बहुरूपी: कोंकण के जंगल का डरावना सच | भूतिया कहानी PART 2

(आदित्य अपने दाहिने हाथ की कलाई पर लगी शर्ट की बटन खोलता है और धीरे-धीरे बाजू ऊपर करता है। उसकी कलाई पर पाँच गहरे, काले पड़े निशान हैं। जैसे किसी ने गरम लोहे की सलाख से वहाँ दाग दिया हो। वह वे निशान आपको दिखाता है। उसके हाथ अब भी काँप रहे हैं।)

भूतिया कहानी

“देखिए… ये निशान देखिए। डॉक्टर कहते हैं कि यह किसी गंभीर स्किन इन्फेक्शन का मामला है। लेकिन उन्हें क्या पता? उन्हें क्या पता कि उस रात उस घने अंधेरे में मेरी कलाई को जिन उँगलियों ने जकड़ा था… वे इंसानी उँगलियाँ नहीं थीं। वे तो खुद मौत के बर्फ जैसे ठंडे फंदे थे।

भूतिया कहानी मेरे कानों में मेरे बचपन की वही आवाज़ गूंज रही थी…
‘कहाँ जा रहा है आदित्य? चल ना, लुका-छिपी खेलते हैं…’

और देवघर के बंद दरवाज़े के पीछे से असली बापू चीख रहे थे—
‘मालिक, मैं अंदर हूँ! दरवाज़ा खोलिए!’

मेरा दिमाग सुन्न हो चुका था। मैंने आखिर किसका हाथ पकड़ा हुआ था? मैं… मैं खुद मौत को अपने साथ लेकर चल रहा था। मेरी कलाई पर उसकी बर्फ जैसी पकड़ अब मेरी हड्डियों तक उतर चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि अभी मेरी कलाई टूट जाएगी।

मैंने झटके से पीछे देखा। अंधेरा इतना घना था कि मुझे उस आकृति का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसकी सफेद, मृत आँखें उस अंधेरे में भी चमक रही थीं। वे सीधे मुझे घूर रही थीं।

‘छोड़… छोड़ मुझे!!’
मैं किसी जानवर की तरह चिल्लाया।

मुझे नहीं पता मुझमें ताकत कहाँ से आई, लेकिन मैंने पूरी ताकत से अपना हाथ झटका।
चर्रर्र…

मेरी कलाई की चमड़ी उन नाखूनों में छिल गई। गर्म खून की एक धार मेरे हाथ से नीचे बह निकली। लेकिन मेरा हाथ छूट गया।

मैंने एक पल भी नहीं सोचा। मैं मुड़ा और सामने लकड़ी की सीढ़ियों की तरफ भागा। वे सीढ़ियाँ माळवद (अटारी) की ओर जाती थीं—वाड़े के सबसे ऊपरी, टाइलों वाली छत के नीचे बने अंधेरे हिस्से में।

मैं अंधेरे में लड़खड़ाता हुआ ऊपर चढ़ने लगा। पुरानी सागवान की लकड़ी की वे सीढ़ियाँ मेरे हर कदम पर ‘कर्रर्र… कर्रर्र…’ जैसी डरावनी आवाज़ कर रही थीं। बाहर छत पर बरसते बारिश के पानी की आवाज़ अब और भी भयानक लग रही थी।

किसी तरह मैं अटारी तक पहुँचा। वहाँ एक भारी लकड़ी का ट्रैपडोर था। मैंने उसे खींचकर बंद किया और पूरी ताकत से उस पर लगी जंग लगी लोहे की कुंडी चढ़ा दी।

(आदित्य एक गहरी साँस लेता है। वह कुर्सी पर थोड़ा आगे झुकता है। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही हैं।)

मैं उसी ट्रैपडोर पर गिर पड़ा। मेरी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी। कलाई से लगातार खून बह रहा था।

