Sharbat-e-Rooh | Horror Story in Hindi

पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में गर्मी केवल मौसम नहीं होती। वह दीवारों, छतों और बंद खिड़कियों में घुसकर बैठ जाती है। दिन ढलने के बाद भी पत्थर तपते रहते हैं और हवा में मसालों, इत्र, धुएँ और पुराने मकानों की सीलन मिली रहती है।

उसी इलाके की गली रहमत वाली में एक छोटी-सी दुकान थी—“महरूम शरबत खाना।”

दुकान का नाम जितना अजीब था, उसकी पहचान उससे भी अधिक रहस्यमयी थी। आसपास के लोग कहते थे कि वहाँ मिलने वाला गुलाब का शरबत पीते ही शरीर की थकान उतर जाती है। बेचैनी शांत हो जाती है और कई दिनों से न सोया व्यक्ति भी गहरी नींद में चला जाता है। Sharbat-e-Rooh Horror Story in Hindi

Sharbat-e-Rooh Horror Story in Hindi

दुकान दिन में केवल तीन घंटे खुलती थी।

शाम पाँच बजे उसका आधा टूटा हुआ हरा दरवाज़ा खुलता और रात आठ बजे ठीक समय पर बंद हो जाता। न एक मिनट पहले, न एक मिनट बाद।

दुकान चलाने वाली साठ वर्ष की सकीना बेगम किसी से अधिक बात नहीं करती थीं। सफेद बालों पर काला दुपट्टा, चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ और हाथों में हमेशा लाल रंग के धब्बे दिखाई देते थे। लोग समझते थे कि वे गुलाब की पंखुड़ियाँ पीसने के कारण बने होंगे।

सकीना बेगम किसी ग्राहक को दुकान के भीतर नहीं आने देती थीं। दरवाज़े के सामने रखी लकड़ी की मेज़ पर गिलास रखतीं, पैसे लेतीं और सामने खड़े व्यक्ति को वहीं शरबत पिलाकर गिलास वापस ले लेतीं।

पैक करके ले जाने की अनुमति किसी को नहीं थी।

यदि कोई बोतल में शरबत माँगता तो उनका उत्तर हमेशा एक ही होता—

“यह रास्ते के लिए नहीं है। जिसे प्यास लगी है, वही यहीं पी ले।”

उस शाम गली में बिजली नहीं थी। छतों पर रखे पानी के टैंक गर्म हो चुके थे और दुकानदार हाथ वाले पंखों से खुद को हवा कर रहे थे। अड़तीस वर्षीय समीर कुरैशी पसीने से भीगा हुआ उस गली से गुजर रहा था।

समीर पेशे से पुरानी इमारतों का सर्वेक्षण करने वाला इंजीनियर था। नगर निगम ने उसे गली रहमत वाली के कुछ जर्जर मकानों की जाँच के लिए भेजा था। उसकी पत्नी नाजिया की मृत्यु को आठ महीने हो चुके थे और उसके बाद से समीर ने अपने काम में खुद को पूरी तरह डुबो दिया था।

घर लौटने की उसे कोई जल्दी नहीं रहती थी।

घर में उसके लिए कोई इंतज़ार नहीं करता था।

नाजिया की मृत्यु एक साधारण बीमारी से हुई थी, लेकिन समीर के लिए उसकी यादें साधारण नहीं थीं। अस्पताल में आखिरी रात नाजिया बार-बार पानी माँगती रही थी। डॉक्टर ने अधिक पानी देने से मना किया था। समीर ने उसके होंठ केवल गीले किए थे।

सुबह होने से कुछ मिनट पहले नाजिया ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा था—

“समीर… घर चलकर मेरे लिए गुलाब का शरबत बनाना।”

वह उसे घर वापस नहीं ला सका।

उस दिन के बाद समीर ने गुलाब का शरबत पीना छोड़ दिया था।

गली से गुजरते समय उसकी नज़र महरूम शरबत खाने पर पड़ी। दुकान के बाहर चार लोग खड़े थे। सकीना बेगम एक-एक कर उन्हें शरबत दे रही थीं।

लाल रंग का शरबत बर्फ से भरे काँच के गिलास में चमक रहा था।

समीर कुछ पल उसे देखता रहा। उसे नाजिया की याद आई और उसके कदम अपने आप रुक गए।

सकीना बेगम ने उसकी तरफ देखा।

उनकी आँखें असामान्य रूप से स्थिर थीं।

“प्यासे हो?” उन्होंने पूछा।

समीर ने जेब से रुमाल निकालकर चेहरा पोंछा।

“हाँ, लेकिन गुलाब का नहीं। कोई नींबू वाला हो तो दे दीजिए।”

सकीना बेगम ने खाली गिलास उठाया।

“यहाँ केवल एक ही शरबत मिलता है।”

समीर मुस्कुराया।

“फिर रहने दीजिए।”

वह आगे बढ़ने लगा तो पीछे से सकीना बेगम की आवाज़ आई—

“आठ महीने से प्यास दबाकर रखने से वह खत्म नहीं होती, समीर मियाँ।”

समीर के कदम रुक गए।

उसने पलटकर देखा।

“आप मेरा नाम कैसे जानती हैं?”

सकीना बेगम गिलास में शरबत डाल रही थीं।

“नगर निगम वाले आए हैं। गली में सबको पता है।”

यह बात संभव थी। समीर ने सुबह दो दुकानदारों को अपने दस्तावेज़ दिखाए थे।

फिर भी सकीना बेगम के शब्द उसे परेशान कर गए थे।

आठ महीने से प्यास दबाकर रखना।

उसने दुकान के सामने जाकर बीस रुपये मेज़ पर रख दिए।

“एक गिलास दीजिए।”

सकीना बेगम ने उसे ध्यान से देखा।

“पूरा पीना पड़ेगा।”

“गिलास लिया है तो पूरा ही पीऊँगा।”

उन्होंने बर्फ के चार टुकड़े गिलास में डाले और मिट्टी की सुराही जैसी एक काली बोतल से गाढ़ा लाल शरबत उंडेल दिया। शरबत में गुलाब की खुशबू के साथ कोई और गंध भी थी। वह खुशबू जानी-पहचानी लग रही थी, लेकिन समीर उसे पहचान नहीं पाया।

