Jantar Mantar Ki Raat | True Delhi Horror Story

BY GOVIND BHISE

दिल्ली की सर्दियां हमेशा अजीब लगती थीं। दिन में वही भीड़, वही traffic, वही metro stations पर भागते लोग… लेकिन रात होते ही शहर का चेहरा बदल जाता था। खासकर Connaught Place के आसपास का इलाका। सफेद colonial buildings, खाली सड़कें, दूर सुनाई देती police siren की आवाज, और ठंडी हवा जिसमें पता नहीं क्यों हमेशा पुरानी धूल और नमी की smell रहती थी।

उस रात भी कुछ ऐसा ही था।

True Delhi Horror Story

दिसंबर का आखिरी हफ्ता चल रहा था। रात लगभग साढ़े बारह बज चुके थे। True Delhi Horror Story मैं अपने दोस्त करण के साथ CP से लौट रहा था। हम दोनों पुरानी जगहों, abandoned buildings और haunted locations जैसी चीजों में हमेशा interest रखते थे। Ghost stories पर पूरा भरोसा नहीं था… लेकिन curiosity बहुत थी।

करण ने अचानक बाइक धीमी की और बोला,
“भाई… Jantar Mantar चलते हैं?”

मैं हंस पड़ा।
“रात के एक बजे?”

“यही तो मज़ा है।”

उस समय सड़क लगभग खाली थी। हवा इतनी ठंडी थी कि helmet के अंदर भी चेहरा सुन्न लग रहा था। दूर कुछ stray dogs सड़क किनारे बैठे थे और बीच-बीच में कोई cab निकल जाती थी।

पंद्रह मिनट बाद हम Jantar Mantar के बाहर थे।

दिन में वहां tourists, school groups और guides की आवाजें रहती हैं। लेकिन रात में… वह जगह बिल्कुल अलग लगती है। बाहर लगी yellow street lights आधी बुझी हुई थीं। अंदर का हिस्सा अंधेरे में डूबा हुआ था। ऊंची लाल दीवारें रात में और भी डरावनी लग रही थीं।

Gate बंद था।

लेकिन side वाली railing टूटी हुई थी।

करण ने मुस्कुराकर कहा,
“बस दो मिनट अंदर चलते हैं। कुछ footage मिल गया तो next video बन जाएगी।”

मैंने पहले मना किया। लेकिन फिर वही stupidity… वही excitement… और हम दोनों अंदर कूद गए।

अंदर जाते ही सबसे पहले जो चीज महसूस हुई, वो थी अजीब सी खामोशी।

दिल्ली जैसा शहर पूरी तरह कभी शांत नहीं होता। कहीं न कहीं गाड़ियों की आवाज, horns या लोगों की बातें सुनाई देती रहती हैं। लेकिन वहां अंदर… कुछ नहीं था।

सिर्फ हवा।

और वो भी अजीब।

जैसे किसी बंद कमरे में पुरानी हवा घूम रही हो।

करण phone flashlight ऑन करके आगे बढ़ा। लाल पत्थरों से बने वो बड़े-बड़े structures रात में किसी alien चीज की तरह दिख रहे थे। उनकी shadows जमीन पर टेढ़ी-मेढ़ी पड़ी थीं।

मैंने धीरे से कहा,
“यार जल्दी निकलते हैं।”

करण हंस पड़ा।
“अबे डर गया क्या?”

मैं जवाब देने ही वाला था कि अचानक मुझे लगा… कोई हमारे पीछे से गुजरा।

बहुत हल्का सा movement।

मैंने तुरंत मुड़कर देखा।

कुछ नहीं।

सिर्फ अंधेरा।

लेकिन दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई थी।

करण उस समय एक बड़े curved structure के पास जाकर camera angle देख रहा था। उसने मजाक में कहा,
“Imagine अगर अभी यहां कोई पुराना astronomer दिख जाए तो?”

मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि उसी वक्त मुझे पहली बार वो आवाज सुनाई दी।

बहुत धीमी।

जैसे कोई दूर से सांस ले रहा हो।

मैं freeze हो गया।

“करण…”

“हां?”

“तुझे कुछ सुनाई दे रहा है?”