कोकण के पुराने वाड़ों की अटारियाँ अपने आप में एक अलग दुनिया होती हैं। वहाँ सदियों पुराना कबाड़, टूटी लकड़ी की पेटियाँ, जंग लगे तांबे-पीतल के बर्तन और पीढ़ियों से जमा धूल होती है। वहाँ की गंध…
चमगादड़ों की बीट, सड़ी लकड़ी और पुराने कागज़ों की सीलन भरी बदबू…
वह गंध मेरी नाक में भर गई थी।

बाहर बिजली कड़की, और एक पल के उजाले में मैंने पूरी अटारी देखी—सैकड़ों लकड़ी के खंभे, बीम और चारों तरफ फैला पुराना सामान।

मैं एक बड़ी पुरानी लकड़ी की पेटी के पीछे जाकर छिप गया। घुटनों को सीने से लगाकर मैंने खुद को जितना हो सके छोटा कर लिया। मैं साँस रोकने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि लगा उसकी आवाज़ नीचे तक सुनाई दे रही होगी।

और तभी…

मेरे बचपन की वही आवाज़ फिर सुनाई दी।
नीचे से…
सीढ़ियों की पहली पायदान से।

‘लुका-छिपी… कितना मज़ेदार खेल है ना आदित्य? मैं गिनती करता हूँ… तू छिप जा…’

मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। मेरी अपनी बचपन की आवाज़…
वह इतनी क्रूर और डरावनी कैसे लग सकती थी?

फिर उसने गिनना शुरू किया।

‘एक…’

खट्…
एक भारी कदम पहली सीढ़ी पर पड़ा।

‘दो…’

खट्…
दूसरा कदम।

वह ऊपर आ रहा था। बहुत धीरे-धीरे। हर अंक के साथ एक कदम। और उन कदमों के साथ एक और आवाज़ थी…
कुछ घसीटने की।
जैसे कोई भारी, गीली बोरी सीढ़ियों पर घसीटकर लाई जा रही हो।

‘तीन… आदित्य, अंधेरे में छिपने में मज़ा आता है ना?’

मैंने दोनों हाथों से अपने कान कसकर बंद कर लिए।
‘हे भगवान, मुझे बचा लो… मुझे यहाँ से निकाल दो…’
मैं मन ही मन रो रहा था।

‘चार…’

अचानक मुझे समझ आया वह घसीटने की आवाज़ किसकी थी।
कल रात मैं सखाराम को कार से वाड़े तक लाया था।
लेकिन बापू ने कहा था कि सखाराम तो कार में ही मर चुका था।
तो फिर…
ऊपर क्या घसीटकर लाया जा रहा था?

मेरे पेट में डर का एक भयानक गोला उठ गया।

‘पाँच… सखाराम भी खेलना चाहता है आदित्य… उसे नहीं खिलाओगे?’

(आदित्य की आवाज़ टूट जाती है। वह आँखें बंद कर लेता है। उसके होंठ काँप रहे हैं।)

नहीं…
मैं वह नहीं देखना चाहता था।
मैंने कान बंद कर रखे थे, फिर भी उसकी आवाज़ सीधे मेरे दिमाग में घुस रही थी।

‘छह… सात… आठ…’

वह और करीब आ रहा था।
बिल्कुल ट्रैपडोर के नीचे।

‘नौ…’

आवाज़ रुक गई।

कुछ सेकंड…
पूरा सन्नाटा छा गया।
जैसे बारिश भी थम गई हो।

और फिर…
ठीक ट्रैपडोर के नीचे से…
लकड़ी पर नाखून रगड़ने की आवाज़ आई—
सर्रर्र… सर्रर्र…

वह वहीं था।
मेरे और उसके बीच बस एक इंच मोटी लकड़ी की पट्टी थी।

‘दस… मैं आ रहा हूँ आदित्य… पकड़ने!’

धड़ाम!!

नीचे से ट्रैपडोर पर इतना ज़ोरदार वार हुआ कि पुरानी लोहे की कुंडी टेढ़ी हो गई। पूरी अटारी काँप उठी। छत की कुछ टाइलें टूटकर गिर गईं और बारिश का पानी अंदर आने लगा।

धड़ाम!!

