मृत्यु की गंध हमेशा सड़ांध जैसी नहीं होती। कभी-कभी वह चंदन जैसी साफ, हल्दी जैसी घरेलू और गर्म दूध जैसी शांत लगती है। नरेश तांबे ने यह बात अपने पेशे में बहुत देर से समझी थी। वह पिछले अठारह साल से अंतिम संस्कारों में लगने वाली सामग्री तैयार करता था—कफन का कपड़ा नापना, सूखी लकड़ियों के छोटे गट्ठर बनाना, तिल, जौ, कुश, मिट्टी के छोटे पात्र, सफेद धागा, लाल कपड़ा, घी की डिब्बी, कपूर, फूल, और वे छोटी-छोटी चीजें जिनका नाम घर के लोग दुःख में भूल जाते हैं लेकिन रस्म के बीच अचानक याद आती हैं। लोग उसे दुकानदार कहते थे, पर नरेश जानता था कि उसका काम केवल सामान बेचना नहीं था। वह उन घरों में चुपचाप खड़ा रहता था जहां रोने की आवाज़ भी थक चुकी होती थी। वह जानता था किस वक्त बोलना है, किस वक्त चुप रहना है, किस रिश्तेदार को पानी देना है और किस बेटे को सिर्फ इतना कहना है कि “धीरे करो, समय है।” Maran Kriya Real Horror Story

उस दिन दोपहर में धूप बहुत सफेद थी। सड़क पर कोई खास भीड़ नहीं थी और हवा में राख नहीं, बल्कि सूखे फूलों की गंध थी। नरेश अपनी छोटी दुकान के भीतर बैठा सूती कपड़े के टुकड़े बराबर कर रहा था। सामने पीतल की पुरानी घंटी लटकी थी जो दरवाज़ा खुलते ही बजती थी। घंटी बजी, मगर दरवाज़ा आधा ही खुला। अंदर एक औरत आई, उम्र चालीस से ऊपर होगी, चेहरा थका हुआ लेकिन रोया हुआ नहीं। उसने नरेश को देखकर नमस्ते भी नहीं की। बस अपने आँचल में लिपटा हुआ एक छोटा-सा कागज निकाला और लकड़ी के काउंटर पर रख दिया।
“ये सब चाहिए,” उसने धीमे स्वर में कहा।
नरेश ने कागज उठाया। लिखावट बहुत साफ थी, जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में नहीं, सोच-समझकर हर शब्द लिखा हो। सूची में सामान्य चीजें थीं, फिर अचानक बीच में एक शब्द लिखा था—मरण क्रिया।
नरेश ने पहली बार सिर उठाकर उसे देखा। “किसका देहांत हुआ है?”
औरत ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसकी आँखें दुकान के भीतर रखे सामान पर घूम रही थीं, जैसे वह देख रही हो कि यहां कौन-सी चीज़ सच में अंतिम है और कौन-सी सिर्फ रस्म का हिस्सा।
“अभी नहीं हुआ,” उसने कहा।
नरेश के हाथ में पकड़ा कागज हल्का-सा मुड़ गया। “फिर यह सामान अभी क्यों?”
“समय कम है।”
“बीमारी है क्या?”
“नहीं। बुलावा है।”
यह शब्द नरेश को अच्छा नहीं लगा। उसके पेशे में लोग दुःख में अजीब बातें कहते थे। कोई कहता था पिता सपने में आकर चले गए, कोई कहता था मां ने सुबह ही अपना जाना बता दिया था, कोई कहता था दीया अपने आप बुझ गया था। नरेश ऐसी बातों पर बहस नहीं करता था। दुःख से लड़ते हुए इंसान को तर्क नहीं, सहारा चाहिए होता है। लेकिन इस औरत के चेहरे पर दुःख नहीं था। डर भी नहीं था। वह एक तय काम करवाने आई थी।
“देखिए,” नरेश ने आवाज़ नरम रखी, “जब तक मृत्यु न हो, कुछ चीजें देना ठीक नहीं माना जाता।”
औरत हल्का-सा मुस्कुराई। वह मुस्कान आभार की नहीं थी। “इसीलिए तो आपके पास आई हूँ। आप ठीक-गलत समझते हैं।”
नरेश ने कागज वापस रख दिया। “मरण क्रिया कोई सामान नहीं है। ये शब्द किसने लिखा?”
