WRITER – ARNAV PATIL
क्या आप बाहर हो रही बारिश को देख रहे हैं?
कितनी शांत, लयबद्ध लगती है शहर में। लेकिन… लेकिन ऐसी ही बारिश उस रात भी हो रही थी।
Konkan Horror Story रुकिए… एक मिनट। मुझे यह खिड़की ठीक से बंद कर लेने दीजिए। अब तो मुझे बारिश की आवाज़ से ही डर लगने लगा है। खिड़की के शीशे पर गिरती बूंदों को देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई बाहर से अपने नाखूनों से कांच खरोंच रहा हो।

आपने कोंकण के बारे में सुना होगा। हरे-भरे पहाड़, लाल मिट्टी, घुमावदार सड़कें और टाइलों वाले पुराने घर… शहर की भागदौड़ से दूर वहाँ जाना किसी स्वर्ग जैसा लगता है, है ना? लेकिन… कोंकण का एक दूसरा रूप भी है। ऐसा रूप, जिसके बारे में सिर्फ वहाँ के पुराने और अनुभवी लोग जानते हैं। और वह रूप सामने आता है, जब सूरज डूब जाता है और बरसात की रात उस घने जंगल को काले अंधेरे में निगल लेती है। वहाँ दिन में प्रकृति जितनी सुंदर लगती है, रात में उतनी ही हिंसक और भयावह हो जाती है।
मेरा नाम आदित्य है। हमारा एक पुराना वाड़ा है… ‘देसाई वाड़ा’। रत्नागिरी जिले में, सह्याद्री की गोद में बसे एक बेहद दूरदराज़ गाँव में। गाँव का नाम मैं आपको नहीं बताऊँगा। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि आप वहाँ जाएँ। कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जहाँ इंसानों का कदम न पड़े तो ही अच्छा होता है।
मेरे दादाजी की मृत्यु हो गई थी, और उस वाड़े को बेचने के लिए, वहाँ के पुराने कागज़ात ढूँढने मुझे जाना पड़ा। पूरे दस साल बाद मैं वहाँ कदम रख रहा था। बचपन की कुछ धुंधली यादें थीं, बस।
हम कार से निकले थे। मैं और मेरा ड्राइवर, सखाराम। आंबा घाट से हमारा सफर शुरू हुआ। शाम के मुश्किल से छह बजे होंगे, लेकिन बारिश के बादलों और घने कोहरे के कारण ऐसा लग रहा था जैसे आधी रात हो। घाट की वह सड़क… दोनों तरफ आसमान छूते, सैकड़ों साल पुराने पेड़। उनकी शाखाएँ इस तरह झुकी हुई थीं, मानो कोई झुककर हमारी गाड़ी को घूर रहा हो। जंगल में एक अजीब सन्नाटा था। न पक्षियों की आवाज़, न कीड़ों की झनझनाहट… बस गाड़ी के इंजन की आवाज़ और लगातार बरसता पानी।
सखाराम बार-बार ऊपर लगे शीशे में देख रहा था। उसके चेहरे की बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।
“साहब… आज रात बस स्टैंड वाले लॉज में रुक जाएँ क्या? अंधेरा होने के बाद वाड़े पर जाना ठीक नहीं,” उसने हिचकते हुए कहा।
मैं हँस पड़ा था।
“अरे सखाराम, डरता क्यों है? वाड़ा अपना ही है। वहाँ क्या शेर-बाघ रहते हैं?”
अब जब मुझे अपनी वह हँसी याद आती है… तो खुद से घृणा होती है।
(कहानी सुनाते हुए आदित्य के हाथ काँपने लगते हैं, वह पानी पीता है।)
मुझे क्या पता था कि मैं खुद चलकर ऐसे चक्रव्यूह में जा रहा हूँ, जहाँ से ज़िंदा निकलना मेरे हाथ में नहीं होगा।
हमारी गाड़ी गाँव के आखिरी छोर पर बने वाड़े के फाटक के सामने रुकी। काले पत्थरों से बना वह विशाल वाड़ा। बारिश के पानी से वह पत्थर और भी ज्यादा काला और डरावना लग रहा था। वाड़े के पीछे सीधा जंगल शुरू होता था। गाँव वाले उसे ‘भवानी का जंगल’ कहते थे। वहाँ दिन में भी कोई लकड़ी काटने नहीं जाता था।
फाटक पर बापू हमारा इंतज़ार कर रहा था। बापू… हमारे वाड़े का पुराना रखवाला। उसके चेहरे पर उम्र से ज्यादा झुर्रियाँ थीं, और आँखों में एक अजीब, मृत शांति। उसने सिर पर काली घोंगड़ी ओढ़ रखी थी।
बापू ने पुराने जंग लगे ताले में बड़ी पीतल की चाबी घुमाई।
कर्रर्र… कान फाड़ देने वाली आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला।
अंदर कदम रखते ही एक खास तरह की गंध नाक में घुस गई। पुराने सागौन की लकड़ी की, सीलन भरी मिट्टी की, और… और किसी मीठी सड़ी हुई चीज़ की गंध। जैसे किसी पुराने, बंद पड़े मंदिर में आती है।
सखाराम सामान अंदर रखकर बोला,
