बंद कुएँ की सौगंध | Hindi Horror Story

उस रात घड़ी में ठीक बारह बजकर पाँच मिनट हुए थे।

आसमान पर बादलों की मोटी परत छाई हुई थी। दूर पहाड़ियों के पीछे कहीं बिजली चमकती, लेकिन गरज की आवाज़ गांव तक नहीं पहुँचती। हवा बिल्कुल शांत थी। इतनी शांत कि किसी के आँगन में लटकती लोहे की बाल्टी की हल्की-सी खनक भी पूरे मोहल्ले में सुनाई दे जाती।

बंद कुएँ की सौगंध

गांव के बीचों-बीच बना सौ साल पुराना पत्थर का कुआँ अंधेरे में एक काली परछाईं की तरह खड़ा था। उसके चारों ओर पत्थर की टूटी हुई मेड़ थी, जिस पर काई जमी हुई थी। दिन में लोग उसके पास बैठकर बातें कर लेते थे, लेकिन सूरज डूबते ही पूरा इलाका सूना पड़ जाता। बंद कुएँ की सौगंध

उसी समय गांव के किनारे बने एक पुराने वाड़े में एक जीप आकर रुकी।

दरवाज़ा खुला और लगभग तीस साल का एक युवक नीचे उतरा।

उसका नाम निखिल था।

पुणे में रहने वाला सिविल इंजीनियर।

करीब पंद्रह साल बाद वह अपने पुश्तैनी गांव लौटा था।

उसके हाथ में सिर्फ एक बैग था और चेहरे पर लंबी यात्रा की थकान साफ दिखाई दे रही थी।

बरामदे में बैठे वृद्ध व्यक्ति ने उसे देखते ही धीमी आवाज़ में कहा,

“आ गया रे… आखिर आ ही गया।”

निखिल ने उनके पैर छुए।

“कैसे हैं, दामू काका?”

बूढ़े ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उनकी आँखों में खुशी से ज़्यादा चिंता थी।

“ठीक हैं… चल, अंदर चल। रात बहुत हो गई है।”

निखिल ने इधर-उधर नज़र दौड़ाई।

बचपन की कई यादें उसी आँगन से जुड़ी थीं।

आम का वही पुराना पेड़।

टूटी हुई तुलसी चौकी।

बरामदे का लकड़ी का झूला।

सब कुछ वैसा ही था, बस समय ने हर चीज़ पर धूल की एक मोटी परत चढ़ा दी थी।

अंदर पहुँचते ही उसकी नज़र दीवार पर टंगी दादा की तस्वीर पर गई।

तस्वीर पर ताज़ा गेंदे की माला थी।

वह कुछ पल चुपचाप तस्वीर को देखता रहा।

फिर धीमे से बोला,

“काश… एक बार मिल पाता।”

दामू काका ने गहरी साँस ली।

“आखिरी समय तक तेरा ही नाम लेते रहे।”

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

थोड़ी देर बाद खाना परोसा गया।

खाते-खाते निखिल ने पूछा,

“दादा की ज़मीन के कागज़ कहाँ हैं?”

दामू काका का हाथ अचानक रुक गया।

उन्होंने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा, फिर नज़रें झुका लीं।

“सुबह बात करेंगे।”

“अभी क्यों नहीं?”

“क्योंकि… रात में उस बात का नाम लेना अच्छा नहीं मानते।”

निखिल हल्का-सा हँसा।

“इतने साल शहर में रहकर मैं ये सब मानना भूल गया हूँ, काका।”

दामू काका ने कोई जवाब नहीं दिया।

उन्होंने बस धीरे से कहा,

“शहर में बहुत-सी बातें नहीं होतीं… लेकिन गांव में आज भी होती हैं।”

खाना खत्म हुआ।

दामू काका ने उसे ऊपर वाले कमरे में सुला दिया।

कमरा पुराना था, मगर साफ था।

लकड़ी की छत।

मिट्टी की दीवारें।

एक पुरानी अलमारी।

और खिड़की से दूर दिखाई देता वही पत्थर का कुआँ।

निखिल ने खिड़की बंद की और बिस्तर पर लेट गया।

लंबे सफर की वजह से उसे नींद आने में ज़्यादा देर नहीं लगी।

लेकिन रात करीब दो बजे उसकी आँख अचानक खुल गई।

गला पूरी तरह सूख चुका था।

वह उठा और कमरे के कोने में रखा मिट्टी का घड़ा उठाया।

घड़ा बिल्कुल खाली था।

उसने हल्की आवाज़ में पुकारा,

“काका…?”