वो कुछ सेकंड चुप रहा। फिर बोला,
“नहीं।”

लेकिन उसके चेहरे का expression बता रहा था कि उसने भी कुछ सुना था।

हम दोनों अब धीरे-धीरे वापस gate की तरफ चलने लगे। हवा अचानक और ठंडी लगने लगी थी। इतनी कि हाथ कांपने लगे।

तभी करण रुक गया।

उसकी flashlight एक दीवार पर पड़ी हुई थी।

वहां किसी ने कुछ लिखा हुआ था।

Black color से।

पहले लगा graffiti होगी।

लेकिन पास जाने पर मेरी रीढ़ में ठंड उतर गई।

वहां सिर्फ एक line लिखी थी —

“रात के बाद यहां मत रुकना।”

नीचे कोई नाम नहीं था।

कोई date नहीं।

कुछ नहीं।

करण ने nervous हंसी के साथ कहा,
“किसी ने prank किया होगा।”

लेकिन उसकी आवाज में confidence नहीं था।

हम आगे बढ़े ही थे कि अचानक करण का phone बंद हो गया।

Battery 70% थी।

उसने दो-तीन बार power button दबाया।
कुछ नहीं।

फिर मेरा phone भी बंद हो गया।

बिना warning के।

उस समय पहली बार मुझे सच में डर लगा।

True Delhi Horror Story

क्योंकि अब पूरा Jantar Mantar pitch black था।

इतना अंधेरा कि अपने हाथ भी मुश्किल से दिख रहे थे।

और उसी अंधेरे में मुझे लगा… कोई हमें देख रहा है।

किसी ऊंची जगह से।

करण ने धीरे से कहा,
“चल… अभी निकलते हैं।”

हम जल्दी-जल्दी gate की तरफ बढ़ने लगे। लेकिन कुछ सेकंड बाद ही एहसास हुआ कि हम घूमकर वापस उसी जगह आ गए हैं जहां दीवार पर warning लिखी थी।

मैं रुक गया।

“हम इधर फिर कैसे आ गए?”

करण ने कुछ नहीं कहा।

उसके चेहरे पर अब डर साफ दिख रहा था।

हमने दूसरी direction पकड़ ली।

फिर वही।

कुछ मिनट बाद फिर वही structure… वही दीवार।

अब मेरी सांसें तेज होने लगी थीं।

दिल्ली की ठंडी हवा के बावजूद माथे पर पसीना आ गया।

करण ने गुस्से में कहा,
“यह possible नहीं है।”

तभी ऊपर कहीं से पत्थर घिसटने जैसी आवाज आई।

हम दोनों ने एक साथ ऊपर देखा।

एक लंबा सा shadow structure के किनारे खड़ा था।

इतनी दूरी थी कि चेहरा साफ नहीं दिख रहा था। लेकिन वो इंसान जैसा नहीं लग रहा था। उसकी body अजीब तरह से झुकी हुई थी… जैसे गर्दन normal angle से ज्यादा नीचे मुड़ी हो।

मैंने instinctively पीछे कदम लिया।

Shadow हिला नहीं।

बस खड़ा रहा।

और फिर धीरे-धीरे… गायब हो गया।

करण अब सच में panic कर चुका था।

“भाई भाग यहां से।”

हम लगभग दौड़ते हुए आगे बढ़े। लेकिन उस जगह का layout जैसे बदल रहा था। जहां रास्ता होना चाहिए था वहां दीवार थी। जहां खुला area था वहां अंधेरा।

फिर अचानक…

हमें किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

धीमी।

साफ।

जैसे कोई हमारे पीछे उसी speed से चल रहा हो।

हम रुके।

आवाज भी रुक गई।

हम फिर चले।

आवाज फिर शुरू।

अब करण literally कांप रहा था।

उसने पीछे मुड़कर चिल्लाया,
“कौन है?!”

कोई जवाब नहीं।

लेकिन अगले ही पल मेरे कान के बिल्कुल पास किसी ने बहुत धीमी आवाज में कुछ कहा।

इतनी धीमी कि शब्द समझ नहीं आए।

लेकिन वो इंसानी आवाज नहीं थी।

मैं झटके से पीछे हटा।

वहां कोई नहीं था।

उस समय मुझे लगा शायद panic की वजह से hallucination हो रहा है। लेकिन तभी करण ने मुझे पकड़ लिया।

उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।

“तूने सुना?”

मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि उसी समय सामने वाले structure के ऊपर कोई तेजी से भागा।

एक काली आकृति।

इतनी तेज कि आंखें ठीक से follow भी नहीं कर पाईं।

फिर अचानक सब शांत।

इतनी शांत कि अपने heartbeat की आवाज तक सुनाई दे रही थी।

और फिर…

दूर कहीं एक light जली।

पीली।

बहुत हल्की।

वो Jantar Mantar के सबसे अंदर वाले हिस्से की तरफ थी।

करण ने धीरे से कहा,
“कोई guard होगा…”

लेकिन मुझे नहीं लगा वो इंसान था।

फिर भी हम दोनों उसी तरफ बढ़ने लगे। शायद इसलिए क्योंकि अंधेरे में वही एक चीज थी जो normal लग रही थी।