“साहब, मैं गाड़ी में ही सो जाऊँगा। इन पुराने घरों में मेरा दम घुटता है।”
सच कहूँ तो, मैं भी यही चाहता था। मुझे अकेलापन चाहिए था।
बापू ज्यादा बोला नहीं। उसने एक लालटेन जलाकर बीच वाले कमरे में रख दी।
“साहब, खाना खा लीजिए और सो जाइए। रात में बारिश और तेज़ होगी,” वह धीमी, भारी आवाज़ में बोला।
वह जाने लगा, लेकिन चौखट पर अचानक रुक गया। उसने पीछे मुड़कर मेरी ओर देखा। लालटेन की रोशनी में उसकी आँखें बेहद डरावनी लग रही थीं।
“और साहब…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“एक बात याद रखिए। बीच वाले कमरे के पीछे का दरवाज़ा… जो पिछवाड़े और भवानी के जंगल की तरफ खुलता है… उसे अंदर से अच्छी तरह बंद कर लीजिए। और रात में कितनी भी बार, कोई भी… कोई भी आवाज़ दे… तो दरवाज़ा मत खोलिएगा। चाहे मेरी ही आवाज़ क्यों न आए। और भूलकर भी खिड़की से बाहर मत देखिएगा। कोंकण में रात के समय किसी की पुकार का जवाब नहीं दिया जाता… खासकर बरसात में।”
मैं कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही बापू तेज़ कदमों से अंधेरे में गायब हो गया।
(आदित्य रुकता है। उसके माथे पर पसीना है। वह गहरी साँस लेकर सामने देखता है।)
मुझे… मुझे यह सब आपको नहीं बताना चाहिए था। अभी भी ऐसा लग रहा है जैसे कोई मेरे पीछे अंधेरे में खड़ा होकर मेरी बातें सुन रहा हो। लेकिन… अब शुरुआत कर दी है, तो पूरी करनी ही पड़ेगी। आपको समझना होगा कि दुनिया में कुछ चीज़ें ऐसी हैं, जो विज्ञान से परे हैं।
रात के साढ़े दस बज चुके थे। सखाराम गाड़ी में जाकर सो गया था। मैं उस दो सौ साल पुराने विशाल वाड़े में अकेला था।
बाहर बारिश का प्रकोप भयानक हो चुका था। आपने कभी कोंकण की बारिश सुनी है? वह सिर्फ बरसती नहीं, टूटकर गिरती है। छत पर, खिड़कियों पर, ज़मीन पर… मानो प्रकृति किसी चीज़ को खत्म करना चाहती हो। आवाज़ इतनी तेज़ कि आपको अपनी धड़कन भी सुनाई नहीं देती।
मैं पुराने लकड़ी के पलंग पर सोने की कोशिश कर रहा था। ऊपर पीली रोशनी वाला एक पुराना बल्ब टिमटिमा रहा था। वाड़े की दीवारें… ऐसा लग रहा था जैसे वे मेरी तरफ बढ़ रही हों। उस सन्नाटे में एक अजीब दबाव था। शहर में सन्नाटा सिर्फ आवाज़ का अभाव होता है। लेकिन उस रात, उस जंगल के वाड़े में… सन्नाटे का भी एक ‘वज़न’ था। और वह वज़न मेरी छाती को दबा रहा था।
अचानक… फस्स्स… आवाज़ हुई और बल्ब बुझ गया। बिजली चली गई।
चारों तरफ घना अंधेरा। ऐसा अंधेरा जो आँखों को काटता हो। मैं लालटेन ढूँढने लगा।
और तभी… तभी वह गंध बदल गई। पहले वाली सड़ी-मीठी गंध अब बहुत तेज़ हो गई थी। जैसे कोई मरा हुआ जानवर मेरे बिल्कुल पास पड़ा हो।
मैं साँस रोके खड़ा रह गया।
और फिर… बारिश के उस भयानक शोर में भी, वह आवाज़ साफ-साफ सुनाई दी।
वह वाड़े के पीछे वाले दरवाज़े से आई थी।
टक… टक… टक…
कोई लंबे नाखूनों से लकड़ी के दरवाज़े पर धीरे-धीरे दस्तक दे रहा था।
मेरे दिल की धड़कन रुक गई। बापू ने कहा था— वह दरवाज़ा मत खोलना।
मैं वहीं जम गया।
फिर… एक आवाज़ आई।
“आदित्य… ए आदित्य…”
मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। वह आवाज़… मेरे दादाजी की थी!
वही दादाजी, जिनका अंतिम संस्कार मैंने दो महीने पहले खुद किया था। जिनकी अस्थियाँ मैंने नदी में बहाई थीं… वही भारी, अधिकारपूर्ण आवाज़ उस बंद दरवाज़े के पीछे से आ रही थी।
“आदित्य… दरवाज़ा खोल। मुझे अंदर आना है। यहाँ बहुत ठंड है…”
मैंने कान बंद कर लिए। आँखें कसकर भींच लीं।
“यह भ्रम है… सिर्फ भ्रम,” मैं खुद से कह रहा था। “दादाजी मर चुके हैं…”
लेकिन वह आवाज़ बंद नहीं हुई।
वह बदलने लगी।
(आदित्य की आँखें फैली हुई हैं, वह लगभग फुसफुसा रहा है।)
वह आवाज़ अचानक मेरी माँ की आवाज़ में बदल गई।
“बेटा… आदित्य, दरवाज़ा खोल ना। मैं भीग रही हूँ बाहर…”
मेरी माँ! जो पुणे में, मेरे फ्लैट में सुरक्षित थी… उसकी आवाज़ इस वीरान जंगल में आधी रात को कैसे आ सकती थी?