उसने पहला घूँट लिया।

शरबत असामान्य रूप से ठंडा था। ऐसा लगा जैसे गर्मी से जलते उसके गले में ठंडी हवा उतर गई हो। दूसरा घूँट पीते ही उसके सिर का भारीपन कम होने लगा।

तीसरे घूँट के बाद उसे एक आवाज़ सुनाई दी।

“धीरे पीजिए… बर्फ गले में लगेगी।”

समीर का हाथ काँप गया।

वह नाजिया की आवाज़ थी।

बिल्कुल वैसी ही आवाज़, जैसा वह घर में शरबत पीते समय कहा करती थी।

समीर ने तुरंत पीछे देखा। गली में लोग आ-जा रहे थे, लेकिन वहाँ नाजिया नहीं थी।

“क्या हुआ?” सकीना बेगम ने पूछा।

समीर ने गिलास मेज़ पर रख दिया।

“कुछ नहीं।”

“पूरा पीना पड़ेगा।”

समीर ने एक ही साँस में बचा हुआ शरबत खत्म किया और गिलास उनके सामने रख दिया।

“इसमें क्या मिलाया है?”

“गुलाब, चीनी, पानी और थोड़ी-सी याद।”

सकीना बेगम ने गिलास उठाकर भीतर रख दिया।

समीर उनकी तरफ देखता रह गया।

“याद?”

“हर चीज़ की खुशबू होती है। यादों की भी।”

समीर ने कुछ नहीं कहा। वह दुकान से दूर चला गया, लेकिन नाजिया की आवाज़ देर तक उसके कानों में गूँजती रही।

उस रात कई महीनों बाद समीर को जल्दी नींद आ गई।

रात लगभग दो बजे उसकी आँख खुली। कमरे में अँधेरा था। एयर कंडीशनर बंद हो चुका था और खिड़की के बाहर बिजली चमक रही थी।

समीर को प्यास लगी थी।

वह बिस्तर से उठा और रसोई की तरफ जाने लगा। तभी उसे गुलाब की तेज़ खुशबू महसूस हुई।

खुशबू ड्रॉइंग रूम से आ रही थी।

वहाँ पहुँचते ही वह दरवाज़े पर रुक गया।

डाइनिंग टेबल पर काँच के दो गिलास रखे थे।

दोनों में लाल शरबत भरा था।

एक कुर्सी पीछे की ओर खिसकी हुई थी, जैसे कोई अभी-अभी वहाँ बैठा हो।

समीर की साँस तेज़ हो गई। उसने दीवार का स्विच दबाया, लेकिन बिजली नहीं आई। मोबाइल की रोशनी में उसने मेज़ देखी।

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गिलासों के बाहर पानी की छोटी-छोटी बूँदें जमा थीं। शरबत में बर्फ तैर रही थी।

वह ताज़ा था।

समीर धीरे-धीरे मेज़ के पास गया। दूसरे गिलास के पीछे खाली कुर्सी रखी थी। उस कुर्सी पर नाजिया बैठा करती थी।

“कौन है?”

घर में कोई उत्तर नहीं आया।

उसने मुख्य दरवाज़ा जाँचा। ताला अंदर से लगा था। बालकनी और खिड़कियाँ भी बंद थीं।

जब वह दोबारा डाइनिंग टेबल की ओर मुड़ा तो एक गिलास आधा खाली था।

समीर वहीं जम गया।

उसके सामने किसी ने शरबत नहीं पिया था। फिर भी गिलास में शरबत का स्तर कम हो गया था।

इसके बाद बहुत हल्की आवाज़ आई—

“तुमने वादा किया था।”

समीर पीछे हटा।

“नाजिया?”

कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।

खाली कुर्सी कुछ इंच पीछे खिसक गई और फर्श पर उसके पैरों की रगड़ सुनाई दी।

समीर ने तुरंत कमरे की बत्ती जलाने का प्रयास किया। उसी क्षण बिजली वापस आ गई।

रोशनी होते ही मेज़ खाली थी।

वहाँ कोई गिलास नहीं था।

अगली सुबह समीर ने खुद को समझाया कि उसने सपना देखा होगा। नाजिया की याद, थकान और सकीना बेगम के अजीब शब्दों ने उसके मन पर असर डाला होगा।

लेकिन डाइनिंग टेबल के नीचे दो पिघले हुए बर्फ के टुकड़े पड़े थे।

समीर उस दिन काम पर नहीं गया। उसने पूरा घर देखा, सुरक्षा कैमरे की रिकॉर्डिंग जाँची और बिल्डिंग के गार्ड से पूछा कि रात को कोई आया था या नहीं।

रिकॉर्डिंग में रात दो बजकर सात मिनट पर कुछ विचित्र दिखाई दिया।

समीर अपने बेडरूम से निकलकर ड्रॉइंग रूम में आया था। वह अकेला था। उसने खाली मेज़ के सामने लगभग पाँच मिनट तक किसी से बात की थी।

फिर वह अचानक पीछे हटा और घबराकर दीवार के पास खड़ा हो गया।

लेकिन कैमरे में मेज़ पर कोई गिलास नहीं था।

समीर ने रिकॉर्डिंग कई बार देखी। एक क्षण ऐसा था जब कैमरे की तस्वीर कुछ सेकंड के लिए धुँधली हो गई। उस धुँधलेपन में खाली कुर्सी पर किसी स्त्री जैसी आकृति बैठी दिखाई दे रही थी।

चेहरा स्पष्ट नहीं था।

केवल लंबे बाल और हल्के रंग के कपड़ों की छाया।

समीर ने रिकॉर्डिंग रोक दी।

उसी समय उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से संदेश आया—

“शरबत अधूरा छोड़ना ठीक नहीं होता।”

समीर ने तुरंत उस नंबर पर फोन किया। घंटी जाने के बजाय दूसरी ओर से पानी उबलने जैसी आवाज़ सुनाई दी।

फिर सकीना बेगम बोलीं—

“आज दुकान पर आ जाना।”

“आपने मेरा नंबर कहाँ से लिया?”

“तुम्हारी प्यास ने दिया।”

समीर ने गुस्से में कहा—

“आपने मुझे क्या पिलाया था?”

