उस रात घड़ी में ठीक दो बजकर सत्रह मिनट हुए थे।
कमरे में रखी पुरानी दीवार घड़ी ने जैसे ही दो बार आवाज की, हवेली की ऊपरी मंजिल से किसी ने दरवाजे पर धीरे से दस्तक दी।
ठक…
कुछ पल की खामोशी छा गई। Band Kamre Ki Nayi Dulhan Horror Story

फिर दूसरी दस्तक हुई।
ठक…
और उसके बाद तीसरी।
ठक…
नीचे अपने कमरे में सोया मानव अचानक आंखें खोलकर उठ बैठा।
उसकी सांसें तेज थीं। माथे पर हल्का पसीना था। कमरे में जल रही नीली नाइट लाइट की रोशनी में उसने सबसे पहले अपने बराबर में देखा।
उसकी पत्नी काव्या बिस्तर पर नहीं थी।
मानव ने घबराकर कमरे के चारों ओर नजर दौड़ाई।
बाथरूम का दरवाजा खुला था और भीतर अंधेरा था। कमरे का मुख्य दरवाजा भी आधा खुला हुआ था, जबकि सोने से पहले उसने खुद उसे बंद किया था।
“काव्या?”
मानव ने धीरे से आवाज लगाई।
कोई उत्तर नहीं मिला।
वह बिस्तर से उतरा और दरवाजे तक पहुंचा। बाहर गलियारे में अंधेरा फैला था। केवल सीढ़ियों के पास जलता छोटा-सा बल्ब बार-बार झिलमिला रहा था।
तभी मानव ने उसे देखा।
काव्या सीढ़ियों के नीचे खड़ी थी।
उसकी पीठ मानव की तरफ थी। उसने वही लाल रंग का सूट पहना हुआ था जो शाम को पहनकर वह सोई थी। उसके बाल खुले हुए थे और चेहरा ऊपर की मंजिल की तरफ था।
“काव्या, तुम यहां क्या कर रही हो?”
मानव उसकी तरफ बढ़ा।
काव्या ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
ऊपरी मंजिल से फिर वही आवाज आई।
ठक… ठक… ठक…
इस बार आवाज पहले से ज्यादा साफ थी।
काव्या ने धीरे-धीरे पहला कदम सीढ़ी पर रखा।
मानव ने तेजी से आगे बढ़कर उसकी कलाई पकड़ ली।
“काव्या, ऊपर मत जाओ।”
उसका हाथ बर्फ की तरह ठंडा था।
काव्या अचानक रुक गई।
कुछ सेकंड तक वह बिल्कुल स्थिर खड़ी रही। फिर बिना पीछे मुड़े उसने इतनी धीमी आवाज में कहा कि मानव के शरीर में सिहरन दौड़ गई—
“वह तीन रात से मेरा इंतजार कर रही है।”
मानव ने उसकी कलाई छोड़ दी।
“कौन?”
काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह सीढ़ियां चढ़ने लगी।
हवेली की वह ऊपरी मंजिल पिछले अठारह वर्षों से बंद थी। मानव बचपन से सुनता आया था कि वहां पुराना और बेकार सामान रखा है। उसके पिता देवेंद्र ने पूरे परिवार को साफ हिदायत दे रखी थी कि बिना उनकी अनुमति कोई वहां न जाए।
मानव ने कभी उस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था।
लेकिन आज काव्या ठीक उसी बंद कमरे की तरफ बढ़ रही थी।
मानव उसके पीछे-पीछे ऊपर पहुंचा।
जैसे ही उसने अंतिम सीढ़ी पर पैर रखा, नीचे जलता बल्ब बुझ गया। अंधेरा इतना गहरा था कि उसे अपना हाथ तक दिखाई नहीं दे रहा था।
“काव्या!”