दूसरा वार।
इस बार कुंडी का एक स्क्रू उखड़ गया। लकड़ी टूटने लगी।

मुझे पता था—
तीसरे वार में वह दरवाज़ा टूट जाएगा।
मैं मौत के दरवाज़े पर खड़ा था।

लेकिन तभी…
नीचे से एक भारी, कर्कश आवाज़ गूंजी—

‘ॐ भैरवाय नमः!! ॐ कालभैरवाय नमः!!’

वह बापू थे!
किसी तरह देवघर का दरवाज़ा खोलकर वे सीढ़ियों तक पहुँच गए थे।

बाहर फिर बिजली चमकी और दरार से मैंने देखा—
बापू के हाथ में एक बड़ी मशाल थी। उस पर कपूर जल रहा था। उसकी नीली-पीली लौ और कपूर की तीखी, पवित्र गंध पूरे वाड़े में फैल गई।

उस रोशनी में…
ट्रैपडोर के नीचे खड़ी उस चीज़ ने एक अमानवीय चीख मारी।

वह इंसान की नहीं थी।
जानवर की भी नहीं।
वह ऐसी थी जैसे हजारों मौतों की पीड़ा एक साथ चिल्ला उठी हो।

उस आवाज़ से अटारी की धूल हवा में उड़ गई।

मुझे नीचे लकड़ी की सीढ़ियों के जोर-जोर से हिलने की आवाज़ सुनाई दी।
वह बहुरूपी उस कपूर की अग्नि और भवानी मंत्र से पीछे हट गया था।
वह नीचे भाग गया था।

‘मालिक!!’
बापू चिल्लाए—
‘जल्दी दरवाज़ा खोलिए!’

मैंने काँपते हाथों से बची हुई कुंडी हटाई और ट्रैपडोर खोल दिया।

बापू ऊपर आए। उनके हाथ में जलती मशाल थी। चेहरा काला पड़ चुका था, पसीने से भीगा हुआ।

‘बापू…’
मैं उनके पैरों में गिरकर रोने लगा।
‘मुझे बचा लो बापू… मुझे यहाँ नहीं मरना…’

बापू ने मेरे कंधे पकड़कर मुझे खड़ा किया। उनकी आँखों में अब पहले वाली शांत मृत ठंडक नहीं थी। वहाँ एक भयानक सच था।

‘शांत हो जाइए मालिक। रोने का समय निकल चुका है,’
बापू की आवाज़ कठोर थी।
‘अब वह सिर्फ बाहर से नहीं बुलाएगा। अब वह पूरे वाड़े पर कब्ज़ा कर रहा है। भवानी का जंगल अब घर के अंदर घुस चुका है…’

“लेकिन क्यों बापू? मैंने क्या किया है? मेरे परिवार ने ऐसा क्या किया कि वह मेरी जान के पीछे पड़ गया?” मैंने काँपती आवाज़ में पूछा।

बापू ने मशाल की रोशनी एक पुरानी, विशाल लकड़ी की पेटी की ओर घुमाई। वह पेटी काले रंग की थी और उस पर अजीब, अनजान भाषा के चिन्ह बने हुए थे।

(आदित्य रुकता है। वह सीधे आपकी आँखों में देखता है। उसकी नज़र अब स्थिर है, लेकिन बेहद गंभीर।)

“आपके दादाजी ने आपको कभी नहीं बताया, है ना?” बापू बहुत धीरे बोले।
“देसाई वाड़े की दौलत… पुणे वाले फ्लैट्स… आपका कारोबार… यह सब कहाँ से आया? एक ही रात में देसाई खानदान इतना अमीर कैसे बन गया?”