वह रो रही थी।
“बेटा, मुझे बहुत डर लग रहा है… दरवाज़ा खोल…”
आवाज़ इतनी दयनीय, इतनी असली थी कि मेरी आँखों में आँसू आ गए। मेरे कदम अपने आप उस दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगे। एक मन चिल्ला रहा था— “पागल हो गया है क्या? पीछे हट!” लेकिन दूसरा मन कह रहा था— “वह माँ है…”
मैं अंधेरे में टटोलते हुए दरवाज़े तक पहुँचा। पीतल की कुंडी को छुआ। वह बर्फ जैसी ठंडी थी।
मैं कुंडी खोलने ही वाला था कि अचानक मुझे बापू की बात याद आई— “खिड़की से बाहर मत देखना।”
लेकिन इंसान की जिज्ञासा ही उसके विनाश का कारण होती है। दरवाज़े के पास एक छोटी लकड़ी की खिड़की थी। मैंने आँख उस दरार से लगाई।
बाहर सिर्फ घना अंधेरा और मूसलाधार बारिश थी।
“माँ?” मैंने धीरे से पुकारा।
बाहर का रोना अचानक बंद हो गया। एक सेकंड के लिए… सिर्फ एक सेकंड के लिए बारिश की आवाज़ भी गायब हो गई।
और फिर… आवाज़ बदल गई।
अब वह सखाराम की आवाज़ थी।
“साहब… दरवाज़ा खोलिए। मैं सखाराम हूँ। गाड़ी में बहुत डर लग रहा है। कोई गाड़ी की खिड़कियों पर नाखून मार रहा है…”
मैं पीछे हट गया। सखाराम तो सामने गाड़ी में था! वह पीछे जंगल में क्यों जाएगा?
तभी… आसमान में बिजली चमकी।
और उस एक पल की सफेद रोशनी में मैंने जो देखा…
(आदित्य की आवाज़ काँप रही है।)
वहाँ बारिश में एक आकृति खड़ी थी। वह बिल्कुल सखाराम जैसी दिख रही थी। लेकिन… वह सखाराम नहीं था।
उसकी लंबाई सात फुट से भी ज्यादा थी। उसके हाथ घुटनों से नीचे तक लटक रहे थे। और उसका चेहरा… इंसान जैसा होते हुए भी उसका जबड़ा अस्वाभाविक रूप से छाती तक लटका हुआ था। उसकी आँखें पूरी सफेद थीं… और वह दरवाज़े की तरफ नहीं, सीधे खिड़की की दरार से मेरी आँखों में देख रहा था!
उसे पता था कि मैं वहाँ खड़ा हूँ।
मैं डर से पीछे गिर पड़ा। तभी मेरे फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर लिखा था— ‘सखाराम’।
मैंने काँपते हाथों से फोन उठाया।
“हैलो… साहब?”
सखाराम की डरी हुई आवाज़ आई।
“साहब, क्या आप बाहर आए थे? कोई वाड़े के पीछे गया है… मुझे बहुत डर लग रहा है…”
फोन मेरे हाथ से गिर गया।
अगर सखाराम सामने गाड़ी में था…
तो पीछे दरवाज़े के बाहर… कौन था?
मैं डर से वहीं जड़ हो गया।
तभी बाहर से फिर आवाज़ आई। लेकिन इस बार वह किसी और की नहीं थी।
वह मेरी अपनी आवाज़ थी।
मेरी ही आवाज़… बिल्कुल मेरे ही लहजे में… मुझसे पूछ रही थी—
“आदित्य… हम दरवाज़ा क्यों नहीं खोल रहे? मुझे अंदर आने दो ना…”
उस आवाज़ में एक भयानक, क्रूर हँसी घुली हुई थी।
और फिर… वह आवाज़ आई जिसने मेरी आखिरी बची हुई चेतना भी छीन ली।
अंदर से बंद की गई लोहे की कुंडी… जो मेरी तरफ थी…
वह धीरे-धीरे… अपने आप… खिसक रही थी।
खट्ट…
खट्ट…
खट्ट…
(आदित्य अचानक कुर्सी से उठ खड़ा होता है। उसकी आँखें भय से फैली हुई हैं।)
नहीं… नहीं… मैं आगे नहीं बता सकता। रुको… क्या आपने सुना?
वह कुंडी की आवाज़… वह आवाज़ मुझे अभी यहीं… आपके पीछे वाले दरवाज़े से सुनाई दे रही है…
(आदित्य ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। वह कुछ सेकंड तक यूँ ही बैठा रहा और फिर अचानक आँखें खोल दीं। वह डरी हुई नज़रों से चारों ओर देखने लगा।)
माफ़ कीजिए… मुझे माफ़ कीजिए। वह खिड़की की आवाज़… वह सिर्फ हवा की थी ना? हाँ, हवा की ही होगी। मेरा दिमाग अब मेरे साथ ही खेल खेलता है। उस रात की याद आते ही मुझे इस सुरक्षित कमरे में भी भ्रम होने लगते हैं। मुझे एक घूंट पानी पी लेने दीजिए…
(वह पानी का गिलास होंठों तक ले जाता है, लेकिन उसके हाथ इतने काँप रहे हैं कि थोड़ा पानी मेज़ पर गिर जाता है। वह एक लंबी साँस लेकर कुर्सी पर फिर पीछे टिक जाता है।)
मैं कहाँ था? हाँ… वह कुंडी। पीछे वाले भारी दरवाज़े की वह मज़बूत लोहे की कुंडी… जिसे मैंने अपने हाथों से अंदर से बंद किया था… वह अपने आप खिसक रही थी।
खट्ट…
खट्ट…
उस आवाज़ ने मेरे सुन्न पड़े शरीर की हर नस जगा दी। वह कोई भ्रम नहीं था। बाहर जो भी था… अब अंदर आने की कोशिश कर रहा था। और मुझे पता था, अगर वह दरवाज़ा खुल गया, तो मैं अगला सूर्योदय ज़िंदा नहीं देख पाऊँगा।
मौत के डर से इंसान के भीतर जो अमानवीय ताकत आ जाती है ना… वह उस पल मेरे अंदर आ गई। मैं ज़मीन से उठा और पूरी ताकत से उस दरवाज़े पर टूट पड़ा। मैंने अपना पूरा शरीर उस लकड़ी के दरवाज़े पर टिका दिया और दोनों हाथों से लोहे की कुंडी को कसकर पकड़ लिया। बाहर से कोई पूरी ताकत से उसे खींच रहा था। लोहे की धार मेरी हथेलियों को काट रही थी, लेकिन मैंने कुंडी को ज़रा भी हिलने नहीं दिया।
