Talab Hindi Horror Story , तंबाकू की रहस्यमयी डिब्बी, डरावनी कहानी
रात के करीब ग्यारह बज रहे थे।
पुणे के बाहर स्थित एक औद्योगिक इलाके में तेज बारिश हो रही थी।
सड़क पर ज्यादा ट्रैफिक नहीं था।
फैक्ट्रियों के गेट पर लगे पीले बल्ब और कभी-कभार गुजरने वाले किसी ट्रक की हेडलाइट्स ही उस इलाके में रोशनी का एकमात्र सहारा थीं।
निखिल मोरे अपनी बाइक धीरे-धीरे चलाते हुए घर जा रहा था।
उसकी उम्र उनतीस साल थी।
एक दवा कंपनी के अकाउंट्स डिपार्टमेंट में काम करने वाला निखिल रोज शाम सात बजे तक ऑफिस से निकल जाता था।
लेकिन उस दिन महीने का आखिरी दिन होने के कारण काम बहुत ज्यादा था।
ऑफिस से निकलते-निकलते रात के साढ़े दस बज गए।
ऊपर से बारिश।
मोबाइल की बैटरी सिर्फ बारह प्रतिशत बची थी।
और सबसे बड़ी परेशानी…
उसका तंबाकू खत्म हो गया था।
निखिल को पिछले आठ-दस सालों से तंबाकू खाने की आदत थी।
घर में किसी को उसकी यह आदत पसंद नहीं थी।
उसकी पत्नी रोज इसी बात को लेकर उससे झगड़ती थी।
कुछ महीने पहले डॉक्टर ने भी साफ-साफ कहा था,
“छोड़ दीजिए। जितनी जल्दी छोड़ेंगे, उतना अच्छा होगा।”
निखिल हर बार कहता,
“हां, इस महीने से कम कर दूंगा।”
लेकिन वह महीना कभी आया ही नहीं।
उस रात ऑफिस से निकलने से पहले उसने तंबाकू की आखिरी पुड़िया भी खत्म कर दी थी।
उसे लगा था कि रास्ते में कहीं न कहीं कोई दुकान या टपरी खुली मिल जाएगी।
लेकिन बारिश की वजह से सब कुछ बंद था।
दस-पंद्रह मिनट बाइक चलाने के बाद ही उसकी बेचैनी बढ़ने लगी।
वह बार-बार अपनी जीभ दांतों के बीच दबा रहा था।
मुंह एकदम बेस्वाद लग रहा था।
“यार… कोई दुकान तो खुली मिल जाए।”
वह खुद से बोला।
मुख्य सड़क छोड़कर वह पुराने इंडस्ट्रियल रोड पर आ गया।
यह एक शॉर्टकट था।
दिन में इस सड़क से बहुत सारी गाड़ियां गुजरती थीं।
लेकिन रात के समय यह इलाका लगभग खाली हो जाता था।
बारिश अब और तेज हो चुकी थी।
निखिल के हेलमेट के शीशे पर पानी की बूंदें लगातार गिर रही थीं।
तभी उसे दाईं तरफ एक छोटी-सी रोशनी दिखाई दी।
वह थोड़ा आगे गया और बाइक रोक दी।
सड़क से कुछ दूरी पर एक पुरानी एक मंजिला इमारत थी।
उसके सामने एक फीका पड़ चुका बोर्ड लटक रहा था।
“श्री साई विश्राम गृह”
नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—
चाय • नाश्ता • ठंडे पेय
इमारत काफी पुरानी लग रही थी।
लेकिन अंदर एक पीला बल्ब जल रहा था।
निखिल ने बाइक किनारे खड़ी कर दी।
उसे चाय नहीं पीनी थी।
लेकिन शायद वहां तंबाकू मिल जाए, इसी उम्मीद में वह अंदर चला गया।
दरवाजा खोलते ही एक पुरानी घंटी की आवाज आई।
टनन्…
अंदर अजीब-सी खामोशी थी।
पुरानी लकड़ी की मेजें।
चार-पांच प्लास्टिक की कुर्सियां।
एक दीवार पर बंद पड़ी घड़ी।
उसमें समय था—
9:17
काउंटर के पीछे कोई नहीं था।
“कोई है?”
निखिल ने आवाज लगाई।
कोई जवाब नहीं।
उसने दोबारा थोड़ा जोर से कहा,
“मालिक?”
अंदर की तरफ से अचानक कुछ गिरने की आवाज आई।
खड़्!