मैं उलझ गया।
“दादाजी ने बहुत मेहनत—”

“मेहनत नहीं मालिक…”
बापू ने मेरी बात काट दी।
“खून। खून का सौदा।”

मशाल की लौ काँप रही थी। उस डरावनी खामोशी में बापू के शब्द बम की तरह फूट रहे थे।

“साठ साल पहले… कोकण में भयंकर अकाल पड़ा था। गाँव के लोग कीड़ों की तरह मर रहे थे। देसाई वाड़े में भी अनाज का एक दाना नहीं बचा था। आपके दादाजी… प्रतापराव देसाई… बहुत महत्वाकांक्षी आदमी थे। उन्हें गरीबी में जीना मंजूर नहीं था। इसलिए एक अमावस्या की रात… वे अकेले… भवानी के जंगल में गए।”

मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“उस जंगल के भीतर एक पुराना, शापित मंदिर है। वहाँ उन्होंने उस ‘बहुरूपी’ शक्ति को जगाया। वह शक्ति इंसान की लालच पर जीवित रहती है। प्रतापराव ने उससे दौलत माँगी… वाड़े की शान माँगी।”

“फिर… उस शक्ति ने बदले में क्या माँगा?”
मेरी आवाज़ मेरे ही गले में अटक गई।

“उसने आपके दादाजी का खून माँगा। लेकिन प्रतापराव चालाक थे। उन्होंने अपनी जान नहीं दी। उन्होंने वचन दिया… कि उनके खून का आख़िरी वारिस… हमेशा के लिए इस जंगल में रहेगा। वह इस जंगल का गुलाम बनेगा।”

(आदित्य आँखें कसकर बंद कर लेता है। उसके चेहरे पर गहरे मानसिक आघात के भाव हैं।)

“आख़िरी वारिस…”
मैं बुदबुदाया।
“पिता मर चुके… दादाजी भी… मेरा कोई भाई-बहन नहीं…
मतलब… मैं?”

“हाँ मालिक,”
बापू ने सिर हिलाया।
“आप। आपके दादाजी ने तंत्र-मंत्र से उस चीज़ को जंगल में बाँध रखा था। लेकिन उनके मरते ही वह बंधन टूट गया। और आप खुद चलकर यहाँ आ गए। अब उसे उसका बलिदान चाहिए। वह ‘बहुरूपी’ कोई भूत नहीं है… वह भवानी के जंगल की आत्मा है। वह जंगल जीवित है मालिक… और अब उसे भूख लगी है।”

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

यह कोई साधारण भूत नहीं था।
यह एक श्राप था।
मेरे ही खून से मेरे लिए खोदा गया गड्ढा।

“लेकिन बापू… हम कुछ कर सकते हैं ना? वह मारुति का अंगारा… यह कपूर—”

मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि…

पूरा माळवद अचानक ज़ोर से काँपने लगा। जैसे भूकंप आ गया हो। लकड़ी की बीमें आपस में घिसने लगीं। छत की सैकड़ों टाइलें टूटकर गिरने लगीं। बारिश का ठंडा पानी और रात का काला अंधेरा सीधे अंदर घुस आया।

लेकिन बारिश के साथ…
कुछ और भी अंदर आ रहा था।

“बापू… वो देखो!!”
मैं चीख पड़ा।

अटारी की दीवारों से…
पत्थरों की दरारों से…
मोटी काली जड़ें अंदर घुस रही थीं।

वे साँपों की तरह रेंग रही थीं।
जीवित थीं।

भवानी का जंगल…
वह सचमुच पूरे वाड़े को निगल रहा था।

वे जड़ें लकड़ी के फर्श को तोड़कर बाहर निकल रही थीं। पुरानी पेटियाँ फट रही थीं।

वाड़े की हर दीवार अब कराह रही थी।
दीवारों से लाल, कीचड़ मिला पानी बहने लगा था…
जैसे पूरा वाड़ा खून रो रहा हो।

“वह वाड़े को निगल रहा है मालिक!!”
बापू मशाल उठाकर चिल्लाए।
“उसे आप चाहिए! अगर हम यहीं रुके तो ये जड़ें हमें जिंदा खा जाएँगी!”