जैसे-जैसे हम पास पहुंचे, हवा और भारी लगने लगी।

सांस लेना मुश्किल।

और वहां पहुंचकर जो हमने देखा… उसने आज तक मुझे सोने नहीं दिया।

वहां एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

बहुत पतला।

सफेद पुराने कपड़े।

सिर नीचे झुका हुआ।

हाथ में lantern।

पहले लगा शायद कोई homeless आदमी होगा।

लेकिन फिर उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसकी आंखें पूरी तरह सफेद थीं।

कोई pupil नहीं।

कोई expression नहीं।

बस खाली सफेद आंखें।

करण पीछे हट गया।
“चल… चल यहां से…”

लेकिन बूढ़ा आदमी वहीं खड़ा रहा।

फिर उसने बहुत धीरे से हाथ उठाकर Jantar Mantar के सबसे बड़े structure की तरफ इशारा किया।

और पहली बार बोला।

“वहां मत जाओ…”

उसकी आवाज ऐसी थी जैसे बहुत पुराने radio से निकल रही हो।

मैंने डरते हुए पूछा,
“क्यों?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस लगातार उसी direction में देखता रहा।

और तभी…

ऊपर से किसी चीज के गिरने की जोरदार आवाज आई।

हम तीनों ने एक साथ ऊपर देखा।

कुछ सेकंड के लिए मुझे लगा कोई इंसान structure के किनारे पर खड़ा है।

फिर वह चीज सीधे नीचे कूदी।

लेकिन जमीन पर गिरने की आवाज नहीं आई।

कुछ भी नहीं।

जैसे वो हवा में गायब हो गई हो।

करण अब almost रोने की हालत में था।
“बस निकलते हैं।”

हम मुड़े…

लेकिन बूढ़ा आदमी गायब था।

Lantern भी नहीं।

कोई footsteps नहीं।

कुछ नहीं।

सिर्फ खाली जगह।

उस moment पर मेरे अंदर कुछ टूट गया। अब curiosity खत्म हो चुकी थी। सिर्फ डर बचा था।

हम दोनों भागने लगे।

इस बार सच में।

बिना पीछे देखे।

पत्थरों पर पैर फिसल रहे थे। सांस टूट रही थी। लेकिन पीछे देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

और तभी…

मुझे साफ महसूस हुआ कि कोई हमारे पीछे दौड़ रहा है।

बहुत तेज।

इतना तेज कि उसके कदमों की vibration जमीन पर महसूस हो रही थी।

करण अचानक चिल्लाया,
“मत मुड़ना!”

लेकिन इंसान का दिमाग ऐसी हालत में वही करता है जो नहीं करना चाहिए।

मैं मुड़ गया।

और जो मैंने देखा… उसे शब्दों में explain करना मुश्किल है।

अंधेरे में एक लंबी काली आकृति हमारी तरफ दौड़ रही थी।

उसका शरीर इंसान जैसा था लेकिन हाथ असामान्य रूप से लंबे थे। और सबसे डरावनी चीज…

उसका चेहरा।

वह पूरा काला था।

जैसे किसी ने चेहरे की जगह खाली अंधेरा भर दिया हो।

मैं वहीं freeze हो गया।

करण ने मुझे जोर से खींचा।
“भाग!”

हम railing पार करके बाहर सड़क पर आ गए।

और उसी सेकंड पीछे का सब कुछ शांत हो गया।

इतना अचानक… कि दिमाग समझ ही नहीं पाया।

सड़क पर आते ही traffic की दूर की आवाजें फिर सुनाई देने लगीं। Cars… horns… normal दुनिया वापस आ गई थी।

लेकिन हम दोनों की हालत खराब थी।

करण वहीं फुटपाथ पर बैठ गया। उसके हाथ कांप रहे थे।

कुछ मिनट तक हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला।

फिर मैंने धीरे से पूछा,
“तूने भी देखा था ना?”

करण ने सिर्फ सिर हिलाया।

उस रात के बाद कई दिनों तक हम दोनों ने इस बारे में बात नहीं की।

लेकिन असली डर उसके बाद शुरू हुआ।

तीन दिन बाद करण ने मुझे call किया।

उसकी आवाज बदली हुई लग रही थी।

बहुत थकी हुई।

उसने कहा,
“भाई… मुझे रात में कोई दिखता है।”

मैं चुप रहा।

“क्या मतलब?”