“नहीं… नहीं… नहीं…”
मैं पागलों की तरह खुद से बड़बड़ा रहा था।
और फिर… बाहर की खींचतान अचानक रुक गई। कुछ सेकंड तक सिर्फ बारिश की वह डरावनी आवाज़ सुनाई देती रही। मुझे लगा, वह चला गया। मैं राहत की साँस लेने ही वाला था…
तभी, बिल्कुल दरवाज़े की दरार से… जैसे किसी ने होंठ लगाकर फुसफुसाया हो… एक आवाज़ आई। वह आवाज़ फिर मेरी ही थी।
“कब तक रोकोगे मुझे, आदित्य? मैं तो कब का अंदर आ चुका हूँ… तुम्हारे मन में।”
उसके बाद एक बेहद घिनौनी, डरावनी हँसी सुनाई दी। वह इंसान की हँसी नहीं थी। उसमें एक साथ कई आवाज़ें मिली हुई थीं— छोटे बच्चों का रोना, बूढ़ों की खाँसी, और जानवरों की डरावनी गुर्राहट। वह आवाज़ धीरे-धीरे दूर चली गई… भवानी के जंगल में खो गई।
मैं उसी दरवाज़े से चिपका ज़मीन पर बैठा रहा। मेरे हाथों से खून बह रहा था, कुंडी की रगड़ से चमड़ी उधड़ गई थी, लेकिन मुझे दर्द महसूस ही नहीं हो रहा था। वह रात मैंने कैसे काटी, यह सिर्फ मैं जानता हूँ। मोबाइल की बैटरी खत्म होने वाली थी। मैं हर सेकंड गिन रहा था।
किसी तरह सुबह हुई। कोंकण की सुबह आमतौर पर पक्षियों की चहचहाहट और ताज़ी रोशनी के साथ होती है। लेकिन उस दिन ऐसा कुछ नहीं था। वह दिन जैसे बीमार पड़ गया था। आसमान में धुंधली, राख जैसी रोशनी फैली हुई थी। बारिश रुक चुकी थी, लेकिन पत्तों से टपकते पानी की ‘टप… टप…’ आवाज़ किसी मौत की घड़ी जैसी लग रही थी।
मैं किसी तरह उठा। मेरे पैर लकड़ी की तरह अकड़ चुके थे। मैं सीधे सामने वाले दरवाज़े की ओर भागा। दरवाज़ा खोला और आँगन में आ गया।
सखाराम की गाड़ी वहीं खड़ी थी।
“सखाराम!”
मैं पूरी ताकत से चिल्लाया।
गाड़ी के शीशे अंदर से धुंधले हो चुके थे। मैंने ज़ोर से काँच पर हाथ मारा। अंदर से सखाराम चौंककर उठा। उसने दरवाज़ा खोला। उसकी हालत भी मेरी जैसी ही थी। आँखें लाल थीं, चेहरे पर मौत का डर साफ दिख रहा था।
“साहब…” वह लगभग रोते हुए बोला, “साहब, यहाँ से चलिए। अभी के अभी चलिए। पूरी रात… कोई गाड़ी के चारों तरफ घूम रहा था। वह आपकी आवाज़ में मुझे बुला रहा था। ‘सखाराम, दरवाज़ा खोल… चाबी दे…’ साहब, वह आप नहीं थे!”
“मुझे पता है, सखाराम,” मैंने उसे शांत करने की कोशिश की। “गाड़ी चालू कर। हम अभी निकल रहे हैं। मुझे इस वाड़े में एक सेकंड भी नहीं रुकना।”
Konkan Horror Story
हम गाड़ी में बैठने ही वाले थे कि वाड़े के पीछे से बापू आता दिखाई दिया। उसके हाथ में पुरानी दरांती थी और शरीर पर वही काली घोंगड़ी। दिन की रोशनी में भी वह किसी भूत जैसा लग रहा था।
“जा रहे हो मालिक?” बापू ने पूछा। उसकी आवाज़ में कोई भाव नहीं था।
“हाँ बापू। कुछ काम याद आ गया है,” मैंने झूठ बोलने की कोशिश की, लेकिन मेरी काँपती आवाज़ सब बता रही थी।
बापू ने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया। फिर जाते-जाते बुदबुदाया—
“जंगल एक बार जाग जाए… तो शिकार किए बिना सोता नहीं।”
मुझमें उसके शब्दों का मतलब समझने की ताकत नहीं बची थी। सखाराम ने गाड़ी स्टार्ट की और हम घाट की ओर निकल पड़े।
(आदित्य रुकता है। उसके चेहरे पर निराशा उतर आती है।)
आपको लग रहा होगा कि हम बच गए। कि दिन के उजाले में हम उस गाँव से सुरक्षित निकल आए होंगे। लेकिन मैंने शुरुआत में ही कहा था ना? कोंकण का वह भयानक रूप एक बार सामने आ जाए… तो वहाँ से निकलना इंसान के हाथ में नहीं रहता।
हम आंबा घाट की सड़क पर पहुँचे। बारिश फिर शुरू हो चुकी थी। गाड़ी घुमावदार रास्तों से ऊपर चढ़ रही थी। मुझे लगा था कि बस यह घाट पार हो जाए, तो हम सुरक्षित हो जाएँगे। लेकिन किस्मत ने कुछ और ही सोच रखा था।
अचानक सखाराम ने ज़ोर से ब्रेक लगाया। गाड़ी चीखती हुई कीचड़ में फिसलकर रुक गई।
“हे भगवान…”
सखाराम के मुँह से निकला।
मैंने सामने देखा… और मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
सामने सड़क थी ही नहीं।
रात की मूसलाधार बारिश में पहाड़ का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आ गिरा था। हज़ारों टन मिट्टी, विशाल पत्थर और सदियों पुराने पेड़… सबने मिलकर पूरी सड़क निगल ली थी। भूस्खलन हो चुका था। इतना बड़ा कि उसे हटाने में कम से कम चार-पाँच दिन लगने वाले थे।
हम फँस चुके थे।
उस डरावने गाँव में।
उस शापित वाड़े में।
और उस ‘भवानी के जंगल’ के पास।
मैं गाड़ी से उतरा। बारिश में भीगते हुए मिट्टी के उस ढेर को घूरता रहा। मोबाइल निकाला… ‘नो नेटवर्क’।
दुनिया से हमारा संपर्क पूरी तरह कट चुका था। हम एक ऐसे टापू पर फँसे थे, जहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं था।
“साहब… अब क्या करेंगे?”
