Kabadi Bazaar Ka Shraapit Aaina | The Horror Story

BY GOVIND BHISE

मैंने उस आईने को खरीदने का फैसला सिर्फ इसलिए किया क्योंकि वह बाकी चीज़ों से अलग दिख रहा था। उस दिन रविवार था। शहर के पुराने हिस्से में लगने वाला कबाड़ी बाजार हमेशा से मुझे आकर्षित करता था। वहाँ ऐसी चीज़ें मिल जाती थीं जो किसी और जगह नहीं मिलतीं। पुराने रेडियो, घड़ियाँ, लकड़ी की अलमारियाँ, पीतल के बर्तन और कभी-कभी ऐसी वस्तुएँ जिनके बारे में कोई ठीक से बता भी नहीं पाता कि वे कहाँ से आई थीं।

मैं बस घूम रहा था। कुछ खरीदने का कोई इरादा नहीं था। The Horror Story

The Horror Story

फिर मेरी नजर उस आईने पर पड़ी।

वह लगभग छह फुट लंबा था। लकड़ी का गहरा भूरा फ्रेम, जिस पर अजीब नक्काशी बनी हुई थी। देखने में बहुत पुराना लग रहा था। उसके शीशे पर हल्की धुंधली परत थी, जैसे उसने वर्षों से सूरज की रोशनी न देखी हो।

दुकानदार ने मुझे उसे देखते हुए पकड़ लिया।

“ले जाओ साहब। बहुत सस्ता दूंगा।”

मैंने कीमत पूछी।

जो कीमत उसने बताई, वह उस आईने के हिसाब से बेहद कम थी।

मुझे थोड़ा अजीब लगा।

“इतना सस्ता क्यों?”

दुकानदार कुछ सेकंड चुप रहा।

फिर बोला, “बस जल्दी निकालना है।”

उसके चेहरे पर कुछ ऐसा था जो मुझे पसंद नहीं आया। लेकिन तब तक मैं आधा फैसला कर चुका था।

शाम तक वह आईना मेरे फ्लैट में पहुँच चुका था।

मैं अकेला रहता था।

शहर के किनारे एक पुरानी बिल्डिंग में मेरा दो कमरों का फ्लैट था। काम से लौटकर मैं अक्सर देर रात तक जागता था। इसलिए अकेलेपन की आदत पड़ चुकी थी।

आईना मैंने बेडरूम की दीवार के सामने रख दिया।

शुरुआत के दो दिन बिल्कुल सामान्य रहे।

तीसरे दिन पहली अजीब बात हुई।

सुबह तैयार होते समय मैं उसके सामने खड़ा था।

बाल ठीक कर रहा था।

तभी मुझे लगा कि मेरे प्रतिबिंब ने पलक झपकाने में एक सेकंड की देरी कर दी।

मैं तुरंत रुक गया।

फिर ध्यान से देखने लगा।

सब सामान्य था।

मैं खुद ही हंस पड़ा।

शायद नींद पूरी नहीं हुई थी।

लेकिन उस घटना के बाद मेरे दिमाग में एक छोटा-सा संदेह पैदा हो चुका था।

उस रात मैं देर तक लैपटॉप पर काम करता रहा।

करीब डेढ़ बजे जब पानी लेने उठा, तब कमरे की सारी लाइटें बंद थीं।

सिर्फ किचन की हल्की रोशनी आ रही थी।

बेडरूम के पास से गुजरते समय मेरी नजर आईने पर पड़ी।

और मैं वहीं रुक गया।

कुछ सेकंड के लिए मुझे लगा कि आईने में खड़ा मेरा प्रतिबिंब मुझे देख रहा है।

जबकि मैं खुद आईने की तरफ देख ही नहीं रहा था।

यह एहसास इतना अचानक था कि मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

मैंने फिर सीधे आईने की तरफ देखा।

सब सामान्य।

वही खाली कमरा।

वही अंधेरा।

मैंने खुद को समझाया कि दिमाग खेल खेल रहा है।

लेकिन अगले कुछ दिनों में ऐसी छोटी-छोटी घटनाएँ बढ़ने लगीं।

कभी ऐसा लगता कि प्रतिबिंब थोड़ा देर से हिल रहा है।

कभी ऐसा महसूस होता कि आईने में कमरा असली कमरे से थोड़ा ज्यादा अंधेरा दिखाई दे रहा है।