“जिसे जाना है।”
दुकान में कुछ पल के लिए अजीब-सी शांति भर गई। बाहर से ठेले वाले की आवाज़ आई, फिर दूर चली गई। नरेश ने पानी का गिलास उठाया और आधा पीकर रखा। उसे लगा, इस औरत से ज्यादा सवाल करना ठीक नहीं। फिर भी उसने पूछा, “नाम?”
“सुधा वेलणकर।”
“जिसका देहांत होने वाला है?”
“नहीं। मेरा नाम सुधा है।”
“और?”
वह झुकी, काउंटर पर रखे कागज को दो उंगलियों से सीधा किया और बोली, “जिसे जाना है, उसका नाम अभी नहीं बताना है।”
नरेश को पहली बार बेचैनी हुई। यह वह बेचैनी नहीं थी जो किसी अंधविश्वास से पैदा होती है। यह वैसी थी जैसी कोई आदमी तब महसूस करता है जब सामने वाला सच बोल रहा हो, मगर पूरा सच नहीं। उसने सूची के सामान्य सामान अलग रख दिए, पर मरण क्रिया वाले शब्द को मन से हटाया नहीं जा रहा था। उसने सुधा से पैसे लिए। जाते-जाते उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा, कोई डरावनी बात नहीं कही, कोई संकेत नहीं छोड़ा। बस दरवाज़े तक पहुंचकर रुकी और बोली, “कल सुबह अगर कोई और यही सूची लेकर आए, तो उसे मत देना।”
“क्यों?”
“क्योंकि तब देर हो चुकी होगी।”
घंटी फिर बजी और वह चली गई। नरेश काफी देर तक दरवाज़े की तरफ देखता रहा। उसके बाद उसने कागज मोड़कर अपने पास रख लिया। ऐसी सूचियाँ वह आम तौर पर फेंक देता था, लेकिन यह कागज उसने गल्ले के नीचे रख दिया। शाम तक दुकान में कई लोग आए। किसी ने अगरबत्ती ली, किसी ने पीतल का छोटा पात्र, किसी ने सूती कपड़ा। रोज़ जैसा दिन था, पर उसके भीतर एक छोटी-सी जगह बार-बार उसी वाक्य पर लौट रही थी—“कल सुबह अगर कोई और यही सूची लेकर आए, तो उसे मत देना।”
रात में घर लौटते समय उसने अपने आप से कहा कि ऐसी बातें रोज़ सुनने को मिलती हैं। लोगों का मन डर बनाता है और डर उसे अर्थ दे देता है। उसका घर दुकान से थोड़ी दूरी पर, एक शांत गली में था। पत्नी सीमा रसोई में थी। बेटा विनय खाना खाते हुए किसी बात पर नाराज़ था, क्योंकि नरेश ने उसकी पढ़ाई के खर्च को लेकर सुबह कुछ सख्त शब्द कह दिए थे। घर वैसा ही था जैसा हमेशा रहता था—छोटे मतभेद, थकी हुई बातचीत, बर्तनों की आवाज़, और दिनभर की थकान के बाद आने वाली चुप्पी।
खाने के बाद सीमा ने पूछा, “आज बहुत चुप हो।”
“एक अजीब औरत आई थी।”
“तुम्हारे पास कौन सामान्य हालत में आता है?”