निखिल ने गर्दन घुमाई।
काउंटर के पीछे एक आधा खुला दरवाजा था।
उस दरवाजे से एक अधेड़ उम्र का आदमी बाहर आया।
उम्र करीब पचास साल।
शरीर पर सफेद बनियान।
कंधे पर एक तौलिया।
उसने निखिल की तरफ देखते हुए पूछा,
“क्या चाहिए?”
“तंबाकू है?”
आदमी कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
“नहीं।”
निखिल का चेहरा उतर गया।
“आसपास कहीं मिल जाएगा क्या?”
“अभी?”
“हां।”
आदमी हल्का-सा मुस्कुराया।
“इस समय यहां कुछ नहीं मिलता।”
निखिल ने निराश होकर सिर हिलाया।
“एक चाय दे दीजिए फिर।”
“बैठो।”
वह आदमी अंदर चला गया।
निखिल एक मेज के पास बैठ गया।
बाहर बारिश छत पर लगातार तेज आवाज कर रही थी।
मोबाइल में नेटवर्क भी मुश्किल से आ रहा था।
बैटरी अब नौ प्रतिशत थी।
उसने व्हाट्सऐप खोला।
पत्नी के दो मैसेज आए थे।
कहां हो?
बारिश बहुत तेज है। धीरे आना।
निखिल ने जवाब टाइप किया—
20-25 मिनट में पहुंच रहा हूं।
उसने मैसेज भेजने की कोशिश की।
लेकिन मैसेज नहीं गया।
तभी काउंटर वाला आदमी चाय लेकर आया।
कप मेज पर रखते हुए उसने पूछा,
“आप पहली बार आए हैं इधर?”
“हां।”
“रात में इस सड़क पर मत आया करो।”
निखिल ने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
आदमी कुछ पल शांत रहा।
फिर बोला,
“सड़क खराब है।”
निखिल हंस पड़ा।
“मुझे लगा कोई भूत की कहानी सुनाने वाले हो।”
लेकिन उस आदमी के चेहरे पर जरा भी हंसी नहीं आई।
वह सीधे काउंटर की तरफ चला गया।
निखिल ने चाय पीनी शुरू की।
लेकिन तंबाकू की तलब कम नहीं हुई।
बल्कि चाय पीने के बाद और बढ़ गई।
उसने फिर पूछा,
“सच में कुछ नहीं है क्या? थोड़ी-सी भी होगी तो चलेगी।”
काउंटर के पीछे खड़ा आदमी रुक गया।
उसने निखिल की तरफ देखा।
“आपको इतनी जरूरत है?”
“हां ना। आदत है।”
आदमी ने धीमी आवाज में पूछा,
“आदत… या तलब?”
निखिल हल्का-सा हंसा।
“दोनों समझ लीजिए।”
आदमी कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
फिर उसने काउंटर के नीचे से एक छोटी-सी धातु की डिब्बी निकाली।
वह बंद थी।
“ये ले लो।”
निखिल के चेहरे पर खुशी आ गई।
“अरे वाह! तो पहले मना क्यों किया?”
“ये बेचने के लिए नहीं है।”
“फिर?”
“एक आदमी की है।”
“कितने पैसे?”
“पैसों की बात नहीं है।”
निखिल ने डिब्बी अपने हाथ में ले ली।
वह हैरान करने वाली हद तक ठंडी थी।
मानो अभी-अभी फ्रिज से निकाली गई हो।
“थोड़ी ले लेता हूं। बाकी रख दूंगा।”
आदमी बोला,
“एक बार खुल गई तो पूरी खत्म करनी पड़ती है।”
निखिल हंस दिया।
“क्या काका, इतनी रात को पहेलियों में क्यों बात कर रहे हो?”
उसने डिब्बी का ढक्कन खोलने की कोशिश की।
लेकिन वह खुल नहीं रहा था।
“घर जाकर खोलना।”
आदमी ने कहा।
निखिल ने भौंहें चढ़ाईं।
“मतलब?”
“यहां मत खोलना।”
उसकी आवाज में अचानक इतनी गंभीरता आ गई कि निखिल ने बिना कुछ कहे डिब्बी अपनी जेब में रख ली।
बारिश अब थोड़ी कम हो चुकी थी।
“कितने हुए?”