सखाराम रो पड़ा।
“गाड़ी पीछे मोड़,” मैंने दाँत भींचकर कहा। “हमें वापस वाड़े में जाना पड़ेगा।”
जब हम फिर से देसाई वाड़े के फाटक पर पहुँचे, तो बापू वहीं खड़ा था। जैसे उसे पहले से पता था कि हम लौटेंगे। उसके चेहरे पर न आश्चर्य था, न दुःख।
“भूस्खलन हुआ ना?” उसने पूछा।
मैंने बस सिर हिलाया। अब मुझसे डर और गुस्सा संभल नहीं रहा था। मैं झपटकर बापू की कॉलर पकड़ ली।
“क्या है ये सब, बापू? बोल! कल रात मेरे दरवाज़े के बाहर कौन था? वह आवाज़ें क्या थीं? तूने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”
बापू ने शांति से मेरा हाथ हटाया। उसकी आँखों में पहली बार डर दिखा। उसने चारों तरफ देखा और मुझे अंदर देवघर में ले गया। वहाँ एक पुराना दीया जल रहा था।
“मालिक… धीरे बोलिए। वह सुनता है,” बापू फुसफुसाया।
“कौन?”
“गाँव वाले उसे ‘बहुरूपी’ कहते हैं,” बापू बोला। “वह सदियों से भवानी के जंगल में है। वह कोई साधारण भूत नहीं है। वह एक परछाई है। ऐसी बुरी शक्ति, जो इंसानों के दुख, अपराधबोध और डर पर पलती है। उसका अपना कोई चेहरा नहीं, अपनी कोई आवाज़ नहीं। वह आपके सबसे करीब लोगों का रूप लेती है। कभी माँ का, कभी भाई का, कभी मरे हुए इंसानों का।”
“लेकिन क्यों? वह मेरे पीछे ही क्यों पड़ा है?” मैंने पूछा।
बापू ने लंबी साँस ली।
“आपके दादाजी ने इस वाड़े के चारों ओर कुछ मंत्रों की रेखाएँ बनाई थीं। कुछ पुराने उपाय किए थे। इसलिए वह जंगल तक ही सीमित था। लेकिन… दादाजी के मरते ही वह बंधन टूट गया। और आप… उनके खून के वारिस… इतने सालों बाद यहाँ आए। आपकी मौजूदगी से उसे फिर गंध मिल गई। अब वह आपको जंगल में खींचने की कोशिश करेगा। आपके मन से खेलेगा। आपको पागल कर देगा। और जिस दिन आप खुद उस जंगल में चले गए… उस दिन आपका अस्तित्व मिट जाएगा।”
(आदित्य की आँखें भर आती हैं। वह खाली नज़रों से सामने देखता रहता है।)
बापू की बातें सुनकर ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर का सारा खून जम गया हो। मतलब मैं ऐसे दुश्मन से लड़ रहा था, जिसे मैं मार नहीं सकता था… क्योंकि वह मेरे अपने लोगों के चेहरों के पीछे छिपा था।
“तो अब क्या करें, बापू? क्या हम ऐसे ही मर जाएँगे?” मैंने टूटे हुए स्वर में पूछा।
बापू ने देवघर में रखे पुराने तांबे के डिब्बे से काली राख निकाली।
“यह मारुति का अंगारा है। और ये भिलावे के पत्ते। इन्हें हम दरवाज़ों और खिड़कियों पर बाँधेंगे। यह राख चौखट पर डालेंगे। लेकिन मालिक… यह उसे सिर्फ बाहर रोक सकती है। अंदर नहीं।”
“मतलब?”
“मतलब जब तक आप खुद उसे अंदर नहीं बुलाएँगे… या खुद बाहर नहीं जाएँगे… वह अंदर नहीं आ सकता। लेकिन याद रखिए… आज की रात कल से ज्यादा डरावनी होगी। वह और ताकत से कोशिश करेगा।”
पूरा दिन हमने वाड़े के सारे दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद करने में बिताया। जहाँ दरारें थीं, वहाँ लकड़ी की तख्तियाँ ठोंकीं। राख डाली। सखाराम अब मेरे साथ ही बीच वाले कमरे में रहने वाला था। उसे गाड़ी में अकेला छोड़ना मौत के मुँह में धकेलने जैसा था।
शाम हो गई। और कोंकण की शाम से ज्यादा डरावनी चीज़ शायद ही कोई हो। सूरज डूबते ही अंधेरा जैसे आसमान से गिर पड़ता है। और उसी अंधेरे के साथ फिर शुरू हो गई वह जानलेवा बारिश।
रात के आठ बजे थे। कमरे में लालटेन जल रही थी। मैं एक कोने में भारी लोहे की रॉड लेकर बैठा था। सखाराम दूसरे कोने में चूल्हे पर चाय बना रहा था।
बाहर तूफ़ानी हवा चीख रही थी। खिड़कियाँ काँप रही थीं। हर आवाज़ पर मेरी नज़र दरवाज़े पर चली जाती।
“सखाराम,” मैंने पुकारा, “चाय बनी क्या? बहुत ठंड लग रही है।”
सखाराम मेरी तरफ पीठ किए खड़ा था। वह चूल्हे की आग में घूर रहा था। उसके हाथ में चम्मच चाय में घूम रहा था। लेकिन… कुछ अजीब था।
सखाराम हमेशा दाहिने हाथ से चाय चलाता था। और अभी वह बाएँ हाथ से चला रहा था। वह भी… उल्टी दिशा में। बहुत धीमी, अस्वाभाविक गति से।
“सखाराम?” मैंने फिर आवाज़ दी।
उसने सिर नहीं घुमाया। बस उसकी पीठ तन गई।
और फिर… उसने जवाब दिया।
“हाँ साहब… लेकिन अंदर बहुत ठंड है रे…”
(आदित्य की आवाज़ अचानक रुक जाती है। वह सीधे आपकी ओर देखता है। उसकी आँखों में ऐसी दहशत है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।)
आपको याद है? पिछली रात… मेरे दादाजी की आवाज़ ने दरवाज़े के बाहर क्या कहा था?
