Raat Ki Aakhiri Bus Horror Story In Hindi

गांव के पुराने बस अड्डे के पास बरगद का एक विशाल पेड़ था। उसकी मोटी-मोटी जड़ें जमीन से निकलकर चारों तरफ फैल गई थीं। उसी पेड़ के नीचे ईंटों और मिट्टी से बना एक लंबा-सा चबूतरा था, जहां गांव के लोग अक्सर शाम के समय बैठा करते थे।

गांव में अब पक्की सड़क बन गई थी। बिजली के खंभे भी लग गए थे और कई लोगों के घरों में मोटरसाइकिलें आ गई थीं। लेकिन बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर बातचीत करने की पुरानी आदत अब भी नहीं बदली थी।

 Raat Ki Aakhiri Bus Horror Story In Hindi

उस शाम भी वहां गांव के कुछ लोग इकट्ठा थे। Raat Ki Aakhiri Bus Horror Story In Hindi

दिन भर की तेज गर्मी के बाद हवा में थोड़ी ठंडक आ गई थी। पास के खेतों से मिट्टी और सूखी घास की मिली-जुली खुशबू आ रही थी। कोई अपनी फसल की बात कर रहा था, कोई बढ़ती महंगाई को कोस रहा था और कोई गांव के प्रधान की नई योजना का मजाक उड़ा रहा था।

“अब प्रधान कह रहा है कि बस अड्डे पर नई छत लगवाएगा।”

रघु ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा।

उसके बगल में बैठे नंदलाल ने हंसते हुए जवाब दिया,

“पहले पुरानी छत तो खोज ले। पिछली बार कागज में बनवा दी थी, जमीन पर आज तक दिखाई नहीं दी।”

यह सुनते ही सभी लोग हंस पड़े।

उनकी हंसी अभी शांत भी नहीं हुई थी कि सामने वाली सड़क से एक दुबला-पतला बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे चलता हुआ दिखाई दिया। उसके कंधे पर पुराना कपड़े का थैला लटका था और हाथ में लकड़ी की छड़ी थी।

वह गांव के रिटायर्ड डाकिया हरिप्रसाद थे।

लगभग चालीस साल तक उन्होंने आसपास के पंद्रह गांवों में चिट्ठियां बांटी थीं। किसके घर नौकरी का पत्र आया, किसके बेटे ने सीमा से चिट्ठी भेजी और किस परिवार के पास शहर से बुरी खबर पहुंची—हरिप्रसाद इन सभी सुख-दुख के गवाह रहे थे।

“अरे हरि काका आ रहे हैं!”

रघु ने उन्हें देखते हुए आवाज लगाई।

“काका, इधर आइए। आज इतनी जल्दी घर में बंद होने का क्या इरादा है?”

हरिप्रसाद उनके पास पहुंचे और हल्की मुस्कान के साथ बोले,

“तुम लोगों की आवाज आधे गांव तक जाती है। घर बैठा भी रहूं तो बातचीत सारी सुनाई दे जाती है।”

“फिर दूर से सुनने से अच्छा है पास बैठकर सुनिए।”

नंदलाल ने चबूतरे पर उनके लिए जगह बनाते हुए कहा।

हरिप्रसाद धीरे से चबूतरे पर बैठ गए। लखन की चाय की दुकान बरगद से थोड़ी ही दूरी पर थी। किसी ने आवाज देकर उनके लिए बिना ज्यादा चीनी वाली चाय मंगवा दी।

कुछ देर तक सामान्य बातें होती रहीं। फिर गांव के एक युवक जीतू ने हरिप्रसाद से पूछा,

“काका, आपने इतने साल डाक बांटी है। पैदल, साइकिल और बस से न जाने कितने रास्तों पर गए होंगे। कभी कोई ऐसी घटना हुई जिसे आप आज तक नहीं भूल पाए?”

हरिप्रसाद के चेहरे की मुस्कान अचानक फीकी पड़ गई।

उन्होंने हाथ में पकड़ा चाय का गिलास अपने घुटने पर रखा और कुछ देर तक उससे उठती भाप को देखते रहे।

“घटनाएं तो बहुत हुईं।”

उन्होंने धीमे स्वर में कहा।

“कभी किसी की खुशी की चिट्ठी पहुंचाई, कभी किसी के घर ऐसा तार लेकर गया जिसे पढ़ने के बाद पूरा आंगन रोने लगा। डाकिए के हाथ में कागज होता था, लेकिन कई बार उसी कागज में किसी की पूरी दुनिया बंद रहती थी।”

जीतू थोड़ा और उनके पास खिसक आया।

“इन सबके बीच कोई ऐसी बात जो समझ से बाहर हो?”

