शापित किताब Part 2 | Haunted Haveli Ka Sach

WRITER – DEVGAN KADALI

“मालिक… मालिक… कल रात कैसी बीती? आपने बंदरों के लिए बहुत सारी चीजें बनाई थीं। लेकिन उन्होंने सब तोड़-फोड़ दी हैं। क्या कोई बंदर ऐसा कर सकता है?”, वसंती ने पूछा।

Haunted Haveli Ka Sach

विवेक सिर झुकाए चुपचाप बैठा था। उसकी नाक लाल हो चुकी थी। शरीर अब भी कांप रहा था। बीती रात का डर उसकी आँखों से गया नहीं था।

दादाजी ने मुझे सावधान किया था। उन्होंने पहले ही सब बताने की कोशिश की थी। उन्हें सब पता था। वह पाइप भी शायद उन्होंने ही टंकी के पास रखा होगा। वे वहाँ गए होंगे। कितने होशियार और बहादुर थे वे। लेकिन फिर भी बच नहीं पाए… और आज…
मैं भी नहीं बचूंगा। दादाजी ने कोई रास्ता बताया था… कौन सा? कुछ भी याद नहीं… हाँ… कुछ तो था… कोई तो था… लेकिन कौन?

Haunted Haveli Ka Sach “हाँ… रुद्र…”, विवेक के मुँह से अचानक निकला।

“क्या मालिक, आपको भूत भगाना है क्या? जो उसका नाम ले रहे हो?”, वसंती हँसते हुए बोली।

“क्या? काकू… तुम्हें रुद्र कौन है, यह पता है?”, विवेक ने चौंककर पूछा।

“हाँ साहब… वह तो मेरे मायके के गाँव का ही है। मैं उसे कैसे नहीं जानूँगी? वह भैरवनाथ का बेटा है। बहुत बड़ा तांत्रिक बन गया है। लेकिन देखने में बिल्कुल साधारण लगता है…”, वसंती बोली।

“काकू, बस मुझे उसका पता बता दो। वहाँ जाकर आने में कितना समय लगेगा, यह बता दो… मुझ पर बहुत बड़ा उपकार होगा…”, विवेक हाथ जोड़ते हुए बोला।

“लगभग चार-पाँच या छह घंटे। अभी निकलोगे तो शाम या रात तक लौट आओगे…”, वसंती ने कहा।

……

“ऐसा हुआ है रुद्र मेरे साथ। आज आखिरी दिन है। मैं भाग नहीं सकता। वह मुझे मार ही डालेगा। तुम भी क्या कर लोगे? क्योंकि वह खेल खेलता है। उसका सामना उसी के नियमों से करना होगा। नहीं तो कुछ भी हो सकता है। अगर हो सके तो मेरी मदद करो… नहीं तो मुझे मरने दो…”, कहते हुए विवेक आँसू पोंछकर उठ गया।

“अरे… रुक…”, रुद्र ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
“मैं तुम्हारी मदद करूँगा। पहले कुछ खा लो। फिर हम साथ निकलेंगे।”

“बहुत-बहुत धन्यवाद रुद्र!”, विवेक ने हाथ जोड़ लिए।

“अरे क्या कर रहे हो? शर्मिंदा मत करो… मैं कोई भगवान नहीं हूँ…”, रुद्र उसका हाथ पकड़ते हुए बोला।

“नितेश, जाने की तैयारी कर…”, रुद्र ने कहा।

दरवाजे पर दक्ष अपने बढ़े हुए पेट पर हाथ रखे खड़ी थी। उसकी आँखें भरी हुई थीं। वह रुद्र को देख रही थी। रुद्र उसकी तरफ बढ़ा, तो वह कमरे के अंदर चली गई।

“नाराज़ हो गई क्या?”, रुद्र ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।

लेकिन रोती हुई दक्ष चुप रही।

“ठीक है बाबा, नहीं जाता मैं। उसे मरने देता हूँ…”, रुद्र बोला और उसके चेहरे की तरफ झुककर देखने लगा।

“न… नहीं…”, दक्ष पलटकर उससे लिपट गई।
“जाओ… लेकिन अपना ध्यान रखना। हमारे बच्चे का चेहरा देखने के लिए वापस आना…”, वह रोते हुए बोली।