“चाय के बीस।”
निखिल ने पैसे दिए।
बाइक स्टार्ट की और वहां से निकल गया।
कुछ दूरी जाने के बाद उसे फिर तंबाकू की तेज तलब महसूस हुई।
उसे जेब में रखी डिब्बी याद आई।
“क्या ड्रामा है… यहां मत खोलना।”
उसने बाइक एक बंद गोदाम के सामने रोक दी।
बारिश अब हल्की हो गई थी।
बाइक की हेडलाइट की रोशनी में उसने डिब्बी बाहर निकाली।
ढक्कन घुमाया।
इस बार वह आसानी से खुल गया।
अंदर तंबाकू जैसी भूरे रंग की पिसी हुई चीज थी।
लेकिन उसकी गंध अलग थी।
पुरानी गीली लकड़ी जैसी।
निखिल कुछ पल रुका।
“जाने दो…”
उसने बहुत थोड़ी-सी मात्रा निकाली।
मुंह में रख ली।
कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।
फिर अचानक उसके पूरे शरीर में एक अजीब-सी ठंडी लहर दौड़ गई।
तलब गायब हो गई।
पूरी तरह।
निखिल ने संतुष्टि से आंखें बंद कर लीं।
“अरे वाह…”
लेकिन तभी…
उसके पीछे से किसी ने धीमी आवाज में पूछा—
“हो गई?”
निखिल ने तुरंत आंखें खोल दीं।
बाइक के शीशे में देखा।
पीछे कोई नहीं था।
उसने तेजी से मुड़कर देखा।
सड़क खाली थी।
“वहम होगा।”
वह खुद से बोला।
उसने डिब्बी जेब में रखी।
बाइक स्टार्ट की।
करीब पांच मिनट बाद वह एक बड़े चौराहे पर पहुंचा।
सिग्नल बंद था।
सड़क पूरी तरह खाली।
उसे बाईं तरफ मुड़ना था।
लेकिन GPS बंद हो जाने के कारण वह अंदाजे से रास्ता पकड़ रहा था।
थोड़ा आगे जाने पर उसे महसूस हुआ—
यह सड़क जानी-पहचानी नहीं थी।
दोनों तरफ बंद फैक्ट्रियां थीं।
जंग लगे गेट।
कहीं कोई रोशनी नहीं।
निखिल ने बाइक रोक दी।
मोबाइल देखा।
बैटरी पांच प्रतिशत।
नेटवर्क शून्य।
तभी उसे सामने सड़क के किनारे एक आदमी खड़ा दिखाई दिया।
काला रेनकोट।
सिर पर हूड।
वह बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
निखिल उसके पास गया।
“भाई, हडपसर का रास्ता किधर है?”
उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।
“भाई?”
उसने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।
और सामने वाली एक संकरी सड़क की तरफ उंगली कर दी।
“थैंक्स।”
निखिल आगे निकल गया।
दो मिनट बाद उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।
आगे वाले मोड़ पर…
वही काला रेनकोट पहने आदमी फिर खड़ा था।
निखिल ने बाइक की रफ्तार कम कर दी।
“ये यहां कैसे?”
वह उसके पास पहुंचा।
आदमी ने इस बार भी कुछ नहीं कहा।
बस अगले रास्ते की तरफ उंगली कर दी।
निखिल के रोंगटे खड़े हो गए।
इस बार उसने उस आदमी की तरफ ध्यान नहीं दिया और बाइक दूसरी दिशा में मोड़ दी।
कुछ दूरी जाने के बाद उसने पीछे के शीशे में देखा।
वह काला रेनकोट पहना आदमी सड़क के बीचों-बीच खड़ा था।
और सीधे निखिल की तरफ देख रहा था।
निखिल ने बाइक की रफ्तार बढ़ा दी।
अब उसकी तंबाकू की तलब फिर लौट आई थी।
पहले से भी ज्यादा।
जीभ में बेचैनी।
सिर चकराने जैसा एहसास।
उसने जेब से डिब्बी निकाली।
“बस एक बार और।”
बाइक रोककर उसने थोड़ी-सी तंबाकू जैसी चीज फिर मुंह में रख ली।
तलब दोबारा शांत हो गई।
लेकिन इस बार तुरंत उसके कान के पास से आवाज आई—
“और ले…”
निखिल जम गया।
आवाज बिल्कुल उसके पास से आई थी।
वह पीछे मुड़ा।
कोई नहीं।
“और…”
अब आवाज बाईं तरफ से आई।
“और ले…”
फिर दाईं तरफ से।
निखिल ने तुरंत डिब्बी बंद कर दी।
बाइक पर बैठा और तेजी से आगे निकल गया।
कुछ देर बाद उसे एक पेट्रोल पंप दिखाई दिया।
उसने राहत की सांस ली।
पेट्रोल पंप बंद था।
लेकिन बगल वाले ऑफिस में लाइट जल रही थी।
निखिल ने दरवाजा खटखटाया।
एक जवान सिक्योरिटी गार्ड बाहर आया।
“क्या हुआ?”
“भाई, ये हडपसर जाने वाला रास्ता है क्या?”
गार्ड ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“हडपसर? आप तो उल्टी दिशा में आ गए।”
“क्या?”