“मुझे अंदर आना है। यहाँ बहुत ठंड है…”
सखाराम ने वही शब्द… बिल्कुल उसी लहजे में दोहराए थे। लेकिन सखाराम ने वह आवाज़ कभी सुनी ही नहीं थी।
मेरे हाथ से लोहे की रॉड गिरते-गिरते बची। मैं वहीं सुन्न खड़ा रह गया।
अगर बापू ने कहा था कि अंगारा उसे ‘बाहर’ रोक सकता है…
तो मेरे सामने, उस चूल्हे के पास बैठा… चाय चलाने वाला वह कौन था?
मैं धीरे-धीरे पीछे हटने लगा। तभी मेरा पैर एक पुराने पीतल के बर्तन से टकराया और ज़ोरदार आवाज़ हुई।
उस आवाज़ के साथ ही… सखाराम की वह आकृति रुक गई। चाय चलाने वाला हाथ हवा में ही ठहर गया।
और फिर… बहुत धीरे-धीरे… उसने अपना सिर मेरी तरफ घुमाना शुरू किया।
उसकी पीठ अब भी चूल्हे की ओर थी, लेकिन उसकी गर्दन… इंसान की गर्दन जितनी घूम सकती है, उससे कहीं ज्यादा घूम रही थी। वह पूरी तरह पीछे देख रहा था।
उसकी आँखों में पुतलियाँ नहीं थीं। सिर्फ सफेद, मरी हुई आँखें। और उसका जबड़ा… पिछली रात खिड़की में जैसा देखा था… वैसा ही… अस्वाभाविक रूप से छाती तक लटका हुआ।
उस लटके हुए जबड़े से… मेरी माँ की आवाज़ में एक फुसफुसाहट निकली—
“आदित्य… चाय लोगे ना बेटा?”
(आदित्य दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लेता है और सिसक उठता है। वह काँप रहा है। कहानी यहीं खत्म होती है।)
(आदित्य काफी देर तक कुछ नहीं बोलता। वह बस शून्य में देखता रहता है। उसके हाथ अब भी काँप रहे हैं। वह मेज़ पर रखा पानी का गिलास उठाने की कोशिश करता है, लेकिन उसका हाथ इतना काँप रहा है कि वह गिलास वापस रख देता है। वह दोनों हाथों से अपना चेहरा मलता है और एक लंबी, गहरी साँस लेता है।)
क्या आपको… कभी नींद से अचानक झटका लगकर जाग आई है? जब सपने में आप कहीं से गिर रहे होते हैं… और अचानक आँख खुल जाती है? उस एक पल की जो भावना होती है ना… दिल की धड़कन रुक जाने जैसी, गला सूख जाने जैसा डर… वही एहसास उस रात मेरे लिए हमेशा के लिए सच बन गया।
वह सखाराम नहीं था।
वह मेरा सखाराम था ही नहीं।
चूल्हे के पास बैठी वह आकृति… जिसकी गर्दन पूरी तरह पीछे मुड़ी हुई थी… और जिसका जबड़ा उसकी छाती तक लटका हुआ था… वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी। मेरी माँ की आवाज़ में।
“आदित्य… चाय लोगे ना बेटा?”
वह आवाज़ इतनी मीठी, इतनी प्यार भरी थी… कि उसे उस डरावने, घिनौने चेहरे से निकलते देखकर मेरा दिमाग जैसे फट रहा था। मेरी साँस रुक गई थी। मैं चीखना चाहता था… लेकिन मेरे गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी।
वह… वह ‘बहुरूपी’… अब खड़ा हो रहा था। बहुत धीरे-धीरे। उसके हाथ-पैर इंसानों की तरह नहीं मुड़ रहे थे। वे किसी मकड़ी की तरह अजीब कोणों में मुड़ रहे थे। खड़ा होने पर उसकी ऊँचाई छत को छू रही थी।
और फिर… उसने कदम बढ़ाया।
खट्ट…
उसके पैर की आवाज़ इंसान के कदमों जैसी नहीं थी। वह ऐसे थी जैसे कोई भारी लकड़ी का लट्ठ ज़मीन पर घसीटा जा रहा हो। उसने दूसरा कदम बढ़ाया… और वह मेरी तरफ आने लगा।
मैंने अपनी बची-खुची ताकत जुटाई, लोहे की रॉड कसकर पकड़ी और पूरी ताकत से चीखते हुए उसके सिर पर दे मारी।
(आदित्य की आँखें फैल जाती हैं। वह कुर्सी के किनारे तक आ जाता है।)
रॉड उसके सिर पर लगी… लेकिन खून नहीं निकला। हड्डी टूटने की आवाज़ नहीं आई। आवाज़ वैसी थी जैसे किसी खोखले, सड़े हुए पेड़ के तने पर वार किया जाए।
ढप्प!