………

गाड़ी के पहिए धीरे-धीरे मिट्टी में धँस गए। तीनों कार से बाहर उतरे। हवा ज़ोरों से चल रही थी। पत्ते उड़ रहे थे। चारों तरफ घना अंधेरा था। पेड़-पौधे अंधेरे में और भी डरावने लग रहे थे। उनकी सरसराहट रोंगटे खड़े कर रही थी।

वह घर तीनों को देख रहा था। बिल्कुल शांत… बिल्कुल स्थिर… मानो सोया हो… और अभी जाग जाएगा।

“कितने बजे हैं?”, रुद्र की आवाज गूँजी।

विवेक ने काँपती गर्दन घुमाई। उसकी आँखें फैल गईं।
“नौ बजने वाले हैं रुद्र…”

“वह कब आता है?”, रुद्र ने पूछा।

“कभी भी… उसका कोई समय नहीं। लेकिन उसके खेलने का समय तय है। वह कभी नहीं बदलता…”, विवेक बोला।

“आज के नियम क्या हैं?”

“पता नहीं… सब उस डायरी में होगा…”, विवेक घबराकर बोला।

“मुझे वह डायरी और नियम दोनों चाहिए…”, कहते हुए रुद्र घर की ओर बढ़ा। दोनों उसके पीछे-पीछे चल पड़े। हवा और तेज़ हो गई।

रुद्र, नितेश और विवेक उस घर की परछाई में दाखिल हुए।

ठन… ठन…

घर की बड़ी घड़ी बजी।

“लगता है नौ बज गए…”, नितेश बोला। उसी समय विवेक ने दरवाज़ा खोला।

कर्रर्र…

रुद्र ने अंदर कदम रखा। घर के भीतर गहरा अंधेरा था। चीज़ें काली परछाइयों जैसी दिख रही थीं। विवेक ने स्विच ऑन किया… टक… टक…

“लाइट नहीं जल रही…”

तभी ऊपर की मंज़िल से दरवाज़ा खुलने की कर्कश आवाज गूँजी। तीनों का दिल बैठ गया।

“व… वो… खेल्या… आ रहा है…”, विवेक काँपती आवाज में बोला। उसके शरीर से पसीना बह रहा था।

“डायरी कहाँ है?”

“ऊ… ऊपर… कमरे में…”

“चलो फिर…”

टप… टप… टप…

ऊपर से कदमों की आवाज आई। तीनों के दिल की धड़कन रुक सी गई।

रुद्र ने मोबाइल की फ्लैश ऑन की। ऊपर सिर्फ अंधेरा था। तभी सब शांत हो गया।

खड़… खड़… खड़…

कुछ लुढ़कता हुआ आया और सीढ़ियों के ऊपर रुक गया। रुद्र ने देखा तो उसकी आँखें फैल गईं। वह एक गुड़िया का सिर था।

“यह वही है… जो वसंती लाई थी…”, विवेक बुदबुदाया।

रुद्र बिना डरे आगे बढ़ गया। नितेश की नज़र उस सिर पर थी। उसे लगा जैसे वह हिल रहा हो… जैसे उसकी फटी हुई आँखें उन्हें घूर रही हों… जैसे वह अभी चीख पड़ेगा…

तभी किसी ने उसके कंधे को छुआ। वह झटके से पलटा। पीछे कोई नहीं था।

रुद्र के मोबाइल की फ्लैश धीमी पड़ गई। उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।

“आऽऽऽ!”

अचानक कोई चीखता हुआ दौड़ा। रुद्र चौंक गया। सामने दो काली चमकती आँखें दिखीं।

धड़ाम!