“यहां से करीब तीस किलोमीटर उल्टा आ चुके हो।”
निखिल को झटका लगा।
“लेकिन मैं तो…”
वह बीच में ही रुक गया।
“क्या?”
“कुछ नहीं।”
गार्ड ने उसे सही रास्ता समझाया।
निखिल जाने ही वाला था कि गार्ड ने अचानक पूछा,
“साहब, आपकी जेब से कैसी आवाज आ रही है?”
निखिल रुक गया।
“कौन-सी आवाज?”
दोनों शांत हो गए।
निखिल की जेब से बहुत हल्की आवाज आ रही थी।
टक…
टक…
टक…
जैसे कोई अंदर से धातु पर नाखून मार रहा हो।
निखिल का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसने डिब्बी बाहर निकाली।
गार्ड ने पूछा,
“ये क्या है?”
“तंबाकू।”
“फेंक दीजिए।”
“क्यों?”
गार्ड ने कोई जवाब नहीं दिया।
निखिल ने डिब्बी पास रखे कूड़ेदान में फेंक दी।
टक-टक की आवाज बंद हो गई।
“अब जाइए।”
गार्ड ने कहा।
निखिल ने बाइक स्टार्ट की।
करीब दस मिनट तक वह ठीक रास्ते पर चलता रहा।
लेकिन अचानक तंबाकू की तलब फिर लौट आई।
इस बार इतनी तेज कि उसके लिए बाइक चलाना मुश्किल हो गया।
मुंह सूखने लगा।
हाथ कांपने लगे।
उसके दिमाग में लगातार सिर्फ एक ही विचार घूम रहा था—
वह डिब्बी वापस ले आ।
निखिल खुद को समझाने लगा।
“नहीं।”
लेकिन दो मिनट बाद…
उसने बाइक मोड़ दी।
वापस पेट्रोल पंप की तरफ।
वह वहां पहुंचा।
ऑफिस अब अंधेरे में था।
“भाई?”
कोई जवाब नहीं आया।
उसने कूड़ेदान में देखा।
डिब्बी वहां नहीं थी।
तभी पीछे से आवाज आई—
“इसे ढूंढ रहे हो?”
निखिल पलटा।
वही काला रेनकोट पहना आदमी सामने खड़ा था।
उसके हाथ में वही डिब्बी थी।
निखिल दो कदम पीछे हट गया।
“कौन हो तुम?”
आदमी शांत रहा।
उसने डिब्बी निखिल के सामने कर दी।
“ले लो।”
उसकी आवाज सुनते ही निखिल के पूरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।
ये आवाज…
विश्राम गृह वाले उस मालिक की थी।
“आप?”
उस आदमी ने धीरे-धीरे अपना हूड पीछे किया।
लेकिन अंदर कोई चेहरा नहीं था।
सिर्फ अंधेरा।
गहरा काला अंधेरा।
निखिल के हाथ-पैरों की ताकत जैसे खत्म हो गई।
उस अंधेरे के अंदर से आवाज आई—
“जब तलब हो… तो चेहरा देखने की क्या जरूरत?”
निखिल चीखते हुए पीछे हटा।
डिब्बी जमीन पर गिर गई।
उसका ढक्कन खुल गया।
भूरे रंग की वह चीज सड़क पर फैल गई।
और अचानक उसमें से कई आवाजें एक साथ फुसफुसाने लगीं—
“थोड़ी और…”
“बस एक बार…”
“आखिरी बार…”
“बाद में छोड़ देंगे…”
“कल से बंद…”
निखिल के दिमाग में ऐसा लग रहा था जैसे सैकड़ों लोग एक साथ बोल रहे हों।
उसने अपने कान बंद कर लिए।
आंखें कसकर बंद कर लीं।
“बस!”
वह जोर से चिल्लाया।
और उस डिब्बी पर पैर रखकर उसे कुचल दिया।
उसी पल सारी आवाजें बंद हो गईं।
पूरी खामोशी।
निखिल ने आंखें खोलीं।
सामने कोई नहीं था।
न वह काला आदमी।
न वह डिब्बी।
न सड़क पर फैली भूरी चीज।
सिर्फ बारिश से भीगी हुई खाली सड़क।
कुछ सेकंड तक निखिल वहीं खड़ा रहा।
फिर उसने बाइक स्टार्ट की और जितनी जल्दी हो सकता था, वहां से निकल गया।
सुबह करीब चार बजे वह घर पहुंचा।
उसकी पत्नी दरवाजे पर ही खड़ी थी।
“कहां थे इतनी देर? फोन भी बंद था!”