कोई जवाब नहीं आया।

पूरा घर गहरी नींद में डूबा था।

निखिल मोबाइल की टॉर्च जलाकर नीचे उतरा।

रसोई देखी।

वहाँ भी पानी नहीं था।

बरामदे में रखा एक पुराना पीतल का लोटा दिखाई दिया।

उसी समय उसकी नज़र सामने खिड़की से बाहर गई।

चाँद बादलों से निकल चुका था।

उसकी फीकी रोशनी सीधे गांव के बीचों-बीच बने उस पुराने कुएँ पर पड़ रही थी।

दामू काका की शाम वाली बात उसके कानों में गूँज उठी—

“रात में उस तरफ मत जाना…”

निखिल ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया।

“एक बाल्टी पानी ही तो लेना है…”

उसे क्या पता था कि यही फैसला उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल बनने वाला है।

निखिल ने बरामदे के कोने से पीतल का लोटा उठाया और धीरे-धीरे आँगन पार करने लगा।

रात असामान्य रूप से ठंडी थी।

कुछ देर पहले तक हवा बिल्कुल शांत थी, लेकिन जैसे ही उसने घर की चौखट पार की, सूखे पत्ते उसके पैरों के पास घूमने लगे। दूर कहीं कुत्ता भौंका और अचानक चुप हो गया।

गांव की पतली गली चाँदनी में सफेद दिखाई दे रही थी।

दोनों तरफ मिट्टी और पत्थर के घर थे। सभी दरवाजे बंद थे। किसी खिड़की से रोशनी नहीं आ रही थी।

निखिल कुछ ही कदम चला था कि उसे महसूस हुआ जैसे कोई पीछे से उसे देख रहा हो।

वह पलटा।

गली खाली थी।

उसने गहरी साँस ली और आगे बढ़ गया।

कुआँ घर से ज्यादा दूर नहीं था। लेकिन उस रात रास्ता उसे जरूरत से ज्यादा लंबा लग रहा था।

जैसे-जैसे वह पास पहुँच रहा था, हवा में एक हल्की-सी गंध घुलने लगी।

यह गीली मिट्टी की गंध नहीं थी।

अगरबत्ती जैसी थी।

बंद कुएँ की सौगंध

पुराने मंदिर में जलने वाली चंदन की अगरबत्ती जैसी।

निखिल कुएँ के सामने जाकर रुक गया।

पास से देखने पर वह और भी पुराना लग रहा था। उसकी गोल पत्थर की दीवार पर मोटी काई जमी थी। किनारे पर पड़ी लकड़ी की चरखी आधी सड़ चुकी थी।

रस्सी से बंधी लोहे की बाल्टी नीचे अंधेरे में लटक रही थी।

निखिल ने मोबाइल की टॉर्च कुएँ के अंदर डाली।

रोशनी कुछ ही फुट नीचे जाकर अंधेरे में खो गई।

पानी दिखाई नहीं दे रहा था।

उसने रस्सी पकड़ी और बाल्टी नीचे छोड़ने लगा।

चरखी से धीमी चरमराहट निकली।

चर्र…

चर्र…

चर्र…

कुछ सेकंड बाद नीचे से पानी में बाल्टी गिरने की आवाज आई।

छपाक!

उसी पल कुएँ के भीतर से कोई दूसरी आवाज भी सुनाई दी।

बहुत हल्की।

जैसे किसी ने लंबी साँस छोड़ी हो।

निखिल ने तुरंत नीचे झाँका।

“कौन है?”