हम ट्रैपडोर की ओर भागे।
लेकिन देर हो चुकी थी।

नीचे जाने वाली लकड़ी की सीढ़ियाँ पूरी तरह उन काली जड़ों में लिपट चुकी थीं। अब वहाँ सीढ़ियाँ थीं ही नहीं…
बस जड़ों का एक अंधा, हिलता हुआ गड्ढा था।

और उस गड्ढे से…
सड़े मांस और जले बालों की वही बदबू आ रही थी।

हम फँस चुके थे।
ऊपर टूटती छत…
नीचे मौत का गड्ढा…

“अब क्या करें बापू?!”
मैं रो पड़ा।

बापू ने मशाल की रोशनी चारों तरफ घुमाई।
तभी उनकी नज़र उस बड़ी काली पेटी पर पड़ी।

वही पेटी…
प्रतापराव की पेटी।

उसका भारी लकड़ी का ढक्कन…
अपने आप…
धीरे-धीरे खुलने लगा।

कर्रर्रर्र…

उस पेटी के अंदर से काला धुआँ निकलने लगा।

(आदित्य की साँसें अब बहुत तेज़ चल रही हैं। वह कुर्सी की पकड़ फिर कस लेता है।)

वह धुआँ हवा में गायब नहीं हो रहा था।
वह आकार ले रहा था।

और फिर…

उस पेटी से वह बाहर आया।

आज भी जब मुझे वह दृश्य याद आता है, तो लगता है जैसे खून की उल्टी हो जाएगी।

वह कोई एक आकृति नहीं थी।

वह एक विशाल, घिनौना शरीर था…
जिसके एक नहीं…
दो नहीं…
चार चेहरे थे।

मेरी माँ का रोता चेहरा…
मेरे दादाजी का गुस्से वाला चेहरा…
सखाराम का टूटा जबड़ा…
और सबसे ऊपर…
मेरे बचपन का मासूम हँसता चेहरा।

वे सारे चेहरे एक सड़े हुए मांस के शरीर पर चिपके हुए थे।

उसके पैर जंगल की काली जड़ों से बने थे।

वह पेटी से बाहर निकला और उसकी ऊँचाई वाड़े की छत तक पहुँच गई।

उसके चारों चेहरों की सफेद, मरी हुई आँखें मेरी ओर घूर रही थीं।

और फिर…

चार अलग-अलग आवाज़ों में…
लेकिन एक साथ…
उसने कहा—

“समय आ गया है आदित्य…
घर लौट आने का…”

उसकी जड़ों जैसी बाँहें हमारी ओर झपटीं।

बापू ने अपने हाथ की जलती मशाल उस चीज़ की तरफ फेंक दी—

(आदित्य अचानक शांत हो जाता है। वह शून्य में देखने लगता है। उसकी आँखों में अब सिर्फ अंधेरा है। कहानी यहीं खत्म होती है।)

(आदित्य की साँसें जैसे रुक गई हों। वह अपने पसीने से भीगे चेहरे को पोंछता है। उसकी आँखें लगातार रोने से लाल हो चुकी हैं। वह एकटक आपकी ओर देखता रहता है, मानो खुद को यकीन दिलाना चाहता हो कि वह अभी सुरक्षित है।)

बापू ने वह जलती हुई कपूर की मशाल उस विशाल, चार चेहरों वाली आकृति पर दे मारी।

जैसे ही मशाल उस शरीर से टकराई, एक कान फाड़ देने वाली, अमानवीय चीख गूँज उठी। जैसे कोई पुराना, भीगा हुआ लकड़ी का लट्ठा आग में जलते समय “तड़-तड़” की आवाज़ करता है, वैसी ही आवाज़ उस शरीर से आने लगी। कपूर की नीली-पीली लपटें उस मांस और काली जड़ों से बने शरीर पर फैल गईं।

उस आकृति के चारों चेहरे—
माँ,
दादाजी,
सखाराम,
और मेरा अपना बचपन वाला चेहरा—
एक साथ दर्द से विकृत हो उठे और भयावह चीखें मारने लगे।

उन चीखों की गूँज से अटारी की बची-खुची टाइलें भी टूटकर गिर पड़ीं।

और उसी पल बापू ने मुझे पूरी ताकत से धक्का दिया।

“मालिक! भागिए! छत से नीचे कूद जाइए! अब पीछे मुड़कर मत देखिए!!”