उसने जेब से मोबाइल निकालकर टॉर्च जलाई।
सफेद रोशनी गलियारे में फैली।
सामने वर्षों से जमी धूल थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे जिनके चेहरे नमी के कारण धुंधले पड़ चुके थे। मकड़ी के जाले छत से लटक रहे थे।
लेकिन धूल से भरे फर्श पर पैरों के ताजा निशान बने हुए थे।
वे निशान काव्या के नहीं थे।
काव्या नंगे पैर थी, जबकि फर्श पर बने निशान किसी ऐसी औरत के थे जिसने पायल या मोटे कड़े पहन रखे हों। हर निशान के किनारे गोल घेरा बना था।
मानव की टॉर्च उन निशानों का पीछा करती हुई गलियारे के आखिरी कमरे तक पहुंची।
काव्या दरवाजे के सामने खड़ी थी।
दरवाजे पर मोटी लोहे की जंजीर और पुराना ताला लगा था।
अंदर से फिर तीन दस्तकें हुईं।
ठक… ठक… ठक…
इस बार मानव को साफ पता चल गया कि आवाज किसी खिड़की या लकड़ी की नहीं थी।
कोई दरवाजे की दूसरी तरफ खड़ा था।
“कौन है अंदर?”
मानव की आवाज गलियारे में गूंज गई।
कोई उत्तर नहीं आया।
अचानक ताले के भीतर कुछ घूमने लगा।
मानव ने टॉर्च ताले पर डाली।
बिना किसी चाबी के वह पुराना ताला धीरे-धीरे खुल गया।
जंजीर दरवाजे से उतरकर जमीन पर गिर पड़ी।
काव्या ने दरवाजे को छुआ भी नहीं था, फिर भी वह चरमराता हुआ अंदर की तरफ खुल गया।
कमरे के भीतर से सड़ी हुई लकड़ी और बंद हवा की तीखी गंध बाहर आई।
मानव ने मोबाइल की रोशनी अंदर की।
कमरा लगभग खाली था।
एक कोने में पुरानी लकड़ी की अलमारी खड़ी थी। बीच में कपड़े से ढका एक बड़ा शीशा था। खिड़की के पास लकड़ी का झूला अपने आप आगे-पीछे हिल रहा था।
हवा बिल्कुल बंद थी।
फिर भी झूले की गति लगातार बढ़ती जा रही थी।
मानव ने काव्या का हाथ पकड़कर उसे पीछे खींचना चाहा, लेकिन इस बार वह अपनी जगह से बिल्कुल नहीं हिली।
काव्या की निगाह सामने वाली दीवार पर टिकी थी।
Band Kamre Ki Nayi Dulhan Horror Story
मानव ने उस तरफ रोशनी घुमाई।
दीवार पर धूल की मोटी परत के बीच किसी ने उंगली से लिखा था—
“तुम फिर लौट आई।”
मानव के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।
“काव्या, नीचे चलो।”
काव्या धीरे से मुस्कराई।
वह मुस्कराहट उसकी अपनी नहीं लग रही थी।
“अब नीचे जाने का समय खत्म हो चुका है।”
अचानक कमरे के बीच रखा कपड़े से ढका शीशा तेज आवाज के साथ जमीन पर गिर गया।
कपड़ा हटते ही शीशे की सतह दिखाई दी।
मानव और काव्या दोनों उसके सामने खड़े थे।
लेकिन शीशे में मानव अकेला दिखाई दे रहा था।
काव्या का प्रतिबिंब वहां नहीं था।
मानव भय से पीछे हट गया।
उसी क्षण शीशे के भीतर किसी तीसरी औरत का चेहरा उभरा।
चेहरा काव्या जैसा था, लेकिन उसकी उम्र अधिक थी। माथे पर चोट का गहरा निशान था और गर्दन के चारों ओर काले धब्बे थे।
वह औरत शीशे के भीतर से मानव को देख रही थी।
मानव चीखते हुए पीछे गिर पड़ा।
उसकी मोबाइल टॉर्च बंद हो गई।
कमरे में घुप्प अंधेरा छा गया।
अंधेरे में उसे काव्या की हंसी सुनाई दी।
उसके बाद किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाकर कहा—
“जिस दिन इस घर में शहनाई बजती है, उस दिन कोई न कोई दुल्हन मरती जरूर है।”
मानव ने डर के कारण आंखें कसकर बंद कर लीं।
कुछ ही सेकंड बाद नीचे से उसकी मां सावित्री की आवाज आई—
“मानव! बेटा, ऊपर क्या कर रहे हो?”