उसकी आवाज कुएँ की दीवारों से टकराकर लौट आई।

कौन है…

कौन है…

कौन है…

लेकिन आखिरी गूँज अलग थी।

वह उसकी आवाज जैसी नहीं लगी।

निखिल कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

फिर खुद को समझाते हुए बोला,

“पुराना कुआँ है। आवाज गूँज रही होगी।”

उसने रस्सी खींचनी शुरू की।

बाल्टी उम्मीद से ज्यादा भारी थी।

दोनों हाथों से जोर लगाने के बावजूद रस्सी मुश्किल से ऊपर आ रही थी।

आधा रास्ता खींचने के बाद अचानक नीचे से जोरदार झटका लगा।

रस्सी उसके हाथ से लगभग छूट गई।

निखिल ने तुरंत उसे कसकर पकड़ लिया।

ऐसा लगा जैसे कुएँ के भीतर किसी ने बाल्टी को नीचे खींच लिया हो।

“ये क्या है?”

उसने फिर जोर लगाया।

कुछ सेकंड तक रस्सी बिल्कुल नहीं हिली।

फिर अचानक ढीली पड़ गई।

निखिल पीछे की ओर लड़खड़ा गया।

बाल्टी तेजी से ऊपर आ गई और कुएँ की दीवार से टकराकर रुक गई।

वह पूरी भरी हुई थी।

पानी एकदम साफ था।

चाँद की रोशनी उसमें चमक रही थी।

निखिल ने लोटा बाल्टी में डाला।

उसी समय उसे फिर वही अगरबत्ती की तेज गंध महसूस हुई।

इस बार वह इतनी गहरी थी जैसे उसके ठीक पीछे किसी ने धूप जलाई हो।

वह पलटा।

पीछे कोई नहीं था।

निखिल ने लोटा होंठों से लगाया, लेकिन पानी पीने से पहले ही रुक गया।

पानी की सतह पर एक पतला लाल धागा तैर रहा था।

उसने उँगली डालकर धागा बाहर निकाला।

धागे में छोटी-सी गाँठ बंधी थी।

वही लाल धागा गांवों में पूजा या किसी अनुष्ठान के समय इस्तेमाल किया जाता था।

निखिल ने उसे किनारे फेंका और बाल्टी से दूसरा लोटा भरा।

इस बार पानी साफ था।

उसने दो घूँट पिए।

पानी बर्फ जैसा ठंडा था।

गले से नीचे उतरते ही उसके पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

उसे अचानक लगा जैसे कुएँ के अंदर से कोई बहुत धीरे-धीरे उसका नाम ले रहा हो।

“नि…खिल…”

उसका हाथ वहीं रुक गया।

वह कुएँ के ऊपर झुक गया।

“किसने बुलाया?”

कोई जवाब नहीं आया।

सिर्फ पानी की गहराई से टपकने की आवाज आती रही।

टप…

टप…

टप…

अचानक मोबाइल की टॉर्च बुझ गई।

चारों तरफ घना अंधेरा फैल गया।

निखिल ने तुरंत फोन का बटन दबाया।

स्क्रीन नहीं जली।

बैटरी कुछ देर पहले तक आधी थी।

उसने फोन झटककर दोबारा कोशिश की।

कुछ नहीं हुआ।

तभी कुएँ की चरखी अपने आप घूमने लगी।

चर्र…

चर्र…

चर्र…

बाल्टी धीरे-धीरे वापस नीचे जाने लगी।

निखिल ने रस्सी रोकने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन तुरंत पीछे हट गया।

रस्सी खुद खिंच रही थी।

जैसे कुएँ के भीतर कोई उसे नीचे खींच रहा हो।

बाल्टी अंधेरे में गायब हो गई।

फिर छपाक की आवाज आई।

निखिल का गला सूख गया।

उसने लोटा वहीं छोड़ा और तेज कदमों से घर की तरफ चल पड़ा।

पीछे से फिर चरखी घूमने की आवाज आई।

चर्र…

चर्र…

चर्र…

इस बार बाल्टी ऊपर आ रही थी।

निखिल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उसके कदम तेज हो गए।

गली के बीच पहुँचते ही उसे अपने पीछे किसी के नंगे पैरों की आवाज सुनाई दी।

छप…

छप…

छप…

जैसे कोई गीले पैरों से उसके पीछे चल रहा हो।

निखिल रुक गया।

पीछे की आवाज भी रुक गई।

उसने हिम्मत करके पलटकर देखा।

गली खाली थी।

लेकिन जमीन पर कुएँ से उसकी तरफ आते हुए गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

