BY GOVIND BHISE
करंजवाड़ी गाँव में रात अचानक नहीं उतरती थी। वह धीरे-धीरे आती थी।
पहले खेतों के किनारे धुंध जैसी परछाइयाँ जमा होतीं, फिर बबूल के पेड़ों के नीचे अंधेरा गाढ़ा होने लगता, और आखिर में पूरा गाँव ऐसे चुप हो जाता जैसे किसी ने दूर से उसकी आवाज़ बंद कर दी हो। Kala Ullu Horror Story

दिन में करंजवाड़ी साधारण गाँव था।
कच्ची गलियाँ, पुराने मकान, खेतों से लौटते लोग, मंदिर की घंटी, और चाय की दुकान पर रोज वही राजनीति और फसल की बातें।
लेकिन जैसे ही अमावस्या पास आती, गाँव का रंग बदल जाता।
लोग शाम से पहले दरवाज़े बंद कर लेते।
बच्चों को छत पर नहीं जाने दिया जाता।
और कोई भी पुराने ठाकुरवाले घर की तरफ रात में नहीं निकलता था।
उस घर को गाँव वाले अब सिर्फ “पुराना वाड़ा” कहते थे।
कागज़ों में वह घर देशमुख परिवार के नाम था, लेकिन गाँव के लोगों के लिए वह जगह एक चेतावनी थी।
वहाँ एक सूखा कुआँ था।
पीछे बंजर खेत था।
और छत की टूटी मुंडेर पर कई सालों से एक अजीब बात कही जाती थी।
अगर अमावस्या की रात उस छत पर काला उल्लू बैठ जाए, तो समझ लो मिट्टी के नीचे दबा कोई सच करवट ले रहा है।
निखिल देशमुख को यह सब बकवास लगता था।
वह शहर में पला-बढ़ा था। गाँव से उसका रिश्ता बस छुट्टियों और पारिवारिक झगड़ों तक सीमित था। दादा के समय की जमीन, पुराने कागज़, और बंद पड़ा घर—यही सब कारण था कि उसे इतने साल बाद करंजवाड़ी आना पड़ा।
उसका इरादा साफ था।
घर देखना है।
कागज़ ढूँढ़ने हैं।
जमीन बेचनी है।
और दो दिन में वापस लौट जाना है।
लेकिन गाँव में घुसते ही उसे महसूस हो गया कि यहाँ लोग उसके आने से खुश नहीं हैं।
बस स्टैंड जैसी छोटी जगह पर जब वह उतरा, तो कुछ लोगों ने उसे पहचान लिया।
“देशमुख घर का लड़का है,” किसी ने धीमे से कहा।
निखिल ने सुना, लेकिन अनसुना कर दिया।
वह बैग लेकर चाय की दुकान पर रुका।
दुकान पर बैठे बूढ़े आदमी ने उसे सिर से पैर तक देखा।
“पुराने वाड़े में रुकने आया है?”
“हाँ,” निखिल ने चाय लेते हुए कहा।
“आज मत रुक।”
निखिल हल्का मुस्कुराया।
“क्यों? घर गिरने वाला है क्या?”
बूढ़ा आदमी हँसा नहीं।
उसने बस आकाश की तरफ देखा।
“कल अमावस्या है।”
निखिल ने चाय का कप नीचे रखा।
“तो?”
