Uski Parchai Usse Pehle Chalne Lag | गाँव की सबसे डरावनी हिंदी हॉरर स्टोरी

सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था, लेकिन पहाड़ियों से घिरे छोटे-से गांव कचनापुर में लोगों की दिनचर्या शुरू हो चुकी थी। कहीं बैलों की घंटियां बज रही थीं, कहीं आंगनों में झाड़ू लग रही थी और कहीं चूल्हों से उठता धुआं हवा में घुल रहा था। गांव अब पहले जैसा बिल्कुल नहीं रहा था। पक्की सड़क बन चुकी थी, हर घर में बिजली थी और मोबाइल टावर लगने के बाद इंटरनेट भी ठीक-ठाक चलने लगा था। फिर भी कुछ बातें ऐसी थीं जो समय के साथ नहीं बदली थीं। गांव के लोग आज भी सूरज ढलने के बाद कुछ रास्तों से बचकर निकलते थे, कुछ पेड़ों के नीचे बैठने से मना करते थे और कुछ सवालों का जवाब मुस्कुराकर टाल देते थे। Uski Parchai Usse Pehle Chalne Lag

Uski Parchai Usse Pehle Chalne Lag

अमित देशमुख इसी गांव में पहली बार आया था। उम्र लगभग पैंतीस साल। पेशे से वह भू-अभिलेख सर्वेक्षक था। उसकी टीम अलग-अलग जिलों में जाकर पुराने खेतों, रास्तों और सरकारी जमीनों का डिजिटल सर्वे करती थी ताकि नए नक्शे तैयार किए जा सकें। इस बार उसे अकेले कचनापुर भेजा गया था, क्योंकि यहां का काम केवल तीन-चार दिनों का था। गांव में रुकने के लिए उसे पंचायत भवन के पीछे बने एक छोटे सरकारी विश्राम गृह की चाबी मिल गई थी। कमरा साधारण था, लेकिन साफ था। उसे लगा, कुछ दिन आराम से निकल जाएंगे।

पहले दिन उसने गांव के कई खेत नापे, पुराने पत्थर के सीमांकन देखे और अपने टैबलेट में सारे निर्देशांक दर्ज करता रहा। गांव वाले उसे उत्सुकता से देखते थे। बच्चों को उसके उपकरण किसी फिल्म की मशीन जैसे लगते थे। शाम तक लगभग आधा काम पूरा हो चुका था।

रात को खाना खाने के बाद अमित बरामदे में बैठा मोबाइल देख रहा था। बिजली बार-बार जा रही थी, इसलिए उसने टॉर्च जलाकर अपने कागज़ व्यवस्थित करने शुरू कर दिए। तभी उसकी नजर सामने की दीवार पर पड़ी।

टॉर्च उसके दाहिने हाथ में थी।

लेकिन दीवार पर बनी उसकी परछाईं का हाथ धीरे-धीरे नीचे हो रहा था।

अमित ने तुरंत अपना हाथ देखा।

उसका हाथ बिल्कुल स्थिर था।

दीवार पर परछाईं का हाथ एक पल के लिए और नीचे गया… फिर वापस उसी जगह आ गया।

उसने झटके से टॉर्च बंद कर दी।

कुछ सेकंड तक वह बिना हिले बैठा रहा। फिर खुद ही हल्का-सा हंस पड़ा।

“शायद दो अलग-अलग रोशनी पड़ रही होंगी…”

उसने दोबारा टॉर्च जलाई।

इस बार सब सामान्य था।

उसने उस बात को थकान समझकर वहीं छोड़ दिया।

अगली सुबह वह गांव के पश्चिमी हिस्से की ओर निकला। वहां एक पुराना रास्ता था जिसे सरकारी रिकॉर्ड में सार्वजनिक मार्ग बताया गया था, लेकिन गांव वाले उसे निजी खेत बताते थे। इसी विवाद का निपटारा करने के लिए सर्वे जरूरी था।

सारा दिन काम करते-करते दोपहर हो गई। तेज धूप में चलते हुए अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके आगे जमीन पर उसकी परछाईं दिखाई दे रही है।

यह सामान्य बात थी।

लेकिन अगले ही पल उसने कदम रोक दिए।

परछाईं नहीं रुकी।

वह लगभग दो कदम और आगे चली गई।

अमित का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया।

उसने तुरंत अपनी आंखें मल लीं।

परछाईं फिर वहीं थी… बिल्कुल उसके पैरों के नीचे।

उसने चारों ओर देखा।

खेत में काम कर रहे दो मजदूर अपनी ही दुनिया में व्यस्त थे।

किसी ने कुछ नहीं देखा था।

उसने खुद को समझाया कि शायद तेज धूप और लगातार स्क्रीन देखने से आंखों का भ्रम हुआ होगा।

लेकिन उस दिन के बाद उसने एक आदत बदल दी।

जब भी वह चलता, उसकी नजर अनजाने में पहले अपनी परछाईं पर जाती।

तीसरे दिन गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, भाऊ काका, उससे मिलने आए। वे बिना किसी काम के काफी देर तक उसके सर्वे उपकरण देखते रहे। फिर अचानक बोले,

“बेटा… यहां कितने दिन रुकना है?”

