WRITER – RAKESH TRIPATHI
बरसात की उस रात पुरी स्टेशन पर सिर्फ दो आवाज़ें साफ सुनाई दे रही थीं…
पहली, प्लेटफॉर्म पर टपकते पानी की।
दूसरी… किसी औरत के पायल की, जो हर बार पीछे मुड़ने पर गायब हो जाती थी।
स्टेशन की घड़ी रात के 11:47 दिखा रही थी। हवा में समुद्र की नमी घुली हुई थी। पुराने लाउडस्पीकर से टूटी हुई आवाज़ बार-बार एक ही अनाउंसमेंट दोहरा रही थी — “यात्रीगण कृपया ध्यान दें…”

लेकिन प्लेटफॉर्म पर कोई यात्री था ही नहीं।
सिर्फ नील।
नील ने बैग कंधे पर ठीक किया और मोबाइल की स्क्रीन देखी। नेटवर्क बार बार गायब हो रहा था। उसने टैक्सी वाले को फिर कॉल लगाया, लेकिन इस बार भी सिर्फ कट-कट की आवाज़ आई।
“साला… ऐसी जगह होटल बुक करना ही नहीं चाहिए था…” उसने धीरे से बड़बड़ाया।
पुरी शहर से लगभग तीस किलोमीटर दूर एक पुराना ब्रिटिशकालीन गेस्टहाउस था — “सी व्यू रेस्ट हाउस।”
Odisha Ki Sachchi Horror Story ऑनलाइन उसकी तस्वीरें काफी अच्छी दिखी थीं। समुद्र के किनारे, शांत जगह, कम भीड़… यही सोचकर उसने वहाँ तीन दिन रुकने का प्लान बनाया था। लेकिन स्टेशन पर उतरने के बाद से ही सब कुछ अजीब लगने लगा था।
तभी प्लेटफॉर्म के आखिरी कोने से एक बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे उसकी तरफ आया। उसके हाथ में लालटेन थी। बारिश की वजह से उसका चेहरा आधा अंधेरे में छिपा हुआ था।
“सी व्यू रेस्ट हाउस?” बूढ़े ने खुद ही पूछा।
नील थोड़ा चौंका। “हाँ… आपको कैसे पता?”
बूढ़ा हल्का मुस्कुराया। उसके दाँतों में तंबाकू फँसा था।
“वहाँ जाने वाले लोग अक्सर इसी टाइम उतरते हैं…”
उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जिसने नील को असहज कर दिया।
“गाड़ी बाहर है,” बूढ़े ने कहा।
स्टेशन के बाहर पुरानी सफेद एम्बेसडर खड़ी थी। उसके बोनट पर बारिश की बूंदें लगातार गिर रही थीं। दूर कहीं समुद्र गरज रहा था।
नील पीछे वाली सीट पर बैठ गया।
गाड़ी चल पड़ी।
शहर की रोशनी धीरे-धीरे पीछे छूटने लगी। सड़क सुनसान होती गई। दोनों तरफ घने पेड़ थे जिनकी शाखाएँ हवा में ऐसे हिल रही थीं जैसे कोई हाथ हिला रहा हो।
करीब बीस मिनट तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।
फिर बूढ़ा अचानक बोला —
“पहली बार आए हो ओडिशा?”
“हाँ।”
“समुद्र पसंद है?”
“बहुत।”
बूढ़े ने शीशे में उसकी तरफ देखा।
“समुद्र अच्छी चीज़ है… लेकिन कुछ चीज़ें वापस भी ले लेता है।”
नील ने जवाब नहीं दिया।
बारिश अब और तेज हो चुकी थी। वाइपर लगातार चल रहे थे लेकिन फिर भी सड़क साफ नहीं दिख रही थी।
तभी अचानक गाड़ी झटके से रुक गई।
“क्या हुआ?” नील ने पूछा।
बूढ़ा चुप रहा।
उसने धीरे से सामने इशारा किया।
सड़क के बीचोंबीच एक औरत खड़ी थी।
सफेद साड़ी। भीगे हुए लंबे बाल। सिर नीचे झुका हुआ।
नील का गला सूख गया।
“ये… कौन है?”
बूढ़े ने तुरंत नजरें फेर लीं।
“देखो मत।”
“क्या मतलब?”