दुकान पर अचानक चुप्पी फैल गई।
दो आदमी जो अभी तक बातें कर रहे थे, उठकर चले गए।
बूढ़े ने धीमी आवाज़ में कहा—
“उस घर की छत पर जो बैठता है, वह पक्षी नहीं होता। वह हिसाब मांगने आता है।”
निखिल को झुंझलाहट हुई।
“देखिए काका, मैं बस कागज़ लेने आया हूँ। मुझे ये गाँव वाले डराने वाले किस्से मत सुनाइए।”
बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“किस्से डराने के लिए नहीं होते बेटा। कुछ किस्से इसलिए बचे रहते हैं ताकि अगली गलती न हो।”
निखिल ने पैसे रखे और बिना जवाब दिए उठ गया।
पुराना वाड़ा गाँव के आखिरी छोर पर था।
रास्ता संकरा था।
दोनों तरफ सूखी झाड़ियाँ थीं।
घर बाहर से ही थका हुआ दिखता था। दीवारों की पलस्तर झड़ चुकी थी। लकड़ी का बड़ा दरवाज़ा टेढ़ा लटक रहा था। आँगन में मिट्टी जमा थी और बीच में टूटा हुआ पत्थर का चबूतरा था।
निखिल ने ताला खोला।
दरवाज़ा धक्का देते ही अंदर से बंद हवा की बदबू निकली।
पुराने लकड़ी, सीलन, धूल और किसी ऐसी चीज़ की गंध, जिसे पहचानना मुश्किल था।
उसने खिड़कियाँ खोलीं।
धूप भीतर आई, लेकिन घर फिर भी उजला नहीं लगा।
कमरों में पुराने संदूक, टूटी कुर्सियाँ, पीतल के बर्तन, और दीवारों पर टंगे फीके पड़ चुके फोटो थे।
एक तस्वीर में उसके दादा थे।
कड़क चेहरा।
मोटी मूँछें।
सफेद धोती-कुर्ता।
बगल में उसके पिता बहुत छोटे दिख रहे थे।
और पीछे वही आँगन था।
निखिल ने तस्वीर को देखा और फिर नजर हटा ली।
उसके घर में दादा का नाम इज्जत से लिया जाता था, लेकिन प्यार से नहीं।
शाम तक वह कागज़ तलाशता रहा।
ऊपर वाले कमरे में पुरानी अलमारी मिली।
उसमें जमीन के नक्शे, रसीदें, कुछ चिट्ठियाँ और अदालत के कागज़ थे।
एक फाइल पर लाल रंग से लिखा था—
“पूर्वी खेत”
निखिल ने उसे अलग रख दिया।
यही जमीन बेचनी थी।
रात होते-होते गाँव शांत हो गया।
इतना शांत कि दूर से कुत्ते के भौंकने की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी।
निखिल ने मोबाइल देखा।
नेटवर्क कमजोर था।
उसने खुद से कहा—
“दो दिन की बात है।”
खाना उसने रास्ते से पैक कराया था।
खाकर वह कागज़ देखने बैठ गया।
करीब ग्यारह बजे के बाद अचानक छत से आवाज़ आई।
धप्प।
जैसे कोई भारी चीज़ आकर बैठी हो।
निखिल ने पहले ध्यान नहीं दिया।
फिर आवाज़ आई—
“हूँऊऊ…”
वह रुक गया।
आवाज़ गहरी थी।
सामान्य उल्लू जैसी नहीं।
उसने टॉर्च उठाई और आँगन में आया।
ऊपर मुंडेर पर एक बड़ा काला उल्लू बैठा था।
इतना काला कि अंधेरे में उसका आकार ही मुश्किल से दिख रहा था।
बस दो चमकती हुई गोल आँखें दिखाई दे रही थीं।
निखिल ने ताली बजाई।
“हट!”
उल्लू नहीं हिला।
उसने पत्थर उठाया और छत की तरफ फेंका।
पत्थर मुंडेर से टकराकर नीचे गिरा।
उल्लू बस अपनी गर्दन घुमाकर उसे देखने लगा।
उसकी आँखों में कुछ अजीब था।
डरावना नहीं।
जैसे वह पहचान रहा हो।
निखिल ने गुस्से में कहा—
“देख क्या रहा है?”
उसी पल घर के पीछे सूखी घास में सरसराहट हुई।
निखिल मुड़ा।
कुछ नहीं था।
जब उसने फिर छत की तरफ देखा, उल्लू गायब था।
रात किसी तरह कटी।
सुबह वह चाय की दुकान पर गया।
बूढ़ा आदमी वहीं बैठा था।
निखिल ने बिना भूमिका के पूछा—
“यहाँ काले उल्लू की कहानी क्या है?”
