उस रात कोलकाता की हवा में अजीब-सी नमी थी। बारिश थम चुकी थी, लेकिन सड़कें अब भी गीली थीं। पुराने लैम्पपोस्ट की पीली रोशनी पानी में पड़कर ऐसे चमक रही थी जैसे किसी ने जमीन पर अनगिनत आंखें बिछा दी हों।
रात के ठीक दस बजकर पैंतालीस मिनट पर एक टैक्सी शहर के बीचों-बीच बने विशाल, ऐतिहासिक भवन के सामने आकर रुकी।
वह इमारत थी National Library Kolkata Haunted Story

दिन के समय यहां हजारों छात्र, शोधकर्ता और इतिहास प्रेमी आते थे। लेकिन रात होते ही पूरा इलाका किसी दूसरी दुनिया का हिस्सा लगने लगता था।
ऊंचे-ऊंचे पेड़, चारों तरफ फैली खामोशी, पुराने पत्थरों से बनी दीवारें और ब्रिटिश दौर की विशाल इमारत…
ऐसा लगता था मानो समय यहां कई दशक पहले ही रुक गया हो।
टैक्सी से लगभग बत्तीस साल का एक युवक उतरा।
उसका नाम आदित्य था।
दिल्ली का रहने वाला आदित्य एक डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर था। उसका नया प्रोजेक्ट भारत की उन ऐतिहासिक जगहों पर आधारित था जिनसे रहस्यमयी घटनाओं की कहानियां जुड़ी हुई थीं।
पिछले छह महीनों में उसने कई किले, हवेलियां और पुराने चर्च कवर किए थे।
अब उसकी अगली मंजिल थी नेशनल लाइब्रेरी।
कई लोगों ने उसे पहले ही चेतावनी दी थी।
“रात के बाद वहां मत रुकना…”
“अजीब आवाजें सुनाई देती हैं…”
“कई गार्ड नौकरी छोड़ चुके हैं…”
आदित्य इन बातों पर हंस देता।
उसे लगता था कि हर पुरानी इमारत के साथ ऐसी कहानियां जुड़ ही जाती हैं।
उसके पास प्रशासन की विशेष अनुमति थी कि वह रात के समय भी लाइब्रेरी के कुछ हिस्सों में शूटिंग कर सकता था।
मुख्य गेट पर एक बुजुर्ग सुरक्षा गार्ड खड़ा था।
उसके चेहरे पर उम्र साफ दिखाई दे रही थी।
उसने परमिशन लेटर देखा और धीरे से बोला,
“साहब… अंदर जाइए… लेकिन अगर रात के बाद कोई आपका नाम लेकर बुलाए… तो जवाब मत दीजिएगा।”
आदित्य मुस्कुराया।
“आप भी इन कहानियों पर यकीन करते हैं?”
गार्ड ने उसकी तरफ बिना मुस्कुराए देखा।
“तीस साल से यहां नौकरी कर रहा हूं…
कुछ बातें किताबों में नहीं लिखी जातीं।”
यह कहकर उसने गेट खोल दिया।
आदित्य कैमरा, ट्राइपॉड और रिकॉर्डर लेकर अंदर चला गया।
अंदर का माहौल दिन से बिल्कुल अलग था।
सैकड़ों साल पुराने बरगद और पीपल के पेड़ों की परछाइयां जमीन पर अजीब आकृतियां बना रही थीं।
दूर कहीं किसी उल्लू की आवाज आई।
फिर सब कुछ शांत।
इतना शांत कि अपने कदमों की आवाज भी डराने लगी।
मुख्य भवन के विशाल दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते रात के ग्यारह बज चुके थे।
अंदर हल्की सफेद रोशनी जल रही थी।
लंबे गलियारे…
लकड़ी की ऊंची अलमारियां…
हजारों किताबें…
पुरानी कागजों की गंध…
ऐसा लग रहा था जैसे पूरी इमारत सांस ले रही हो।
आदित्य ने कैमरा ऑन किया।
“मैं इस समय भारत की सबसे बड़ी लाइब्रेरी के अंदर हूं…”
वह बोल ही रहा था कि रिकॉर्डर में हल्की-सी आवाज आई।
जैसे किसी ने बहुत धीरे से कहा हो—
“श्श्श…”
आदित्य तुरंत पीछे मुड़ा।
कोई नहीं था।
उसने सोचा शायद माइक्रोफोन में इंटरफेरेंस होगा।
रिकॉर्डिंग जारी रही।
करीब आधे घंटे तक सब सामान्य रहा।
फिर अचानक लाइब्रेरी के पिछले हिस्से से किसी किताब के गिरने की आवाज आई।
धप्प…
आदित्य टॉर्च लेकर उस दिशा में गया।
फर्श पर एक मोटी किताब पड़ी थी।
उसने उसे उठाया।
धूल साफ की।
किताब का कवर बिल्कुल खाली था।
कोई नाम नहीं।
उसने खोला।
अंदर सारे पन्ने खाली थे।
एक भी शब्द नहीं।
वह हैरान था।
जैसे ही उसने किताब बंद की…
पीछे से कदमों की आवाज आई।
टक…
टक…
