WRITER – VIVEK SHARMA
शहर से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर एक पुरानी कॉलोनी थी — शिवपुर लाइन। पहले वहां रेलवे कर्मचारियों के परिवार रहते थे। अब आधे मकान खाली पड़े थे। कई घरों की खिड़कियां टूटी हुई थीं, कुछ की दीवारों पर पेड़ उग आए थे। शाम के बाद वहां अजीब सा सन्नाटा फैल जाता था। ऐसा नहीं कि लोग बिल्कुल नहीं रहते थे… लेकिन हर कोई जल्दी दरवाजा बंद कर लेता था। रात में अगर कोई आवाज आती भी, तो लोग खिड़की खोलकर देखने की गलती नहीं करते थे।

कॉलोनी के आखिर में एक बड़ा पुराना मकान था। बाकी घरों से अलग। ऊंची boundary wall, जंग लगा gate और ऊपर टूटी balcony। उसके बाहर लगा नाम वाला पत्थर आधा टूट चुका था। सिर्फ एक शब्द बचा था — “…शी”
इसी वजह से लोग उसे “वहशी वाला घर” बोलने लगे थे।
Scary House Story Hindi राघव जब पहली बार उस कॉलोनी में आया, तब उसे ये सब बातें पता नहीं थीं। उसकी factory job नई लगी थी और रहने के लिए सस्ता कमरा चाहिए था। broker ने जल्दी-जल्दी उसे कमरा दिखाया और जाते-जाते बस इतना कहा, “रात में ज्यादा बाहर मत घूमना। यहां लोग जल्दी सो जाते हैं।” राघव हंस दिया। उसे लगा छोटा शहर है, लोग बेवजह डरपोक होंगे। वैसे भी उसे horror stories पर कभी भरोसा नहीं रहा। उसके हिसाब से हर डर के पीछे या तो अफवाह होती है या कोई इंसान।
पहली दो रातें बिल्कुल normal रहीं। लेकिन तीसरी रात करीब 2 बजे उसकी नींद एक अजीब आवाज से खुली।
ख्ररर…
जैसे कोई भारी चीज जमीन पर घसीट रहा हो।
पहले उसने सोचा ऊपर वाले कमरे से आवाज होगी। फिर दोबारा वही आवाज आई। इस बार थोड़ा लंबी। राघव उठकर खिड़की तक गया। बाहर गली में सिर्फ एक street light जल रही थी। उसकी पीली रोशनी सीधे उस पुराने मकान के gate पर पड़ रही थी।
Gate खुला हुआ था।
उसे पूरा याद था कि शाम को gate बंद था।
राघव कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा। तभी उसे लगा जैसे gate के अंदर कोई खड़ा है। बहुत लंबा आदमी। लेकिन अगले ही पल वह पीछे अंधेरे में चला गया। चेहरा दिखाई नहीं दिया। सिर्फ इतना महसूस हुआ कि वह चीज उसे देख रही थी।
सुबह उसने ये बात सामने वाली चाय की दुकान पर casually बता दी। दुकान पर बैठे दो आदमी अचानक चुप हो गए। बूढ़ा चायवाला कुछ देर तक kettle में चम्मच घुमाता रहा, फिर बोला, “उधर देखने की आदत मत डालो बेटा।”
“क्यों?” राघव हंसा।
बूढ़े ने सीधा जवाब नहीं दिया। उसने धीमी आवाज में पूछा, “रात में आवाज सुनी थी क्या?”
राघव का चेहरा थोड़ा serious हो गया।
पास बैठा एक दुबला आदमी बोला, “पहले जानवर गायब होते थे… अब लोग रास्ता बदल लेते हैं।”
“मतलब?” राघव ने पूछा।
“मतलब जो समझना है समझ लो,” आदमी तुरंत उठकर चला गया।
उस दिन के बाद राघव ने notice किया कि पूरी कॉलोनी उस घर का नाम लेने से बचती है। बच्चे उस तरफ खेलते नहीं थे। दूध वाला gate के सामने cycle धीमी नहीं करता था। यहां तक कि stray dogs भी उस गली में जाकर अचानक चुप हो जाते थे।
उस रात मौसम खराब था। हवा में नमी थी और बिजली बार-बार जा रही थी। करीब डेढ़ बजे पूरी कॉलोनी अंधेरे में डूब गई। राघव bed पर पड़ा phone चला रहा था तभी बाहर किसी कुत्ते के जोर से भौंकने की आवाज आई।
फिर अचानक भौंकना बंद।
पूरा सन्नाटा।
पता नहीं क्यों, राघव फिर खिड़की तक चला गया।
इस बार उसने साफ देखा।
पुराने मकान के बाहर एक काला कुत्ता खड़ा था। उसके सामने अंधेरे में कोई झुका हुआ था। पहले लगा कोई आदमी जमीन पर बैठा है। फिर वह चीज धीरे-धीरे सीधी खड़ी हुई।
बहुत लंबी।
असामान्य रूप से पतली।
और उसकी गर्दन… इंसानों की तरह सीधी नहीं थी।
राघव का गला सूख गया। वह चीज कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ी रही। फिर उसने धीरे-धीरे अपना सिर राघव की खिड़की की तरफ घुमाया।
Street light हल्की blink हुई।
बस एक सेकंड के लिए उसका चेहरा दिखाई दिया।
पीली आंखें।
और मुस्कुराहट।
Scary House Story Hindi
ऐसी मुस्कुराहट जो इंसानों में नहीं होती।
अगले ही पल वह चीज gate के अंदर गायब हो गई।
राघव पूरी रात नहीं सो पाया। सुबह तक उसने खुद को समझाने की कोशिश की कि शायद कोई बीमार आदमी होगा… कोई drug addict… कुछ भी। लेकिन अंदर कहीं उसे पता था कि उसने जो देखा, वो सामान्य नहीं था।
दो दिन बाद कॉलोनी में खबर फैली कि सामने वाले शर्मा जी का छोटा बछड़ा गायब हो गया है। रस्सी खुली मिली। जमीन पर घसीटने के निशान थे जो सीधे उसी पुराने मकान की दीवार तक जाते थे।
और वहीं खत्म हो जाते थे।
उस शाम पहली बार राघव को सच में डर महसूस हुआ।
लेकिन डर के साथ एक और चीज थी — curiosity।
वह बार-बार सोच रहा था कि आखिर अंदर है क्या?