हरिप्रसाद ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।

बरगद के पत्ते हवा में सरसराने लगे थे। दूर मंदिर में शाम की आरती की घंटियां बज रही थीं। कुछ देर बाद उन्होंने लंबी सांस ली।

“एक घटना है।”

हरिप्रसाद ने गंभीर आवाज में कहा।

“पर वह मेरे साथ नहीं हुई थी। वह घटना मुझे उस आदमी ने सुनाई थी जिसने उसे अपनी आंखों से देखा था। कई साल पहले मैंने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया था। लेकिन अगले दिन जो देखा, उसके बाद मेरे पास उसकी बात को झूठ मानने का कोई कारण नहीं बचा।”

चबूतरे पर बैठे सभी लोग शांत हो गए।

हरिप्रसाद ने एक बार सबके चेहरों की तरफ देखा और फिर अपनी कहानी शुरू की।

यह उस समय की बात है जब इस इलाके में इतनी पक्की सड़कें नहीं थीं। गांवों के बीच चलने वाली बसें भी गिनी-चुनी थीं। शाम ढलने के बाद किसी की आखिरी बस छूट जाए तो उसे या तो पैदल जाना पड़ता था या रात किसी कस्बे में बितानी पड़ती थी।

उसी समय के आसपास सरायपुर नाम के कस्बे में मोहन नाम का एक युवक रहता था।

मोहन की उम्र लगभग अट्ठाईस साल थी। वह कस्बे की एक कपड़े की दुकान में हिसाब-किताब का काम करता था। शांत स्वभाव का था और बेवजह किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करता था।

उसका गांव सरायपुर से करीब पैंतीस किलोमीटर दूर था। नौकरी के कारण वह कस्बे में किराए का कमरा लेकर रहता था और महीने में एक-दो बार ही अपने गांव जा पाता था।

उस दिन उसकी छोटी बहन सुधा की सगाई थी।

सगाई शाम को होने वाली थी और मोहन ने अपनी मां से वादा किया था कि वह दोपहर तक घर पहुंच जाएगा। उसने बहन के लिए हरे रंग की साड़ी खरीदी थी और मां के लिए लकड़ी की नई पूजा चौकी।

लेकिन दुकान के मालिक ने अचानक उसे हिसाब की पुरानी बही जांचने के लिए रोक लिया।

काम खत्म करते-करते शाम के सात बज गए।

जुलाई का महीना था। पूरे दिन उमस के बाद शाम को घने बादल छा गए थे। हवा तेज चलने लगी थी और दूर आसमान में बिजली चमक रही थी।

मोहन सामान लेकर तेजी से बस अड्डे पहुंचा, लेकिन गांव की आखिरी बस निकल चुकी थी।

बस अड्डे पर दो-तीन चाय की दुकानें बंद हो रही थीं। पूछताछ खिड़की पर बैठा कर्मचारी भी अपने कागज समेट रहा था।

मोहन ने उसके पास जाकर पूछा,

“भैया, देवगढ़ जाने वाली कोई और बस मिलेगी?”

कर्मचारी ने बिना ऊपर देखे जवाब दिया,

“आखिरी बस साढ़े छह बजे चली गई।”

“कोई दूसरी बस जो आगे चौराहे तक छोड़ दे?”

“अब इस समय उस तरफ कुछ नहीं जाएगा। सुबह छह बजे पहली बस है।”

मोहन परेशान हो गया।

उस समय मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे। गांव में भी केवल प्रधान के घर टेलीफोन लगा था। वह न घरवालों को खबर दे सकता था और न उन्हें बता सकता था कि वह क्यों नहीं पहुंच पाया।

बहन की सगाई थी। पूरा परिवार उसका इंतजार कर रहा होगा।

वह बस अड्डे के एक कोने में रखी बेंच पर बैठ गया।

हवा अब और तेज हो चुकी थी। थोड़ी देर में बारिश की मोटी-मोटी बूंदें गिरने लगीं। दुकानदार जल्दी-जल्दी अपने तिरपाल बांधने लगे।

मोहन सोच रहा था कि रात कस्बे में ही रुक जाए। तभी बस अड्डे के बाहर से किसी पुराने इंजन की घरघराहट सुनाई दी।

उसने सिर उठाकर देखा।

धुंधली पीली रोशनी के बीच एक पुरानी बस धीरे-धीरे बस अड्डे की तरफ आ रही थी।

बस का रंग कभी नीला रहा होगा, लेकिन अब उसका अधिकतर रंग उतर चुका था। आगे की दोनों लाइटों में से केवल एक जल रही थी। शीशे पर सफेद रंग से लिखा था—

“सरायपुर से देवगढ़।”

मोहन को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ।

वह तुरंत सामान उठाकर बस की तरफ दौड़ा।

बस अड्डे का कर्मचारी जा चुका था। आसपास की लगभग सभी दुकानें बंद हो गई थीं। बारिश के कारण सड़क भी खाली थी।

बस उसके सामने आकर रुकी। दरवाजा खुला और लगभग पचास वर्ष का एक दुबला कंडक्टर नीचे उतरा। उसने खाकी वर्दी पहन रखी थी और कंधे पर पुराने ढंग का टिकट वाला थैला लटका था।

“देवगढ़ जाएगी?”