टक…
जैसे कोई धीरे-धीरे चलता हुआ उसी की तरफ आ रहा हो।
आदित्य तेजी से पीछे मुड़ा।
National Library Kolkata Haunted Story
गलियारा खाली था।
लेकिन कदमों की आवाज बंद नहीं हुई।
अब ऐसा लग रहा था कि आवाज उसके पीछे नहीं…
बल्कि चारों तरफ से आ रही है।
उसने कैमरा उसी दिशा में घुमाया।
रिकॉर्डिंग में कुछ दिखाई नहीं दिया।
लेकिन माइक्रोफोन लगातार किसी की धीमी सांस रिकॉर्ड कर रहा था।
वह पहली बार थोड़ा असहज हुआ।
रात के बारह बज चुके थे।
आदित्य ऊपर वाली मंजिल पर पहुंचा।
यहीं पुराने रेयर कलेक्शन रखे जाते थे।
कमरे का दरवाजा आधा खुला था।
जबकि गार्ड ने कहा था कि यह हिस्सा बंद रहता है।
उसने धीरे से दरवाजा खोला।
अंदर हल्का अंधेरा था।
सिर्फ खिड़की से आती चांदनी कमरे में फैल रही थी।
लकड़ी की मेज पर एक पुरानी रजिस्टर खुली हुई थी।
उसने पास जाकर देखा।
रजिस्टर में नाम दर्ज थे।
1948…
1952…
1961…
1974…
फिर अचानक आखिरी पन्ने पर आज की तारीख लिखी थी।
और उसके नीचे…
“आदित्य”
उसका अपना नाम।
उसकी उंगलियां वहीं रुक गईं।
उसने खुद वह नाम नहीं लिखा था।
कमरे में कोई और भी नहीं था।
अचानक पीछे से कुर्सी खिसकने की आवाज आई।
घर्र…
आदित्य पलटा।
कमरे के कोने में रखी पुरानी लकड़ी की कुर्सी अपने आप धीरे-धीरे हिल रही थी।
उसने कैमरा उस पर फोकस किया।
रिकॉर्डिंग में कुर्सी बिल्कुल स्थिर दिखाई दे रही थी।
लेकिन उसकी आंखों के सामने वह लगातार हिल रही थी।
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसी समय पूरे कमरे की लाइट एक पल के लिए बुझ गई।
अंधेरा।
सिर्फ दो सेकंड।
जब रोशनी वापस आई…
रजिस्टर बंद हो चुका था।
और कुर्सी अपनी जगह सीधी खड़ी थी।
मानो कुछ हुआ ही न हो।
आदित्य ने तुरंत रिकॉर्डिंग चेक की।
वीडियो में वह अकेला खड़ा था।
न कुर्सी हिली।
न रजिस्टर खुला।
लेकिन ऑडियो ट्रैक में साफ आवाज रिकॉर्ड थी—
“यहां से चले जाओ…”
आवाज किसी बूढ़े आदमी की थी।
उसने धीरे से रिकॉर्डर बंद किया।
अब उसे महसूस होने लगा था कि यहां कुछ ऐसा जरूर है जिसे वह समझ नहीं पा रहा।
रात के करीब एक बजे उसे नीचे वाले पुराने गलियारे से हल्की रोशनी दिखाई दी।
जब वह वहां पहुंचा…
तो देखा कि एक लंबी मेज पर कई किताबें खुली रखी थीं।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई अभी-अभी उन्हें पढ़कर गया हो।
एक कुर्सी हल्का-हल्का घूम रही थी।
आदित्य ने कमरे में कदम रखा।
उसी पल दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
उसने दौड़कर हैंडल पकड़ा।
दरवाजा नहीं खुला।
अचानक कमरे में पन्ने पलटने की आवाज गूंजने लगी।
फड़…
फड़…
फड़…
सैकड़ों किताबों के पन्ने एक साथ पलट रहे थे।
कमरे में हवा बिल्कुल नहीं थी।
फिर भी हर किताब अपने आप खुल रही थी।
उसने कैमरा उठाया।
जैसे ही स्क्रीन देखी…
उसे एक सफेद धुंधली आकृति दिखाई दी।
वह कमरे के दूसरे कोने में खड़ी थी।
आदित्य ने कैमरा नीचे किया।
वहां कुछ नहीं था।
फिर कैमरा स्क्रीन पर देखा।
आकृति अब और पास थी।
चेहरा साफ नहीं दिख रहा था।
बस लंबा कोट और झुका हुआ सिर।
उसने घबराकर कैमरा बंद कर दिया।
कमरे की सारी आवाजें एकदम शांत हो गईं।
दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।
आदित्य बाहर निकल आया।
उसकी सांसें तेज चल रही थीं।
वह सीधे गार्ड के कमरे की तरफ गया।
लेकिन वहां कोई नहीं था।
कुर्सी खाली थी।
टेबल पर रखा पुराना थर्मस ठंडा हो चुका था।
ऐसा लग रहा था जैसे कई घंटों से वहां कोई आया ही न हो।
तभी पीछे से वही बुजुर्ग आवाज आई।
“मिल गई सच्चाई?”