वे निशान उसके ठीक पीछे आकर खत्म हो रहे थे।

निखिल के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।

वह दौड़ पड़ा।

घर पहुँचकर उसने दरवाजा अंदर से बंद किया और कुछ पल तक उससे पीठ लगाकर खड़ा रहा।

उसकी साँसें तेज चल रही थीं।

अंदर सब शांत था।

वह बिना किसी को जगाए ऊपर अपने कमरे में चला गया।

कमरे में पहुँचते ही मोबाइल अचानक चालू हो गया।

स्क्रीन पर बैटरी छियालीस प्रतिशत थी।

निखिल ने कुछ देर फोन को देखा, फिर खुद को समझाया कि शायद वह खराब हो गया होगा।

वह बिस्तर पर लेट गया।

लेकिन नींद नहीं आई।

कुछ मिनट बाद कमरे में वही आवाज सुनाई दी।

टप…

टप…

टप…

निखिल उठकर बैठ गया।

छत सूखी थी।

खिड़की बंद थी।

घड़े में पानी नहीं था।

फिर भी टपकने की आवाज लगातार आ रही थी।

उसने कमरे के हर कोने में देखा।

आवाज बिस्तर के नीचे से आ रही थी।

निखिल ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और धीरे-धीरे नीचे झाँका।

वहाँ कुछ नहीं था।

लेकिन फर्श पर पानी की एक पतली लकीर बनी हुई थी।

वह लकीर बिस्तर के नीचे से निकलकर कमरे की दीवार तक जा रही थी।

दीवार पर जाकर वह ऊपर चढ़ी थी।

जैसे पानी नीचे से ऊपर की तरफ बह रहा हो।

निखिल स्तब्ध होकर उसे देखता रहा।

पानी की वह लकीर धीरे-धीरे दीवार पर एक आकार बनाने लगी।

कुछ ही सेकंड में वहाँ तीन टेढ़े-मेढ़े अक्षर उभर आए—

“एक और”

निखिल पीछे हट गया।

उसका पैर चारपाई से टकराया और वह लगभग गिर पड़ा।

उसी समय नीचे आँगन से दामू काका की आवाज आई।

“निखिल!”

वह दरवाजा खोलकर बाहर निकला।

दामू काका सीढ़ियों के नीचे खड़े थे। उनके हाथ में लालटेन थी।

“तू कुएँ पर गया था?”

निखिल ने जवाब नहीं दिया।

दामू काका तेजी से ऊपर आए।

उनकी नजर सबसे पहले उसके हाथ पर गई।

निखिल की कलाई पर वही लाल धागा बंधा हुआ था जो उसने कुएँ के पास फेंक दिया था।

वह धागा अब भी गीला था।

दामू काका का चेहरा सफेद पड़ गया।

उन्होंने काँपती आवाज में पूछा,

“तूने वहाँ का पानी पी लिया?”

निखिल ने अपनी कलाई देखी।

“ये मेरे हाथ पर कैसे आया?”

दामू काका ने उसका हाथ पकड़कर धागा खोलने की कोशिश की।

लेकिन गाँठ इतनी कसी हुई थी जैसे त्वचा के भीतर धँस गई हो।

“काका, आखिर बात क्या है?”

दामू काका ने उसकी तरफ देखा।

उनकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

“मैंने तुझे मना किया था।”

“किस बात से मना किया था? पानी पीने से या कुएँ के पास जाने से?”

“दोनों से।”

“क्यों?”

दामू काका कुछ पल चुप रहे।

फिर उन्होंने कमरे की खिड़की कसकर बंद की और धीमी आवाज में बोले,

“उस कुएँ से जो एक बार पानी लेता है, उसे दूसरी बाल्टी वापस देनी पड़ती है।”

निखिल ने झुँझलाकर कहा,

“ये कैसी बेकार बात है?”

दामू काका की आवाज और धीमी हो गई।

“पानी की बाल्टी नहीं, निखिल।”

उन्होंने उसकी कलाई पर बंधे धागे की तरफ देखा।

“एक जिंदा इंसान।”

कमरे में अचानक टपकने की आवाज बंद हो गई।

अगले ही पल नीचे आँगन से किसी बाल्टी के गिरने की तेज आवाज आई।

दोनों चौंककर सीढ़ियों की तरफ देखने लगे।

फिर बाहर से एक बहुत धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

“एक बाल्टी और…”

  1. National Disaster Management Authority (Water Safety)

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