Raat Ki Aakhiri Bus Horror Story In Hindi

मोहन ने जल्दी से पूछा।

कंडक्टर ने कुछ क्षण उसे ध्यान से देखा।

उसकी आंखें गहरी और थकी हुई थीं।

“जाएगी।”

उसने सपाट आवाज में जवाब दिया।

“लेकिन रास्ते में कहीं नहीं रुकेगी।”

“मुझे भी देवगढ़ ही जाना है।”

कंडक्टर एक तरफ हट गया।

“तो बैठ जाओ। देर पहले ही बहुत हो चुकी है।”

मोहन बस में चढ़ गया।

अंदर लगभग दस-बारह यात्री बैठे थे। बस काफी पुरानी थी। सीटों का चमड़ा कई जगह से फट चुका था और छत से बारिश का पानी टपक रहा था।

सबसे आगे एक बुजुर्ग महिला बैठी थी। उसकी गोद में लाल कपड़े में लिपटा मिट्टी का छोटा कलश रखा था। उसके पीछे नई शादी का जोड़ा दिखाई देने वाला एक युवक और एक महिला बैठे थे। महिला के हाथों में लाल चूड़ियां थीं, लेकिन वह सिर झुकाए बिल्कुल शांत बैठी थी।

एक मजदूर जैसा आदमी खिड़की के पास बैठा था। उसके कपड़ों पर सूखी मिट्टी लगी थी। पीछे की सीट पर एक मां अपने लगभग दस वर्षीय बेटे को सीने से लगाकर बैठी थी।

बस में इतनी शांति थी कि इंजन की आवाज और छत से टपकते पानी की बूंदें साफ सुनाई दे रही थीं।

मोहन ने अपना सामान ऊपर रखने की कोशिश की, लेकिन जगह न मिलने पर साड़ी वाला पैकेट गोद में रख लिया।

कंडक्टर बस में चढ़ा और दरवाजा बंद कर दिया।

ड्राइवर ने बिना पीछे देखे बस आगे बढ़ा दी।

बस कस्बे से बाहर निकल गई।

कुछ देर बाद कंडक्टर टिकट काटते हुए मोहन के पास आया।

“कहां तक?”

“देवगढ़।”

कंडक्टर का हाथ टिकट वाली मशीन पर रुक गया।

“पूरा रास्ता जाओगे?”

मोहन को उसका सवाल अजीब लगा।

“हां। मेरा गांव वहीं है।”

कंडक्टर ने एक टिकट निकाला और उसकी तरफ बढ़ा दिया।

मोहन ने पैसे देते हुए पूछा,

“यह बस रोज चलती है क्या? मैंने पहले कभी नहीं देखी।”

कंडक्टर ने पैसे थैले में रखे।

“रोज नहीं चलती।”

“आज कैसे चल रही है?”

कंडक्टर ने उत्तर देने के बजाय केवल इतना कहा,

“कई बार छूटी हुई चीज को लेने के लिए रास्ते दोबारा खुल जाते हैं।”

मोहन उसके चेहरे की तरफ देखता रह गया।

कंडक्टर आगे बढ़ गया।

बारिश तेज होती जा रही थी। बस की खिड़कियों से ठंडी हवा अंदर आ रही थी। बाहर पेड़ों और खेतों के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

कुछ किलोमीटर चलने के बाद मोहन को याद आया कि मां ने बाजार से मिठाई लाने को कहा था। दुकान के काम में फंसने के कारण वह मिठाई लेना भूल गया था।

उसने सामने जाते कंडक्टर को आवाज दी,

“भैया, आगे रामदीन की मिठाई की दुकान आएगी। वहां दो मिनट रोक देना।”

कंडक्टर अचानक ठहर गया।

बस में बैठे कुछ यात्रियों ने भी सिर उठाकर मोहन की तरफ देखा।

“कहा था, बस रास्ते में कहीं नहीं रुकेगी।”

