PG में रहने वाली चुड़ैल | Delhi Haunted PG Horror Story in Hindi

दिल्ली में नौकरी मिलने के बाद सबसे बड़ी समस्या नौकरी नहीं थी। समस्या थी रहने की जगह। जो लोग कभी दिल्ली में किराए का कमरा ढूंढ़ चुके हैं, वे जानते हैं कि यहां मकान ढूंढ़ना किसी परीक्षा से कम नहीं होता। कहीं किराया बहुत ज्यादा, कहीं मालिक के अजीब नियम, कहीं लोकेशन इतनी दूर कि ऑफिस पहुंचने में ही आधा दिन निकल जाए। PG में रहने वाली चुड़ैल

लगभग एक हफ्ते तक भटकने के बाद मुझे एक PG मिला।

दक्षिण दिल्ली की एक पुरानी गली में।

PG में रहने वाली चुड़ैल

बाहर से देखने पर इमारत बिल्कुल सामान्य लगती थी। चार मंजिला बिल्डिंग। नीचे एक छोटी किराने की दुकान। सामने चाय वाला। आसपास कई दूसरे PG और किराए के फ्लैट।

पहली नजर में कुछ भी असामान्य नहीं लगा।

PG की मालकिन एक अधेड़ उम्र की महिला थीं। उनका व्यवहार भी काफी अच्छा था।

उन्होंने कमरा दिखाया।

कमरा छोटा था लेकिन साफ था।

एक बेड, एक अलमारी, एक स्टडी टेबल और खिड़की जो पीछे की तरफ खुलती थी।

मुझे जगह पसंद आ गई।

किराया भी आसपास के इलाकों से कम था।

यही बात मुझे थोड़ी अजीब लगी।

दिल्ली में कोई अच्छी चीज इतनी सस्ती आसानी से नहीं मिलती।

लेकिन उस समय मेरे पास ज्यादा विकल्प नहीं थे।

मैंने उसी दिन एडवांस जमा किया और अगले दिन सामान लेकर शिफ्ट हो गया।

शुरुआती दो दिन बिल्कुल सामान्य गुजरे।

सुबह ऑफिस।

शाम को वापस।

रात को खाना खाकर सो जाना।

लेकिन तीसरी रात कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे पहली बार असहज कर दिया।

करीब दो बजे मेरी आंख खुली।

कारण समझ नहीं आया।

कमरे में पूरा अंधेरा था।

सिर्फ खिड़की से आती स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

मैं करवट बदलकर फिर सोने ही वाला था कि मुझे लगा कोई गलियारे में चल रहा है।

धीरे-धीरे।

जैसे कोई नंगे पैर फर्श पर चल रहा हो।

टप…

फिर कुछ सेकंड की खामोशी।

फिर एक और कदम।

आवाज बहुत हल्की थी।

इतनी कि शायद कोई और सुन भी न पाए।

मैंने सोचा शायद कोई दूसरा लड़का वॉशरूम जा रहा होगा।

PG में कई लोग रहते थे।

ऐसी आवाजें सामान्य थीं।

मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

लेकिन अगले दिन सुबह नाश्ते के समय मैंने बाकी लड़कों से पूछा।

“कल रात कौन जाग रहा था?”

सबने एक-दूसरे की तरफ देखा।

फिर एक लड़का बोला,

“किस समय?”

“करीब दो बजे।”

उसका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

“तुमने भी सुना?”

उसके इतना कहते ही टेबल पर कुछ सेकंड के लिए अजीब खामोशी छा गई।

मैंने हंसते हुए पूछा,

“क्या सुना?”

लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया।

विषय बदल दिया गया।

उस समय मुझे लगा शायद ये लोग मजाक कर रहे हैं।

लेकिन अगले कुछ दिनों में मुझे समझ आने लगा कि बात मजाक की नहीं थी।

रात के दो बजे के बाद अक्सर गलियारे में कदमों की आवाज सुनाई देती।

धीमी।

नियमित।

जैसे कोई एक सिरे से दूसरे सिरे तक चलता हो।

कभी ऊपर।

कभी नीचे।

लेकिन जब भी कोई बाहर निकलकर देखता…

गलियारा खाली मिलता।

एक सप्ताह बाद मैंने पहली बार उसे देखा।

उस रात ऑफिस से लौटने में देर हो गई थी।

कमरे में पहुंचते-पहुंचते लगभग ग्यारह बज चुके थे।

मैंने खाना खाया और फोन देखते-देखते सो गया।

पता नहीं कितनी देर बाद अचानक मेरी नींद खुली।

इस बार कारण स्पष्ट था।

कमरे के बाहर किसी महिला के रोने की आवाज आ रही थी।

बहुत धीमी।

लेकिन साफ।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई दूर बैठकर लगातार सिसक रहा हो।