“हर रात… कमरे के कोने में कोई खड़ा रहता है।”

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि शायद trauma होगा। Lack of sleep। Anxiety।

लेकिन फिर उसने एक और बात कही।

“वही चेहरा है…”

उसके बाद करण बदलने लगा।

वो पहले जैसा funny और loud नहीं रहा। उसने बाहर निकलना बंद कर दिया। Phone calls avoid करने लगा। उसकी मां ने बताया कि वो रात में सोते-सोते अचानक उठकर कमरे की दीवारों को घूरता रहता है।

एक हफ्ते बाद मैं उससे मिलने गया।

उसका कमरा पूरी तरह अंधेरा था।

दिन के समय भी curtains बंद।

वो बिस्तर पर बैठा था और बेहद कमजोर लग रहा था।

मैंने पूछा,
“क्या हो रहा है तेरे साथ?”

उसने मेरी तरफ देखा।

और उस moment पर मेरे पूरे शरीर में डर दौड़ गया।

क्योंकि उसकी आंखों के नीचे गहरे काले घेरे थे… लेकिन सबसे डरावनी चीज उसकी नजर थी।

वो लगातार मेरे पीछे देख रहा था।

मैंने धीरे से पूछा,
“क्या देख रहा है?”

उसने फुसफुसाकर कहा,
“वो तेरे पीछे खड़ा है।”

मेरी सांस रुक गई।

मैं तुरंत पीछे मुड़ा।

कोई नहीं।

लेकिन कमरे का temperature अचानक गिर चुका था।

इतना कि सांस से धुंध निकल रही थी।

मैं बिना कुछ बोले वहां से निकल गया।

उसके बाद करण से मेरी आखिरी बात दो दिन बाद हुई।

रात के करीब ढाई बजे उसका call आया।

उसकी सांसें तेज चल रही थीं।

“वो कमरे में है…”

मैंने कहा,
“Police को call कर!”

लेकिन उसने मेरी बात नहीं सुनी।

सिर्फ एक ही line बार-बार बोल रहा था।

“वो पास आ रहा है…”

फिर अचानक call कट गया।

अगले दिन पता चला… करण अपने कमरे में dead मिला।

Official report में heart failure लिखा गया।

उम्र — 27 साल।

कोई बीमारी नहीं।

कोई drugs नहीं।

कुछ नहीं।

लेकिन सबसे अजीब बात police ने नहीं बताई।

वो मुझे उसकी मां से पता चली।

मरने से पहले करण ने अपने कमरे की दीवार पर कुछ लिखा था।

काले marker से।

सिर्फ एक sentence।

“वो Jantar Mantar से मेरे साथ आया था।”

उसके बाद मैंने कभी उस जगह के पास जाने की कोशिश नहीं की।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

करीब छह महीने बाद मैं late night metro से Rajiv Chowk उतर रहा था। Platform लगभग खाली था। हवा में वही ठंडी नमी थी जो उस रात महसूस हुई थी।

मैं escalator की तरफ बढ़ रहा था तभी अचानक मेरी नजर सामने खड़े एक आदमी पर गई।

सफेद कपड़े।

झुका हुआ शरीर।

और हाथ में पुरानी lantern।

वही बूढ़ा आदमी।

वो भीड़ के बीच बिल्कुल चुप खड़ा था।

मैं freeze हो गया।

कुछ सेकंड बाद उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।

सफेद आंखें।

बिल्कुल वैसी ही।

फिर उसने मेरी तरफ देखकर बहुत हल्का सा सिर हिलाया…

जैसे warning दे रहा हो।

और अगले ही पल भीड़ उसके सामने से गुजरी।

जब लोग हटे…

वह गायब था।

उस रात घर पहुंचने के बाद मैंने पहली बार internet पर Jantar Mantar के बारे में पुराने records पढ़ने शुरू किए।

और वहां मुझे एक चीज मिली जिसने आज तक मेरी नींद खराब कर रखी है।

1700s के कुछ पुराने documents में लिखा था कि Jantar Mantar बनने के दौरान वहां कई मजदूरों की unexplained मौत हुई थी।

कुछ bodies कभी मिली ही नहीं।

और workers रात के बाद अंदर जाने से डरते थे।

क्यों?

उसका कोई साफ जवाब कहीं नहीं था।

लेकिन एक बात बार-बार लिखी हुई थी —

“सूरज ढलने के बाद वहां रुकना मना था।”

आज भी जब कभी रात में Delhi की ठंडी हवा चलती है… या कहीं दूर पुरानी lantern जैसी रोशनी दिखती है… मुझे वही जगह याद आती है।

और सबसे डरावनी बात?

कभी-कभी देर रात मुझे अब भी ऐसा लगता है…

जैसे कोई मेरे पीछे उसी speed से चल रहा हो।

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