रुद्र के कंधे पर ज़ोरदार वार हुआ। उसका संतुलन बिगड़ गया और वह गिर पड़ा। पीछे वाले दोनों भी सीढ़ियों से लुढ़क गए।

गुड़िया का सिर लुढ़कता हुआ नीचे आया और रुद्र के पैरों के पास रुक गया। उसे लगा जैसे वह मुस्कुरा रहा हो…

……

रुद्र ने अब सावधानी से कदम बढ़ाया। चारों ओर परछाइयाँ हिल रही थीं। उसे लगा कि वह उसी अंधेरे में कहीं छिपा हुआ है। उसने नज़रें घुमाईं। उसका पैर आख़िरी सीढ़ी पर पड़ा ही था कि बाईं तरफ़ की गैलरी में हलचल हुई।

वह बिना कोई आवाज़ किए सरका। रुद्र का ध्यान उधर नहीं था। मौका पाकर खेल्या ने लोहे की रॉड पूरी ताकत से घुमाई — सीधे रुद्र के सिर की ओर।

रुद्र की नज़र घूमी। वह झटके से नीचे झुक गया। उसका दूसरा हाथ बैग में था। उसने उसमें से विभूति निकाली और खेल्या पर फेंक दी।

“आऽऽऽ!”
भयानक चीख के साथ वह अंधेरे में घुस गया।

विवेक और नितेश डरकर पीछे हट गए थे।

“जल्दी…!”, रुद्र चिल्लाया।

उसने आख़िरी सीढ़ी चढ़ी। तभी कुछ तेज़ चीज़ उसके चेहरे पर आकर लगी। रुद्र लड़खड़ा गया। उसका पैर फिसला और वह विवेक व नितेश पर जा गिरा।

तीनों धड़ाम-धड़ाम करते हुए सीढ़ियों से लुढ़क गए और हॉल में आकर गिरे। उन्हें बुरी तरह चोट लगी थी। वे दर्द से कराह रहे थे।

रुद्र ने अपने चेहरे पर पड़ी चीज़ हटाई। उसकी आँखें फैल गईं। वह बिना सिर वाली गुड़िया का धड़ था।

“ही… ही… ही… तू आ गया… और किसे साथ लाया है… विवेक… विवेक… तू मरेगा… और ये भी मरेंगे…!”

ऊपर की मंज़िल से आवाज़ गूँजी।

टप… टप…

कदमों की आवाज़ आने लगी। साथ में लोहे की रॉड घसीटने की आवाज़ भी। वह हँसता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। उसने अपने पैर सीढ़ियों पर जमा दिए। चाँदनी उसके शरीर पर पड़ी। उसके लंबे नाखून चमक उठे।

एक राक्षसी आकृति वहाँ खड़ी थी। किसी जंगली जानवर जैसी। उसके कान ऊपर उठे हुए थे। पूरे शरीर पर बाल थे। हाथ में लोहे की रॉड थी। उसकी आँखें इधर-उधर घूम रही थीं। मुँह से गुर्राने की आवाज़ निकल रही थी और लार टपक रही थी।

ठक… ठक…

उसने ज़ोर से पैर पटके।

“कहाँ हो तुम?… आज मैं तुम्हें पकड़ूँगा… तुमने मेरी गुड़िया ली है ना?… मैं तुम्हारा कलेजा निकाल लूँगा…!”

उसकी भारी आवाज़ गूँज उठी और वह सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।

उसके हर कदम के साथ तीनों की धड़कनें तेज़ हो रही थीं।

“आज मैं नहीं बचूँगा… यह मुझे मार डालेगा…”
विवेक अपने मुँह पर हाथ रखकर रो पड़ा।

“मुझे तुम्हारी गंध आ रही है…”, वह सीढ़ियों के बीच खड़ा होकर सूँघते हुए बोला।

रुद्र ने एक बार उसकी तरफ देखा। वह आधी सीढ़ियाँ उतर चुका था। फिर रुद्र ने अपने हाथ की गुड़िया की तरफ देखा।

खड़… धाड़… ठक…

अचानक दरवाज़े की तरफ़ कुछ ज़ोर से टकराया। खेल्या एक पल के लिए रुक गया। उसकी आँखें चमक उठीं। चेहरे पर क्रूर मुस्कान फैल गई।

अगले ही पल वह हवा की रफ़्तार से दरवाज़े की तरफ दौड़ा। वहाँ कुर्सी के पीछे कुछ पड़ा था। खेल्या उसकी ओर बढ़ा।