उस रात करीब 12:40 पर उसने torch उठाई और चुपचाप कमरे से निकल गया। पूरी कॉलोनी सो रही थी। दूर कहीं पुराना fan चर्र-चर्र कर रहा था। बाकी सब शांत।
पुराने मकान का gate इस बार थोड़ा खुला था।
अंदर जाते ही बदबू आई। सीलन, धूल और किसी गीले जानवर जैसी गंध। floor पर मोटी धूल जमी थी लेकिन उस धूल पर बड़े-बड़े पैरों के निशान बने हुए थे। नंगे पैर… मगर इंसानी पैरों से काफी लंबे।
दीवारों पर गहरी खरोंचें थीं।
कुछ इतनी ऊंची कि वहां तक हाथ पहुंचना मुश्किल था।
राघव धीरे-धीरे hallway पार करता हुआ अंदर गया। उसकी torch की रोशनी एक पुराने कमरे पर पड़ी। अंदर टूटा हुआ furniture था, फर्श पर बिखरे कागज और दीवार पर टंगी एक family photo।
photo में आदमी का चेहरा नाखून से बुरी तरह घिसा गया था।
उसी वक्त ऊपर से कदमों की आवाज आई।
धड़…
धड़…
धीमी। भारी। जैसे कोई बहुत वजनदार चीज चल रही हो।
राघव जम गया।
फिर उसे साफ सुनाई दिया—
“राघव…”
उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
उसने तुरंत ऊपर torch मारी लेकिन सीढ़ियों पर कोई नहीं था।
तभी पीछे कहीं लकड़ी चरमराई।
Phone की light एक सेकंड के लिए blink हुई… और बंद।
पूरा अंधेरा।
उसी अंधेरे में उसे सांस लेने की आवाज सुनाई दी। बहुत करीब। गर्म। जानवर जैसी।
फिर उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—
“लोग मुझे वहशी कहते हैं…”
राघव चीखते हुए पीछे मुड़ा और लोहे की rod पूरी ताकत से घुमाई। किसी चीज से जोरदार टक्कर हुई। अगले ही पल ऐसी गुर्राहट गूंजी कि पूरा कमरा कांप गया।
Torch दोबारा जल उठी।
और इस बार उसने उसे साफ देखा।
लंबा दुबला शरीर।
झुकी हुई पीठ।
हाथ असामान्य रूप से लंबे।
चेहरा आधा इंसान… आधा कुछ और।
लेकिन सबसे डरावनी चीज उसकी आंखें नहीं थीं।
उसकी मुस्कुराहट थी।
वह चीज धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी।
राघव भागा।
सीढ़ियां उतरते वक्त वह फिसला, उसका कंधा दीवार से टकराया, लेकिन वह रुका नहीं। पीछे से घसीटने की आवाजें आ रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वह चीज दौड़ नहीं रही… रेंग रही है।
दरवाजे तक पहुंचकर राघव बाहर भागा।
और अचानक रुक गया।
बाहर कॉलोनी नहीं थी।
न street light।
न उसका कमरा।
न सड़क।
सामने धुंध थी… मिट्टी का रास्ता… और दूर लालटेन जैसी हल्की रोशनी।
उस धुंध में कई लोग खड़े थे।
कुछ पुराने कपड़ों में।
कुछ नए।
सब चुपचाप उसे देख रहे थे।
पीछे पुराने मकान का gate धीरे-धीरे बंद हुआ।
अंदर से वही आवाज आई—
“अब तू भी यहीं रहेगा…”
अगली सुबह लोगों ने राघव का कमरा अंदर से बंद पाया। उसका phone मेज पर रखा था। wallet, कपड़े, सब वहीं थे।
बस राघव नहीं था।
Phone की आखिरी recording में सिर्फ भारी सांसों की आवाज थी… और अंत में बहुत धीमी फुसफुसाहट—
“अगर वो gate खुला दिखे… अंदर मत जाना…”
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