नरेश हल्का-सा हँसा, पर हँसी टिक नहीं पाई। उसने सुधा की बात बताई। सीमा ने पहले ध्यान से सुना, फिर बोली, “किसी के घर में बीमारी होगी। लोग डर जाते हैं।”
“उसने कहा अभी मौत नहीं हुई।”
“तो होने वाली होगी।”
“सीमा, लोग बीमारी के लिए दवा लेते हैं। पहले से अंतिम सामान नहीं।”
सीमा ने उसके सामने पानी रखा। “तुम इतने साल से यह काम कर रहे हो। तुम्हें सबसे ज्यादा पता होना चाहिए कि लोग दुःख आने से पहले ही उससे हार जाते हैं।”
बात सही थी। फिर भी रात को नरेश देर तक सो नहीं पाया। उसे सुधा की आँखें याद आती रहीं। उनमें आँसू नहीं थे, मगर खालीपन भी नहीं था। जैसे वह किसी की मृत्यु से नहीं, किसी निर्णय से जुड़ी थी।
अगली सुबह दुकान खोलते ही घंटी बजी। नरेश ने सोचा कोई नियमित ग्राहक होगा। दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था, उम्र पचास के आसपास, सफेद कुरता, चेहरे पर जल्दी और घबराहट दोनों। उसके हाथ में मुड़ा हुआ कागज था।
“जल्दी सामान चाहिए,” उसने कहा।
नरेश ने कागज लिया। वही सूची थी। वही लिखावट। वही क्रम। बीच में वही शब्द—मरण क्रिया।
उसका गला सूख गया। उसने आदमी को गौर से देखा। “किसके लिए?”
“आप सामान दीजिए, बाकी बात का समय नहीं है।”
“नाम बताइए।”
आदमी चिढ़ गया। “नाम से क्या फर्क पड़ता है?”
“बहुत फर्क पड़ता है।”
“एक स्त्री है। घर में समय निकल रहा है। आप ये सब बांध दीजिए।”
“कौन स्त्री?”
आदमी ने चारों तरफ देखा, जैसे दुकान की दीवारें सुन रही हों। फिर थोड़ा झुककर बोला, “सुधा वेलणकर।”
नरेश को लगा जैसे दुकान में रखे सारे सूखे फूलों की गंध एकदम कड़वी हो गई हो। उसने कागज वापस कर दिया। “मैं यह सामान नहीं दे सकता।”
“क्या मतलब?”
“कल वे खुद आई थीं।”
आदमी की आँखों में घबराहट की जगह एक पल के लिए गुस्सा चमका। “आपको गलतफहमी हुई होगी।”
“नहीं। उन्होंने अपना नाम बताया था।”
“वह घर से बाहर निकल ही नहीं सकती थीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि कल दोपहर से उनका शरीर आधा सुन्न था। रात को हालत बिगड़ी। अभी सांस चल रही है। हमें क्रिया की तैयारी करनी है।”
नरेश ने काउंटर पकड़ लिया। आदमी ने उसे अजीब नज़र से देखा। फिर बोला, “मुझे बहस नहीं करनी। सामान नहीं देंगे तो मैं कहीं और से ले लूंगा।”
वह जाने लगा। नरेश ने उसे रोका। “रुकिए। सुधा जी के घर चलना होगा।”
“आप कौन होते हैं घर चलने वाले?”
“वही आदमी जिससे कल उन्होंने कहा था कि आज किसी को यह सूची मत देना।”
इस बार आदमी चुप हो गया। उसके चेहरे का रंग थोड़ा उतर गया। कुछ क्षण बाद उसने कागज मोड़ा और धीमे स्वर में कहा, “चलिये।”
नरेश दुकान बंद करके उसके साथ चल पड़ा। रास्ते भर दोनों ने बहुत कम बात की। शहर के बीच से गुजरते हुए नरेश को पहली बार लगा कि दिन में भी कुछ बातें छुप सकती हैं। लोग अपने-अपने काम में थे, दुकानें खुली थीं, बच्चे स्कूल से लौट रहे थे, सब कुछ सामान्य था। इसी सामान्यता के भीतर एक ऐसी बात चल रही थी जिसे कोई देख नहीं पा रहा था।
सुधा वेलणकर का घर किसी भव्य जगह पर नहीं था। संकरी गली में दो मंज़िला मकान, नीला दरवाज़ा, खिड़की पर फीका पर्दा। अंदर जाते ही हल्दी, दवा और पुराने कपड़ों की मिली-जुली गंध आई। बैठक में तीन लोग बैठे थे। कोई जोर से नहीं रो रहा था। यह वह घर नहीं लगा जहां मौत आ चुकी हो; यह वह घर लगा जहां सब लोग किसी अनचाहे फैसले का इंतज़ार कर रहे हों।
अंदर कमरे में सुधा लेटी हुई थी।
नरेश दरवाज़े पर ही रुक गया। यह वही चेहरा था। वही माथा, वही नाक, वही आँखें। फर्क बस इतना था कि कल उसकी आँखें सीधी नरेश पर टिक रही थीं, और अब वे आधी खुली होकर छत की तरफ जमी थीं। होंठ सूखे थे। सांस बहुत हल्की। उसके पास बैठी एक युवती, शायद बेटी, कपड़े से उसका माथा पोंछ रही थी।
“ये कल आपकी दुकान पर आई थीं?” साथ आए आदमी ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा।
नरेश ने जवाब नहीं दिया। वह कमरे में कुछ कदम अंदर गया। सुधा की बेटी ने उसकी तरफ देखा। “आप?”