गलियारे की लाइट अचानक जल उठी।
मानव ने आंखें खोलीं।
वह बंद कमरे के बाहर जमीन पर पड़ा था। दरवाजे पर ताला पहले की तरह लगा हुआ था। जंजीर भी अपनी जगह बंधी थी।
काव्या उसके बराबर में बेहोश पड़ी थी।
सावित्री और देवेंद्र तेजी से ऊपर आए।
“तुम दोनों यहां कैसे पहुंचे?”
देवेंद्र की नजर जैसे ही बंद कमरे पर पड़ी, उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
मानव ने कांपती आवाज में पूरी बात बतानी शुरू की, लेकिन बीच में ही देवेंद्र ने उसे रोक दिया।
“तुमने कुछ नहीं देखा।”
“पापा, मैंने उस कमरे के अंदर एक औरत को देखा है।”
“मैंने कहा ना, तुमने कुछ नहीं देखा!”
देवेंद्र की तेज आवाज पूरे गलियारे में गूंज गई।
सावित्री ने घबराकर अपने पति की तरफ देखा।
मानव को पहली बार महसूस हुआ कि उसके पिता डरे हुए थे।
सिर्फ नाराज नहीं।
डरे हुए।
देवेंद्र ने काव्या को उठाने में मानव की मदद की। तीनों उसे नीचे कमरे में ले आए। कुछ मिनट बाद काव्या को होश आया।
उसने आंखें खोलकर चारों तरफ देखा।
“मैं जमीन पर क्यों लेटी हूं?”
“तुम ऊपर वाले कमरे में गई थीं,” मानव ने कहा।
काव्या के चेहरे पर उलझन दिखाई दी।
“कौन-सा कमरा?”
“वही बंद कमरा। तुमने कहा था कि कोई तीन रातों से तुम्हारा इंतजार कर रही है।”
काव्या कुछ देर तक चुप रही। फिर उसने अपना सिर पकड़ लिया।
“मुझे कुछ याद नहीं है। मैं तो तुम्हारे साथ सोई थी।”
मानव ने उसकी आंखों में देखा।
वह झूठ नहीं बोल रही थी।
सुबह तक घर में किसी ने उस घटना के बारे में बात नहीं की।
नाश्ते की मेज पर देवेंद्र अखबार पढ़ने का नाटक करते रहे। सावित्री बार-बार काव्या की तरफ देख रही थीं। मानव के मन में पूरी रात देखे दृश्य घूम रहे थे।
कुछ देर बाद काव्या उठकर रसोई में चली गई।
मानव ने मौका देखकर पिता से पूछा—
“उस कमरे में क्या है?”
देवेंद्र ने अखबार नीचे नहीं किया।
“पुराना सामान।”
“तो आप इतना डर क्यों गए थे?”
देवेंद्र ने धीरे से अखबार मोड़ा।
“तुम्हारी शादी को केवल चार दिन हुए हैं। अपना ध्यान अपनी पत्नी पर रखो। पुराने कमरों और पुरानी बातों को भूल जाओ।”
“पर दीवार पर लिखा था कि काव्या फिर लौट आई है।”
देवेंद्र के हाथ से चाय का कप छूट गया।
कप जमीन पर गिरकर टूट गया।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“तुमने क्या कहा?”
मानव ने वही शब्द दोहराए।
देवेंद्र की नजर सावित्री पर गई।
दोनों के बीच कुछ ऐसा था जिसे वे मानव से छिपा रहे थे।
सावित्री बिना कुछ बोले टूटे कप के टुकड़े उठाने लगीं।
उसी समय रसोई से बर्तन गिरने की तेज आवाज आई।
मानव दौड़कर अंदर पहुंचा।
काव्या सिंक के सामने खड़ी थी। उसके हाथ में एक पुराना चांदी का कंगन था। कंगन पर काली मिट्टी लगी थी।
“यह तुम्हें कहां मिला?”