एक रात तो मुझे यकीन हो गया कि आईने में रखी कुर्सी अपनी जगह से कुछ इंच अलग थी।

मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

असली कुर्सी वहीं थी जहाँ हमेशा रहती थी।

उस रात पहली बार मुझे नींद नहीं आई।

अगले दिन ऑफिस में भी मेरा ध्यान भटका हुआ था।

मैं बार-बार उसी बारे में सोच रहा था।

शाम को घर लौटकर मैंने एक प्रयोग किया।

मोबाइल कैमरा ऑन किया।

आईने के सामने ट्राइपॉड पर रख दिया।

फिर रिकॉर्डिंग चालू कर दी।

करीब दस मिनट तक कमरे में इधर-उधर घूमता रहा।

जब वीडियो देखा तो कुछ भी असामान्य नहीं मिला।

मैंने राहत की सांस ली।

शायद मैं जरूरत से ज्यादा सोच रहा था।

लेकिन राहत ज्यादा देर नहीं चली।

क्योंकि उसी रात मुझे एक सपना आया।

मैं अपने ही कमरे में खड़ा था।

सामने वही आईना।

लेकिन इस बार उसमें मेरा प्रतिबिंब नहीं था।

वहाँ कोई दूसरा आदमी खड़ा था।

उसका चेहरा बिल्कुल मेरे जैसा था।

लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

वह मुस्कुरा रहा था।

धीरे-धीरे।

अस्वाभाविक तरीके से।

फिर उसने आईने के अंदर से हाथ उठाया और शीशे को भीतर से छू लिया।

अगले ही पल मैं नींद से जाग गया।

The Horror Story

दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि सांस लेना मुश्किल लग रहा था।

कमरे में अंधेरा था।

लेकिन आईना साफ दिखाई दे रहा था।

और कुछ सेकंड के लिए मुझे लगा कि वहाँ कोई खड़ा है।

मैंने तुरंत लाइट जला दी।

कमरा खाली था।

उसके बाद सपने रोज आने लगे।

हर रात।

हर बार थोड़ा अलग।

लेकिन वह आदमी हमेशा मौजूद रहता।

और हर सपने में वह आईने के थोड़ा और करीब आ जाता।

एक हफ्ते बाद मैं पूरी तरह परेशान हो चुका था।

मैंने इंटरनेट पर उस आईने जैसी नक्काशी खोजनी शुरू की।

कई घंटे खोजने के बाद मुझे एक पुरानी वेबसाइट मिली।

वहाँ कुछ तस्वीरें थीं।

नक्काशी लगभग वैसी ही थी।

साथ में एक लेख भी था।

लेख के अनुसार उन्नीसवीं सदी में कुछ क्षेत्रों में ऐसे आईने बनाए जाते थे जिन्हें आत्माओं से जुड़ी मान्यताओं के कारण विशेष माना जाता था।

मैं अंधविश्वासी नहीं था।

फिर भी पढ़ता रहा।

उसमें लिखा था कि कुछ आईनों के बारे में लोगों का विश्वास था कि वे केवल प्रतिबिंब नहीं दिखाते।