बूढ़े ने चाय का कप नीचे रखा।
“देख लिया?”
निखिल चुप रहा।
बूढ़ा बोला—
“वह हर घर पर नहीं बैठता। जिस घर की मिट्टी में कुछ छुपा हो, उसी घर पर आता है।”
“मतलब?”
“देशमुख वाड़े की मिट्टी बहुत भारी है।”
“आप सीधे बोलिए।”
बूढ़े ने दुकान वाले लड़के को इशारा किया।
लड़का अंदर चला गया।
फिर बूढ़ा धीमे स्वर में बोला—
“तुम्हारे दादा के समय एक औरत गायब हुई थी। उसका नाम रामी था।”
निखिल ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“कौन रामी?”
“पूर्वी खेत उसी के परिवार का था।”
निखिल ने तुरंत कहा—
“गलत। वो जमीन हमारे कागज़ में है।”
“कागज़ हमेशा सच नहीं बताते।”
“फिर वह औरत गई कहाँ?”
बूढ़े ने जवाब देने से पहले लंबी साँस ली।
“कह दिया गया कि रात में गाँव छोड़कर चली गई। अपने बेटे के साथ। लेकिन गाँव के कई लोगों को यकीन नहीं था।”
“और किसी ने पुलिस को नहीं बताया?”
बूढ़े की आँखों में कड़वाहट आ गई।
“उस समय पुलिस भी उसी की सुनती थी जिसके आँगन में बैलगाड़ी ज्यादा खड़ी हो।”
निखिल को बात पसंद नहीं आई।
उसे लगा बूढ़ा उसके परिवार पर कीचड़ उछाल रहा है।
वह उठ गया।
“मुझे अफवाहों में interest नहीं है।”
बूढ़े ने पीछे से कहा—
“तो कागज़ देख लेना। पूर्वी खेत के पुराने नक्शे में नाम मिलेगा।”
घर लौटकर निखिल ने वही फाइल निकाली।
पूर्वी खेत।
कागज़ पुराने थे।
ज्यादातर नाम देशमुख परिवार के थे।
लेकिन सबसे नीचे एक पीला पड़ा नक्शा था।
उस पर हल्की लिखावट में एक नाम था—
रामी जगताप।
निखिल का हाथ रुक गया।
नाम काटा गया था।
ऊपर बाद में नीली स्याही से देशमुख लिखा गया था।
उसने खुद को समझाया—
“पुरानी जमीनों में ऐसा होता है।”
लेकिन मन शांत नहीं हुआ।
दूसरी रात अमावस्या थी।
पूरा गाँव शाम से पहले बंद हो गया।
वाड़े के बाहर से गुजरते समय एक औरत ने उसे दरवाज़ा बंद करने को कहा।
“आज बाहर मत निकलना।”
निखिल ने पूछा—
“क्यों?”