“जल्दी…!”, रुद्र बोला।

सीढ़ियों की ओट में छिपे तीनों तुरंत भागे और सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

“चीटिंग… चीटिंग…!”, खेल्या ज़ोर से चिल्लाया।

कुर्सी के पीछे गुड़िया का धड़ पड़ा था। उसने उस पर रॉड से वार किया।

रुद्र ने वही धड़ दरवाज़े की तरफ फेंका था ताकि खेल्या का ध्यान भटक जाए और वे ऊपर भाग सकें। बिल्कुल वैसा ही हुआ।

गुड़िया टूटकर बिखर गई। खेल्या तेज़ी से उनकी ओर दौड़ा। तब तक वे ऊपर पहुँच चुके थे।

रुद्र की आँखें फैल गईं। खेल्या आँधी की तरह उनकी तरफ आ रहा था। वह बिल्कुल पास पहुँच गया।

रुद्र झुक गया। उसने सीढ़ियों पर विभूति की एक सीधी रेखा खींच दी।

खेल्या उस रेखा से टकराया। ज़बरदस्त झटका लगा और वह हवा में उछल गया।

धड़ाम…!

वह हॉल में जाकर गिरा

तीनों कमरे के अंदर घुस गए। चारों तरफ़ सन्नाटा था, सिर्फ हवा की सरसराहट सुनाई दे रही थी। उन्होंने अपने चेहरे का पसीना पोंछा।

“रुद्र… वो देखो डायरी…”, विवेक ने काँपती उंगली से इशारा करते हुए कहा।

रुद्र ने डायरी उठाई। उसने विभूति से एक घेरा बनाया और उसके अंदर बैठ गया। उसके पास नितेश और विवेक भी बैठ गए।

रुद्र ने पन्ना पलटा।
“वेलकम…”
खून जैसे लाल अक्षर उभर आए।

अगले पन्ने पर लिखा था —

लेवल तीन…
आज आख़िरी पड़ाव…
सिर्फ एक ही उपाय — गुड़िया ढूँढकर वापस देना…
खेल दो घंटे चलेगा…
अगर तुमने गुड़िया वापस नहीं की… तो तुम मरोगे…
और तुम्हारे साथ आए ये दोनों बेवकूफ़ भी…

………

रुद्र ने गहरी साँस लेकर किताब बंद कर दी। अचानक उसे अजीब महसूस हुआ। जैसे कोई उसे घूर रहा हो। उसने झटके से गर्दन घुमाई।

दरवाज़ा खुला हुआ था।

रुद्र ने कमरे की टॉर्च उठाई और रोशनी दरवाज़े की ओर डाली।

तीनों को ज़ोर का झटका लगा।

वह लकड़ी की रेलिंग से लटका हुआ था… गाल फाड़कर हँस रहा था… और उन्हें घूर रहा था।

“नितेशऽऽऽ!”, रुद्र चिल्लाया।

उसने अपना बैग उसकी ओर फेंका। नितेश दरवाज़े की तरफ दौड़ा और दोनों पल्ले पकड़कर दरवाज़ा बंद कर दिया।

तभी…

धड़ाम!

दरवाज़े पर भयंकर चोट पड़ी। नितेश हवा में उछलकर दूर जा गिरा। दरवाज़े का एक हिस्सा ज़ोर से खुला और दूसरा टूटकर गिर पड़ा।

खेल्या डरावनी हँसी हँसते हुए अंदर घुस आया।

रुद्र ने नितेश को संभाला।

“अरे! मैंने तुझे बैग इसलिए दिया था कि दरवाज़े पर विभूति की रेखा बना दे…!”