“जो तुम पीना चाहते थे।”

“मैं पुलिस को बुलाऊँगा।”

“पुलिस को बुलाने से पहले अपने घर की दीवार पर उभरा नाम देख लेना।”

फोन कट गया।

समीर कुछ पल वहीं खड़ा रहा। फिर उसकी नज़र ड्रॉइंग रूम की उस दीवार पर गई जहाँ नाजिया और उसकी शादी की तस्वीर लगी थी।

तस्वीर के नीचे नमी फैली हुई थी।

उस नमी के बीच उँगली से लिखे गए शब्द जैसे उभर रहे थे—

“नाजिया प्यास से मरी।”

समीर के हाथ से मोबाइल गिर गया।

उसने कपड़ा लेकर दीवार साफ की, लेकिन शब्द मिटने के कुछ सेकंड बाद फिर उभर आए।

इस बार उनके नीचे एक और पंक्ति दिखाई दी—

“तुमने पानी क्यों नहीं दिया?”

समीर ने दीवार पर कई बार कपड़ा रगड़ा। पेंट उतर गया, लेकिन नमी के शब्द बने रहे।

“डॉक्टर ने मना किया था!” वह अचानक चिल्लाया।

कमरे में उसकी आवाज़ गूँज गई।

वह दीवार के सामने खड़ा होकर ऐसे जवाब दे रहा था जैसे नाजिया सच में वहाँ मौजूद हो।

“मैं तुम्हें तकलीफ नहीं देना चाहता था। मैंने वही किया जो डॉक्टर ने कहा था।”

नमी धीरे-धीरे नीचे बहने लगी।

शब्द मिट गए।

फिर पीछे से गिलास रखे जाने की आवाज़ आई।

समीर ने पलटकर देखा। डाइनिंग टेबल पर वही दो गिलास रखे थे।

इस बार एक कुर्सी पर नाजिया बैठी थी।

उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था। हल्का नीला दुपट्टा कंधों पर पड़ा था और बाल चेहरे को ढक रहे थे। वह बिल्कुल वैसी दिख रही थी जैसी अस्पताल जाने से पहले दिखती थी।

समीर की आँखें भर आईं।

“नाजिया…”

उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।

चेहरा नाजिया का था, लेकिन त्वचा पर कोई रंग नहीं था। होंठ सूखे और सफेद थे। आँखें समीर की ओर नहीं, सामने रखे शरबत के गिलास पर टिकी थीं।

“तुमने बनाया?” उसने पूछा।

समीर रोते हुए उसके करीब गया।

“मुझे माफ कर दो।”

नाजिया ने गिलास उठाया, लेकिन उसे होंठों तक नहीं ले गई।

“मैंने शरबत माँगा था।”

“मुझे लगा तुम ठीक होकर घर आओगी। मैंने सच में सोचा था कि हम साथ घर आएँगे।”

“तुमने आठ महीने से मुझे इंतज़ार कराया।”

समीर ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की। उसकी उँगलियाँ नाजिया के हाथ से गुजर गईं और उसे बर्फ जैसी ठंड महसूस हुई।

“तुम सच में नाजिया हो?”

नाजिया ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में कोई पुतली नहीं थी। केवल दूधिया सफेदी थी।

“तुम क्या चाहते हो, समीर? मैं सच में नाजिया बन जाऊँ या तुम्हें सच बता दूँ?”

समीर पीछे हट गया।

अचानक कमरे की बत्तियाँ बुझ गईं।

जब रोशनी वापस आई, नाजिया गायब थी।

लेकिन मेज़ पर रखे गिलास में एक सूखा हुआ गुलाब तैर रहा था।

शाम होते ही समीर गली रहमत वाली पहुँचा। दुकान बंद थी, जबकि पाँच बज चुके थे। उसने हरे दरवाज़े पर जोर से दस्तक दी।

अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

“सकीना बेगम!”

दुकान के सामने वाली इत्र की दुकान पर बैठे बूढ़े व्यक्ति ने उसे देखा।

“किसे ढूँढ़ रहे हो?”

“सकीना बेगम को। यह दुकान चलाती हैं।”

बूढ़े व्यक्ति का चेहरा बदल गया।

“यह दुकान तो कई साल से बंद है।”

समीर ने दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

“मैं कल यहीं से शरबत पीकर गया था। और भी लोग खड़े थे।”

बूढ़ा अपनी कुर्सी से उठा और दुकान के पास आया।

“इस पर ताला लगा है।”

समीर ने नीचे देखा। दरवाज़े पर पुराना जंग लगा ताला लटक रहा था। उस पर मोटी धूल जमी थी।

“यह संभव नहीं है।”

बूढ़े ने पूछा—

“तुमने शरबत पिया था?”

समीर ने उसकी तरफ देखा।

“आप सकीना बेगम को जानते हैं?”

बूढ़ा कुछ देर चुप रहा।

“मेरा नाम हारून है। सकीना मेरी बड़ी बहन थी।”

“थी?”

“बारह वर्ष पहले उसकी मृत्यु हो गई।”

समीर के चेहरे का रंग उड़ गया।

हारून ने आसपास देखा और उसे अपनी दुकान के भीतर बुला लिया। इत्र की छोटी-छोटी बोतलों के बीच बैठकर उसने दुकान का पुराना किस्सा सुनाना शुरू किया।

सकीना बेगम की एक बेटी थी—रूहाना।

रूहाना को बचपन से गुलाब का शरबत बहुत पसंद था। रमजान के दिनों में वह अपनी माँ के साथ दुकान पर बैठती और ग्राहकों को शरबत देती थी। बीस वर्ष की उम्र में उसका निकाह तय हुआ, लेकिन निकाह से दो दिन पहले वह अचानक बीमार पड़ गई।

उसे तेज़ बुखार था और वह बार-बार ठंडा पानी माँग रही थी। पुराने इलाज और अंधविश्वास के कारण परिवार के एक बुजुर्ग ने उसे पानी देने से मना कर दिया। कहा कि बुखार में ठंडा पानी देने से उसकी जान को खतरा होगा।

रूहाना रातभर प्यास से तड़पती रही।

सकीना उसके पास बैठी रही, लेकिन परिवार के दबाव में उसे पानी नहीं दे सकी।

सुबह होने से पहले रूहाना की मृत्यु हो गई।

मरने से कुछ समय पहले उसने अपनी माँ से कहा था—

“अम्मी, मेरे लिए गुलाब का शरबत बना दो।”

सकीना ने उससे वादा किया कि सुबह होते ही बनाएगी।

सुबह आई, लेकिन रूहाना नहीं रही।

उसके बाद सकीना बदल गई। उसने दुकान का नाम “महरूम शरबत खाना” रख दिया। वह कहती थी कि दुनिया में सबसे बड़ी प्यास पानी की नहीं, अधूरे वादे की होती है।

“लेकिन उसकी मृत्यु कैसे हुई?” समीर ने पूछा।

हारून ने गहरी साँस ली।

“रूहाना के जाने के दस साल बाद सकीना ने एक नया शरबत बनाना शुरू किया। वह केवल उन लोगों को पिलाती थी जो किसी अपने को खो चुके थे। शरबत पीने वालों को मृत व्यक्ति की आवाज़ सुनाई देती थी। कुछ लोग खुश होकर जाते थे, लेकिन कुछ लोग बार-बार आने लगे।”

“उसमें क्या मिलाती थीं?”