औरत ने सिर्फ इतना कहा—
“जब वह बुलाए, तो पीछा मत करना।”
दरवाज़ा बंद हो गया।
रात गहरी हुई।
आसमान खाली था।
हवा तक नहीं चल रही थी।
करीब आधी रात के आसपास वही आवाज़ फिर आई।
धप्प।
इस बार निखिल का शरीर पहले से तैयार था, लेकिन दिल फिर भी तेज धड़कने लगा।
“हूँऊऊ…”
वह टॉर्च लेकर बाहर आया।
काला उल्लू फिर छत पर बैठा था।
लेकिन इस बार वह अकेला नहीं था।
आँगन की मिट्टी पर निखिल को कुछ निशान दिखाई दिए।
छोटे-छोटे पैरों के निशान।
जैसे कोई बच्चा गीली मिट्टी में चलकर गया हो।
समस्या यह थी कि आँगन सूखा था।
निखिल झुककर देखने लगा।
निशान घर के पीछे की तरफ जा रहे थे।
उसी समय उल्लू उड़कर पीछे वाले बंजर खेत की ओर चला गया।
निखिल को बूढ़े की बात याद आई—
“जब वह बुलाए, तो पीछा मत करना।”
लेकिन मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यही है।
जिस बात से रोका जाता है, वही सबसे ज्यादा खींचती है।
निखिल टॉर्च लेकर पीछे चला गया।
खेत में घास सूखी थी।
कदम रखते ही आवाज़ आती।
चर्र।
चर्र।
काला उल्लू थोड़ी दूर जाकर बैठता, फिर उड़कर आगे चला जाता।
जैसे रास्ता दिखा रहा हो।
करीब दस मिनट बाद वह खेत के उस हिस्से में पहुँचा जहाँ मिट्टी बाकी जगहों से अलग थी।
गहरी।
दबी हुई।
उल्लू एक टेढ़े पत्थर पर बैठ गया।
निखिल ने टॉर्च नीचे की।
वहाँ जमीन पर गोल निशान बने हुए थे।
जैसे कभी कुएँ या गड्ढे का मुँह बंद किया गया हो।
तभी पीछे से बहुत धीमी आवाज़ आई—
“माँ…”
निखिल का गला सूख गया।
उसने टॉर्च घुमाई।
कोई नहीं था।
आवाज़ फिर आई।
इस बार जमीन के नीचे से।
“माँ… अंधेरा है…”
निखिल चीखते हुए पीछे गिरा।
टॉर्च हाथ से छूट गई।
जब उसने उठकर फिर देखा, उल्लू गायब था।
वह भागता हुआ घर लौटा।
उस रात उसने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।
नींद नहीं आई।
सुबह सबसे पहले वह बूढ़े के पास गया।
इस बार उसके चेहरे पर मज़ाक नहीं था।
“रामी का बेटा था?”
बूढ़े ने उसकी हालत देखी।
“हाँ। नाम माधव था। बारह-तेरह साल का।”
“वे दोनों सच में गायब हुए थे?”
बूढ़े ने कहा—
“गायब नहीं हुए। गायब किए गए थे।”
निखिल के भीतर कुछ काँपा।
“किसने?”
बूढ़ा कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
“तुम्हारे दादा अकेले नहीं थे। गाँव के दो और आदमी थे। और एक आदमी जिसने सब देखा था।”
“कौन?”
“गणपत। रामी का बूढ़ा काका। अगले दिन वह भी नहीं मिला।”
निखिल ने सिर पकड़ लिया।
“आपने इतने साल चुप क्यों रखा?”
बूढ़े की आँखें भर आईं।
“क्योंकि मैं तब बच्चा था। मैंने कुछ नहीं देखा था। बस सुना था। और जो सुना, उसे बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी।”
निखिल ने पूछा—
“अगर खुदाई करूँ तो?”
बूढ़ा बोला—
“सच मिट्टी में होगा तो बाहर आएगा। लेकिन ध्यान रखना, सच बाहर आ गया तो वह सिर्फ मरे हुओं को नहीं जगाएगा। जिंदा लोग भी डरेंगे।”