बापू की आवाज़ आग और बारिश के शोर में भी साफ सुनाई दे रही थी।

मैं लड़खड़ाते हुए टूटी हुई छत की तरफ भागा। बारिश सीधे अटारी के अंदर बरस रही थी। मैं छत के किनारे पहुँचा और एक बार पीछे मुड़कर देखा।

(आदित्य के होंठ काँपने लगते हैं। वह आँखें कसकर बंद कर लेता है।)

वह दृश्य…
मैं मरते दम तक नहीं भूल पाऊँगा।

वह आग उस चीज़ को मार नहीं रही थी…
बस उसे और क्रोधित कर रही थी।

उन काली, रेंगती जड़ों ने बापू को चारों तरफ से जकड़ लिया था। बापू…
वह बूढ़ा, वफादार आदमी…
उसने एक बार भी मदद के लिए नहीं पुकारा।

उसने सिर्फ मेरी ओर देखा…
हाथ जोड़कर शांत स्वर में कहा—

“राम राम मालिक…”

अगले ही पल उस चार चेहरों वाली भयावह आकृति ने अपना सड़ा हुआ, लटकता जबड़ा खोला…
और बापू को जिंदा निगल गई।

बापू की हड्डियों के टूटने की “कड़ाक… कड़ाक…” आवाज़ बारिश के शोर को चीरती हुई मेरे कानों में पड़ी।

मेरे मुँह से एक चीख निकली…
लेकिन मैंने एक पल भी रुके बिना टूटी छत से नीचे, वाड़े के पीछे फैले अंधेरे में छलांग लगा दी।

मैं सीधे पीछे की बगिया के कीचड़ में जा गिरा। मेरा बायाँ कंधा बुरी तरह चोटिल हो गया, लेकिन उस समय मैं दर्द महसूस करने की हालत में भी नहीं था।

मैं उठा और आँखें बंद करके भागने लगा।
मुझे दिशा नहीं पता थी।
मैं बस उस वाड़े से दूर भागना चाहता था।

लेकिन…
मैं कहाँ भाग रहा था?

मैं सीधे “भवानी के जंगल” में घुस चुका था।

(आदित्य पानी पीने की कोशिश करता है, लेकिन इस बार गिलास मेज़ पर ही छोड़ देता है। वह कुर्सी पर थोड़ा पीछे खिसक जाता है।)

वह जंगल…
कोई साधारण जंगल नहीं था।
वह जीवित था।

जब मैं भाग रहा था, ज़मीन से निकली जड़ें साँपों की तरह मेरे पैरों में लिपट रही थीं। पेड़ों की शाखाएँ हाथों की तरह नीचे झुककर मुझे नोच रही थीं।

मेरे कपड़े फट चुके थे।
शरीर से खून बह रहा था।
लेकिन मैं रुका नहीं।

अंधेरा इतना घना था कि जैसे आँखों पर पट्टी बाँध दी गई हो।

और उस अंधेरे में…
मुझे आवाज़ें सुनाई देने लगीं।

“आदित्य… कहाँ भाग रहा है बेटा? इधर आ…”
“साहब… मुझे अकेला छोड़कर मत जाइए…”
“तू मेरे खून का वारिस है… तू मेरा है…”

वे आवाज़ें चारों ओर से आ रही थीं।
पत्तों की सरसराहट से…
बारिश की हवा से…

मैं कानों पर हाथ रखकर, कीचड़ में गिरता-पड़ता, रोता हुआ भाग रहा था।

मेरे जूते कब के छूट चुके थे।
काँटों ने मेरे पैरों की चमड़ी उधेड़ दी थी।

और मेरे पीछे…
वही आवाज़ आ रही थी—

खट्…
खट्…
सर्रर्र…

वह चीज़ मेरे बिल्कुल करीब थी।

उस सड़े हुए मांस की बदबू लगातार मेरी नाक में भर रही थी। मुझे लग रहा था कि अगले ही पल उसका ठंडा हाथ मेरे कंधे पर पड़ेगा और मुझे हमेशा के लिए उस अंधेरे में खींच ले जाएगा।