इतना कहते ही उसके हाथ की टॉर्च बुझ गई।

खेल्या कमरे में घूम रहा था। उसके पैरों की आवाज़ और लोहे की रॉड की ठक-ठक पूरे कमरे में गूँज रही थी।

ठन… ठन… ठन…

रुद्र ने बैग से मोमबत्ती निकाली और जलाई। कमरे में हल्की रोशनी फैल गई।

उसकी नज़र घूमी… और अचानक रुक गई।

विभूति का घेरा एक जगह से मिट चुका था।

रुद्र चौंक गया। उसने तुरंत बैग में हाथ डाला। लेकिन उसी पल खेल्या तेज़ी से उस घेरे में घुस आया।

ज़बरदस्त धक्का लगा।

तीनों घेरों से बाहर जा गिरे।

रुद्र दीवार से टकराकर नीचे गिरा। उसकी नाक से खून बहने लगा। मोमबत्ती बगल में गिरी थी, लेकिन अब भी जल रही थी।

रुद्र ने सामने देखा।

खेल्या घेरे के अंदर फँस चुका था।

उसके भयानक जानवर जैसे पैर घेरे के भीतर घूम रहे थे। वह बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ रहा था। उसके शरीर को झटके लग रहे थे।

रुद्र ने जल्दी से बैग खींचा। उसने विभूति निकालकर अधूरा घेरा पूरा कर दिया।

अब खेल्या पूरी तरह फँस गया था।

“आऽऽऽ!”

वह भयानक चीख मारा।

रुद्र ने नितेश को उठाया। नितेश खिड़की से टकराकर गिरा था। काँच टूट चुका था।

रुद्र ने फिर बैग में हाथ डाला और खिड़की पर स्वास्तिक बना दिया।

अब खेल्या धुएँ में बदलने लगा था। वह घेरे में चीखता हुआ घूम रहा था।

“जल्दी…!”, रुद्र ने दोनों को बाहर निकाला।

उसने दरवाज़े की चौखट पर भी विभूति की रेखा खींच दी। फिर ठंडी नज़रों से खेल्या को देखने लगा।

उसका चेहरा अब और भी बड़ा हो गया था। वह गुर्राते हुए रुद्र को घूर रहा था। पहले से कहीं ज़्यादा खतरनाक लग रहा था।

रुद्र तुरंत वहाँ से निकल गया। तीनों हॉल में पहुँचे।

रुद्र ने किताब नीचे रखी।

“कितना समय हुआ?”

“रुद्र… साढ़े दस…”, विवेक काँपते हुए बोला।

“मतलब सिर्फ आधा घंटा बचा है। किसी भी तरह वह गुड़िया ढूँढनी होगी…”, कहते हुए रुद्र ने आँखें बंद कर लीं।

उसने काँपता हाथ डायरी पर रखा।

गड़गड़…!

बाहर बादल गरजे। बिजली चमकी। हवा पागल हो चुकी थी।

कुछ देर बाद रुद्र ने आँखें खोलीं।

“चलो जल्दी… विवेक, कुदाल और फावड़ा है ना?”

“हाँ…”

रुद्र ने दरवाज़ा खोला। बाहर की हवा पत्तों के साथ अंदर घुस आई। जैसे तीनों को पीछे धकेल रही हो। बाहर तूफ़ान बहुत तेज़ था। उनके कपड़े हवा में फड़फड़ा रहे थे।

फिर बिजली कड़की।

“रुद्र, कितनी कुदालें और फावड़े लाऊँ?”, विवेक ने पूछा।

“जितने हैं सब ले आओ। नितेश, उसके साथ जाओ…”

रुद्र कुएँ की तरफ भागा। विवेक और नितेश दूसरी ओर बने कमरे में घुस गए।

तीन कुदालें और दो फावड़े लेकर वे बाहर आए और रुद्र की तरफ दौड़े।

तभी…

एक ठंडी बूंद रुद्र के गाल पर गिरी। उसने उसे उंगली से पोंछा।

वह पानी था।

रुद्र सोच में पड़ गया… और अगले ही पल ज़ोर से चिल्लाया —

“फास्ट…

विवेक और नितेश रुद्र के पास आकर रुके। वे ज़ोर-ज़ोर से साँस ले रहे थे।

“अरे यहाँ क्यों रुके हो? खोदो यहाँ…!”, रुद्र चिल्लाया और कुदाल ज़मीन पर दे मारी।

हवा और भी बेकाबू हो गई। आसपास के पेड़ टूटने जैसे हिलने लगे। तभी बिजली चमकी और सामने वाले आम के पेड़ की डाल पर गिरी। डाल टूटकर नीचे गिरी और उसमें आग लग गई।