मैं कुछ सेकंड तक चुपचाप सुनता रहा।

फिर धीरे से दरवाजा खोला।

गलियारा खाली था।

पीली ट्यूबलाइट झिलमिला रही थी।

आवाज फिर आई।

इस बार ऊपर की मंजिल से।

मैंने सीढ़ियों की तरफ देखा।

और वहीं मेरी सांस रुक गई।

सीढ़ियों के मोड़ पर कोई खड़ा था।

एक महिला।

लंबे बाल।

सफेद कपड़े।

उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था।

मैं कुछ समझ पाता उससे पहले ऊपर वाली ट्यूबलाइट अचानक बुझ गई।

पूरा हिस्सा अंधेरे में डूब गया।

मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।

मैं तुरंत कमरे में वापस घुसा और दरवाजा बंद कर लिया।

PG में रहने वाली चुड़ैल

उस रात शायद ही मैं सो पाया।

सुबह होते ही मैंने खुद को समझाया कि नींद की हालत में भ्रम हुआ होगा।

लेकिन अंदर कहीं न कहीं डर बैठ चुका था।

उस शाम मैंने नीचे चाय वाले से बातचीत शुरू की।

बातों-बातों में PG का जिक्र निकला।

चाय वाला कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला,

“आप नए हो न?”

“हां।”

उसने धीरे से सिर हिलाया।

“बस रात में ज्यादा घूमना मत।”

मैं हंस पड़ा।

“क्यों?”

लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।

सिर्फ चाय का गिलास आगे बढ़ा दिया।

उसकी आंखों में ऐसा भाव था जिसने मेरा मजाक वहीं खत्म कर दिया।

उस रात पहली बार मुझे एहसास हुआ कि शायद इस इमारत के बारे में कुछ ऐसा है जिसके बारे में सब जानते हैं…

सिवाय मेरे।

और मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ दिनों में मैं ऐसी चीज देखने वाला हूं जिसके बाद उस PG में एक भी रात गुजारना मेरे लिए मुश्किल हो जाएगा…

अगले दिन ऑफिस में मेरा ध्यान काम पर बिल्कुल नहीं था।

लैपटॉप खुला था, स्क्रीन पर फाइलें भी खुली थीं, लेकिन दिमाग बार-बार उसी सीढ़ी के मोड़ पर अटक रहा था।

वह औरत सच में थी?

या मैंने आधी नींद में कुछ देख लिया था?

दिल्ली जैसे शहर में इंसान वैसे भी अकेला हो जाता है। भीड़ बहुत होती है, लेकिन किसी से बात करने का मन नहीं करता। उस दिन मुझे पहली बार PG का कमरा खाली नहीं, बल्कि अजीब तरह से भरा हुआ लगने लगा था।

शाम को वापस लौटा तो गेट के पास वही चाय वाला बैठा था।

मैंने चाय ली और बिना घुमाए सीधा पूछ लिया,

“भैया, इस PG में पहले कुछ हुआ है क्या?”

उसने मेरी तरफ देखा।

इस बार वह मुस्कुराया नहीं।

“आपको क्या दिखा?”

उसका सवाल सुनकर मेरे हाथ का गिलास रुक गया।

मैंने धीरे से कहा,

“ऊपर सीढ़ियों पर कोई औरत खड़ी थी।”

उसने नजरें झुका लीं।

कुछ देर चुप रहने के बाद बोला,

“भाईसाहब, ये PG पहले लड़कियों का था।”

मैं चुप हो गया।

उसने आगे कहा,

“कई साल पहले यहां एक लड़की रहती थी। नाम था सुमेधा। शांत स्वभाव की थी। किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी। पढ़ाई करती थी, पार्ट टाइम काम भी करती थी। घर वालों से दूर रहती थी। लोग कहते थे कि वह हमेशा डर में रहती थी, जैसे किसी से छिप रही हो।”

मैंने पूछा,

“फिर?”

चाय वाला थोड़ा आगे झुका।

“फिर एक दिन वह अचानक गायब हो गई।”

“गायब?”

“हां। उसका सामान कमरे में था। फोन कमरे में था। बैग भी वहीं था। लेकिन लड़की नहीं मिली।”

मेरे मुंह से अपने-आप निकला,

“पुलिस?”

“आई थी। खूब पूछताछ हुई। PG बंद भी हुआ कुछ महीनों के लिए। बाद में मालकिन ने फिर शुरू कर दिया। पहले लड़कियों का PG था, फिर लड़कों का बना दिया।”

मेरी रीढ़ में ठंडक उतर गई।

“और लोग कहते हैं… वही दिखती है?”