“मैं सामग्री वाला हूँ,” नरेश ने कहा, फिर तुरंत उसे अपने शब्दों पर शर्म आई। जैसे उसने जीती हुई देह के सामने हार की तैयारी का परिचय दे दिया हो।
बेटी बोली, “अभी कुछ नहीं चाहिए। डॉक्टर ने कहा है इंतज़ार करें।”
नरेश चुप रहा। वह सुधा के चेहरे को देखता रहा। अचानक सुधा की उंगलियां हल्की-सी हिलीं। कमरे में बैठे सब लोग एक साथ आगे झुके। सुधा के होंठ कांपे। आवाज़ बहुत कम निकली, इतनी कम कि नरेश को लगा शायद वह भ्रम है।
“दिया… मत… देना…”
बेटी रो पड़ी। “आई, पानी?”
सुधा ने बहुत मुश्किल से सिर हिलाया। फिर उसकी आँखें, जो अब तक छत पर थीं, धीरे-धीरे नरेश की दिशा में आईं। वह उसे देख रही थी। सचमुच देख रही थी। नरेश के भीतर कुछ ठंडा फैल गया।
उसने फिर कहा, “दूसरा… आएगा…”
कमरे में किसी को बात समझ नहीं आई। मगर नरेश समझ गया। या शायद वह समझना नहीं चाहता था।
“कौन दूसरा?” उसने धीरे से पूछा।
सुधा के होंठों पर हल्की हरकत हुई। इस बार आवाज़ नहीं निकली। बेटी ने कान पास किया, पर कुछ नहीं सुन पाई। सुधा की आँखों से एक बूंद किनारे की तरफ चली गई। वह रो नहीं रही थी। वह चेतावनी देने की कोशिश कर रही थी।
फिर अचानक उसकी सांस थोड़ी तेज हुई, जैसे भीतर कोई अदृश्य गाँठ खुल रही हो। सब लोग घबरा गए। बेटी ने उसका हाथ पकड़ लिया। साथ आया आदमी बाहर किसी को आवाज़ देने गया। नरेश वहीं खड़ा रहा, बिल्कुल असहाय। वह ऐसी देहें देख चुका था जिनसे जीवन जा चुका था। लेकिन यह पहली बार था जब उसे लगा कि कोई व्यक्ति जाते-जाते भी किसी को बचाने की कोशिश कर रहा है।
कुछ देर बाद कमरे की हलचल शांत हो गई। किसी ने धीमे से कहा, “गईं।”
रोने की आवाज़ उठी, मगर नरेश के कान में केवल सुधा का अधूरा वाक्य रह गया—“दूसरा आएगा।”
उसी समय घर के बाहर दरवाज़े पर दस्तक हुई। न बहुत तेज, न बहुत धीमी। बस तीन बार। जैसे कोई जानता हो कि अंदर किस क्षण प्रवेश करना है।
सुधा की बेटी ने आँसू पोंछे और बाहर जाने लगी, लेकिन नरेश ने उसे रोक दिया।
“मैं देखता हूँ,” उसने कहा।
Maran Kriya Real Horror Story
वह बैठक पार करके दरवाज़े तक गया। बाहर एक दुबला-पतला आदमी खड़ा था। चेहरा सामान्य, कपड़े सामान्य, हाथ खाली। उसने नरेश को देखकर पूछा, “मरण क्रिया यहीं होगी?”