वे देखने वाले के भीतर छिपी चीज़ों को भी पकड़ लेते हैं।

मैंने ब्राउज़र बंद कर दिया।

लेकिन लेख दिमाग में घूमता रहा।

उस रात एक और घटना हुई।

मैं बाथरूम से वापस आ रहा था।

कमरे की लाइट बंद थी।

जैसे ही बेडरूम में प्रवेश किया, मुझे लगा कि कोई आदमी आईने के सामने खड़ा है।

मैं जम गया।

दिल की धड़कन रुकने जैसी हो गई।

फिर समझ आया कि वह मेरा ही प्रतिबिंब था।

लेकिन एक समस्या थी।

मैं अभी तक आईने के सामने पहुँचा ही नहीं था।

कुछ सेकंड तक वह आकृति वहीं खड़ी रही।

फिर अचानक गायब हो गई।

मैं भागकर कमरे से बाहर निकल गया।

पूरी रात हॉल में बैठा रहा।

सुबह होने का इंतजार करता रहा।

अब मामला सिर्फ डर का नहीं था।

मैं सच जानना चाहता था।

अगले दिन मैं फिर उसी कबाड़ी बाजार पहुँचा।

दुकानदार पहले तो मुझे देखकर असहज हो गया।

मैंने सीधे पूछा, “यह आईना कहाँ से आया था?”

वह चुप रहा।

मैंने दबाव डाला।

आखिरकार उसने बताया।

कुछ महीने पहले शहर के पुराने इलाके में एक हवेली तोड़ी गई थी।

उस हवेली से कई सामान निकले थे।

आईना भी वहीं से आया था।

“उस हवेली में क्या हुआ था?” मैंने पूछा।

दुकानदार ने जवाब देने से पहले चारों तरफ देखा।

फिर बोला, “लोग कहते हैं कि वहाँ एक आदमी रहता था जो खुद को घंटों आईने में देखता रहता था।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

वह आगे बोला।

“एक दिन वह गायब हो गया।”

“गायब?”

“हाँ। कमरा अंदर से बंद था। आदमी नहीं मिला। बस आईना मिला था।”

मेरे शरीर में ठंडक दौड़ गई।

दुकानदार ने तुरंत बात खत्म कर दी।

“साहब, मुझे कुछ नहीं पता। जो सुना वही बता दिया।”

मैं घर लौट आया।

लेकिन अब हर चीज़ पहले से ज्यादा भयावह लग रही थी।

उस रात मैंने फैसला किया कि आईना घर से निकाल दूँगा।

मैंने उसे उठाने की कोशिश की।

लेकिन वह असामान्य रूप से भारी लग रहा था।

जैसे किसी ने दूसरी तरफ से पकड़ रखा हो।

मैंने पूरी ताकत लगाई।

फिर भी वह मुश्किल से हिला।

तभी मुझे आईने के भीतर हलचल दिखाई दी।

एक पल के लिए।

बस एक पल।

लेकिन वह काफी था।

आईने में मेरा प्रतिबिंब मुझे नहीं देख रहा था।

वह कमरे के किसी दूसरे कोने में घूर रहा था।

मैंने तुरंत पीछे देखा।

वहाँ कुछ नहीं था।

जब दोबारा आईने की तरफ देखा तो प्रतिबिंब सामान्य हो चुका था।

उस रात मैं कमरे में नहीं गया।

सुबह होते ही मजदूर बुलाने का सोचा।

लेकिन सुबह आने से पहले सबसे भयानक घटना हुई।

करीब तीन बजे मेरी आँख खुली।

कमरे में पूरी खामोशी थी।

फिर मुझे आवाज सुनाई दी।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई कांच पर उंगली मार रहा हो।

मैं धीरे-धीरे उठा।

आवाज बेडरूम से आ रही थी।

हर टक के साथ मेरे अंदर बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

मैं दरवाजे तक पहुँचा।

अंदर अंधेरा था।

लेकिन आवाज जारी थी।

मैंने लाइट ऑन कर दी।

आवाज बंद हो गई।

कमरा खाली था।

लेकिन आईने पर कुछ लिखा हुआ था।

अंदर की तरफ से।

जैसे किसी ने शीशे के दूसरी ओर उंगली घुमाकर शब्द बनाए हों।

सिर्फ तीन शब्द।

“मुझे बाहर आने दो।”