“हमें कभी पता नहीं चला। गुलाब की पंखुड़ियाँ वह कब्रिस्तान के पीछे उगे पौधों से लाती थीं। कहती थीं कि जहाँ किसी की प्रतीक्षा दफन हो, वहाँ उगने वाले फूल यादों को संभालकर रखते हैं।”

हारून ने बंद दुकान की ओर देखा।

“एक रात दुकान में आग लगी। सकीना अंदर ही थी। आग बुझने के बाद उसका शरीर नहीं मिला। केवल काली बोतलें और राख से भरे कुछ गिलास मिले। उसके बाद दुकान बंद कर दी गई।”

“और लोग कहते हैं कि वह मर गई?”

“जो शरीर न मिले, उसकी मृत्यु पर विश्वास करना कठिन होता है। लेकिन उसके बाद वह कभी दिखाई नहीं दी।”

समीर ने मोबाइल निकालकर सकीना के नंबर पर कॉल किया।

हारून की दुकान के पीछे से फोन बजने की आवाज़ आई।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

आवाज बंद दुकान के भीतर से आ रही थी।

समीर बाहर आया। ताले के बावजूद दरवाज़े की नीचे वाली दरार से लाल रंग का तरल बाहर बह रहा था।

गुलाब की खुशबू पूरी गली में फैलने लगी।

ताला अपने आप खुलकर जमीन पर गिर गया।

हरा दरवाज़ा धीरे-धीरे भीतर की तरफ खुला।

दुकान के अंदर घना अँधेरा था।

हारून ने समीर का हाथ पकड़ लिया।

“अंदर मत जाना।”

समीर ने कहा—

“उसने मेरे घर में कुछ भेजा है। मुझे जानना होगा कि वह क्या चाहती है।”

“वह तुम्हारी पत्नी नहीं है।”

“लेकिन उसकी आवाज़ वही थी।”

“आवाज और आत्मा एक चीज़ नहीं होती।”

दुकान के भीतर अचानक दीया जल उठा। पीली रोशनी में लकड़ी की पुरानी मेज़, धूल भरी अलमारियाँ और दीवार पर लटके दर्जनों काँच के गिलास दिखाई दिए।

हर गिलास के नीचे कागज़ का एक छोटा टुकड़ा चिपका था।

उन पर नाम लिखे थे।

समीर दुकान में चला गया। हारून बाहर ही खड़ा रहा।

दीवार के बीच लगे एक गिलास के नीचे लिखा था—“नाजिया कुरैशी।”

समीर ने काँपते हाथ से वह गिलास उतारा।

गिलास के अंदर सूखी गुलाब की पंखुड़ी और एक सफेद धागा रखा था। धागे पर अस्पताल का छोटा टैग बँधा था।

उस पर नाजिया का नाम और भर्ती होने की तारीख लिखी थी।

“यह आपके पास कैसे आया?”

दुकान के पिछले हिस्से से सकीना बेगम बाहर आईं।

आज उनके कपड़े काले नहीं, सफेद थे। चेहरे की झुर्रियाँ गायब थीं और वे तस्वीरों में दिखाई देने वाली लगभग चालीस वर्ष की महिला जैसी लग रही थीं।

“मृत व्यक्ति की आखिरी चीज़ों में उसकी प्यास बची रहती है,” उन्होंने कहा।

समीर ने गिलास कसकर पकड़ा।

“आप मेरे घर में क्या भेज रही हैं?”

“मैं कुछ नहीं भेजती। मैं केवल दरवाज़ा खोलती हूँ। अंदर कौन आता है, यह तुम्हारी याद तय करती है।”

“वह नाजिया है या नहीं?”

सकीना बेगम मुस्कुराईं।

“तुम्हें क्या लगता है?”

“मुझे सच चाहिए।”

“सच का स्वाद मीठा नहीं होता।”

“फिर भी बताइए।”

सकीना दुकान के भीतर रखे एक पुराने चूल्हे के पास गईं। उस पर बड़ा पीतल का बर्तन रखा था। भीतर गाढ़ा लाल शरबत उबल रहा था, लेकिन नीचे कोई आग नहीं थी।

“जब कोई व्यक्ति किसी अपने को खो देता है, तो उसके भीतर बहुत-सी बातें अधूरी रह जाती हैं। माफी, शिकायत, प्रेम, पछतावा और वादे। समय शरीर को आगे ले जाता है, लेकिन मन उसी जगह खड़ा रहता है।”

उन्होंने बर्तन में चम्मच घुमाया।

“शरबत-ए-रूह मृत व्यक्ति को वापस नहीं लाता। यह जीवित व्यक्ति की याद को इतना गहरा कर देता है कि वह एक रूप ले लेती है।”

समीर ने धीरे से पूछा—

“मतलब वह नाजिया नहीं है?”

“वह उतनी ही नाजिया है जितनी नाजिया तुम्हारे भीतर बची है।”

“फिर उसने मुझसे कहा कि मैंने उसे प्यास से मारा।”

“क्या तुम्हें ऐसा लगता है?”

समीर चुप हो गया।

सकीना उसकी तरफ मुड़ीं।

“जिस बात का अपराध तुम्हारे भीतर छिपा है, वही उसकी आवाज़ बनकर सामने आएगी। शरबत आत्मा नहीं बुलाता, पछतावा बुलाता है।”

“इसे रोकने का तरीका क्या है?”

“जो वादा अधूरा है, उसे पूरा करो।”

“नाजिया अब इस दुनिया में नहीं है। मैं उसके लिए शरबत कैसे बनाऊँ?”