“बस दो दिन और।”

“काम पूरा होते ही चले जाना।”

अमित मुस्कुराया।

“इतनी जल्दी भगा क्यों रहे हैं?”

भाऊ काका ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा,

“कल दोपहर तुम पश्चिम वाले खेत में गए थे?”

अमित चौंक गया।

“हां… गया था।”

“वापस आते समय पीछे मुड़कर देखा था?”

“क्यों?”

भाऊ काका कुछ क्षण चुप रहे। फिर धीरे से बोले,

“अगर आगे कभी दोपहर में वहां जाना… तो अपनी परछाईं पर नजर मत रखना।”

अमित के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।

“आपको कैसे पता कि…”

वह वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया।

भाऊ काका उठे, अपनी लाठी संभाली और बिना पीछे देखे धीरे-धीरे चलते हुए चले गए।

अमित बरामदे में काफी देर तक बैठा रहा।

उसने गांव में किसी से भी अपनी परछाईं वाली बात नहीं कही थी।

फिर भाऊ काका ने ऐसा क्यों कहा?

उस रात उसने तय किया कि अब वह इस बात को अंधविश्वास मानकर नहीं टालेगा। अगर सच में कुछ अजीब हो रहा है, तो वह उसे अपने कैमरे में रिकॉर्ड करेगा। उसे पूरा भरोसा था कि कैमरा वह दिखा देगा जो आंखें नहीं दिखा पातीं… या फिर साबित कर देगा कि यह सब केवल उसके दिमाग का खेल है।

उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि अगले दिन कैमरा जिस चीज़ को रिकॉर्ड करेगा, उसे देखने के बाद वह अपनी ही परछाईं से नज़रें मिलाने की हिम्मत खो देगा।

अगली सुबह अमित सूरज निकलने से पहले ही तैयार हो गया। उसने अपने बैग से हाई-रेज़ोल्यूशन कैमरा निकाला, उसे एक छोटे ट्राइपॉड पर लगाया और रिकॉर्डिंग चालू कर दी। उसका इरादा साफ था। अगर सचमुच उसकी परछाईं उससे पहले चलती है, तो कैमरा उसे रिकॉर्ड कर लेगा। अगर नहीं, तो यह साबित हो जाएगा कि पिछले दो दिनों से उसका दिमाग लगातार काम और थकान की वजह से भ्रम पैदा कर रहा था।

वह उसी पश्चिम वाले रास्ते पर पहुंचा जहां पिछले दिन उसे पहली बार अजीब अनुभव हुआ था। धूप धीरे-धीरे तेज हो रही थी। उसने कैमरा अपनी ओर करके कुछ कदम चलना शुरू किया। पहली रिकॉर्डिंग में सब सामान्य दिखाई दिया। दूसरी में भी कुछ नहीं था। तीसरी रिकॉर्डिंग के दौरान उसने जानबूझकर कई बार रुककर अपनी परछाईं देखी। हर बार वह सामान्य थी। अमित के चेहरे पर राहत आ गई। उसे लगा कि शायद वह बेवजह डर गया था।

लेकिन लौटते समय उसने कैमरा बंद नहीं किया।

गांव से लगभग आधा किलोमीटर पहले उसे अचानक महसूस हुआ कि आसपास का वातावरण असामान्य रूप से शांत हो गया है। पक्षियों की आवाज़ें बंद थीं। हवा चल रही थी, लेकिन पेड़ों की पत्तियां स्थिर थीं। उसने सहज रूप से नीचे देखा।

Uski Parchai Usse Pehle Chalne Lag

उसकी परछाईं उसके पैरों से लगभग तीन कदम आगे खड़ी थी।

चल नहीं रही थी।

बस… खड़ी थी।

और फिर उसने अपना सिर धीरे-धीरे उसकी तरफ घुमाया।

अमित के शरीर में जैसे खून जम गया। उसने ऊपर देखा। सामने कोई नहीं था। नीचे देखा तो परछाईं फिर सामान्य जगह पर थी।

उसने बिना पीछे देखे तेज़ कदमों से गांव की ओर चलना शुरू कर दिया।

विश्राम गृह पहुंचते ही उसने कैमरा लैपटॉप से जोड़ा।

रिकॉर्डिंग बिल्कुल सामान्य शुरू हुई। फिर वही क्षण आया, जब उसने परछाईं को आगे खड़ा देखा था।

वीडियो में अमित लगातार चल रहा था।

लेकिन उसकी परछाईं दो सेकंड पहले ही रुक गई थी।

अमित का शरीर अभी भी आगे बढ़ रहा था, जबकि जमीन पर बनी काली आकृति बिल्कुल स्थिर थी। उसके बाद वीडियो में परछाईं ने धीरे-धीरे अपना सिर कैमरे की तरफ उठाया।

