Kamini Har Amavasya Ko Dikhati Hai | Horror Kahani Hindi

बरसों पहले मध्यप्रदेश के एक छोटे से गांव “बेलाखेड़ा” में एक लड़की रहती थी — कामिनी। गांव छोटा था, लेकिन उसके बारे में बातें बहुत बड़ी थीं। कुछ लोग कहते थे उसकी आंखें अजीब थीं। कुछ कहते थे कि वह रात में अकेले नदी किनारे चली जाती थी। और कुछ लोग दावा करते थे कि अमावस्या की रात उसे श्मशान के पास बैठे देखा गया था। लेकिन सच क्या था… ये कोई नहीं जानता था। क्योंकि कामिनी अचानक गायब हो गई थी। और उसके बाद गांव में जो शुरू हुआ… उसने बेलाखेड़ा का नाम हमेशा के लिए बदल दिया।

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साल 2021। बरसात का मौसम खत्म हो चुका था। Horror Kahani Hindi खेतों में हल्की ठंडी हवा चलती थी। रात जल्दी उतर आती थी और गांव के लोग सूर्य डूबते ही घरों में बंद हो जाते थे। राघव उसी गांव में अपने बूढ़े पिता के साथ रहता था। उसकी छोटी सी mobile repair shop थी। दिनभर फोन ठीक करना, recharge करना, tempered glass लगाना… यही उसकी जिंदगी थी। राघव practical आदमी था। उसे भूत-प्रेत की बातों पर कभी भरोसा नहीं रहा। लेकिन एक चीज उसे हमेशा परेशान करती थी। गांव के पुराने तालाब के पास बना वो टूटा हुआ घर। लोग कहते थे… वही कामिनी का घर था।

अब वहां कोई नहीं जाता था। दीवारों पर काई जम चुकी थी। खिड़कियां टूटी हुई थीं। छत का आधा हिस्सा गिर चुका था। लेकिन अजीब बात ये थी कि हर अमावस्या की रात उस घर में रोशनी दिखाई देती थी। और किसी लड़की के गाने की आवाज आती थी। धीमी… टूटी हुई… जैसे कोई बहुत दूर बैठा हो।

राघव हर बार ये बातें सुनकर हंस देता। लेकिन उस रात कुछ ऐसा हुआ… जिसने उसकी हंसी हमेशा के लिए छीन ली।

अक्टूबर की अमावस्या थी। रात करीब साढ़े दस बजे राघव अपनी दुकान बंद करके लौट रहा था। गांव की सड़क लगभग खाली थी। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर Unknown Number लिखा था। उसने कॉल उठाई। कुछ सेकंड तक सिर्फ हवा की आवाज आती रही। फिर बहुत धीमी आवाज सुनाई दी — “राघव…” उसका दिल हल्का सा धड़का। “कौन?” दूसरी तरफ कुछ पल चुप्पी रही। फिर वही आवाज आई — “मुझे घर छोड़ दोगे…?” आवाज लड़की की थी। बहुत कमजोर। जैसे कोई रोने के बाद बोल रहा हो।

राघव ने आसपास देखा। सड़क खाली थी। “कौन बोल रहा है?” इस बार सिर्फ हल्की हंसी सुनाई दी। और कॉल कट गई। राघव ने नंबर दोबारा मिलाने की कोशिश की। लेकिन स्क्रीन पर लिखा आया — Number Does Not Exist।

उसने खुद को समझाया कि शायद किसी ने मजाक किया होगा। लेकिन तभी उसकी नजर सड़क के दूसरी तरफ पड़ी। पुराने तालाब के पास… सफेद कपड़ों में एक लड़की खड़ी थी। बाल चेहरे पर बिखरे हुए। और वो बिल्कुल उसकी तरफ देख रही थी।

राघव कुछ सेकंड वहीं जम गया। फिर उसने सोचा शायद कोई गांव की लड़की होगी। वो धीरे-धीरे उसके पास गया। “कौन हो तुम?” लड़की ने सिर थोड़ा उठाया। उसका चेहरा बहुत फीका था। आंखों के नीचे काले निशान थे। “घर तक छोड़ दोगे?” उसने धीमी आवाज में पूछा।

राघव ने पीछे गांव की तरफ देखा। “इतनी रात में यहां क्या कर रही हो?” लेकिन लड़की ने जवाब नहीं दिया। बस तालाब के पीछे बने पुराने घर की तरफ इशारा कर दिया।

राघव का गला सूख गया। “वहां?” लड़की ने सिर हिलाया। हवा अचानक बहुत ठंडी हो गई। तालाब का पानी बिल्कुल शांत था। और तभी राघव को एहसास हुआ… लड़की के पैर मिट्टी पर नहीं थे। वो जमीन से कुछ इंच ऊपर खड़ी थी।