निखिल ने पुलिस को फोन करने की कोशिश की, लेकिन पहले उसे प्रमाण चाहिए था।
वह दिन भर पुराने कागज़, घर की दीवारों और अलमारी के पीछे छुपी चीज़ें देखता रहा।
ऊपर वाले कमरे में एक बंद संदूक था।
जंग लगा ताला तोड़ने में समय लगा।
अंदर कुछ पुराने कपड़े, दादा की डायरी और एक कपड़े में लिपटी पायल मिली।
पायल पर काले धब्बे थे।
डायरी में ज्यादा बातें खेतों, पैसों और झगड़ों की थीं।
लेकिन एक पन्ना बीच से फाड़ा गया था।
उससे पहले लिखा था—
“रामी ने फिर हिस्सा माँगा। यह औरत चुप नहीं बैठेगी।”
अगले पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य बचा था—
“रात को फैसला करना पड़ेगा।”
निखिल ने डायरी बंद कर दी।
अब यह अफवाह नहीं रह गई थी।
शाम तक उसने गाँव के सरपंच को बुलाया।
सरपंच पहले नाराज़ हुआ।
“पुराने मामले मत खोलो। जमीन बेचनी है तो बेचो।”
निखिल ने डायरी सामने रख दी।
“खेत खोदना पड़ेगा।”
सरपंच का चेहरा बदल गया।
“तुम जानते नहीं, क्या कर रहे हो।”
“अब शायद जानना जरूरी है।”
अगली सुबह पुलिस आई।
पहले सबको लगा कुछ नहीं मिलेगा।
लेकिन जब खेत के उस हिस्से की खुदाई शुरू हुई, तो आधे गाँव की भीड़ जमा हो गई।
तीन फीट नीचे मिट्टी बदली।
चार फीट नीचे कपड़े के टुकड़े मिले।
फिर हड्डियाँ।
पहले एक हाथ की हड्डी।
फिर खोपड़ी।
फिर दूसरी छोटी खोपड़ी।
भीड़ में सन्नाटा फैल गया।
खुदाई जारी रही।
कुल तीन कंकाल निकले।
एक औरत।
एक किशोर।
एक बुजुर्ग।
बूढ़ा चायवाला दूर खड़ा रो रहा था।
“रामी… माधव… गणपत…”
निखिल जमीन पर बैठ गया।
उसे लगा जैसे उसके शरीर से सारी ताकत निकल गई हो।
उसके परिवार की इज्जत, वंश, पुरानी हवेली—सब अचानक झूठ की दीवार लगने लगे।
मामला खुल गया।
पुराने रिकॉर्ड निकले।
गाँव के दो बूढ़े लोगों ने बयान दिया कि रामी जमीन का हिस्सा माँग रही थी। देशमुख परिवार ने उसे बदनाम किया। कहा गया कि वह अपशकुन है, जादू-टोना करती है, घरों में मौत लाती है।
लोगों ने दूरी बना ली।
फिर एक रात वह गायब हो गई।
उसका बेटा भी।
और उसका काका भी।
सच इतना सीधा था कि डर और बढ़ गया।
कोई चुड़ैल नहीं थी।
कोई तांत्रिक नहीं था।
सिर्फ लालच था।
और लालच से बड़ा भूत कोई नहीं होता।
निखिल के पिता को शहर से बुलाया गया।
जब पुलिस ने सवाल किए, तो पहले उन्होंने कुछ नहीं माना।
लेकिन डायरी, नक्शे और कंकाल मिलने के बाद उनका चेहरा टूटने लगा।
उन्होंने कहा—
“मैं छोटा था। मैंने सिर्फ इतना देखा था कि बाबा ने कुछ लोगों को रात में बुलाया था। सुबह घर में सब चुप थे। मुझे कहा गया कि अगर कभी किसी से कुछ बोला तो माँ भी नहीं बचेगी।”
निखिल ने पूछा—
“आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”
पिता ने नज़र झुका ली।
“कुछ डर उम्र के साथ खत्म नहीं होते।”