चाय वाले ने सीधे जवाब नहीं दिया।

बस इतना बोला,

“जो लोग उसे देखने लगते हैं, वे ज्यादा दिन यहां नहीं टिकते।”

मैं कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा।

दिल्ली की सड़क पर गाड़ियां निकल रही थीं। हॉर्न बज रहे थे। लोग बातें कर रहे थे। दुनिया बिल्कुल सामान्य चल रही थी।

लेकिन मेरे लिए सब कुछ बदल चुका था।

उस रात मैं कमरे में जल्दी आ गया।

मन कर रहा था कि सामान बांधकर तुरंत निकल जाऊं, लेकिन दिल्ली में रहने की जगह छोड़ना इतना आसान नहीं होता। सिक्योरिटी जमा थी। नया कमरा मिलना मुश्किल था। ऑफिस पास था।

मैंने खुद को समझाया कि शायद ये सब अफवाह है।

रात को खाना खाकर मैंने कमरे की लाइट बंद नहीं की।

फोन चार्ज पर लगाया, दरवाजे की कुंडी दो बार चेक की और बिस्तर पर लेट गया।

करीब आधी रात तक सब शांत रहा।

फिर ऊपर से हल्की-सी आवाज आई।

जैसे कोई भारी चीज घसीट रहा हो।

मैं उठकर बैठ गया।

आवाज कुछ सेकंड बाद बंद हो गई।

फिर गलियारे में वही कदमों की आहट शुरू हुई।

इस बार कदम मेरे कमरे के सामने आकर रुक गए।

मैंने सांस रोक ली।

दरवाजे के नीचे से बाहर की रोशनी अंदर आ रही थी।

उस रोशनी पर अचानक एक काली परछाईं पड़ी।

कोई दरवाजे के बाहर खड़ा था।

मैंने हिम्मत करके पूछा,

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं आया।

कुछ देर तक खामोशी रही।

फिर दरवाजे पर बहुत हल्की आवाज आई।

जैसे किसी ने नाखून से लकड़ी को छुआ हो।

मैंने फिर पूछा,

“कौन?”

इस बार बाहर से एक लड़की की धीमी आवाज आई।

“दरवाजा खोलो…”

मेरा गला सूख गया।

आवाज में अजीब ठंडापन था।

वह आवाज न बहुत तेज थी, न बहुत कमजोर।

लेकिन उसमें इंसानी गर्मी नहीं थी।

मैंने फोन उठाया और अपने रूममेट वाले ग्रुप में मैसेज किया।

“किसी ने मेरे दरवाजे पर knock किया क्या?”

कुछ सेकंड बाद एक लड़के का reply आया।

“मत खोलना।”

बस दो शब्द।

मत खोलना।

मेरे हाथ कांप गए।

बाहर फिर वही आवाज आई।

“मुझे अंदर आने दो…”

मैंने पूरा शरीर कंबल में छिपा लिया।

बचपन में सुनी कहानियां याद आने लगीं, जिन पर कभी हंसी आती थी। लेकिन डर की असली बात यही है। जब वह सामने खड़ा हो, तो तर्क सबसे पहले भागता है।

करीब दस मिनट बाद बाहर की परछाईं हट गई।

कदमों की आवाज धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ चली गई।

मैंने पूरी रात आंखें बंद नहीं कीं।

सुबह होते ही कमरे से बाहर निकला तो गलियारे में बाकी दो लड़के खड़े थे।

उनमें से एक ने मेरी तरफ देखकर पूछा,

“उसने तुमसे बात की?”

मैंने हैरानी से पूछा,

“तुम लोगों को पता था?”

वह बोला,

“यहां सबको पता है। बस नए आदमी को पहले कोई नहीं बताता, वरना कोई रुकता ही नहीं।”

मुझे गुस्सा भी आया और डर भी।

“तो तुम लोग रहते क्यों हो यहां?”

दूसरा लड़का कड़वी हंसी हंसा।

“किराया कम है। ऑफिस पास है। और सच बोलूं तो… शुरुआत में सबको लगता है संभाल लेंगे।”

मैंने पूछा,

“फिर?”

उसने मेरी आंखों में देखते हुए कहा,

“फिर वह किसी एक को चुनती है।”

कमरे के अंदर हवा जैसे भारी हो गई।

“मतलब?”

वह बोला,

“पहले कदमों की आवाज। फिर रोना। फिर सीढ़ियों पर दिखना। फिर दरवाजे पर आना। उसके बाद…”

वह चुप हो गया।

“उसके बाद क्या?”