उसके हाथ से फोन लगभग गिर गया। वो पीछे हटने लगा। लेकिन लड़की मुस्कुराई। और वही मुस्कान देखकर राघव के शरीर में सिहरन दौड़ गई। क्योंकि गांव के पुराने मंदिर में लगी एक धुंधली तस्वीर में उसने यही चेहरा देखा था। कामिनी।

राघव पूरी रात सो नहीं पाया। सुबह उसने ये बात अपने पिता को बताई। लेकिन पिता का चेहरा सुनते ही उतर गया। “उस तरफ गया था तू?” उन्होंने घबराकर पूछा। “वो… लड़की थी वहां।” कुछ पल कमरे में चुप्पी रही। फिर उसके पिता धीरे से बोले — “आज के बाद अमावस्या की रात घर से बाहर मत निकलना।”

“लेकिन वो थी कौन?” उसके पिता ने खिड़की बंद कर दी। “कामिनी। वो मर चुकी है।”

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उस दिन पहली बार राघव ने गांव वालों से कामिनी के बारे में पूछना शुरू किया। लेकिन हर कोई बात टाल देता। कुछ लोग उसका नाम सुनते ही चुप हो जाते। एक बूढ़ी औरत ने तो सीधे उसके हाथ में ताबीज पकड़ा दिया। “अगर वो दिखे… तो उसकी आंखों में मत देखना।” “क्यों?” बूढ़ी औरत कांपती आवाज में बोली — “जो उसकी आंखों में देखता है… वो कुछ दिनों बाद गायब हो जाता है।”

शाम को राघव गांव के सबसे पुराने आदमी, हरिराम काका, के घर पहुंचा। काका लगभग अस्सी साल के थे। उन्होंने कामिनी का नाम सुनते ही लंबी सांस ली। “बहुत साल हो गए… लेकिन लोग आज भी उसे भूल नहीं पाए।” “क्या हुआ था उसके साथ?” काका कुछ देर चुप रहे। फिर बोले — “कामिनी अलग थी। बाकी लड़कियों जैसी नहीं। उसे रात पसंद थी। अमावस्या पसंद थी। वो घंटों तालाब के पास बैठी रहती थी।”

राघव ध्यान से सुनता रहा। “फिर एक रात गांव के तीन लड़के गायब हो गए। आखिरी बार उन्हें कामिनी के घर के पास देखा गया था। तीन दिन बाद उनमें से एक लड़का मिला… लेकिन जिंदा नहीं।” कमरे में सन्नाटा छा गया। “उसकी लाश तालाब में मिली थी। चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे मरने से पहले उसने कुछ बहुत डरावना देखा हो।”

“बाकी दो?” राघव ने पूछा। “कभी नहीं मिले,” काका धीरे से बोले। “उसके बाद गांव वालों ने कामिनी को दोषी मान लिया। उस रात लोग मशालें लेकर उसके घर पहुंचे। लेकिन अंदर कामिनी अकेली बैठी थी। सफेद कपड़े पहने। और मुस्कुरा रही थी।”

राघव की सांस भारी हो गई। “फिर?” हरिराम काका की आवाज धीमी हो गई। “लोगों ने उसे घसीटकर बाहर निकाला। वो सिर्फ एक बात बार-बार बोल रही थी — मैंने कुछ नहीं किया। लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। उसे तालाब के पास बने पुराने पीपल के पेड़ से बांध दिया गया… और जिंदा जला दिया।”

कमरे में कुछ सेकंड तक सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही। फिर काका बोले — “मरने से पहले उसने सिर्फ एक बात कही थी… हर अमावस्या को मैं लौटूंगी।”

उस रात फिर अमावस्या थी। राघव खुद को रोक नहीं पाया। वो आधी रात को तालाब की तरफ निकल गया। पूरा गांव अंधेरे में डूबा था। जैसे सबको पता हो कि बाहर नहीं निकलना चाहिए। तालाब के पास पहुंचते ही उसे वही गाना सुनाई दिया। धीमा… टूटा हुआ… हवा में तैरता हुआ।

पुराने घर की टूटी खिड़की के अंदर हल्की पीली रोशनी जल रही थी। राघव का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। लेकिन फिर भी वो अंदर चला गया। घर के अंदर धूल जमी थी। दीवारों पर अजीब निशान बने हुए थे। और कमरे के बीचोंबीच एक पुराना आईना रखा था। उस आईने पर किसी ने उंगलियों से लिखा था — “तुमने मुझे देखा था।”

राघव पीछे हटने लगा। तभी उसके पीछे दरवाजा अपने आप बंद हो गया। धड़ाम। पूरा कमरा कांप उठा। और फिर… आईने में किसी लड़की की परछाई दिखाई दी। कामिनी। वो धीरे-धीरे आईने के अंदर से बाहर आने लगी।

राघव की सांस अटक गई। उसका शरीर हिल नहीं रहा था। कामिनी उसके बिल्कुल सामने आकर रुक गई। उसकी आंखें पूरी काली थीं। लेकिन उनमें गुस्सा नहीं था। दर्द था।