उस रात रामी, माधव और गणपत के अवशेषों का विधि से अंतिम संस्कार किया गया।
गाँव के लोग जमा हुए।
कई लोग रोए।
कई शर्मिंदा दिखे।
निखिल ने पूर्वी खेत बेचने का फैसला बदल दिया।
उसने कहा कि वह जमीन रामी और माधव की याद में गाँव के नाम करेगा।
सबको लगा अब मामला खत्म हो गया।
लेकिन करंजवाड़ी की रातों को इतनी आसानी से शांति नहीं मिलती थी।
अगली शाम निखिल वाड़े में आखिरी बार सामान समेट रहा था।
घर अब पहले जैसा डरावना नहीं लग रहा था।
कम से कम उसे ऐसा लगा।
उसने दादा की तस्वीर दीवार से उतारी।
पीछे धूल जमी थी।
जैसे ही तस्वीर नीचे रखी, दीवार पर पुराने कोयले से बना एक छोटा-सा निशान दिखाई दिया।
वह एक उल्लू का आकार था।
नीचे कुछ लिखा था।
लिखावट बहुत पुरानी थी।
निखिल ने कपड़ा मारकर पढ़ने की कोशिश की।
शब्द धीरे-धीरे साफ हुए—
“जिसने देखा, वह भी दोषी है।”
निखिल समझ नहीं पाया।
तभी बाहर छत से वही आवाज़ आई।
धप्प।
उसका दिल बैठ गया।
वह आँगन में आया।
काला उल्लू फिर मुंडेर पर बैठा था।
लेकिन इस बार उसकी चोंच में कुछ था।
एक पुराना कपड़े का टुकड़ा।
उल्लू ने वह आँगन में गिरा दिया।
निखिल ने उसे उठाया।
उसमें लोहे की एक छोटी चाबी बंधी थी।
चाबी बहुत पुरानी थी।
वह घर के किसी ताले की लग रही थी।
निखिल ने पूरा घर छाना।
आखिर में उसे पूजा वाले कमरे की दीवार में एक छोटा लकड़ी का खाने जैसा हिस्सा मिला, जिसे पहले उसने सिर्फ सजावट समझा था।
चाबी उसी में लगी।
ताला खुला।
अंदर एक पतली कॉपी रखी थी।
कॉपी उसके पिता की थी।
बचपन की लिखावट।
निखिल ने काँपते हाथों से पहला पन्ना खोला।
उसमें तारीख थी।
चालीस साल पुरानी।
और नीचे लिखा था—
“आज बाबा ने रामी काकू को मारा। माधव रो रहा था। गणपत काका भागे नहीं। मैंने सब देखा।”
निखिल के हाथ ठंडे पड़ गए।
वह पन्ने पलटता गया।
हर पन्ने में वही रात लिखी थी।
एक बच्चे की आँखों से।
डर के साथ।
लेकिन आखिरी पन्ने पर जो लिखा था, उसने निखिल की साँस रोक दी।
“बाबा ने कहा था कि अगर मैं चुप रहा तो खेत हमारा रहेगा। मैंने हाँ कहा।”
निखिल पीछे हट गया।
उसके पिता ने सिर्फ सच नहीं छुपाया था।
वह उस सौदे का हिस्सा थे।
छोटे थे, डरे हुए थे, लेकिन चुप्पी से फायदा भी उठाया था।
उसी वक्त दरवाज़े के पास आहट हुई।
निखिल मुड़ा।
उसके पिता खड़े थे।
उनका चेहरा पीला था।
“तुम्हें यह कहाँ मिला?”
निखिल ने कॉपी हाथ में कस ली।
“आप जानते थे।”
पिता ने धीमे से कहा—
“मैं बच्चा था।”
“लेकिन बड़े होकर भी चुप रहे।”
पिता की आँखों में डर से ज्यादा गुस्सा दिखाई दिया।
“तुम समझते नहीं हो। उस समय जो हुआ, उसे वापस नहीं बदला जा सकता।”
निखिल ने कहा—
“लेकिन सच छुपाया जा सकता था? जमीन रखी जा सकती थी? नाम बचाया जा सकता था?”
पिता चिल्लाए—
“हमने जिंदगी भर उस घर का बोझ उठाया है!”