कंडक्टर की आवाज अब पहले से ज्यादा कठोर थी।

“सिर्फ दो मिनट लगेंगे। बहन की सगाई है।”

सामने बैठी बुजुर्ग महिला ने पहली बार उसकी तरफ देखा।

उसकी आंखें पूरी तरह भावहीन थीं।

“जिसे घर पहुंचना हो, उसे रास्ते की चीजों का लालच नहीं करना चाहिए।”

उसने धीमे स्वर में कहा।

मोहन को उसकी बात अच्छी नहीं लगी।

“मिठाई लेना कोई लालच नहीं है, माता जी। घर में कार्यक्रम है।”

महिला ने कुछ नहीं कहा। उसने फिर से अपना चेहरा खिड़की की तरफ कर लिया।

बस आगे बढ़ती रही।

थोड़ी देर बाद मोहन ने देखा कि बाहर वही विशाल पीपल का पेड़ दूसरी बार दिखाई दिया, जिसके नीचे पत्थर का छोटा मंदिर था।

उसने सोचा शायद आसपास ऐसे दो पेड़ होंगे।

लेकिन कुछ मिनट बाद वही टूटा हुआ कुआं फिर दिखाई दिया जिसे वह पहले पार कर चुके थे।

मोहन ने मजदूर जैसे दिखने वाले यात्री से पूछा,

“भैया, यह बस किस रास्ते से जा रही है? देवगढ़ का सीधा रास्ता तो दूसरी तरफ है।”

आदमी ने धीरे से अपना सिर मोहन की ओर घुमाया।

“रास्ता वही है।”

“लेकिन हम कुछ जगहों को दोबारा पार कर रहे हैं।”

मजदूर ने फीकी मुस्कान के साथ कहा,

“रात में सभी रास्ते एक जैसे दिखाई देते हैं।”

फिर उसने आंखें बंद कर लीं।

मोहन के मन में हल्की बेचैनी पैदा हो गई।

उसने जेब से अपनी पुरानी घड़ी निकाली। घड़ी में आठ बजकर सत्रह मिनट हो रहे थे।

लगभग पंद्रह मिनट बाद उसने फिर घड़ी देखी।

सुइयां अब भी आठ बजकर सत्रह मिनट पर अटकी थीं।

उसने घड़ी को कान से लगाया। घड़ी चलने की टिक-टिक सुनाई दे रही थी, लेकिन सुइयां आगे नहीं बढ़ रही थीं।

“अजीब बात है।”

वह बुदबुदाया।

उसके बगल की सीट खाली थी। कुछ देर बाद वह नवविवाहित जोड़े के सामने वाली सीट पर जाकर बैठ गया।

“आप लोग भी देवगढ़ जा रहे हैं?”

उसने युवक से पूछा।

युवक ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

उसके चेहरे पर कई जगह हल्के काले निशान थे, जैसे धुएं से चेहरा झुलस गया हो।

“हमें नदी के पार जाना है।”

“नदी के पार कौन-सा गांव?”

युवक जवाब देता, उससे पहले उसके साथ बैठी महिला बोल पड़ी,

“हमारा घर नदी के उस पार था।”

“था?”

महिला चुप हो गई।

उसके हाथों की चूड़ियां बस के हिलने के बावजूद कोई आवाज नहीं कर रही थीं।

मोहन वापस अपनी सीट पर आ गया।

अब उसे बस का माहौल असामान्य लगने लगा था। उसने पीछे बैठे बच्चे को देखा। बच्चा लगातार खिड़की के बाहर देख रहा था।

अचानक बच्चे ने अपना हाथ शीशे पर रखा।

“मां, वही पुल फिर आ गया।”

उसकी मां ने तुरंत उसका हाथ पकड़कर नीचे कर दिया।

“बाहर मत देखो।”

“लेकिन मां, हम हर बार पुल से वापस क्यों आ जाते हैं?”

महिला ने बच्चे को कसकर अपने सीने से लगा लिया।

पूरी बस में फिर से सन्नाटा छा गया।

मोहन अब अपने डर को नजरअंदाज नहीं कर पा रहा था।

वह उठकर ड्राइवर के पास पहुंचा।

“बस रोकिए।”

ड्राइवर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

“मैं कह रहा हूं बस रोकिए। मुझे उतरना है।”

ड्राइवर ने दोनों हाथ स्टीयरिंग पर रखे हुए थे। उसके सिर पर पुरानी टोपी थी और चेहरा अंधेरे में दिखाई नहीं दे रहा था।

कंडक्टर तेजी से मोहन के पास आया।

“अपनी सीट पर बैठ जाओ।”

“नहीं बैठूंगा। यह बस गलत रास्ते पर जा रही है।”

“बस रास्ते पर ही है।”

“हम एक ही जगह घूम रहे हैं। मेरी घड़ी भी रुक गई है और यहां कोई ठीक से बात नहीं कर रहा। दरवाजा खोलो।”

कंडक्टर ने मोहन का हाथ मजबूती से पकड़ लिया।

उसकी हथेली बर्फ जैसी ठंडी थी।

“जब तक पुल पार नहीं होगा, कोई नहीं उतर सकता।”

“कौन-सा पुल?”