मेरे हाथ काँपने लगे।

मैं पीछे हट गया।

कुछ सेकंड बाद शब्द धीरे-धीरे गायब होने लगे।

जैसे भाप मिट रही हो।

मैंने उसी समय फैसला कर लिया।

सुबह होते ही आईना तोड़ दूँगा।

लेकिन सुबह का इंतजार करने का मौका नहीं मिला।

क्योंकि उसी रात बिजली चली गई।

पूरा फ्लैट अंधेरे में डूब गया।

मैंने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की।

और तभी बेडरूम से किसी के चलने की आवाज आई।

धीरे।

भारी कदम।

जैसे कोई नंगे पैर फर्श पर चल रहा हो।

मेरे शरीर ने मानो काम करना बंद कर दिया।

मैं सुनता रहा।

कदमों की आवाज करीब आती गई।

फिर अचानक रुक गई।

बेडरूम के दरवाजे पर।

मैंने काँपते हाथ से फ्लैशलाइट उस दिशा में घुमाई।

वहाँ कोई नहीं था।

लेकिन आईने की तरफ रोशनी पड़ते ही मेरा खून जम गया।

आईने के अंदर एक आदमी खड़ा था।

वही चेहरा।

वही काली आँखें।

वही मुस्कान।

वह धीरे-धीरे शीशे की सतह के करीब आ रहा था।

जैसे कोई पानी के नीचे से ऊपर आ रहा हो।

मैं चीखते हुए पीछे हट गया।

मोबाइल हाथ से गिर गया।

अंधेरा छा गया।

और उसी अंधेरे में मुझे साफ सुनाई दिया—

“अब मेरी बारी है।”

आवाज मेरी अपनी थी।

बिल्कुल मेरी।

जब होश आया तो सुबह हो चुकी थी।

मैं हॉल के फर्श पर पड़ा था।

सिर में दर्द था।

कुछ देर तक समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ था।

फिर नजर बेडरूम की तरफ गई।

आईना अभी भी वहीं था।

लेकिन कुछ अलग था।

बहुत अलग।

मैं धीरे-धीरे उसके पास गया।

और जैसे ही सामने खड़ा हुआ, मेरी सांस अटक गई।

आईना अब मेरा प्रतिबिंब नहीं दिखा रहा था।

उसमें वही आदमी खड़ा था।

काली आँखों वाला।

और वह मुस्कुरा रहा था।

जबकि मैं नहीं।

उसने धीरे-धीरे हाथ उठाया।

मैंने हाथ नहीं उठाया।

फिर उसने शीशे पर हथेली रख दी।

दूसरी तरफ से।

उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि मैं क्या देख रहा हूँ।

मैं बाहर नहीं था।

मैं अंदर था।

अचानक मेरे चारों ओर की दुनिया धुंधली होने लगी।

कमरा दूर जाता हुआ महसूस हुआ।

जैसे मैं किसी गहरे कुएँ में गिर रहा हूँ।

और उस गिरते हुए पल में मैंने आखिरी बार देखा—

वह आदमी मेरे शरीर के साथ कमरे से बाहर जा रहा था।

मेरी चाल में।

मेरे चेहरे के साथ।

मेरी जिंदगी लेकर।

अब मुझे नहीं पता कितना समय बीत चुका है।

दिन।

महीने।

या साल।

यहाँ समय अलग चलता है।

मैं अभी भी उसी आईने के भीतर हूँ।

दूसरी तरफ।

कभी-कभी लोग उस आईने के सामने आकर खड़े होते हैं।

वे अपने बाल ठीक करते हैं।

कपड़े देखते हैं।

मुस्कुराते हैं।

और फिर चले जाते हैं।

उन्हें पता भी नहीं चलता कि मैं उन्हें देख रहा हूँ।

लेकिन हाल ही में एक बात बदली है।

कल पहली बार मैंने देखा कि एक नया आदमी आईने को खरीदकर अपने घर ले गया।

वह उसे बहुत पसंद कर रहा था।

ठीक वैसे ही जैसे कभी मैंने किया था।

और जब उसने पहली बार उसके सामने खड़े होकर खुद को देखा…

मैं मुस्कुरा दिया।

क्योंकि इस बार मेरी बारी खत्म होने वाली है।

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