“बस… देखो मत।”
लेकिन नील की नजरें हट नहीं रही थीं। उस औरत के पैर उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।
अचानक उसने सिर उठाया।
उसकी आँखें पूरी काली थीं।
नील चीख पड़ा।
उसी पल बिजली चमकी… और सड़क खाली थी।
कुछ भी नहीं।
“क्या—”
“बैठे रहो,” बूढ़े ने तेजी से गाड़ी आगे बढ़ाई।
अब उसकी आवाज़ पहले जैसी शांत नहीं थी। हाथ भी काँप रहे थे।
“वो क्या था?” नील ने डरते हुए पूछा।
बूढ़े ने इस बार कोई जवाब नहीं दिया।
करीब दस मिनट बाद गाड़ी एक पुराने लोहे के गेट के सामने रुकी।
ऊपर जंग लगा बोर्ड टेढ़ा लटक रहा था —
“SEA VIEW REST HOUSE”
अंदर पूरा परिसर अंधेरे में डूबा हुआ था। सिर्फ एक खिड़की में पीली रोशनी जल रही थी।
नील नीचे उतरा।
बारिश रुक चुकी थी लेकिन हवा बेहद ठंडी हो गई थी।
“सुनो…” बूढ़ा धीरे से बोला।
नील उसकी तरफ मुड़ा।
“अगर रात में समुद्र से किसी औरत के रोने की आवाज़ आए… तो खिड़की मत खोलना।”
नील कुछ बोल पाता उससे पहले गाड़ी वापस मुड़ गई।
उसने अकेले गेस्टहाउस की तरफ देखा।
पूरा भवन ऐसा लग रहा था जैसे कई सालों से वहाँ कोई नहीं रहा हो। दीवारों पर काई जमी थी। बरामदे की लकड़ियाँ सड़ चुकी थीं।
दरवाज़ा खुद-ब-खुद चर्ररर की आवाज़ के साथ खुला।
अंदर लगभग पचास साल पुरानी गंध थी। नमी, सीलन और किसी पुराने बंद कमरे जैसी।
रिसेप्शन पर एक दुबला आदमी बैठा था। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे।
“बुकिंग?” उसने बिना ऊपर देखे पूछा।
“नील…”
उस आदमी ने रजिस्टर खोला।
कुछ सेकंड बाद बोला —
“कमरा नंबर 203।”
उसने चाबी आगे बढ़ा दी।
नील ने पूछा, “यहाँ और भी लोग रुके हैं?”
आदमी ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
“आज नहीं।”
ऊपर जाते वक्त लकड़ी की सीढ़ियाँ अजीब आवाज़ें कर रही थीं। जैसे कोई उसके पीछे धीरे-धीरे चल रहा हो।
203 का दरवाज़ा खुलते ही ठंडी हवा का झोंका अंदर आया।
कमरा बड़ा था। एक पुराना पंखा। लकड़ी का बिस्तर। खिड़की के बाहर काला समुद्र।
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लहरों की आवाज़ लगातार आ रही थी।
नील ने बैग रखा और खुद को शांत करने की कोशिश की।
“सब दिमाग का खेल है…” उसने खुद से कहा।
लेकिन तभी…
टक… टक… टक…
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
नील जम गया।
“क… कौन?”
कोई जवाब नहीं।
फिर वही दस्तक।
धीरे-धीरे।
टक… टक… टक…
नील दरवाज़े तक गया। साँसें तेज हो चुकी थीं।
उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ लंबा खाली गलियारा… और उसके आखिर में खड़ी एक छोटी लड़की।
लगभग आठ साल की।
गीले बाल। फटी हुई फ्रॉक।
वो नील को घूर रही थी।
“बेटा… तुम यहाँ अकेली क्या कर रही हो?”
लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस धीरे से हाथ उठाकर गलियारे के आखिरी कमरे की तरफ इशारा किया।
कमरा नंबर 217।
फिर वह अचानक भाग गई।
नील कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा। उसके कानों में सिर्फ समुद्र की आवाज़ थी।
लेकिन अब उस आवाज़ के बीच… किसी औरत के रोने की हल्की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
रात करीब 2 बजे नील की नींद अचानक खुली।
कमरे में अजीब ठंड थी।
पंखा बंद था।
मोबाइल की स्क्रीन खुद-ब-खुद ऑन ऑफ हो रही थी।
फिर उसे एहसास हुआ…
कोई उसके बिस्तर के नीचे साँस ले रहा था।
धीमी… भारी साँसें।
नील का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
उसने धीरे से नीचे देखने की कोशिश की।
अंधेरा।
लेकिन अंदर कुछ हिल रहा था।
अचानक बिस्तर के नीचे से औरत की आवाज़ आई —
“मत देखो…”
नील उछलकर पीछे हट गया।
उसी पल बिस्तर के नीचे से किसी चीज़ ने उसका पैर पकड़ लिया।
बरफ जैसे ठंडे हाथ।
नील चीखते हुए गिर पड़ा।
उसने पूरी ताकत से पैर छुड़ाया और दरवाज़े की तरफ भागा।
गलियारा खाली था।
लेकिन अब पूरे होटल में किसी के दौड़ने की आवाज़ गूँज रही थी।
ठक… ठक… ठक… ठक…
ऊपर… नीचे… दीवारों के अंदर…
जैसे कोई पागलों की तरह भाग रहा हो।
नील सीढ़ियों से नीचे उतरा। रिसेप्शन खाली था।
लेकिन रजिस्टर खुला पड़ा था।
उस पर पानी की बूंदें गिर रही थीं।
नील ने अनजाने में रजिस्टर की तरफ देखा… और उसका दिल रुक गया।
203 नंबर कमरे के सामने लिखा नाम था —
“नील शर्मा
Check In: 17 जुलाई 2019”
आज 2026 था।
उसके हाथ काँपने लगे।
तभी पीछे से आवाज़ आई —
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
नील मुड़ा।
वही बूढ़ा टैक्सी ड्राइवर खड़ा था।
“तुम यहाँ कैसे—”
“समय नहीं है,” बूढ़ा तेजी से बोला।
“अगर सूरज निकलने से पहले यहाँ से नहीं निकले… तो तुम भी यहीं रह जाओगे।”
“ये जगह है क्या?”
बूढ़े की आँखें डर से भरी थीं।
“सात साल पहले यहाँ एक लड़की गायब हुई थी। उसके बाद जो भी यहाँ रुका… वो जिंदा नहीं लौटा।”
“लेकिन मेरा नाम… 2019 में कैसे—”
“क्योंकि तुम पहले भी यहाँ आ चुके हो।”
नील के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“क्या बकवास है?”
बूढ़े ने जेब से पुरानी फोटो निकाली।
उसमें चार लोग समुद्र किनारे खड़े थे।
उनमें से एक… नील था।
लेकिन तस्वीर पुरानी थी। कम से कम सात-आठ साल पुरानी।
“ये… नहीं हो सकता…”
“तुम्हें कुछ याद नहीं क्योंकि उस रात तुम अकेले बचे थे।”
नील की साँसें तेज हो गईं।
तस्वीर में एक लड़की भी थी। वही चेहरा… जो सड़क पर दिखा था।
“उसका नाम मीरा था,” बूढ़ा बोला।
“वो तुम्हारे साथ यहाँ आई थी।”
नील के दिमाग में अचानक तेज दर्द उठा।
कुछ टूटी हुई यादें लौटने लगीं।
समुद्र… बारिश… चीख…
और खून।
“नहीं…” नील पीछे हट गया।
“उस रात तुम लोगों ने शराब पी रखी थी। तूफान आया। बाकी सब वापस चले गए… लेकिन मीरा गायब हो गई।”
“मैंने कुछ नहीं किया…”
बूढ़ा चुप रहा।
फिर धीरे से बोला —
“सच बोलो।”
नील का चेहरा पीला पड़ चुका था।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“मैं… मैं उसे छोड़कर भाग गया था…”
यादें अब साफ होने लगीं।
मीरा समुद्र में फँस गई थी।
वो मदद के लिए चिल्ला रही थी।
लेकिन नील डर गया था।
वो भाग गया।
अकेला।
अगले दिन पुलिस आई लेकिन मीरा की लाश कभी नहीं मिली।
“तब से वो यहीं है,” बूढ़ा बोला।
“जो लोग डरकर अपनों को छोड़ देते हैं… वो उन्हें जाने नहीं देती।”
ऊपर से अचानक लड़की की चीख सुनाई दी।
पूरा होटल काँप उठा।
दरवाज़े अपने आप खुलने बंद होने लगे।
समुद्र की आवाज़ अब बहुत करीब आ रही थी।
जैसे लहरें होटल के अंदर घुस रही हों।
बूढ़ा चिल्लाया —
“भागो!”