विवेक और नितेश डरकर पीछे हट गए।

“इतना डरते क्यों हो? अगर यहाँ नहीं खोदा तो डरने के लिए भी ज़िंदा नहीं बचोगे…”, रुद्र बोला।

तभी आसमान ज़ोर से गरजा और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। रुद्र कुछ पल के लिए शांत खड़ा रह गया।

“गर्मी में बारिश…”, नितेश बुदबुदाया।

“समझे? यह सब प्राकृतिक नहीं है…”, रुद्र ने गंभीर नज़रों से कहा।

विवेक और नितेश काँप उठे।

बारिश की धारें हवा के साथ कमरे की खिड़की पर पड़ रही थीं। वहाँ बनी विभूति की रेखा धुलने लगी। हवा और तेज़ हो गई। बारिश का पानी सीधे कमरे में घुसने लगा और बहते हुए उस घेरे की तरफ बढ़ने लगा जहाँ खेल्या फँसा था।

खेल्या घेरे में शांत बैठा था।

फिर उसने अपने नुकीले दाँत दिखाए… और हँसने लगा। उसकी हँसी धीरे-धीरे और डरावनी होती गई।

“रुद्रऽऽऽ!”, नितेश काँपता हुआ पीछे हट गया।

“क्या हुआ?”, रुद्र ने घबराकर पूछा।

उसकी नज़र गड्ढे में बने छोटे से जाल पर पड़ी। वह मिट्टी से ढका हुआ था, लेकिन बारिश का पानी पड़ते ही साफ हो गया।

रुद्र तुरंत मिट्टी खोदने लगा।

तभी घर की तरफ कुछ ज़ोर से टकराया।

“वह आ गया…”, रुद्र गंभीर आवाज़ में बोला।

तीनों की नज़र घर की तरफ गई।

वह राक्षसी आकृति तेज़ी से उनकी ओर बढ़ रही थी। उसके बालों वाले हाथ आगे-पीछे झूल रहे थे। आँखें लाल चमक रही थीं। कुत्ते जैसे लंबे कान हिल रहे थे।

कुछ ही पल में वह उनके बिल्कुल सामने आ खड़ा हुआ।

विवेक और नितेश काँपते हुए पीछे हट गए।

रुद्र ने गड्ढे में हाथ डाला। तभी उसे ज़ोरदार झटका लगा।

“रुद्रऽऽ!”, नितेश चीखा।

अगले ही पल खेल्या ने नितेश के सिर पर वार किया। नितेश कीचड़ में गिर पड़ा।

विवेक भागने के लिए मुड़ा ही था कि —

ठाँय!

रॉड उसकी पीठ पर लगी और वह सीधे नीचे गिर पड़ा।

“ही… ही… ही…!”, खेल्या आसमान की तरफ मुँह करके ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। बारिश की धारें उसके खुले मुँह में जा रही थीं।

फिर उसने अचानक गर्दन घुमाकर रुद्र की तरफ देखा।

अगले ही पल वह रुद्र पर झपटा। उसने लोहे की रॉड रुद्र के सिर पर दे मारी।

रुद्र ने अपने हाथ आगे कर दिए।

खेल्या अचानक रुक गया।

चारों ओर सन्नाटा छा गया। सिर्फ बारिश की आवाज़ गूँज रही थी।

उसके हाथ से रॉड नीचे गिर गई।

उसकी आँखें रुद्र के हाथों पर टिक गईं।

धीरे-धीरे उसका रूप बदलने लगा। उसका शरीर इंसानी बनने लगा। उसके पंजे सामान्य हाथों में बदल गए। पैरों की विकृत आकृति गायब हो गई। शरीर के बाल झड़ने लगे। उसकी आँखें बदल गईं।

अब वह एक साधारण इंसान लग रहा था। बेहद कमज़ोर… जैसे अंदर से पूरी तरह टूट चुका हो।

रुद्र ने अपने हाथ में पकड़ी गुड़िया आगे कर दी।

खेल्या ने काँपते हाथों से वह पुरानी, गंदी गुड़िया पकड़ ली और उसे सीने से लगा लिया।