कंडक्टर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

“वही पुल जिसे यह बस पंद्रह साल पहले पार नहीं कर पाई थी।”

मोहन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“क्या मतलब?”

तभी आसमान में तेज बिजली चमकी।

एक क्षण के लिए बस का पूरा अंदरूनी हिस्सा सफेद रोशनी से भर गया।

उस रोशनी में मोहन ने जो देखा, उससे उसकी चीख निकल गई।

सामने बैठी बुजुर्ग महिला के माथे से खून की सूखी लकीर बह रही थी। नवविवाहित युवक के कपड़े कई जगह से जले हुए थे। उसके साथ बैठी महिला के चेहरे का आधा हिस्सा बुरी तरह झुलसा हुआ था।

मजदूर की गर्दन अस्वाभाविक रूप से एक तरफ झुकी हुई थी और पीछे बैठे बच्चे के सिर पर गहरी चोट का निशान था।

बिजली की चमक समाप्त हुई और सब कुछ फिर सामान्य दिखाई देने लगा।

मोहन पीछे हटते हुए एक सीट से टकरा गया।

“तुम लोग कौन हो?”

उसकी आवाज कांप रही थी।

किसी ने उत्तर नहीं दिया।

कंडक्टर ने उसका हाथ छोड़ दिया।

“हम वे यात्री हैं जो देवगढ़ कभी नहीं पहुंच पाए।”

मोहन ने घबराकर दरवाजे की तरफ देखा।

“यह कोई मजाक है। बस रोको!”

“पंद्रह साल पहले इसी रात यह बस सरायपुर से देवगढ़ जा रही थी। नदी में बाढ़ थी। पुराने पुल पर पानी चढ़ चुका था। ड्राइवर को बस रोक देनी चाहिए थी, लेकिन हम सब अपने-अपने घर पहुंचने की जल्दी में थे।”

कंडक्टर की आंखों में अजीब उदासी उतर आई।

“किसी की बेटी की विदाई थी। कोई कई महीनों बाद मजदूरी से लौट रहा था। कोई अपने बेटे की अस्थियां लेकर जा रहा था। कोई शादी के बाद पहली बार पत्नी को घर ले जा रहा था।”

मोहन ने कांपते हुए पूछा,

“फिर क्या हुआ?”

“बस पुल के बीच पहुंची तो पानी का तेज बहाव उसे नीचे खींच ले गया। किसी को बाहर निकलने का मौका नहीं मिला।”

“तो यह बस…”

“हर साल उसी तारीख की रात लौटती है।”

कंडक्टर ने कहा।

“वही रास्ता, वही यात्री और वही अधूरा सफर।”

मोहन ने अपना माथा पकड़ लिया।

“लेकिन मैं इस बस में कैसे आ गया? मैं तो जीवित हूं।”

कंडक्टर ने कुछ देर उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें इस बस में नहीं चढ़ना चाहिए था।”

“दरवाजा खुला था। तुमने मुझे बैठने दिया।”

“दरवाजा हमने तुम्हारे लिए नहीं खोला था।”

“फिर किसके लिए?”

कंडक्टर ने पीछे की सबसे आखिरी सीट की तरफ इशारा किया।

मोहन ने उधर देखा।

अंधेरे में एक आदमी बैठा था।

मोहन ने उसे पहले नहीं देखा था।

उस आदमी ने सफेद कमीज पहन रखी थी। उसका सिर नीचे झुका हुआ था और दोनों हाथ घुटनों पर रखे थे।

धीरे-धीरे उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

मोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उस आदमी का चेहरा बिल्कुल मोहन जैसा था।

वही आंखें, वही बाल और वही सफेद कमीज जो मोहन ने उस दिन पहनी थी।

अंतर केवल इतना था कि उसके माथे पर गहरा घाव था और कमीज खून से भीगी हुई थी।

“यह कौन है?”