निखिल ने पहली बार शांत आवाज़ में कहा—
“नहीं। बोझ उन्होंने उठाया जो मिट्टी में दबे रहे।”
कुछ सेकंड दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
बाहर उल्लू बोला।
“हूँऊऊ…”
इस बार आवाज़ घर के हर कमरे से टकराई।
दीवारों से धूल झरने लगी।
पिता पीछे हटे।
“इसे जला दो,” उन्होंने कॉपी की तरफ देखते हुए कहा।
“नहीं।”
“निखिल, बात समझो। पुलिस को यह मिला तो…”
“तो सच पूरा होगा।”
पिता ने आगे बढ़कर कॉपी छीनने की कोशिश की।
उसी पल आँगन की मिट्टी में छोटे पैरों के निशान बनने लगे।
निखिल ने देखा।
पिता ने भी देखा।
निशान धीरे-धीरे पूजा कमरे की तरफ आ रहे थे।
फिर एक और निशान उभरा।
बड़े पैर का।
फिर तीसरा।
जैसे तीन लोग घर के अंदर प्रवेश कर रहे हों।
हवा भारी हो गई।
दीवार पर लगा उल्लू का काला निशान फैलने लगा।
पिता काँपते हुए बोले—
“मैंने किसी को नहीं मारा…”
कमरे के कोने से बहुत धीमी आवाज़ आई—
“लेकिन तुमने दरवाज़ा खोला था।”
निखिल के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
पिता जमीन पर गिर पड़े।
“मैं डर गया था… बाबा ने कहा था बस दरवाज़ा खोलना… मुझे नहीं पता था…”
आवाज़ फिर आई—
“तुम्हें पता था।”
पिता रोने लगे।
उनकी आवाज़ टूट गई।
निखिल ने पहली बार उन्हें इतने कमजोर रूप में देखा।
उसे गुस्सा भी था।
दया भी आ रही थी।
लेकिन उस रात दया सच से बड़ी नहीं हो सकती थी।
सुबह होते ही निखिल ने कॉपी पुलिस को दे दी।
पिता का बयान फिर दर्ज हुआ।
मामला फिर खुला।
दादा मर चुके थे, बाकी दो आरोपी भी दुनिया में नहीं थे, लेकिन रिकॉर्ड बदल गया।
रामी जगताप, माधव और गणपत को पहली बार आधिकारिक रूप से गुमशुदा नहीं, हत्या के शिकार माना गया।
पूर्वी खेत पर लगा देशमुख नाम हटाया गया।
गाँव में एक छोटा पत्थर लगाया गया।
उस पर तीन नाम लिखे गए।
रामी।
माधव।
गणपत।
उस दिन शाम को करंजवाड़ी में पहली बार लोगों ने उस काले उल्लू की कहानी डर के लिए नहीं, याद रखने के लिए सुनाई।
निखिल शहर लौट गया।
पुराना वाड़ा बंद कर दिया गया।
जमीन पंचायत को सौंप दी गई।
कुछ महीनों तक सब शांत रहा।
फिर एक दिन निखिल को गाँव से फोन आया।
चाय वाले बूढ़े की आवाज़ थी।
“बेटा, एक बात बतानी थी।”
“क्या हुआ?”
“कल अमावस्या थी।”
निखिल चुप हो गया।
बूढ़ा बोला—
“काला उल्लू फिर आया था।”
निखिल की उंगलियाँ फोन पर कस गईं।
“कहाँ बैठा था?”
बूढ़े ने धीमे स्वर में कहा—
“वाड़े पर नहीं।”
“फिर?”
“उस पुराने पंचायत घर की छत पर।”
निखिल ने आँखें बंद कर लीं।
पंचायत घर।
वही जगह जहाँ पुराने जमीन रिकॉर्ड रखे जाते थे।
कुछ देर दोनों तरफ चुप्पी रही।
फिर बूढ़ा बोला—
“लगता है बेटा… मिट्टी में सिर्फ तुम्हारे घर का सच नहीं दबा था।”
फोन कट गया।
उस रात निखिल बहुत देर तक सो नहीं पाया।
खिड़की के बाहर शहर की रोशनी थी।
गाड़ियों की आवाज़ थी।
लोग थे।
लेकिन नींद आने से पहले उसे एक आवाज़ साफ सुनाई दी।
बहुत दूर से।
या शायद बहुत भीतर से।
“हूँऊऊ…”
और इस बार निखिल समझ गया।
काला उल्लू अपशकुन नहीं था।
वह सजा देने नहीं आता था।
वह सिर्फ यह पूछने आता था—
अब सच बोलोगे?
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