निखिल ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह सीधे बाथरूम में गया।
चेहरे पर पानी डाला।
आईने में खुद को देखा।
उसकी आंखें लाल थीं।
वह अभी तक उस घटना से सहमा हुआ था।
कुछ देर बाद उसे एहसास हुआ—
तंबाकू की तलब फिर हो रही थी।
उसने आईने में अपनी आंखों में देखते हुए खुद से कहा,
“नहीं।”
उस दिन निखिल ने तंबाकू छोड़ने का फैसला कर लिया।
शुरुआत के कुछ दिन मुश्किल थे।
सिरदर्द।
चिड़चिड़ापन।
बेचैनी।
लेकिन उसने दोबारा तंबाकू को हाथ नहीं लगाया।
कुछ हफ्तों बाद एक दिन ऑफिस में उसके एक सहकर्मी ने पूछा,
“कल मैं उस पुराने इंडस्ट्रियल रोड से आया था। वहां कोई होटल है क्या?”
निखिल के चेहरे के भाव बदल गए।
“क्यों?”
“मुझे एक बोर्ड दिखाई दिया था। श्री साई विश्राम गृह या ऐसा ही कुछ नाम था।”
निखिल के हाथ में पकड़ा पेन रुक गया।
“तू अंदर गया था?”
“नहीं। बंद लग रहा था।”
“कितने बजे?”
“रात के करीब ग्यारह।”
निखिल ने बिना कुछ कहे अपना मोबाइल निकाल लिया।
अगले दिन उसकी छुट्टी थी।
दोपहर में वह उसी सड़क पर गया।
उस जगह पहुंचा जहां उस रात उसने विश्राम गृह देखा था।
लेकिन वहां कोई चालू होटल नहीं था।
सिर्फ एक आधी टूटी हुई पुरानी इमारत खड़ी थी।
खिड़कियां टूटी हुई थीं।
दरवाजे पर जंग लगा ताला था।
बगल की दीवार पर एक फीका पड़ चुका बोर्ड अब भी लटक रहा था।
श्री साई विश्राम गृह
निखिल के रोंगटे खड़े हो गए।
पास के गैरेज में बैठे एक बुजुर्ग आदमी से उसने पूछा,
“काका, ये होटल कब से बंद है?”
बुजुर्ग ने उसकी तरफ देखा।
“होटल?”
“हां।”
“कम से कम बीस साल हो गए होंगे।”
“मालिक?”
बुजुर्ग कुछ पल शांत रहा।
“मालिक को तंबाकू की बहुत बुरी लत थी।”
निखिल के चेहरे का रंग उड़ गया।
“फिर?”
“एक रात दुकान बंद करके घर जाते समय रास्ते में अचानक उसकी तबीयत खराब हो गई। कहते हैं कि वह वापस यहीं आया था। आसपास मदद करने वाला कोई नहीं था।”
बुजुर्ग ने उस खंडहर हो चुकी इमारत की तरफ देखा।
“अगली सुबह वह यहीं मिला था।”
निखिल कुछ बोल नहीं पाया।
वह जाने के लिए मुड़ा।
तभी बुजुर्ग ने पीछे से पूछा,
“लेकिन आप ये सब क्यों पूछ रहे हो?”
निखिल रुक गया।
“कुछ नहीं।”
वह अपनी बाइक के पास गया।
हेलमेट पहनते समय अचानक उसकी नजर जमीन पर पड़ी।
विश्राम गृह के दरवाजे के ठीक अंदर…
एक छोटी-सी धातु की डिब्बी पड़ी थी।
वही।
उस रात वाली।
निखिल कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
फिर बिना पीछे देखे उसने बाइक स्टार्ट की।
और वहां से निकल गया।
लेकिन उस दिन के बाद…
उस सड़क से रात में गुजरने वाले कुछ लोगों ने एक अजीब बात बताई।
बरसात के दिनों में…
देर रात…
कभी-कभी उस बंद पड़े विश्राम गृह के अंदर एक पीला बल्ब जलता हुआ दिखाई देता है।
और अगर कोई मुसाफिर वहां रुक जाए…
तो अंदर से एक आदमी पूछता है—
“क्या चाहिए?”
और अगर जवाब मिले—
“तंबाकू है क्या?”
तो काउंटर के नीचे से…
एक ठंडी धातु की डिब्बी बाहर आती है।
क्योंकि कुछ लतें हम नहीं छोड़ते।
और कभी-कभी…
वे लतें ही हमें छोड़ने के लिए तैयार नहीं होतीं।
समाप्त
WHO – Tobacco Information — तंबाकू के स्वास्थ्य प्रभावों की authoritative जानकारी।