मोहन ने कांपती आवाज में पूछा।

“यह वह है जिसे आज रात हमारे साथ आना था।”

कंडक्टर ने जवाब दिया।

“सरायपुर से थोड़ी दूर पहले सड़क पर एक बैलगाड़ी पलटने वाली थी। उसे बचाने की कोशिश में एक युवक की मृत्यु होनी तय थी। वही युवक इस बस का अगला यात्री बनता।”

मोहन ने अपनी ही शक्ल वाले आदमी की तरफ देखा।

“लेकिन मैं तो जिंदा हूं।”

“तुम दुकान के काम में देर से निकले। जिस समय तुम्हें उस सड़क पर होना चाहिए था, उस समय तुम बस अड्डे पर बैठे थे। तुम्हारी मृत्यु का समय गुजर गया, लेकिन रास्ता तुम्हें खोजते हुए यहां तक आ गया।”

मोहन की सांसें तेज हो गईं।

“तो अब क्या होगा?”

कंडक्टर ने आगे सड़क की तरफ देखा।

“बस कुछ ही देर में पुराने पुल पर पहुंचेगी। अगर तुम बस में रहे, तो वह खाली जगह भर जाएगी। फिर तुम भी हर साल हमारे साथ यही सफर करोगे।”

मोहन ने दरवाजे का हैंडल पकड़ लिया।

“इसे खोलो!”

“चलती बस से उतरना आसान नहीं है।”

“मैं कोशिश करूंगा।”

“बाहर साधारण सड़क नहीं है। बस अब जीवित लोगों की दुनिया से निकल चुकी है। दरवाजा खोलते ही तुम्हें केवल अंधेरा मिलेगा।”

“तो मुझे बचने का रास्ता बताओ!”

कंडक्टर पहली बार असमंजस में दिखाई दिया।

“हर बार किसी न किसी की यात्रा अधूरी रह जाती है। यही कारण है कि बस वापस आती है। इस बार खाली जगह तुम्हारी है। नियम बदलना आसान नहीं।”

मोहन ने हाथ जोड़ दिए।

“मेरी छोटी बहन की आज सगाई है। मेरी मां मेरा इंतजार कर रही होगी। मैंने उनसे वादा किया था कि मैं पहुंचूंगा। मुझे जाने दो।”

बस में बैठे यात्रियों के चेहरों पर हल्की हलचल हुई।

नवविवाहित महिला ने पहली बार अपना सिर पूरी तरह उठाया।

“इंतजार…”

उसने धीमे से कहा।

“हमारा भी कोई इंतजार कर रहा था।”

मजदूर ने आंखें खोलीं।

“मेरी मां ने मेरे लिए खाना बनाकर रखा था।”

बुजुर्ग महिला ने कलश को और मजबूती से पकड़ लिया।

“मेरा बेटा नदी के उस पार खड़ा था।”

पीछे बैठा बच्चा अपनी मां से अलग होकर मोहन की तरफ देखने लगा।

“क्या आपके घर वाले अब भी आपका इंतजार कर रहे हैं?”

मोहन की आंखें भर आईं।

“हां।”

बच्चे ने कंडक्टर की तरफ देखा।

“इन्हें जाने दो।”

कंडक्टर ने कठोर स्वर में कहा,

“तुम नियम जानते हो।”

“नियम की वजह से हम पंद्रह साल से घर नहीं पहुंचे।”

बच्चे ने जवाब दिया।

“क्या किसी और को भी घर से दूर रखना जरूरी है?”

कंडक्टर चुप हो गया।

बस के बाहर अचानक तेज गर्जना हुई। आगे अंधेरे में पुराना पुल दिखाई देने लगा। नदी का पानी पुल के ऊपर से बह रहा था।

ड्राइवर ने बस की गति बढ़ा दी।

कंडक्टर ने मोहन की तरफ देखा।

“तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

“मुझे क्या करना होगा?”

कंडक्टर ने मोहन के हाथ से टिकट लिया।

“यह टिकट तुम्हें बस से बांध रहा है। इसे फाड़ने से रास्ता कुछ क्षण के लिए खुलेगा। लेकिन केवल टिकट फाड़ना काफी नहीं है। किसी यात्री को अपनी अधूरी यात्रा छोड़कर तुम्हारी जगह रास्ता रोकना होगा।”

“कौन करेगा ऐसा?”