धीरे-धीरे उसकी सिसकियाँ बढ़ने लगीं… और फिर वह फूट-फूटकर रो पड़ा। उसकी चीखें आसमान में गूँजने लगीं।

कुछ देर बाद उसने काँपती गर्दन उठाकर रुद्र की तरफ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे।

उसने हल्की सी मुस्कान दी।

धीरे-धीरे उसका शरीर धुएँ में बदलने लगा… और कुछ ही पलों में वह हवा में गायब हो गया।

टन… टन…

घर की घड़ी बज उठी।

घर की लाइटें जल गईं।

ग्यारह बज चुके थे।

खेल खत्म हो चुका था।

रुद्र ने गुड़िया उठाई और उसे गड्ढे में डाल दिया। फिर उसने नितेश को सहारा देकर उठाया।

तीनों घर के अंदर आए। कपड़े बदलकर वे हॉल में बैठ गए।

“रुद्र… यह सब क्या था? तुम्हें तो समझ आ गया होगा ना?”, नितेश ने पूछा।

तभी विवेक पोहे लेकर आया।

“माफ करना… रात में यही नाश्ता दे पा रहा हूँ…”, उसने प्लेट आगे बढ़ाई और खुद भी बैठ गया।

“वो खेल्या फिर वापस तो नहीं आएगा ना?”, विवेक ने डरते हुए पूछा।

रुद्र बोला —

“वह खेल्या गाँव का मास्टर केशव था। यह ज़मीन-जायदाद उसे पुश्तैनी मिली थी। उसकी एक पत्नी और छोटा बेटा था। लेकिन उसका लालची भाई विकास और उसकी दुष्ट पत्नी भी इसी घर में रहते थे।

बाद में केशव की पत्नी का एक्सीडेंट हुआ। वह हादसा उसके भाई विकास ने करवाया था। आखिर में उन्होंने उसके बेटे को भी मार डाला और उसकी लाश आम के पेड़ के नीचे दफना दी।

केशव पूरी तरह पागल हो गया। उसे अपना मरा हुआ बेटा दिखाई देने लगा। वह उसके साथ चोर-पुलिस खेलता रहता था।

आखिरकार विकास और उसकी पत्नी ने उसे जिंदा जला दिया।

वे दोनों इस घर और सारी संपत्ति के मालिक बन गए। लेकिन एक रात केशव की आत्मा ने उन दोनों को इसी घर में मार डाला। उनके सीने से दिल गायब थे।

उसके बाद जो भी यहाँ आता… केशव की आत्मा उसके साथ चोर-पुलिस का खेल खेलती… और उन्हें मारकर उनका कलेजा निकाल लेती।

उसे रोकना नामुमकिन था। उसे सिर्फ उसी के नियमों से रोका जा सकता था। बचने का एक ही रास्ता था — वह गुड़िया।

उन्होंने वह गुड़िया केशव के बेटे के साथ दफना दी थी। एक पिता… जो अपने बेटे के प्यार में पागल हो चुका था… वही उसे ढूँढ रहा था… उसी के लिए तड़प रहा था।

हमने उसका खेल पूरा कर दिया। गुड़िया देखकर उसकी आत्मा शांत हो गई… जैसे वह अपने बेटे को गले लगा रहा हो।

आखिरकार उसका राक्षसी रूप खत्म हो गया… और वह मुस्कुराते हुए यहाँ से चला गया…”

यह सुनकर विवेक और नितेश चुप हो गए।

उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि हँसे या रोएँ। वे इस भयानक मुसीबत से बच जाने पर खुश थे… लेकिन केशव की कहानी सुनकर उतने ही दुखी भी।

“उसके साथ बहुत बुरा हुआ… लेकिन अब हम क्या कर सकते हैं?”, नितेश ने सिर झुकाकर कहा।

“अंतिम संस्कार… उसके बेटे का अंतिम संस्कार…”, रुद्र बोला।

सुबह होते ही तीनों ने उन हड्डियों और गुड़िया को जला दिया।

फिर रुद्र और नितेश वहाँ से निकल पड़े…
एक और नए रोमांच… नए रहस्य… और नए डर की ओर…

क्योंकि अंधेरा अभी खत्म नहीं हुआ था

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