वह थोड़ा पीछे हटा। और उसी एक सेकंड का फायदा उठाकर मैं मुड़ा और कमरे से बाहर भागा।
मैं अँधेरे में वाड़े के लंबे, काले गलियारे में भाग रहा था। मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। सिर्फ बाहर चमकती बिजली की रोशनी में एक पल के लिए पुराने खंभे और बंद दरवाज़े दिखाई दे जाते थे। बारिश इतनी तेज़ थी कि मुझे अपने कदमों की आवाज़ तक सुनाई नहीं दे रही थी।
मैं भाग रहा था… और मेरे पीछे…
खट्ट…
खट्ट…
खट्ट…
वह मेरे पीछे आ रहा था। वह दौड़ नहीं रहा था। लेकिन फिर भी मुझे महसूस हो रहा था कि वह करीब आता जा रहा है।
“आदित्य… अँधेरे में गिर जाओगे बेटा… रुक जाओ ना…”
अब माँ की आवाज़ पूरे वाड़े में गूँज रही थी। वह आवाज़ रोने लगी थी। जैसे मैं अपनी माँ को छोड़कर भाग रहा हूँ। वह आवाज़ मेरे दिमाग को तोड़ रही थी। मुझे रुकने का मन होने लगा।
“वह माँ है… तू उसे छोड़कर क्यों भाग रहा है?”
मेरा अपना दिमाग मुझे धोखा देने लगा था।
(आदित्य अपना सिर पकड़ लेता है। उसके चेहरे पर गहरी बेचैनी है।)
इंसान का दिमाग ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन होता है। वह बहुरूपी मेरी डर पर नहीं… मेरे प्यार और अपराधबोध पर पल रहा था।
मैं लड़खड़ाते हुए देवघर की तरफ भागा। मुझे पता था बापू वहीं होगा। मैंने देवघर का भारी लकड़ी का दरवाज़ा धक्का देकर खोला और अंदर गिर पड़ा।
अंदर दीये की हल्की पीली रोशनी थी। बापू वहीं ज़मीन पर बैठा था। उसके सामने कोई अजीब-सी तांत्रिक व्यवस्था की गई थी— काली गुड़िया, हल्दी-कुमकुम, और बीच में एक नींबू जिसमें सुइयाँ चुभी हुई थीं।
“बापू!”
मैं रोते हुए, हाँफते हुए चिल्लाया।
“बापू, वह अंदर आ गया है! सखाराम… वह सखाराम बनकर अंदर आ गया है!”
मैंने दरवाज़ा अंदर से बंद किया और बापू के पास ज़मीन पर गिर पड़ा। मैं काँप रहा था। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे।
बापू ने मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर अब साफ डर था। उसने मुट्ठी में राख कसकर पकड़ ली।
“आपने क्या किया मालिक?” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “मैंने कहा था ना… उसे अंदर मत बुलाइए।”
“मैंने नहीं बुलाया बापू! मैं सखाराम को गाड़ी से अंदर लाया… वह मेरा ड्राइवर है… मैं उसे बाहर कैसे मरने देता?”
बापू ने आँखें बंद कर लीं। उसके गाल पर आँसू बह निकला।
“मालिक… सखाराम वाड़े में आया ही नहीं।”
(आदित्य की साँस कुछ पल के लिए रुक जाती है। वह बहुत धीमे स्वर में बोलता है।)
“क… क्या मतलब?”
“जब भूस्खलन हुआ था, तब आप सड़क देखने गाड़ी से उतरे थे ना? उस वक्त सखाराम गाड़ी में अकेला था। फिर आप वापस गाड़ी में बैठे… और सखाराम को लेकर वाड़े में लौट आए। लेकिन मालिक… जिसे आप साथ लाए थे… वह सखाराम नहीं था।”
मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। सीने में जैसे कुछ फट गया।
“मतलब… मतलब सखाराम…”
“सखाराम वहीं, उस भूस्खलन के पास मर चुका था मालिक। जंगल एक बार जाग जाए… तो खाली हाथ नहीं लौटता। जिसे आप वाड़े में लाए… वह बहुरूपी था। वह आपके साथ गाड़ी में बैठकर अंदर आया। और आपने खुद उसे अपने घर, अपने कमरे में जगह दी।”
बापू के शब्द तपते लोहे की तरह मेरे कानों में घुस रहे थे।
मतलब… जिससे मैं गाड़ी में बात कर रहा था… जो मेरे साथ चाय बना रहा था… वह इंसान नहीं था?
“नहीं… नहीं… यह झूठ है!”
मैं सिर पकड़कर चीख पड़ा।
“मालिक, शांत रहिए!” बापू ने मेरे मुँह पर हाथ रख दिया। “वह सुन रहा है। वह यहीं बाहर है।”
मैंने साँस रोक ली।
देवघर के बाहर वाले गलियारे में अब गहरा सन्नाटा था। बारिश की आवाज़ भी जैसे थम गई थी।
और तभी… दरवाज़े की नीचे वाली दरार से… काला, घना धुआँ अंदर आने लगा। उसके साथ एक गंध आई। सड़े हुए मांस और जले बालों की गंध। इतनी तेज़ कि मेरा पेट मचल गया।
सर्रर्र…
सर्रर्र…
बाहर कोई अपने लंबे नाखूनों से ज़मीन खुरच रहा था।
“बापू…” मैं रोते हुए फुसफुसाया।
“चुप रहिए,” बापू ने देवघर का दीया बुझा दिया। अब पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया था।
“वह रोशनी की तरफ खिंचता है। अंधेरे में वह हमें नहीं देख पाएगा… बस उसे हमारी साँस नहीं सुननी चाहिए।”
हम दोनों उस घने अंधेरे में ज़मीन पर बैठे थे। बाहर खरोंचने की आवाज़ अब दरवाज़े पर चढ़ रही थी।
“मालिक…”
दरवाज़े के बाहर से आवाज़ आई।
वह बापू की आवाज़ थी!