बस में फिर सन्नाटा छा गया।

तभी पीछे बैठा बच्चा अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ।

उसकी मां ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं।”

“मां, हम वैसे भी घर नहीं पहुंच रहे।”

“तुम मुझसे दूर नहीं जाओगे।”

“मैं दूर नहीं जाऊंगा।”

बच्चे ने मासूमियत से कहा।

“बस को रोकूंगा ताकि यह भैया उतर सकें।”

मोहन ने सिर हिलाया।

“नहीं। मैं किसी बच्चे को अपनी वजह से—”

बच्चे की मां ने आंखें बंद कर लीं। फिर धीरे-धीरे उसने अपने बेटे का हाथ छोड़ दिया।

“शायद किसी को घर पहुंचाने से हमारी यात्रा भी पूरी हो जाए।”

बच्चा ड्राइवर के पास पहुंचा और स्टीयरिंग के बगल में लगे लोहे के पुराने लीवर को पकड़ लिया।

कंडक्टर ने मोहन का टिकट बीच से फाड़ दिया।

उसी क्षण बस की सभी लाइटें बुझ गईं।

पूरी बस में यात्रियों की चीखें गूंज उठीं। इंजन की आवाज अचानक बहुत तेज हो गई। बस बुरी तरह हिलने लगी।

“दरवाजा खोलो!”

कंडक्टर चिल्लाया।

मोहन ने पूरी ताकत से हैंडल खींचा।

दरवाजा खुलते ही बाहर कोई सड़क दिखाई नहीं दी। केवल गहरा काला अंधेरा था, जिसके नीचे नदी की गर्जना सुनाई दे रही थी।

“मैं इसमें कूद गया तो मर जाऊंगा!”

“अभी नहीं कूदे तो निश्चित मरोगे!”

कंडक्टर ने उसे धक्का देते हुए कहा।

बस पुल पर चढ़ चुकी थी।

बच्चा दोनों हाथों से लीवर खींच रहा था। उसकी मां रोते हुए उसे देख रही थी। बाकी यात्री अपनी सीटों को पकड़े हुए थे।

मोहन ने अपनी बहन की साड़ी वाला पैकेट सीने से लगाया और आंखें बंद करके दरवाजे से छलांग लगा दी।

कुछ क्षण तक उसे ऐसा लगा जैसे वह हवा में गिरता जा रहा हो।

फिर उसका सिर किसी कठोर चीज से टकराया और वह बेहोश हो गया।

जब मोहन की आंख खुली तो सुबह हो चुकी थी।

उसके चेहरे पर धूप पड़ रही थी। पक्षियों की आवाजें सुनाई दे रही थीं और पास से लोगों की बातचीत का शोर आ रहा था।

उसने धीरे-धीरे आंखें खोलीं।

वह सरायपुर बस अड्डे की उसी बेंच के नीचे पड़ा था, जिस पर पिछली शाम बैठा था।

उसके आसपास भीड़ जमा थी।

एक चाय वाले ने उसे सहारा देकर उठाया।

“भैया, ठीक हो? पूरी रात यहीं पड़े रहे क्या?”

मोहन ने घबराकर इधर-उधर देखा।

“वह बस कहां गई?”

“कौन-सी बस?”

“देवगढ़ वाली पुरानी बस। रात को करीब आठ बजे आई थी।”

आसपास खड़े लोगों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

बस अड्डे का कर्मचारी भी वहां आ गया था।

“रात साढ़े छह बजे के बाद देवगढ़ की कोई बस नहीं जाती।”

“बस आई थी! मैं उसमें बैठा था। उसमें एक कंडक्टर था और कई यात्री थे।”

मोहन ने अपने हाथ में पकड़े सामान की तरफ देखा।

लकड़ी की पूजा चौकी उसके पास पड़ी थी। साड़ी का पैकेट भी सीने से लगा हुआ था।

लेकिन उसकी मुट्ठी में एक गीला और मिट्टी से सना टिकट दबा था।

उसने टिकट खोलकर देखा।

उस पर धुंधली स्याही से लिखा था—

“सरायपुर से देवगढ़।”

नीचे तारीख छपी थी।

वह तारीख आज की नहीं, बल्कि पंद्रह वर्ष पुरानी थी।

टिकट के पीछे नीली स्याही से एक नाम लिखा हुआ था—

“राजू।”

मोहन को उसी बच्चे का चेहरा याद आ गया जिसने बस रोकने के लिए लीवर खींचा था।

वह तुरंत खड़ा हो गया।

“पुराना पुल कहां है?”