भागते-भागते अचानक मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन खत्म हो गई और मैं एक ढलान से नीचे लुढ़क गया। कीचड़, पत्थरों और काँटों के साथ मैं नीचे गिरता चला गया।

मेरा सिर एक बड़े पत्थर से टकराया…
और सब कुछ अंधेरा हो गया।

पता नहीं कितना समय बीता।

जब मेरी आँख खुली, तो बारिश का पानी मेरे चेहरे पर गिर रहा था। मैं किसी तरह उठकर बैठा। मेरे चारों तरफ लाल मिट्टी और पत्थरों के विशाल ढेर थे।

(आदित्य के चेहरे पर हल्की राहत दिखाई देती है।)

पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया।

फिर…
दूर मुझे ट्रक की हेडलाइट्स दिखाई दीं।

मैं भूस्खलन वाली जगह पर पहुँच चुका था!
वही जगह जहाँ पहाड़ टूटकर सड़क पर गिरा था।

मैं जंगल का पूरा चक्कर काटकर हाईवे की दूसरी तरफ आ गया था, जहाँ सड़क अब भी सही सलामत थी।

मैंने अपनी बची-खुची सारी ताकत लगाकर चीखा—

“बचाओ!! मुझे बचाओ!!”

ट्रक रुक गया।

उसमें से दो-तीन लोग नीचे उतरे। उन्होंने मुझे कीचड़ से बाहर निकाला। मैं खून और मिट्टी से लथपथ था। आधा मरा हुआ।

उन्होंने मुझे ट्रक में डाला…
और मैं बेहोश हो गया।

(आदित्य एक लंबी, गहरी साँस छोड़ता है। अब वह बेहद शांत होकर आपकी ओर देख रहा है। उसकी पहले वाली घबराहट पूरी तरह खत्म हो चुकी है।)

जब मुझे होश आया, मैं कोल्हापुर के एक सरकारी अस्पताल में था। घरवालों को बुला लिया गया था। मैंने उन्हें सब कुछ बताया।

पुलिस देसाई वाड़े की जाँच करने गई।

पता है उन्हें वहाँ क्या मिला?

कुछ भी नहीं।

वह वाड़ा…
वह दो सौ साल पुराना विशाल पत्थरों का महल…
वहाँ था ही नहीं।

वहाँ सिर्फ एक गहरा गड्ढा था…
जिसमें सैकड़ों साल पुरानी सड़ी लकड़ियाँ और पेड़ों की जड़ें उलझी हुई थीं।

जैसे जंगल ने पूरे वाड़े को निगल लिया हो।

सखाराम का कोई पता नहीं चला।
बापू का भी नहीं।
न गाड़ी मिली…
न वह काली पेटी।

वहाँ बस भवानी का काला जंगल खड़ा था…
पूरी तरह शांत।

(आदित्य अब आराम से कुर्सी पर पीछे टिक जाता है। वह अब बिल्कुल डरा हुआ नहीं लग रहा। लेकिन उसकी यह शांति… असहज कर देने वाली है।)

आज उस घटना को तीन महीने हो चुके हैं। मैं पुणे में, अपने सुरक्षित फ्लैट में हूँ। मैं मनोचिकित्सक के पास जाता हूँ। वे कहते हैं कि यह “पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर” है।

उनका कहना है—
भूस्खलन हुआ,
हम फँस गए,
सखाराम बह गया…
और सदमे में मेरे दिमाग ने यह सारी भूत-प्रेत वाली कहानी बना ली।

(आदित्य के चेहरे पर एक धीमी, अजीब मुस्कान उभरती है। वह मुस्कान इंसानी नहीं लगती।)

डॉक्टर बहुत समझदार होते हैं ना?
उन्हें लगता है कि हर चीज़ का जवाब विज्ञान के पास है।

लेकिन…
उन्हें कोकण की उन रातों के बारे में कुछ नहीं पता।

मैंने आपको अभी एक बात बताई थी…
याद है बापू ने क्या कहा था?