“चावल के डिब्बे में था।”
मानव ने कंगन हाथ में लिया।
उसके अंदर छोटे अक्षरों में एक नाम खुदा हुआ था—
“मालिनी”
पीछे खड़ी सावित्री ने जैसे ही नाम देखा, उनके हाथ कांपने लगे।
“मां, मालिनी कौन है?”
सावित्री का चेहरा पीला पड़ गया।
उन्होंने कंगन मानव के हाथ से छीन लिया।
“यह तुम्हें जहां मिला है, वहीं वापस रख दो।”
“लेकिन यह है किसका?”
“इस घर में कोई मालिनी नहीं रहती।”
यह कहकर सावित्री रसोई से बाहर चली गईं।
काव्या ने धीमी आवाज में मानव से कहा—
“मैंने यह नाम पहले भी सुना है।”
“कब?”
काव्या कुछ सोचने लगी।
“कल रात… शायद सपने में।”
उसने अपनी आंखें बंद कीं।
“कोई औरत मेरे पास खड़ी थी। वह बार-बार कह रही थी कि मेरी शादी उसी कमरे में हुई थी।”
मानव का गला सूख गया।
“और क्या कहा उसने?”
काव्या ने आंखें खोलीं।
“उसने कहा कि तुम्हारे पिता ने पूरे घर से उसकी शादी की तस्वीरें मिटा दीं, लेकिन उसकी कब्र मिटाना भूल गए।”
उसी समय हवेली के पीछे से किसी औरत के रोने की आवाज आई।
मानव और काव्या खिड़की तक पहुंचे।
घर के पीछे पुराना बगीचा था, जिसके बीचों-बीच सूखा कुआं और एक बड़ा नीम का पेड़ खड़ा था।
नीम के नीचे लाल शादी का जोड़ा पहने एक औरत खड़ी थी।
उसका चेहरा घूंघट से ढका हुआ था।
मानव ने खिड़की खोली।
“कौन है वहां?”
औरत ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
लेकिन इससे पहले कि मानव उसका चेहरा देख पाता, तेज हवा चली और खिड़की अपने आप बंद हो गई।
मानव ने दोबारा खिड़की खोली।
वह औरत गायब हो चुकी थी।
नीम के नीचे केवल लाल कपड़े का एक छोटा-सा टुकड़ा पड़ा था।
उस रात मानव ने तय किया कि वह सोएगा नहीं।
उसने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद किया और चाबी अपने पास रख ली। काव्या को सारी बात बताकर उसने उससे वादा लिया कि वह किसी भी आवाज पर बाहर नहीं जाएगी।
रात के दो बजकर सोलह मिनट तक सब शांत रहा।
मानव घड़ी को देख रहा था।
जैसे ही सुई दो बजकर सत्रह मिनट पर पहुंची, ऊपर से कोई आवाज नहीं आई।
मानव ने राहत की सांस ली।
तभी उसके बिस्तर के नीचे से तीन दस्तकें हुईं।
ठक… ठक… ठक…
काव्या की आंखें खुल गईं।
दोनों ने धीरे से नीचे देखा।
बिस्तर के नीचे अंधेरा था।
फिर वहां से एक औरत की आवाज आई—
“मानव… दरवाजा मत खोलना।”
मानव ने कांपती आवाज में पूछा—
“क्यों?”
बिस्तर के नीचे से उत्तर आया—
“क्योंकि जो तुम्हारे बराबर में लेटी है… वह तुम्हारी पत्नी नहीं है।”
मानव ने धीरे-धीरे अपना चेहरा काव्या की तरफ घुमाया।
काव्या पहले से ही उसे देख रही थी।
उसके चेहरे पर वही अजीब मुस्कराहट थी।
और उसकी कलाई में मालिनी का चांदी का कंगन बंधा हुआ था।
National Institute of Mental Health (Sleep Paralysis & Sleep Disorders) – https://www.nimh.nih.gov
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