दरवाज़े पर खड़े उस आदमी की आवाज़ में न शोक था, न जिज्ञासा। वह ऐसा लग रहा था जैसे उसे पहले से मालूम हो कि भीतर क्या हो चुका है। उसके चेहरे पर किसी रिश्तेदार की बेचैनी भी नहीं थी। नरेश ने सहज ही पूछा, “आप कौन हैं?”
आदमी ने उत्तर देने के बजाय भीतर झाँकने की कोशिश की। बैठक में रोने की आवाज़ अब साफ सुनाई दे रही थी। उसने धीरे से कहा, “देर हो गई।”
“किस बात की?”
“जिसे रोकना था।”
नरेश ने दरवाज़ा थोड़ा और बंद कर दिया। “आपका नाम?”
“नाम से कुछ नहीं बदलता।”
यह वही वाक्य था जो सुबह सूची लेकर आए व्यक्ति ने कहा था। नरेश के भीतर जैसे कोई पुरानी घंटी बज उठी।
“आपको किसने भेजा?”
आदमी ने पहली बार उसकी आँखों में देखा। उसकी पुतलियाँ बिल्कुल स्थिर थीं।
“उन्होंने।”
“किसने?”
“जो अभी गई हैं।”
नरेश का हाथ अपने आप दरवाज़े की चौखट पर कस गया।
“आप अंदर नहीं आएँगे।”
आदमी ने विरोध नहीं किया। बस जेब से एक छोटा-सा मुड़ा हुआ कपड़ा निकाला और नरेश की ओर बढ़ा दिया।
“ये उन्हें दे देना था। अब ज़रूरत नहीं।”
“इसमें क्या है?”
“जिसके कारण मरण क्रिया पूरी होती है।”
नरेश ने कपड़ा नहीं लिया।
आदमी मुस्कुराया। वह मुस्कान डरावनी नहीं थी, बल्कि थकी हुई थी।
“आप नहीं लेंगे तो कोई और ले लेगा।”
इतना कहकर वह मुड़ा और गली में आगे बढ़ गया।
नरेश कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा। उसे अचानक ध्यान आया कि उसने उसके कदमों की आवाज़ नहीं सुनी। वह तुरंत बाहर निकला। गली सीधी थी। दोनों ओर घरों के दरवाज़े खुले थे। दूर तक लोग दिखाई दे रहे थे, लेकिन वह आदमी कहीं नहीं था। इतनी जल्दी किसी का यूँ गायब हो जाना संभव नहीं था।
वह वापस लौटा तो बैठक में लोगों की संख्या बढ़ चुकी थी। अंतिम तैयारियों की चर्चा होने लगी थी। किसी ने नरेश से सामान के बारे में पूछा। उसने यंत्रवत सिर हिला दिया, लेकिन उसका मन अभी भी उसी कपड़े और उसी अजनबी में अटका था।
सुधा के अंतिम संस्कार के बाद कई दिन तक सब कुछ सामान्य दिखाई देता रहा। नरेश फिर अपनी दिनचर्या में लौट आया। फिर भी उसने महसूस किया कि कुछ बदल चुका है। पहले लोग उसकी दुकान पर दुःख लेकर आते थे और चले जाते थे। अब कभी-कभी कोई ग्राहक चुपचाप उसे देखता रहता। जैसे वह सामान नहीं, उसका चेहरा पहचानने आया हो।
एक शाम एक वृद्ध महिला आई। उसने कुछ भी नहीं खरीदा। केवल नरेश को देखकर पूछा, “तुमने सुधा की बात मान ली थी?”
नरेश चौंका।
“आप उन्हें जानती थीं?”
“बहुत पहले।”
“उन्होंने किस बात से रोकना चाहा था?”
महिला ने लंबी साँस ली।
“मरण क्रिया मृत्यु की रस्म नहीं है।”
“फिर क्या है?”