“वह बहुरूपी… इंसान की परछाई में जीता है। वह रूप बदलता है। और जब तक कोई उसे भीतर बुलाए नहीं… वह अंदर नहीं आ सकता।”

(आदित्य धीरे-धीरे अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाता है। जिस कलाई पर उसने आपको वे पाँच काले निशान दिखाए थे, वहाँ वह अब अपने नाखूनों से जोर-जोर से खुजलाने लगता है।)

इतना जोर से…
कि चमड़ी उधड़ने लगती है।

मैं उस जंगल से बाहर आ गया…
मुझे भी ऐसा ही लगा था।

मैं पुणे आया।
माँ से मिला।
उन्हें गले लगाया।

लेकिन…
जब मैंने उन्हें गले लगाया…

तो मुझे उनकी देह से माँ जैसी खुशबू नहीं आई।

मुझे वही गंध आई…
गीली मिट्टी की…
सड़ी लकड़ी की…
और जले हुए बालों की।

(आदित्य के नाखून अब उसकी कलाई के अंदर तक धँस चुके हैं। लेकिन वहाँ से खून नहीं निकल रहा…)

वहाँ से निकल रही है…
काली मिट्टी…
और लकड़ी का बुरादा।

आपकी साँस रुक जाती है।

मैं आपको यह सब क्यों बता रहा हूँ, जानते हैं?

क्योंकि वह बहुरूपी एक शरीर में ज्यादा समय तक नहीं रह सकता। उसे हमेशा नए शरीर चाहिए।
नई आत्माएँ।
नए दिमाग।

दादाजी ने जंगल से वादा किया था…
आखिरी वारिस जंगल का गुलाम बनेगा।

और वह वारिस…
वह आदित्य…
आज भी वहीं है।

उस अटारी में।
रो रहा है।
चीख रहा है।
उस चार चेहरों वाली आकृति के सामने।

वह कभी जंगल से बाहर आया ही नहीं।

(आदित्य अब बिल्कुल आपके करीब झुक आता है। उसकी आँखें…
जो अभी तक सामान्य लग रही थीं…
अब पूरी तरह सफेद, मृत हो चुकी हैं। उसका चेहरा राख जैसा धूसर पड़ गया है।)

उसकी आवाज़ अब आदित्य की नहीं रही।

वह कई आवाज़ों का मिला-जुला, भयानक स्वर बन चुकी है।

“मैं बाहर आया…
उसके शरीर से।
उसके रूप से।

लेकिन शहर में आने के बाद एक समस्या थी।

मैं सीधे किसी के मन में प्रवेश नहीं कर सकता।
मुझे किसी के निमंत्रण की ज़रूरत होती है।
किसी को मेरा अस्तित्व स्वीकार करना पड़ता है।

और इसलिए…
मैंने तुम्हें यह कहानी सुनाई।

तुमने इसे सुना।
तुमने मुझ पर विश्वास किया।
तुमने हर डर को अपने भीतर महसूस किया।

तुमने अपनी कल्पना में…
अपने ही मन में…
मुझे आकार दिया।”

(उसका जबड़ा अब अस्वाभाविक रूप से नीचे खिसकने लगता है। “कड़ाक… कड़ाक…” की आवाज़ आती है, जैसे जोड़ टूट रहे हों।)

वह सीधे आपकी आँखों में देखकर एक भयानक मुस्कान देता है।

“तुमने मुझे…
अपने मन के अंदर बुला लिया।”

अचानक…

आपके कमरे का एकमात्र बल्ब “फ्स्स…” की आवाज़ के साथ बुझ जाता है।

पूरा कमरा अंधेरे में डूब जाता है।

और उस गहरे अंधेरे में…
आपको अपने कान के पास एक ठंडी, सड़ी हुई साँस महसूस होती है।

फिर एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई देती है—

“लुका-छिपी खेलें…?”

(कहानी समाप्त।)

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