“तुम्हें पता है।”

“नहीं।”

सकीना उसके करीब आईं।

“अस्पताल में नाजिया ने केवल अपने लिए शरबत नहीं माँगा था। उसने तुमसे कुछ और भी कहा था।”

समीर की आँखों में भय उतर आया।

अस्पताल की आखिरी रात उसकी स्मृति में फिर जीवित हो गई।

नाजिया ने उसका हाथ पकड़कर कहा था—

“मेरे बाद मेरी माँ को अकेला मत छोड़ना।”

समीर ने तुरंत कहा था—

“तुम खुद उनके पास जाओगी। यह सब मत बोलो।”

लेकिन नाजिया ने उसका हाथ दबाया था।

“वादा करो।”

समीर ने सिर हिला दिया था।

नाजिया की मृत्यु के बाद उसकी माँ, शहनाज बेगम, कई बार समीर से मिलने आई थीं। वे अपनी बेटी की चीज़ें, तस्वीरें और कुछ कपड़े माँगती थीं। समीर उनसे मिल नहीं पाता था। उसे लगता था कि उनके चेहरे में नाजिया दिखाई देती है।

धीरे-धीरे उसने उनके फोन उठाने बंद कर दिए।

दो महीने पहले शहनाज बेगम वृद्धाश्रम चली गई थीं।

समीर को यह बात पता थी, लेकिन वह उनसे मिलने नहीं गया था।

सकीना ने कहा—

“मृत व्यक्ति के लिए बनाया गया शरबत कब्र पर रखा जा सकता है। लेकिन जीवित प्यास को कौन बुझाएगा?”

समीर की आँखें झुक गईं।

“मुझसे नहीं हुआ।”

“तुमने कोशिश भी नहीं की।”

“उनसे मिलते ही मुझे नाजिया याद आती है।”

“तुम अपने दर्द से बचते रहे और उनकी माँ को उसी दर्द में अकेला छोड़ दिया।”

समीर की आवाज़ भर्रा गई।

“मैं अब क्या करूँ?”

सकीना ने काली बोतल उसकी तरफ बढ़ा दी।

“आज रात बारह बजे तक यह शरबत नाजिया की माँ को अपने हाथ से पिला दो। उनसे माफी माँगो। फिर नाजिया की कब्र पर एक खाली गिलास रखकर वापस आ जाना।”

“और उसके बाद?”

“जो तुम्हारे घर में है, उसे रास्ता मिल जाएगा।”

“अगर मैंने ऐसा नहीं किया?”

सकीना ने दीवार पर टंगे गिलासों की ओर देखा।

कई गिलासों में अचानक लाल शरबत भरने लगा।

उनके नीचे लिखे नाम धीरे-धीरे काले पड़ गए।

“याद जितनी देर शरीर से बाहर रहती है, उतनी ही भूखी होती जाती है। पहले वह तुम्हारी बातें दोहराएगी। फिर तुम्हारी आदतें सीखेगी। उसके बाद वह तुम्हारी जगह लेने की कोशिश करेगी।”

समीर ने घबराकर पूछा—

“मेरी जगह?”

“मृत यादें जीना चाहती हैं, समीर। उनके पास शरीर नहीं होता।”

दुकान के भीतर लगे सभी गिलास एक साथ हिलने लगे।

सकीना का चेहरा फिर बूढ़ा होने लगा। उनकी त्वचा पर जलने के निशान उभर आए और आँखों से लाल पानी बहने लगा।

“जाओ। तुम्हारे पास अधिक समय नहीं है।”

समीर काली बोतल लेकर दुकान से बाहर निकल गया। हारून दरवाज़े के पास नहीं था।

गली भी असामान्य रूप से खाली थी।

समीर ने पीछे देखा। दुकान फिर बंद हो चुकी थी और ताला अपनी जगह लटक रहा था।

उसने तुरंत शहनाज बेगम के वृद्धाश्रम का पता लगाया। वह शहर के बाहरी हिस्से में था। वहाँ पहुँचते-पहुँचते रात के दस बज चुके थे।

रिसेप्शन पर बैठी महिला ने बताया कि मिलने का समय समाप्त हो चुका है।

समीर ने बहुत आग्रह किया।

“मैं उनका दामाद हूँ। बहुत जरूरी बात है।”

महिला ने रिकॉर्ड देखा।

“आपका नाम समीर कुरैशी है?”

“जी।”

महिला का चेहरा गंभीर हो गया।

“वे पिछले कई दिनों से आपका नाम ले रही हैं। उनकी तबीयत ठीक नहीं है।”

समीर को एक छोटे कमरे में ले जाया गया। शहनाज बेगम बिस्तर पर लेटी थीं। उनका शरीर कमजोर हो चुका था और चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क लगा था।

समीर दरवाज़े पर खड़ा रह गया।

कभी वह उन्हें अम्मी कहा करता था। नाजिया की मृत्यु के बाद उसने उन्हें नाम से भी संबोधित नहीं किया था।

उसने धीरे से कहा—

“अम्मी…”

शहनाज बेगम ने आँखें खोलीं।

कुछ पल वे उसे पहचान नहीं पाईं। फिर उनकी आँखों में आँसू आ गए।

“समीर?”

वह उनके पास बैठ गया।

“मुझे माफ कर दीजिए।”

शहनाज ने मास्क हटाने की कोशिश की।

“तुम ठीक हो?”

आठ महीने की दूरी के बाद भी उनका पहला सवाल यही था।

समीर खुद को रोक नहीं सका। उसने उनका हाथ पकड़ लिया और रो पड़ा।

“मैं ठीक नहीं था। लेकिन मैंने आपके बारे में भी नहीं सोचा। नाजिया ने मुझसे वादा लिया था कि मैं आपको अकेला नहीं छोड़ूँगा। मैंने वादा तोड़ दिया।”

शहनाज की आँखों से आँसू बहने लगे।

“मैंने तुम्हें दोष नहीं दिया, बेटा। तुमने भी तो उसे खोया है।”

“लेकिन आपको मेरी जरूरत थी।”

“मुझे लगा तुम मुझे देखकर टूट जाते हो। इसलिए मैंने फोन करना बंद कर दिया।”

समीर ने काली बोतल मेज़ पर रखी।

“नाजिया ने आखिरी रात गुलाब का शरबत माँगा था। मैं उसे नहीं दे पाया। आज मैं यह आपके लिए लाया हूँ।”

शहनाज ने बोतल को देखा।

“यह कहाँ से लाए?”