“जब कोई आदमी अपनी मौत स्वीकार नहीं कर पाता, तब वह अपने जाने का रास्ता किसी दूसरे के भीतर खोजने लगता है।”
नरेश ने पहली बार यह शब्द किसी और के मुँह से सुना था।
“ये कैसी बात हुई?”
महिला ने उसकी बात अनसुनी कर दी।
“हर कई साल में एक आदमी चुना जाता है। वह जो मृत्यु के सबसे पास रहता है, लेकिन मरता नहीं।”
नरेश का गला सूख गया।
“मैं?”
महिला ने सिर नहीं हिलाया। केवल उसकी आँखों में देखा।
“सुधा जानती थी कि अगला कौन होगा।”
“तो उसने नाम क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि नाम बता देती तो क्रिया उसी क्षण पूरी हो जाती।”
नरेश ने महसूस किया कि उसके हाथ काँप रहे हैं।
“आप ये सब कैसे जानती हैं?”
महिला हल्का-सा मुस्कुराई।
“क्योंकि तीस साल पहले मैं भी उसी दरवाज़े पर खड़ी थी जहाँ आज तुम खड़े हो।”
यह कहकर वह मुड़ी और बिना कुछ खरीदे चली गई।
उस रात नरेश बहुत देर तक जागता रहा। उसे पहली बार अपने काम से डर लगा। वह हमेशा सोचता था कि मृत्यु अंतिम होती है। लेकिन अगर मृत्यु के बाद भी कोई अधूरा निर्णय जीवित लोगों के बीच चलता रहे तो?
अगले कुछ दिनों में अजीब घटनाएँ शुरू हुईं।
जिस परिवार को वह सामान देकर लौटता, वहाँ से अगले दिन कोई अनजान व्यक्ति उसकी दुकान का रास्ता पूछता।
कभी कोई बच्चा आकर कहता, “एक आंटी ने भेजा है।”
जब वह पूछता, “कौन-सी आंटी?”
बच्चा उलझ जाता।
“याद नहीं।”
कभी कोई बुज़ुर्ग केवल एक प्रश्न पूछता—
“अभी तक आए नहीं?”
“कौन?”
“दूसरे वाले।”
और फिर बिना उत्तर सुने चला जाता।
नरेश ने यह बात घर में किसी को नहीं बताई। उसे डर था कि सीमा उसे मानसिक थकान का नाम देगी। लेकिन बात यहीं नहीं रुकी।
एक सुबह उसने अपनी दुकान खोली तो काउंटर पर वही मुड़ा हुआ कपड़ा रखा था जिसे उसने उस अजनबी से लेने से मना कर दिया था।
दरवाज़ा बंद था।
ताला टूटा नहीं था।
अंदर कोई आया भी नहीं था।
उसने काँपते हाथों से कपड़ा खोला।
अंदर राख जैसी कोई चीज़ थी। राख बिल्कुल ठंडी थी, लेकिन उसे छूते ही नरेश की उँगलियों में तीखी गर्मी फैल गई। उसने तुरंत कपड़ा गिरा दिया।
राख के बीच एक बहुत छोटा-सा कागज़ का टुकड़ा था।
उस पर सिर्फ़ चार शब्द लिखे थे—
“अब तुम्हारी बारी है।”
नरेश ने तुरंत उसे जलाने की कोशिश की।
माचिस की तीली जली।
कागज़ नहीं जला।
उसने दूसरी, तीसरी, चौथी तीली जलाई।
कुछ नहीं हुआ।
आख़िर उसने पूरा कपड़ा मिट्टी के घड़े में डाल दिया और ऊपर से पानी उड़ेल दिया।
उसे लगा बात वहीं समाप्त हो गई।
लेकिन उसी रात सीमा ने अचानक पूछा—
“आज कोई मिलने आया था क्या?”
“नहीं।”
“अजीब बात है।”
“क्या?”
“जब मैं रसोई में थी, किसी आदमी की आवाज़ आई। उसने कहा—‘नरेश घर पर हैं? उन्हें कहना तैयारी पूरी हो गई है।’”
“तुमने देखा?”