“उन्होंने मुझे जिंदा जलाया…” उसने फुसफुसाकर कहा। कमरे का तापमान अचानक गिर गया। “मैंने किसी को नहीं मारा था।”

“तो वो लड़के…?” राघव ने कांपते हुए पूछा।

कामिनी की आंखों से काले आंसू बहने लगे। “तालाब के नीचे कुछ है।”

तभी बाहर से किसी के चीखने की आवाज आई। फिर कई लोगों के भागने की आवाजें। राघव दौड़कर बाहर आया। गांव के लोग तालाब के पास जमा थे। और तालाब का पानी… काला पड़ चुका था। उसमें से बुलबुले उठ रहे थे। जैसे नीचे कुछ सांस ले रहा हो।

तभी पानी के अंदर से एक हाथ बाहर निकला। सड़ा हुआ… लंबी उंगलियां… और फिर दूसरा हाथ। लोग चीखते हुए पीछे भागने लगे। कुछ ही सेकंड में पानी से एक काला इंसानी आकार बाहर निकला। उसका शरीर आधा जला हुआ था। आंखें पूरी सफेद। और चेहरे पर वही निशान थे… जो उन गायब लड़कों की लाश पर मिले थे।

हरिराम काका कांपते हुए बोले — “ये वही है… तालाब का आदमी।”

सालों पहले उस तालाब में एक तांत्रिक डूबकर मरा था। लोग कहते थे उसने मरने से पहले कई लोगों की बलि दी थी। और उसकी आत्मा तालाब में ही फंस गई थी। उसी ने उन लड़कों को मारा था। लेकिन गांव वालों ने बिना सच जाने कामिनी को दोषी मान लिया।

अब दोनों वापस लौट आए थे। तांत्रिक बदले के लिए। और कामिनी सच बताने के लिए।

उस रात बेलाखेड़ा गांव में कई घरों की लाइट अपने आप बंद हो गई। लोगों ने खिड़कियों पर किसी के हाथों के निशान देखे। कहीं बच्चों के रोने की आवाजें आईं। कहीं औरतों की चीखें। पूरा गांव डर से कांप रहा था।

राघव फिर तालाब के पास गया। कामिनी वहीं खड़ी थी। इस बार उसका चेहरा शांत था। “उसे वापस भेजना होगा,” उसने कहा। “कैसे?” “जिस जगह उसने लोगों की बलि दी थी… वहां आग जलानी होगी।”

राघव पानी में उतर गया। ठंडा पानी उसके सीने तक पहुंच गया। तालाब के बीच पहुंचते ही उसे पैरों के नीचे कुछ पत्थर जैसा महसूस हुआ। उसने हाथ डाला। नीचे लोहे का पुराना बक्सा था।

जैसे ही उसने उसे बाहर निकाला… तालाब का पानी अचानक उबलने लगा। काली आकृति चीखती हुई उसकी तरफ बढ़ी। राघव ने कांपते हाथों से बक्सा खोला। अंदर पुराने काले धागे… हड्डियां… और एक तस्वीर थी। तस्वीर में वही तांत्रिक खड़ा था। और उसके पीछे… कामिनी। जिंदा। डरी हुई।

तभी राघव समझ गया। कामिनी उस तांत्रिक की आखिरी बलि बनने वाली थी। लेकिन गांव वालों ने सच जानने से पहले उसे मार दिया।

राघव ने पूरा बक्सा आग में फेंक दिया। जैसे ही आग भड़की… तालाब से भयानक चीख उठी। काली आकृति तड़पने लगी। पानी लाल होने लगा। और फिर… सब शांत हो गया।

सुबह होने लगी थी। पहली बार कई सालों बाद बेलाखेड़ा में अमावस्या की रात बिना किसी मौत के खत्म हुई थी। राघव ने पीछे मुड़कर देखा। कामिनी पीपल के पेड़ के पास खड़ी थी। अब उसका चेहरा वैसा नहीं था। डरावना नहीं। बस थका हुआ।

“अब तुम जाओगी?” राघव ने पूछा।

कामिनी हल्का सा मुस्कुराई। “अब शायद मुझे कोई याद नहीं करेगा।”

धीरे-धीरे उसका शरीर धुंध में बदलने लगा। और कुछ ही सेकंड में… वो गायब हो गई।

आज भी बेलाखेड़ा गांव मौजूद है। तालाब भी वहीं है। लेकिन अब अमावस्या की रात वहां गाने की आवाज नहीं आती। पुराना घर धीरे-धीरे टूट चुका है। लोग कहते हैं कामिनी को आखिरकार शांति मिल गई।

लेकिन गांव के कुछ बूढ़े आज भी एक बात धीरे आवाज में कहते हैं — अगर किसी रात तालाब के पानी में अपना चेहरा देखने जाओ… और पीछे सफेद कपड़ों में कोई लड़की खड़ी दिख जाए… तो पलटकर मत देखना। क्योंकि हो सकता है… कामिनी अभी भी किसी को सच बताने का इंतजार कर रही हो।

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