“एक पुरानी दुकान से।”

उनके चेहरे पर अचानक डर दिखाई दिया।

“कौन-सी दुकान?”

“महरूम शरबत खाना।”

शहनाज ने समीर का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“तुमने वहाँ का शरबत पी लिया?”

समीर ने सिर हिलाया।

“आप उस दुकान को जानती हैं?”

शहनाज ने दरवाज़े की तरफ देखा, जैसे कोई उनकी बात सुन रहा हो।

“नाजिया के जन्म के बाद कई वर्षों तक मुझे दूसरा बच्चा नहीं हुआ। किसी रिश्तेदार ने मुझे सकीना के पास भेजा था। उसने कहा था कि मेरी कोख खाली नहीं, डरी हुई है। उसने मुझे गुलाब का शरबत पिलाया।”

“फिर?”

“उस रात मैंने सपने में एक बच्ची को देखा। वह अँधेरे कमरे में बैठी पानी माँग रही थी। अगले महीने मुझे पता चला कि मैं गर्भवती हूँ।”

समीर ध्यान से सुन रहा था।

“वह बच्ची नाजिया थी?”

“मैंने भी यही समझा। लेकिन जब नाजिया पाँच वर्ष की हुई, वह नींद में एक नाम बोलती थी—रूहाना।”

कमरे की हवा ठंडी होने लगी।

शहनाज की आवाज़ काँप गई।

“वह कहती थी कि उसे अपनी अम्मी के पास जाना है। धीरे-धीरे उसने वह नाम लेना बंद कर दिया। मैंने कभी इस बारे में किसी को नहीं बताया।”

समीर ने काली बोतल की तरफ देखा।

“क्या नाजिया का सकीना की बेटी से कोई संबंध था?”

“मैं नहीं जानती। लेकिन नाजिया को गुलाब का शरबत उसी तरह पसंद था जैसे लोगों ने रूहाना के बारे में बताया था।”

दीवार पर लगी घड़ी ने साढ़े ग्यारह बजाए।

समीर ने गिलास में शरबत डाला।

जैसे ही बोतल खुली, कमरे में गुलाब की तेज़ खुशबू फैल गई। शहनाज ने गिलास हाथ में लिया, लेकिन उनके हाथ काँप रहे थे।

“इसे मत पीजिए,” पीछे से किसी महिला ने कहा।

समीर ने पलटकर देखा।

दरवाज़े पर नाजिया खड़ी थी।

वही नीला दुपट्टा, वही चेहरा और वही खाली सफेद आँखें।

शहनाज के हाथ से गिलास लगभग छूट गया।

“नाजिया…”

नाजिया धीरे-धीरे कमरे में आई।

“अम्मी, वह आपको भी मेरे जैसा बना देगा।”

समीर उसके सामने खड़ा हो गया।

“तुम नाजिया नहीं हो।”

नाजिया के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

“यह बात दुकान वाली ने कही?”

“तुम केवल मेरी याद हो।”

“फिर अम्मी मुझे क्यों देख पा रही हैं?”

समीर ने शहनाज की तरफ देखा। वे सचमुच नाजिया को देख रही थीं।

नाजिया ने हाथ आगे बढ़ाया।

“अम्मी, गिलास मुझे दे दीजिए।”

शहनाज रोते हुए बोलीं—

“तू नाजिया है या रूहाना?”

नाजिया का चेहरा कठोर हो गया।

कमरे की खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं। तेज़ हवा भीतर आई और पर्दे उड़ने लगे।

नाजिया की आवाज़ बदल गई। उसमें दो महिलाओं की आवाज़ें एक साथ सुनाई दे रही थीं।

“नाम से क्या बदलता है, अम्मी? प्यास तो वही है।”

समीर समझ गया कि सकीना ने पूरी सच्चाई नहीं बताई थी।

शरबत केवल उसकी याद को रूप नहीं दे रहा था। उसके भीतर किसी और की अधूरी प्यास भी थी—रूहाना की।

शायद वर्षों पहले शहनाज को दिया गया शरबत रूहाना की स्मृति को नाजिया से जोड़ गया था। नाजिया ने अपना जीवन अपने रूप में जिया, लेकिन उसकी कुछ आदतों, पसंद और सपनों में रूहाना की अधूरी इच्छा छिपी रही।

और अब नाजिया की मृत्यु के बाद दोनों यादें एक साथ जाग चुकी थीं।

नाजिया ने गिलास छीनने की कोशिश की। समीर ने उसका रास्ता रोका। उसके शरीर से टकराते ही समीर को ऐसा लगा जैसे बर्फ के पानी में गिर गया हो।

वह फर्श पर जा गिरा।

नाजिया शहनाज के पास पहुँची।

“अम्मी, आपने उस रात मुझे पानी नहीं दिया था।”

शहनाज काँपने लगीं।

“मैंने तुझे कभी प्यासा नहीं रखा।”

“आपने मुझे जन्म देने से पहले शरबत पिया था। आपने मुझे वापस बुलाया, लेकिन मेरी अम्मी को नहीं बताया।”

यह रूहाना बोल रही थी।

शहनाज ने आँखें बंद कर लीं।

“मुझे बच्चा चाहिए था। मुझे नहीं पता था कि उस शरबत में क्या है।”

“हर कोई अपनी खाली जगह भरना चाहता है। कोई यह नहीं पूछता कि उस जगह पर पहले कौन था।”

समीर उठकर नाजिया के पीछे पहुँचा।

“रूहाना!”

वह रुक गई।

“तुम्हारी माँ अभी भी उसी दुकान में तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।”

नाजिया का चेहरा बदलने लगा। कुछ पल उसमें किसी दूसरी युवती की छवि दिखाई दी।

“झूठ।”

“सकीना बेगम ने तुम्हारी प्यास को गिलासों में बंद कर रखा है। वह तुम्हें मुक्त नहीं कर सकीं क्योंकि वे खुद तुम्हें छोड़ना नहीं चाहती थीं।”

कमरे की दीवारों पर लाल पानी बहने लगा।

रूहाना ने चीखकर कहा—

“उन्होंने मुझे पानी नहीं दिया!”