उसने धीमे से कहा,

“फिर वह कमरे के अंदर दिखती है।”

मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसकती महसूस हुई।

मैंने उसी दिन PG छोड़ने का फैसला कर लिया।

लेकिन बात इतनी आसान नहीं थी।

ऑफिस से छुट्टी नहीं मिल रही थी। नया कमरा देखने का समय नहीं था। ऊपर से मालकिन ने साफ कह दिया कि सिक्योरिटी वापस चाहिए तो एक महीने पहले बताना पड़ेगा।

मैंने बहस की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

उस रात मैं होटल जाने का सोच रहा था, मगर फिर खर्च देखकर रुक गया।

बस एक रात और।

मैंने खुद से यही कहा।

सिर्फ एक रात और।

रात को कमरे में जाते ही मैंने कुर्सी दरवाजे के आगे लगा दी।

लाइट चालू रखी।

फोन हाथ में रखा।

फिर भी नींद आ गई।

कभी-कभी डर से भी इंसान थक जाता है।

पता नहीं कितनी देर बाद मेरी आंख खुली।

कमरे की लाइट बंद थी।

मैंने खुद तो बंद नहीं की थी।

मैंने फोन उठाया।

बैटरी 6% थी।

कमरा अंधेरे में डूबा हुआ था।

तभी मुझे एहसास हुआ कि खिड़की खुली है।

ठंडी हवा अंदर आ रही थी।

मैंने साफ याद किया था कि सोने से पहले खिड़की बंद की थी।

मैं उठने ही वाला था कि मेरी नजर स्टडी टेबल पर गई।

वहां कोई बैठा था।

पीठ मेरी तरफ।

लंबे बाल कुर्सी से नीचे तक लटक रहे थे।

मेरे शरीर का एक-एक हिस्सा सुन्न हो गया।

वह बिल्कुल स्थिर बैठी थी।

जैसे बहुत देर से वहां मेरा इंतजार कर रही हो।

मैंने बोलने की कोशिश की, लेकिन आवाज नहीं निकली।

तभी कुर्सी धीरे-धीरे घूमने लगी।

धीरे।

बहुत धीरे।

और फिर पहली बार मैंने उसका चेहरा देखा।

चेहरा पूरा सफेद नहीं था।

वह किसी फिल्मी चुड़ैल जैसा नहीं दिख रहा था।

यही बात उसे और ज्यादा डरावना बना रही थी।

वह चेहरा किसी सामान्य लड़की का था।

लेकिन आंखें…

आंखें बिल्कुल खाली थीं।

जैसे अंदर कोई इंसान बचा ही न हो।

उसने मुझे देखा।

और बहुत धीमे से मुस्कुराई।

फिर बोली,

“तुमने भी मेरी बात नहीं सुनी…”

मेरे कानों में भनभनाहट भर गई।

मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा,

“कौन हो तुम?”

उसकी मुस्कान गायब हो गई।

कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।

उसने धीमे से कहा,

“जिसे इस कमरे ने निगल लिया।”

मेरी नजर अनजाने में कमरे की दीवारों पर चली गई।

दीवारों पर कुछ नहीं था।

लेकिन उस पल मुझे लगा जैसे यह कमरा सिर्फ ईंट और सीमेंट का नहीं है।

यह किसी पुराने राज़ को छिपाकर बैठा है।

मैंने कांपती आवाज में पूछा,

“तुम चाहती क्या हो?”

वह कुछ सेकंड तक मुझे देखती रही।

फिर उसने अपना हाथ उठाया और अलमारी की तरफ इशारा किया।

“ऊपर वाला हिस्सा खोलो।”

मैंने अलमारी की तरफ देखा।

ऊपर एक छोटा सा बंद खांचा था, जिसे मैंने अब तक कभी इस्तेमाल नहीं किया था।

मैंने डरते हुए कहा,

“क्या है उसमें?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस कुर्सी पर बैठी रही।

मैं धीरे-धीरे बिस्तर से उतरा।

मेरे पैर कांप रहे थे।

मैंने अलमारी के ऊपर वाले खांचे का छोटा दरवाजा खोला।

अंदर धूल थी।

कुछ पुराने अखबार।

एक टूटा हुआ हेयर क्लिप।

और एक छोटी डायरी।

डायरी के कवर पर उंगलियों के निशान जैसी काली परत जमी थी।

मैंने जैसे ही डायरी हाथ में ली, कमरे की लाइट अचानक जल उठी।

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

कुर्सी खाली थी।

वह जा चुकी थी।

लेकिन उसकी आवाज कमरे में अब भी तैर रही थी।

“सच लिखो…”

मैंने डायरी खोली।

पहले पन्ने पर बहुत हल्के अक्षरों में लिखा था—

“अगर यह डायरी किसी को मिले, तो समझ जाना कि मैं खुद नहीं गई थी।”

मेरे हाथ कांपने लगे।

अब यह सिर्फ डर की बात नहीं थी।

यह किसी लड़की की अधूरी कहानी थी।

और शायद इसी वजह से वह PG आज तक शांत नहीं हुआ था।

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