आदित्य तुरंत मुड़ा।
गार्ड वहीं खड़ा था।
लेकिन इस बार उसके कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे।
चेहरे पर अजीब थकान थी।
आदित्य बोला,
“आप अभी कहां थे?”
गार्ड मुस्कुराया नहीं।
बस बोला,
“कुछ कमरों में रात को कोई नहीं जाता…
जो चला जाता है…
वह पहले जैसा वापस नहीं आता।”
इतना कहकर वह धीरे-धीरे अंधेरे में चला गया।
आदित्य उसके पीछे गया।
लेकिन कुछ ही कदम बाद रास्ता खाली था।
गार्ड गायब था।
सुबह होने में अभी एक घंटा बाकी था।
आदित्य ने फैसला किया कि वह आखिरी बार पूरे भवन का एक चक्कर लगाएगा और निकल जाएगा।
वह मुख्य पढ़ने वाले हॉल में पहुंचा।
सैकड़ों खाली कुर्सियां…
लंबी मेजें…
ऊंची छत…
चारों तरफ सन्नाटा।
जैसे ही उसने कैमरा ऑन किया…
सभी कुर्सियों से एक साथ हल्की चरमराहट की आवाज आई।
क्रीईक…
जैसे किसी ने एक साथ उन पर बैठने की कोशिश की हो।
उसने धीरे-धीरे चारों तरफ देखा।
कोई नहीं।
लेकिन सामने की एक कुर्सी अपने आप पीछे खिसकी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
अब पूरा हॉल धीमी आवाजों से भर गया।
ऐसा लग रहा था जैसे अदृश्य लोग अपनी जगह बदल रहे हों।
आदित्य धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।
तभी उसे साफ महसूस हुआ…
कोई उसके ठीक पीछे खड़ा है।
उसकी गर्दन के पास ठंडी हवा लगी।
लेकिन उसने पीछे देखने की हिम्मत नहीं की।
उसे गार्ड की बात याद आ गई—
“अगर कोई नाम लेकर बुलाए… जवाब मत देना।”
उसी पल उसके कान के बिल्कुल पास फुसफुसाहट हुई—
“आदित्य…”
उसकी आंखें फैल गईं।
आवाज इतनी साफ थी कि लगता था कोई उसके कंधे से सटा खड़ा है।
फिर दूसरी बार—
“आदित्य…”
उसने होंठ भींच लिए।
कोई जवाब नहीं दिया।
तीसरी बार आवाज आई।
इस बार पहले से ज्यादा धीमी।
लेकिन उसने फिर भी पीछे नहीं देखा।
करीब दस सेकंड बाद सब कुछ शांत हो गया।
उसने धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाए।
मुख्य दरवाजा अब खुला हुआ था।
वह तेजी से बाहर निकल आया।
सूरज उगने लगा था।
गार्ड फिर गेट पर खड़ा था।
इस बार उसके कपड़े बिल्कुल सूखे थे।
जैसे रात की कोई बात हुई ही न हो।
आदित्य ने पूछा,
“रात को आपने मुझे बुलाया था?”
गार्ड ने सिर हिलाया।
“नहीं साहब।
मैं तो पूरी रात बाहर ही था।”
आदित्य कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर बोला,
“लेकिन मैं आपसे अंदर मिला था।”
गार्ड का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
उसने धीरे से कहा,
“जिससे मिले थे…
जरूरी नहीं कि वह मैं ही था।”
आदित्य कुछ नहीं बोला।
वह चुपचाप टैक्सी में बैठ गया।
दिल्ली लौटने के बाद उसने पूरी रिकॉर्डिंग देखी।
वीडियो में सब कुछ सामान्य था।
कोई आकृति नहीं।
कोई चलती कुर्सी नहीं।
कोई खुलती किताब नहीं।
लेकिन ऑडियो में कई जगह धीमी फुसफुसाहटें रिकॉर्ड थीं।
सबसे आखिरी रिकॉर्डिंग सुनकर उसके हाथ कांप गए।
सुबह जब वह लाइब्रेरी से बाहर निकल रहा था…
ऑडियो में एक आवाज साफ सुनाई दे रही थी—
“अगली बार…
अकेले मत आना…”
आदित्य ने उसी दिन वह डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट हमेशा के लिए बंद कर दिया।
उसने कभी दोबारा किसी कथित भुतहा जगह पर रात में शूटिंग नहीं की।
आज भी उसकी हार्ड ड्राइव में वह ऑडियो फाइल मौजूद है।
लेकिन उसने उसे कभी सार्वजनिक नहीं किया।
क्योंकि उसका कहना था—
“कुछ आवाजें लोगों को सुनाने के लिए नहीं होतीं।”
National Library of India (Official)
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