“उन्हें पछतावा है।”

“पछतावा प्यास नहीं बुझाता।”

समीर ने कहा—

“सही कहा। इसीलिए यह शरबत तुम्हारे लिए नहीं है।”

उसने शहनाज के हाथ से गिलास लिया और उनके होंठों तक पहुँचाया।

रूहाना तेजी से उसकी तरफ बढ़ी। उसकी उँगलियाँ असामान्य रूप से लंबी होने लगीं और चेहरा सूखकर काला पड़ गया।

“उन्हें मत पिलाओ!”

समीर ने शहनाज को शरबत पिला दिया।

पहला घूँट पीते ही कमरे की हवा शांत हो गई।

दूसरे घूँट के बाद शहनाज के चेहरे पर दर्द कम होने लगा।

तीसरे घूँट के बाद उन्होंने आँखें बंद कर लीं और कहा—

“नाजिया… मेरी बच्ची…”

नाजिया के चेहरे से सफेदपन गायब होने लगा। उसकी आँखों में पुतलियाँ लौट आईं।

वह अब रूहाना नहीं, समीर की नाजिया जैसी दिख रही थी।

“तुम देर से आए,” उसने समीर से कहा।

समीर की आँखों से आँसू बहने लगे।

“मुझे माफ कर दो।”

“मैं तुमसे नाराज़ नहीं थी।”

“फिर मेरे घर में वह सब किसने लिखा?”

“तुमने।”

समीर चुप हो गया।

नाजिया उसके करीब आई।

“तुम खुद को सजा देना चाहते थे। क्योंकि तुम्हें लगता था कि मेरी आखिरी इच्छा पूरी न करके तुमने मुझे मार दिया। लेकिन मैं बीमारी से गई थी, तुम्हारी वजह से नहीं।”

“मैंने अम्मी को अकेला छोड़ दिया।”

“अब मत छोड़ना।”

समीर ने सिर हिलाया।

“वादा करता हूँ।”

नाजिया मुस्कुराई।

अचानक उसके चेहरे पर फिर रूहाना की छवि उभरी। इस बार वह भयावह नहीं थी। बीस वर्ष की एक साधारण युवती, जिसकी आँखों में उदासी थी।

उसने शहनाज की ओर देखा।

“मुझे मेरी अम्मी के पास पहुँचा दो।”

दीवार की घड़ी में बारह बजने में दस मिनट बाकी थे।

समीर काली बोतल और खाली गिलास लेकर वृद्धाश्रम से बाहर निकला। नाजिया की कब्र शहर के पुराने कब्रिस्तान में थी, जो वहाँ से लगभग बीस मिनट की दूरी पर था।

वह तेज़ी से गाड़ी चला रहा था। रास्ते में कई बार उसे पिछली सीट पर किसी के बैठने का एहसास हुआ। शीशे में कभी नाजिया दिखाई देती, कभी रूहाना।

कब्रिस्तान पहुँचते-पहुँचते बारह बजने में केवल दो मिनट बचे थे।

समीर दौड़ता हुआ नाजिया की कब्र तक पहुँचा। उसने खाली गिलास कब्र के पास रखा।

लेकिन काली बोतल उसके हाथ से नहीं छूटी।

पीछे से सकीना बेगम की आवाज़ आई—

“उसे वापस दो।”

समीर ने पलटकर देखा।

सकीना कब्रों के बीच खड़ी थीं। उनके पीछे दुकान के दर्जनों गिलास हवा में तैर रहे थे।

“रूहाना आपके पास जाना चाहती है,” समीर ने कहा।

सकीना की आँखें भर आईं।

“वह मेरे पास थी। इन गिलासों में, इन फूलों में और हर उस व्यक्ति की याद में जिसे मैंने शरबत दिया।”

“वह आपके पास नहीं थी। आपने उसकी प्यास को कैद कर रखा था।”

“मैं उसकी माँ हूँ।”

“इसीलिए आपको उसे जाने देना होगा।”

सकीना के चेहरे पर क्रोध उभर आया।

“तुम क्या जानो माँ का दर्द?”

“मैं इतना जानता हूँ कि किसी अपने को याद रखना और उसे कैद करना अलग बातें हैं।”

सकीना ने हाथ उठाया। हवा में तैर रहे सभी गिलास एक साथ टूट गए।

कब्रिस्तान में चीखों जैसी आवाज़ें गूँजने लगीं। हर टूटे गिलास से धुएँ की एक आकृति निकली और हवा में घूमने लगी।

सकीना समीर की ओर बढ़ीं।

“बोतल मुझे दे दो।”

समीर ने बोतल जमीन पर दे मारी।

काली बोतल टूट गई।

लाल शरबत मिट्टी पर फैलने लगा। जहाँ-जहाँ वह गिरा, वहाँ छोटे-छोटे गुलाब उग आए।

सकीना घुटनों के बल बैठ गईं।

“तुमने क्या किया?”

कब्र के पास रखा खाली गिलास अपने आप भरने लगा।

लेकिन उसमें लाल शरबत नहीं, साफ पानी था।

गिलास के सामने रूहाना दिखाई दी।

उसने गिलास उठाकर पानी पिया।

सकीना उसे देखती रह गईं।

रूहाना ने धीमे से कहा—

“अम्मी, मुझे उस रात आपसे नाराज़गी नहीं थी। मुझे केवल प्यास लगी थी।”

सकीना रोते हुए उसके पास पहुँचीं।

“मैं डर गई थी। सबने कहा था पानी मत देना। मैंने उनकी बात मान ली।”

“आपने मुझे खो दिया, फिर मुझे जाने भी नहीं दिया।”

“मैं तुम्हारे बिना कैसे रहती?”

रूहाना ने उनका हाथ पकड़ा।

“जैसे हर माँ अपने बच्चे की याद के साथ जीती है। उसे दूसरों की यादों में बाँधकर नहीं।”

सकीना का शरीर धीरे-धीरे राख में बदलने लगा।

उन्होंने घबराकर रूहाना को पकड़ने की कोशिश की।

“मुझे छोड़कर मत जाओ।”

रूहाना मुस्कुराई।

“मैं आपको छोड़कर नहीं जा रही। इस बार हम साथ जा रहे हैं।”

दोनों की आकृतियाँ गुलाब की पंखुड़ियों में बदल गईं। हवा चली और पंखुड़ियाँ कब्रिस्तान के ऊपर फैल गईं।

दूर किसी मस्जिद की घड़ी ने बारह बजाए।

समीर ने नाजिया की कब्र की तरफ देखा।

वहाँ नाजिया बैठी थी।

वह कब्र के पत्थर से पीठ लगाए उसी तरह मुस्कुरा रही थी जैसे रविवार की सुबह घर की बालकनी में बैठकर मुस्कुराती थी।

समीर उसके पास बैठ गया।

“तुम भी जा रही हो?”