लेकिन बापू तो मेरे पास बैठा था!
“मालिक… दरवाज़ा खोलिए। मैं बापू हूँ। मुझे अंदर आने दीजिए… बाहर बहुत अंधेरा है…”
मेरे पास बैठे बापू ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था। वह मुझे चुप रहने का इशारा कर रहा था।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
“बापू…” बाहर की आवाज़ अब बदल गई। वह दादाजी की बन गई।
“अरे बापू… मेरे पोते को मुझसे छिपा रहा है क्या? उसे मेरे पास भेज… मुझे उसकी याद आ रही है…”
फिर आवाज़ माँ की हो गई। फिर सखाराम की। वह लगातार आवाज़ें बदल रहा था। जैसे हमें पागल करना चाहता हो। मुझे लग रहा था मेरे कान फट जाएँगे।
घंटों हम वहीं बैठे रहे। धीरे-धीरे आवाज़ें बंद हो गईं। गंध भी कम हो गई।
(आदित्य पानी पीता है। उसका गला सूख चुका है। वह आपकी तरफ घूरकर देखता है।)
मैंने आपको पहले ही कहा था… कोंकण में सन्नाटे का भी एक ‘वज़न’ होता है। और जब वह सन्नाटा अचानक उतर आए… तो समझो मौत करीब है।
“क्या वह चला गया?”
मैंने बहुत देर बाद धीमे से पूछा।
बापू ने जवाब नहीं दिया।
“बापू?”
मैंने फिर फुसफुसाया।
अंधेरा इतना था कि मुझे अपना हाथ भी दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन बापू मेरे पास ही बैठा था। मैं उसका हाथ पकड़े हुए था। वही ठंडा, झुर्रीदार हाथ।
“बापू… क्या हम ऊपर अटारी पर चलें? वहाँ शायद ज्यादा सुरक्षित होगा,” मैंने कहा।
बापू ने मेरे हाथ को हल्के से दबाया। जैसे ‘हाँ’ कह रहा हो। लेकिन वह बोला नहीं।
मुझे अजीब लगा। बापू अभी तक लगातार मंत्र बुदबुदा रहा था। लेकिन पिछले आधे घंटे से उसने एक शब्द नहीं कहा था।
हम धीरे-धीरे उठे। मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। अंधेरे में वही मेरा सहारा था।
“बापू, तुम आगे चलो। मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा,” मैंने कहा।
उसने मेरा हाथ पकड़कर दरवाज़े की तरफ खींचा। उसने बिना आवाज़ किए दरवाज़ा खोला।
बाहर गलियारे में भयानक सन्नाटा था। बारिश थोड़ी कम हो गई थी।
हम दोनों सीढ़ियों की तरफ बढ़े। ऊपर अटारी की तरफ जाने वाली लकड़ी की सीढ़ियाँ।
बापू आगे चल रहा था। मैं उसका हाथ पकड़े पीछे था। उसके कदमों की कोई आवाज़ नहीं थी।
अचानक… आसमान में बिजली चमकी। सफेद रोशनी खिड़की से अंदर आई।
और उस एक पल की रोशनी में… मैंने दीवार पर बापू की परछाईं देखी।
(आदित्य का चेहरा डर से सफेद पड़ जाता है।)
वह परछाईं… बापू की नहीं थी।
वह सात फुट ऊँची थी। उसके हाथ घुटनों से नीचे लटक रहे थे… और उसका जबड़ा छाती तक खुला हुआ था।
मेरे पैर वहीं जम गए।
मैं जिस हाथ को पकड़े चल रहा था… वह अब मेरे हाथ से फिसल रहा था। मैंने नीचे देखा।
जिसे मैं बूढ़े बापू का हाथ समझ रहा था… वह काला था। और उसके नाखून अस्वाभाविक रूप से लंबे और नुकीले थे।
वह बापू था ही नहीं।
मेरे दिमाग में एक ही बात कौंधी— जब बापू ने दीया बुझाया था… तब… कुछ बदल गया था।
मैं पीछे हटने ही वाला था कि वह बर्फ जैसा ठंडा हाथ मेरे हाथ पर साँप की तरह कस गया।
और फिर… अंधेरे से… बिल्कुल मेरे कान के पास… एक आवाज़ फुसफुसाई।
वह आवाज़ माँ की नहीं थी। दादाजी की नहीं। सखाराम की भी नहीं।
वह एक छोटे बच्चे की आवाज़ थी… मेरी अपनी बचपन की आवाज़!
“कहाँ जा रहे हो आदित्य? चलो ना, लुका-छिपी खेलते हैं…”
और उसी पल…
देवघर के अंदर से… जहाँ से हम अभी-अभी बाहर निकले थे… बापू की असली, डरी हुई आवाज़ आई—
“मालिक! आप किसके साथ बाहर गए?! मालिक, मैं यहीं अंदर हूँ! दरवाज़ा खोलिए मालिक!!”
(आदित्य साँस रोककर कुर्सी पर पीछे गिर जाता है। उसकी आँखें आपकी तरफ टिकी हैं… लेकिन उनमें जीवन नहीं है।)
मैं… मैं किसका हाथ पकड़े हुए था?
और देवघर के अंदर कौन था?
मेरी कलाई पर वह बर्फ जैसी पकड़ अब मेरी हड्डियों में धँस रही थी… और मेरे सामने अंधेरे में वह सात फुट लंबी आकृति अब मेरी तरफ मुड़ रही थी…
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