“जब बाहर आई तो कोई नहीं था।”
नरेश ने पहली बार सीमा से झूठ बोला।
“शायद किसी का भ्रम होगा।”
लेकिन उसे मालूम था—भ्रम अब उसके घर तक पहुँच चुका था।
अगले दिन उसने फैसला किया कि वह दुकान हमेशा के लिए बंद कर देगा।
उसने लकड़ी के तख्ते उतारे, सामान बाँधा और दरवाज़े पर ताला लगा दिया।
वह जैसे ही जाने लगा, सामने सड़क के उस पार एक आदमी खड़ा दिखाई दिया।
वही दुबला-पतला चेहरा।
वही शांत आँखें।
वही साधारण कपड़े।
उसने दूर से हाथ उठाकर केवल एक इशारा किया—
पीछे देखो।
नरेश ने अनायास पीछे मुड़कर अपनी बंद दुकान की ओर देखा।
ताले के ऊपर सफेद चॉक से किसी ने एक शब्द लिखा था—
“पूर्ण।”
वह दौड़कर वापस पहुँचा।
ताला वैसा ही बंद था।
चॉक का निशान भी गायब था।
सिर्फ़ उसकी हथेली पर सफेद धूल लगी हुई थी।
उस क्षण उसे पहली बार समझ आया कि वह किसी आत्मा से नहीं, किसी ऐसी प्रक्रिया से टकरा चुका है जो किसी एक इंसान की नहीं थी।
उसने उसी शाम निर्णय लिया कि वह इस रहस्य का पीछा नहीं करेगा। वह अपना शहर छोड़ देगा, नया काम करेगा और इस पूरे अध्याय को यहीं समाप्त कर देगा।
तीन दिन बाद वह परिवार सहित दूसरी जगह चला गया।
न नई दुकान खोली।
न अंतिम संस्कार का कोई सामान बेचा।
धीरे-धीरे जीवन सामान्य होने लगा।
महीने बीत गए।
फिर एक दिन, बिल्कुल अप्रत्याशित रूप से, उसके दरवाज़े पर दस्तक हुई।
इस बार बाहर कोई अजनबी नहीं था।
एक बारह-तेरह साल का लड़का खड़ा था।
उसने जेब से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकाला।
“माँ ने दिया है।”
“किसलिए?”
“उन्होंने कहा, इसे सिर्फ़ आपको देना है।”
नरेश ने काँपते हाथों से कागज़ खोला।
लिखावट बिल्कुल नई थी।
नाम नया था।
शब्द भी नए थे।
लेकिन बीच की एक पंक्ति वैसी ही थी—
“मरण क्रिया।”
उसके नीचे एक और वाक्य लिखा था—
“इस बार जिसे जाना है… वह आप नहीं हैं। लेकिन अगर आपने यह कागज़ पढ़ लिया, तो जिसे बचाया जा सकता था, वह अब कभी नहीं बचेगा।”
नरेश ने घबराकर सिर उठाया।
लड़का वहाँ नहीं था।
गली खाली थी।
उसने चारों ओर देखा।
एक भी इंसान दिखाई नहीं दिया।
उसी पल उसे समझ आया कि मरण क्रिया किसी व्यक्ति की मृत्यु का नाम नहीं थी।
वह एक निर्णय था।
जिस क्षण कोई उस निर्णय का साक्षी बनता, वह अगले निर्णय का वाहक बन जाता।
सुधा उसे बचाना चाहती थी।
उसने चेतावनी दी थी—“दूसरा आएगा।”
लेकिन नरेश ने दरवाज़ा खोल दिया था।
और उसी क्षण यह क्रम उसके जीवन में प्रवेश कर चुका था।
उसने उस कागज़ को बिना पढ़े फाड़ देना चाहा, मगर अब बहुत देर हो चुकी थी।
क्योंकि उसके हाथ में पकड़े कागज़ पर लिखे शब्द धीरे-धीरे बदलने लगे।
अब उस पर केवल एक पंक्ति बची थी—
“मरण क्रिया कभी किसी को मारती नहीं… वह केवल अगला साक्षी चुनती है।”
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