“मैं पहले ही जा चुकी हूँ।”

“फिर यह क्या है?”

“तुम्हारी आखिरी याद।”

“क्या मैं तुम्हें फिर कभी देख पाऊँगा?”

नाजिया ने खाली गिलास उसकी तरफ बढ़ाया।

“जब भी किसी प्यासे को पानी दोगे, मुझे याद कर लेना। लेकिन मुझे वापस बुलाने की कोशिश मत करना।”

समीर ने गिलास ले लिया।

“मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहता।”

“भूलना जरूरी नहीं है। बस मेरी याद में जीना बंद मत कर देना।”

समीर ने रोते हुए कहा—

“मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है।”

“मुझे पता है।”

नाजिया की आकृति हल्की होने लगी।

“अम्मी का ध्यान रखना।”

“हमेशा।”

“और कभी गुलाब का शरबत बनाओ तो बर्फ कम डालना। तुम हमेशा ज्यादा डाल देते थे।”

समीर हँसते हुए रो पड़ा।

कुछ ही क्षणों में नाजिया गायब हो गई।

कब्र के पास केवल खाली गिलास रह गया, जिसके किनारे पर उसके होंठों जैसा हल्का निशान था।

अगली सुबह गली रहमत वाली में महरूम शरबत खाने का पुराना मकान गिरा हुआ मिला। किसी ने उसके गिरने की आवाज़ नहीं सुनी थी। मलबे में न कोई बोतल मिली, न गिलास और न ही सकीना बेगम का कोई निशान।

केवल लकड़ी की मेज़ के नीचे एक पुराना कागज़ मिला, जिस पर लिखा था—

“जिसे याद करना हो, उसके नाम पर किसी प्यासे को पानी पिला देना। आत्माएँ मीठे शरबत से नहीं, सच्ची दुआ से शांत होती हैं।”

समीर शहनाज बेगम को वृद्धाश्रम से अपने घर ले आया। नाजिया का कमरा उसने वैसा ही रखा, लेकिन घर की खिड़कियाँ फिर से खोल दीं। डाइनिंग टेबल पर रखी दूसरी कुर्सी अब खाली रहने के बजाय शहनाज के लिए थी।

कुछ महीनों बाद समीर ने अपनी बिल्डिंग के नीचे राहगीरों के लिए ठंडे पानी की एक छोटी प्याऊ लगवाई। उसके ऊपर किसी का नाम नहीं लिखा था। केवल एक वाक्य था—

“अधूरे वादों से बड़ी कोई प्यास नहीं।”

हर साल नाजिया की पुण्यतिथि पर समीर गुलाब का शरबत बनाता। एक गिलास शहनाज को देता, एक खुद पीता और एक गिलास घर के बाहर किसी जरूरतमंद व्यक्ति के लिए रख देता।

पहले वर्ष सब सामान्य रहा।

दूसरे वर्ष भी कुछ नहीं हुआ।

तीसरे वर्ष की उस शाम एक बूढ़ी महिला प्याऊ के पास आई। उसने पूरा गिलास पानी पिया और समीर से पूछा—

“गुलाब का शरबत मिलेगा?”

समीर का चेहरा फीका पड़ गया।

महिला ने मुस्कुराकर कहा—

“डरिए मत। पानी ही ठीक है।”

उसने खाली गिलास मेज़ पर रखा और चली गई।

गिलास के नीचे गुलाब की एक ताज़ा पंखुड़ी पड़ी थी।

समीर ने सड़क की तरफ देखा, लेकिन महिला भीड़ में गायब हो चुकी थी।

रात को वह डाइनिंग टेबल पर बैठा था। शहनाज सो चुकी थीं। मेज़ पर रखा उसका शरबत आधा बचा था।

अचानक सामने वाली खाली कुर्सी कुछ इंच पीछे खिसकी।

समीर के हाथ रुक गए।

कमरे में गुलाब की हल्की खुशबू फैल गई।

फिर नाजिया की धीमी आवाज़ सुनाई दी—

“बर्फ आज भी ज्यादा डाल दी।”

समीर की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन इस बार वह डरा नहीं।

उसने सामने एक खाली गिलास रखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

“बस आज के लिए।”

कुर्सी के सामने रखा खाली गिलास अपने आप धुँधला होने लगा, जैसे उसमें ठंडा शरबत भरा हो।

लेकिन कुछ सेकंड बाद गुलाब की खुशबू चली गई।

कुर्सी वापस अपनी जगह आ गई।

गिलास खाली ही था।

समीर मुस्कुराया और खिड़की खोल दी।

बाहर रात शांत थी।

दूर किसी घर की छत पर एक माँ अपने बच्चे को पानी पिला रही थी। सड़क किनारे एक दुकानदार किसी राहगीर को बोतल दे रहा था। प्याऊ के नल से पानी की एक बूँद गिरकर जमीन में समा गई।

समीर ने पहली बार महसूस किया कि कुछ आत्माएँ लौटकर डराने नहीं आतीं।

वे केवल यह देखने आती हैं कि उनके जाने के बाद किया गया वादा निभाया गया या नहीं।

लेकिन गली रहमत वाली के पुराने लोग आज भी एक बात कहते हैं।

गर्मी की सबसे तपती शामों में, ठीक पाँच बजे, टूटी हुई दुकान के मलबे से गुलाब की खुशबू आने लगती है। कभी-कभी वहाँ एक काला दुपट्टा पहने महिला दिखाई देती है, जिसके सामने लकड़ी की मेज़ पर दो गिलास रखे होते हैं।

वह हर राहगीर को शरबत नहीं देती।

केवल उसी व्यक्ति को बुलाती है जिसके मन में किसी मृत अपने से किया गया वादा अधूरा हो।

यदि वह व्यक्ति रुक जाए तो महिला उससे पूछती है—

“प्यासे हो?”

और यदि उसने एक बार गिलास उठा लिया, तो उसे पूरा पीना पड़ता है।

क्योंकि शरबत-ए-रूह की मिठास गुलाब और चीनी से नहीं बनती।

उसमें उन लोगों के आँसू मिलते हैं, जो चले गए।

और उन लोगों का पछतावा—

जो जीवित रह गए।

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