अगले ही फ्रेम में पूरी स्क्रीन कुछ पल के लिए काली हो गई।

रिकॉर्डिंग अपने आप बंद हो गई।

अमित कई मिनट तक स्क्रीन को देखता रहा। उसे पहली बार एहसास हुआ कि यह कोई भ्रम नहीं था।

उसी शाम वह भाऊ काका के घर पहुंच गया।

बूढ़े ने उसकी बात पूरी होने तक एक शब्द नहीं कहा। फिर अंदर से लकड़ी का पुराना डिब्बा लाकर उसके सामने रख दिया। डिब्बे में कई पीली पड़ चुकी तस्वीरें थीं।

पहली तस्वीर लगभग पचास साल पुरानी थी।

उसमें गांव के पांच आदमी खड़े थे।

उनमें से एक की परछाईं बाकी चार लोगों से अलग दिशा में पड़ रही थी।

दूसरी तस्वीर में वही आदमी अकेला था।

इस बार उसकी परछाईं तस्वीर के किनारे से बाहर जाती हुई दिखाई दे रही थी।

तीसरी तस्वीर में केवल खेत था।

आदमी गायब था।

लेकिन उसकी परछाईं अब भी जमीन पर मौजूद थी।

अमित ने तस्वीरें कांपते हाथों से नीचे रख दीं।

“ये कौन था?”

भाऊ काका ने धीमे स्वर में कहा,

“नाम था… हरिनारायण। गांव का नाप-जोख करने वाला। सरकार ने उसे यहां नई सीमाएं तय करने भेजा था।”

अमित का गला सूख गया।

“उसके साथ क्या हुआ?”

“किसी को नहीं पता। एक दिन लोग उसे खोजते रहे। खेत में उसके जूते मिले, औज़ार मिले… लेकिन आदमी नहीं मिला। बस उसकी परछाईं आख़िरी बार कई लोगों ने देखी थी।”

“परछाईं?”

“हाँ… बिना आदमी के।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

भाऊ काका ने पहली बार अमित की आंखों में सीधे देखते हुए कहा,

“इस गांव में जमीन की नाप बदल सकती है… लेकिन कुछ ज़मीनें किसी इंसान की नहीं होतीं। जो उन्हें अपनी रेखाओं में बाँधने की कोशिश करता है… उसकी परछाईं पहले उससे अलग होती है। फिर एक दिन आदमी भी।”

अमित ने उसी रात गांव छोड़ने का फैसला कर लिया।

उसने अपना सामान जीप में रखा और बिना किसी को बताए निकल पड़ा।

गांव की सीमा पार करते ही उसने राहत की सांस ली।

उसे लगा सब खत्म हो गया।

करीब दो घंटे बाद वह शहर पहुंचा। एक ढाबे पर चाय पीने के लिए रुका। हाथ धोने वह वॉशरूम में गया। सामने लगे लंबे शीशे में उसने खुद को देखा।

सब सामान्य था।

लेकिन जैसे ही उसने नल बंद किया, शीशे में उसकी परछाईं एक पल तक वहीं खड़ी रही।

असल अमित मुड़ चुका था।

उसकी सांस अटक गई।

उसने तुरंत पलटकर शीशे की ओर देखा।

अब सब सामान्य था।

उस रात वह अपने घर नहीं गया। सीधे विभागीय कार्यालय पहुंचा और पूरी घटना किसी को बताए बिना सर्वे रिपोर्ट जमा कर दी। उसने केवल इतना लिखा कि “क्षेत्र का सर्वे अधूरा है। आगे का कार्य किसी अन्य टीम को सौंपा जाए।”

कुछ दिनों तक सब शांत रहा।

फिर एक सुबह उसके विभाग में खबर आई।

कचनापुर में नई सर्वे टीम भेजी गई थी।

चार लोग गए थे।

तीन लौट आए।

चौथे अधिकारी के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चला।

अमित ने बिना कुछ कहे अपने कंप्यूटर पर उस टीम की समूह फोटो खोली, जो रवाना होने से पहले खींची गई थी।

चारों अधिकारी कैमरे की तरफ देख रहे थे।

लेकिन चौथे अधिकारी की परछाईं…

बाकी तीनों से दो कदम आगे खड़ी थी।

उसके बाद अमित ने कभी किसी गांव का सर्वे नहीं किया।

उसने नौकरी नहीं छोड़ी, लेकिन हमेशा केवल दफ्तर का काम चुना। वर्षों बाद भी जब कभी दोपहर की तेज धूप में चलते हुए उसकी नजर जमीन पर पड़ती, वह अपनी परछाईं को देखने की हिम्मत नहीं करता था।

क्योंकि उसे अब भी यकीन था कि अगर उसने एक बार भी उसे गौर से देख लिया…

तो इस बार वह केवल उससे आगे नहीं चलेगी।

वह मुड़कर उसका इंतज़ार करेगी।

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