दोनों बाहर की तरफ दौड़े।
लेकिन मुख्य दरवाज़ा बंद हो चुका था।
तभी पीछे से पायल की आवाज़ आई।
छन्न… छन्न… छन्न…
नील धीरे-धीरे मुड़ा।
गलियारे के आखिर में मीरा खड़ी थी।
उसका चेहरा पानी में सड़े हुए शरीर जैसा लग रहा था। आँखों से काला पानी बह रहा था।
लेकिन सबसे डरावनी बात थी उसकी आवाज़।
वो रो नहीं रही थी।
वो हँस रही थी।
“तुम फिर भागोगे, नील?”
नील काँपने लगा।
“मीरा… मुझे माफ कर दो…”
वो धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगी।
फर्श पर उसके पैरों से समुद्री पानी फैल रहा था।
“मैं बहुत देर तक तुम्हारा इंतज़ार करती रही…”
हर शब्द के साथ कमरे का तापमान गिरता जा रहा था।
“मैं डर गया था…” नील रो पड़ा।
“मैं मरना नहीं चाहता था…”
मीरा उसके बिल्कुल सामने आ गई।
“और मैं मरना चाहती थी?”
अचानक पूरे होटल की लाइट्स जलने बुझने लगीं।
दीवारों से पानी निकलने लगा।
ऊपर की छत से किसी के घसीटे जाने की आवाज़ आ रही थी।
बूढ़ा पीछे हट गया।
“अब कोई नहीं बचा सकता…”
मीरा ने धीरे से नील का हाथ पकड़ा।
बरफ जैसा ठंडा।
तभी नील को महसूस हुआ… उसका हाथ धीरे-धीरे भीग रहा है।
उसने नीचे देखा।
उसकी हथेली से समुद्री कीचड़ टपक रही थी।
उसके नाखून काले हो चुके थे।
त्वचा सड़ने लगी थी।
“ये… क्या हो रहा है?”
मीरा मुस्कुराई।
“तुम उस रात बचे ही नहीं थे।”
नील की आँखें फैल गईं।
अचानक सारी यादें वापस आ गईं।
तूफान की रात…
वो मीरा को छोड़कर भागा था।
लेकिन होटल लौटते वक्त एक विशाल लहर उसे भी बहाकर ले गई थी।
उसकी लाश भी कभी नहीं मिली।
नील पीछे लड़खड़ा गया।
“नहीं… नहीं…”
बूढ़े ने धीरे से सिर झुका लिया।
“मैं हर साल तुम्हें स्टेशन से लेने आता हूँ…”
“क्या?”
“क्योंकि हर साल तुम वापस आ जाते हो।
उसी रात।
उसी ट्रेन से।
सब भूलकर।”
नील की आँखों से आँसू बहने लगे।
“तो… मैं…?”
“सात साल से मरे हुए हो।”
पूरा होटल अचानक शांत हो गया।
सिर्फ समुद्र की आवाज़ बची।
मीरा ने पहली बार नरम आवाज़ में कहा —
“अब भागना बंद करो।”
धीरे-धीरे होटल की दीवारें गायब होने लगीं।
चारों तरफ सिर्फ काला समुद्र था।
ठंडी हवा।
तूफान।
और दूर कहीं… डूबते हुए लोगों की चीखें।
अगली सुबह स्थानीय मछुआरों को समुद्र किनारे एक पुराना कैमरा मिला।
उसमें आखिरी रिकॉर्डिंग चालू थी।
वीडियो में तूफानी रात दिख रही थी।
एक लड़की मदद के लिए चिल्ला रही थी।
कैमरा पकड़े लड़के की साँसें तेज थीं।
वो बार-बार कह रहा था —
“मुझे माफ कर दो… मुझे माफ कर दो…”
फिर अचानक विशाल लहर कैमरे पर आकर टकराई।
वीडियो खत्म।
उस कैमरे की तारीख थी —
17 जुलाई 2019।
लेकिन सबसे डरावनी बात कुछ और थी।
वीडियो के आखिरी फ्रेम में…
समुद्र किनारे दो लोग खड़े दिखाई दे रहे थे।
एक नील।
और उसके बगल में… वही बूढ़ा ड्राइवर।
दोनों सीधे कैमरे की तरफ देख रहे थे।
और मुस्कुरा रहे थे।
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