बस अड्डे के कर्मचारी ने कहा,

“नदी की तरफ। लेकिन अब वहां कोई नहीं जाता। पंद्रह साल पहले बस हादसे के बाद पुल बंद कर दिया गया था।”

मोहन ने देर नहीं की। वह कुछ लोगों को साथ लेकर पुराने पुल की तरफ गया।

पुल का अधिकांश हिस्सा टूट चुका था। नीचे नदी में पानी कम था। किनारे झाड़ियों और मिट्टी में जंग लगे लोहे के कुछ टुकड़े दिखाई दे रहे थे।

वहां उन्हें बस का एक पुराना पहिया मिला।

पास ही मिट्टी में आधी दबी लोहे की टिकट काटने वाली मशीन पड़ी थी।

जब लोगों ने झाड़ियां हटाईं तो एक छोटी जंग लगी पट्टी भी मिली, जिस पर कुछ नाम लिखे थे। वह हादसे में मारे गए यात्रियों की याद में लगाई गई थी।

मोहन उन नामों को पढ़ने लगा।

सूची में एक बुजुर्ग महिला का नाम था। एक नवविवाहित जोड़े के नाम थे। मजदूरी से लौट रहे एक व्यक्ति का नाम था।

फिर उसकी नजर नीचे लिखे दो नामों पर पड़ी—

“कमला देवी एवं पुत्र राजू, उम्र दस वर्ष।”

मोहन के हाथ से पुराना टिकट गिर गया।

वह काफी देर तक उस पट्टी के सामने खड़ा रहा।

उसी दिन दोपहर बाद वह अपने गांव पहुंचा।

घर के बाहर मेहमानों की भीड़ थी। मां और बहन पूरी रात जागने के कारण परेशान थीं। जैसे ही उन्होंने मोहन को देखा, दोनों दौड़कर उसके पास आ गईं।

“कहां रह गया था?”

मां ने उसे सीने से लगाते हुए पूछा।

“हमें लगा तुम्हारे साथ कुछ हो गया।”

मोहन ने बहन के हाथ में साड़ी का पैकेट दिया, लेकिन उसके मुंह से कोई शब्द नहीं निकला।

सगाई का कार्यक्रम पूरा हुआ। घर में खुशियां लौट आईं, लेकिन मोहन के मन में उस बस के यात्री बसे रहे।

अगले दिन वह फिर पुराने पुल पर गया।

इस बार वह अपने साथ फूल और एक छोटा लकड़ी का खिलौना लेकर गया था। उसने फूल स्मृति-पट्टिका के पास रखे और खिलौना राजू के नाम के नीचे छोड़ दिया।

“मैं घर पहुंच गया।”

उसने धीमे स्वर में कहा।

हवा में अचानक किसी पुरानी बस की घंटी जैसी हल्की आवाज सुनाई दी।

मोहन ने पलटकर देखा।

सड़क पूरी तरह खाली थी।

लेकिन उसे लगा जैसे दूर धूल और धुंध के बीच एक पुरानी बस खड़ी है। उसकी खिड़की में वही दस साल का बच्चा बैठा मुस्कुरा रहा था।

उसके बगल में उसकी मां थी।

इस बार दोनों के चेहरों पर किसी प्रकार का घाव नहीं था।

बस धीरे-धीरे धुंध में गायब हो गई।

उस रात के बाद सरायपुर बस अड्डे पर वह पुरानी बस दोबारा कभी दिखाई नहीं दी।

लोगों का कहना था कि मोहन के जीवित घर पहुंचने के साथ केवल उसकी यात्रा पूरी नहीं हुई थी।

पंद्रह वर्षों से एक ही रास्ते पर भटक रहे उन यात्रियों को भी शायद आखिरकार उनका अंतिम पड़ाव मिल गया था।

हरिप्रसाद ने कहानी समाप्त की तो बरगद के नीचे बैठे सभी लोग शांत थे।

किसी के पास कुछ कहने के लिए नहीं था।

कुछ देर बाद जीतू ने धीमे स्वर में पूछा,

“काका, आपने कहा था कि अगले दिन आपने कुछ देखा था। वह क्या था?”

हरिप्रसाद ने अपने पुराने कपड़े के थैले में हाथ डाला।

उन्होंने अंदर से एक छोटा, पीला पड़ चुका बस का टिकट निकाला और चबूतरे पर रख दिया।

“मोहन ने घटना के अगले दिन यह टिकट मुझे दिया था।”

टिकट के पीछे नीली स्याही से आज भी एक नाम लिखा था—

“राजू।”

हरिप्रसाद ने टिकट वापस थैले में रखते हुए कहा,

“उस समय मैं सरायपुर में डाक बांटता था। मोहन की बात सुनकर मैं भी उसके साथ पुराने पुल पर गया था। वहां फूलों के पास रखा लकड़ी का खिलौना अपनी जगह पर था।”

उन्होंने कुछ क्षण रुककर आगे कहा,

“लेकिन गीली मिट्टी पर बस के पहियों के ताजे निशान भी थे।”

“वे निशान पुल के पास से शुरू होते थे।”

“और सीधे नदी के किनारे जाकर समाप्त हो जाते थे।”

बंद कुएँ की सौगंध | Hindi Horror Story

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