गाँव की एक रहस्यमयी डरावनी कहानी
उत्तर प्रदेश के एक सुनसान इलाके में बसा छोटा-सा गाँव बरवा बाहर से बिल्कुल साधारण दिखाई देता था। गाँव के चारों तरफ गेहूँ, सरसों और गन्ने के खेत फैले थे। बीच से गुजरने वाली कच्ची सड़क करीब आठ किलोमीटर दूर जाकर मुख्य सड़क से मिलती थी। दिन में खेतों में काम करते किसान, गलियों में दौड़ते बच्चे, कुएँ से पानी भरती महिलाएँ और बरगद के नीचे ताश खेलते बुजुर्ग दिखाई देते थे।
लेकिन सूरज ढलने के बाद बरवा बदल जाता था।

शाम होते ही लोग जल्दी-जल्दी घर लौट आते। जानवरों को खुले आँगन में रखने के बजाय दरवाजों के पास बाँध दिया जाता। घरों की खिड़कियाँ बंद कर दी जातीं और गाँव की पश्चिमी सीमा की ओर जाने वाला रास्ता पूरी तरह सुनसान हो जाता।Jinnzadi Real Horror Story
उस दिशा में एक सूखा तालाब था।
तालाब के किनारे खंडहर बन चुकी एक पुरानी हवेली खड़ी थी, जिसे गाँव वाले नवाब की हवेली कहते थे।
कहा जाता था कि लगभग सौ वर्ष पहले वहाँ एक जमींदार रहता था। उसके मरने के बाद हवेली कई परिवारों के हाथों में गई, लेकिन उसमें रहने वाला कोई भी परिवार कुछ महीनों से ज्यादा टिक नहीं पाया। किसी ने आधी रात को छत पर पायल की आवाज सुनी थी। किसी ने बंद कमरे में किसी लड़की को रोते देखा था। एक परिवार के तीन बैल एक ही रात गायब हो गए थे और अगले दिन उनके गले की रस्सियाँ तालाब के बीच पड़ी मिली थीं।
धीरे-धीरे हवेली वीरान हो गई।
बरवा के बुजुर्ग बच्चों को हमेशा चेतावनी देते थे—
“अँधेरा होने के बाद तालाब की तरफ मत जाना। वहाँ जो रहती है, वह इंसान नहीं है।”
नई पीढ़ी इन बातों को बूढ़ों का अंधविश्वास समझती थी।
उन्हीं में एक था अट्ठाईस साल का दीपक।
दीपक गाँव में ही पैदा हुआ था, लेकिन पिछले पाँच वर्षों से लखनऊ में रहकर एक निजी कंपनी में काम कर रहा था। पिता की बीमारी की खबर मिलने पर उसे अचानक गाँव लौटना पड़ा। उसके पिता हरिराम कई दिनों से तेज बुखार में पड़े थे। गाँव के वैद्य की दवा से कोई फायदा नहीं हुआ था।
दीपक जब बरवा पहुँचा, तब शाम होने वाली थी। आसमान में हल्के बादल थे और हवा में गीली मिट्टी की गंध फैली थी। वह बस से मुख्य सड़क पर उतरा और अपना बैग कंधे पर डालकर गाँव की ओर चल पड़ा।
गाँव तक जाने के दो रास्ते थे।
पहला लंबा रास्ता खेतों के बीच से घूमकर जाता था। दूसरा सूखे तालाब और पुरानी हवेली के सामने से निकलता था। उस रास्ते से गाँव केवल आधे घंटे में पहुँच सकता था।
बचपन में दीपक को उस रास्ते पर जाने से रोका जाता था, लेकिन अब वह उन बातों पर विश्वास नहीं करता था।
उसने छोटा रास्ता चुन लिया।
करीब बीस मिनट चलने के बाद खेत समाप्त हो गए। सामने सूखा तालाब दिखाई देने लगा। कभी पानी से भरा रहने वाला तालाब अब गहरी काली मिट्टी का मैदान बन चुका था। उसके किनारों पर झाड़ियाँ उग आई थीं। दाईं ओर पीपल और नीम के पुराने पेड़ों के पीछे हवेली का टूटा हुआ ऊपरी हिस्सा दिखाई दे रहा था।
दीपक ने चलते-चलते हवेली की तरफ देखा।
मुख्य दरवाजे का एक हिस्सा जमीन पर गिरा था। दीवारों से पलस्तर उखड़ चुका था। छत पर जंगली बेलें फैल गई थीं। हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की अँधेरी दिखाई दे रही थी।
दीपक कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि उस खिड़की के भीतर उसे सफेद रंग की कोई चीज हिलती दिखाई दी।
वह रुक गया।
कुछ पल तक खिड़की को देखता रहा।
अंदर कुछ नहीं था।
“कोई कपड़ा होगा,” उसने खुद से कहा और आगे चल पड़ा।
तभी पीछे से पायल की बहुत धीमी आवाज आई।
छन…
छन…
छन…
दीपक ने पलटकर देखा।
रास्ता खाली था।
आसपास इतनी शांति थी कि खेतों से आती झींगुरों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। उसने कदम तेज कर दिए।
कुछ दूर आगे जाने पर उसे रास्ते के किनारे एक लड़की खड़ी दिखाई दी।
लड़की ने हल्के हरे रंग का पुराना सलवार-कुर्ता पहन रखा था। उसके लंबे बाल खुले थे और चेहरा दूसरी तरफ था। उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा घड़ा था।
दीपक उसके पास जाकर रुक गया।
“तुम गाँव जा रही हो?”
लड़की ने कोई उत्तर नहीं दिया।
“अँधेरा होने वाला है। अकेली यहाँ क्या कर रही हो?”
लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उसकी ओर किया।
उसकी उम्र बीस-बाईस वर्ष से अधिक नहीं लग रही थी। चेहरा बहुत सुंदर था, लेकिन उसकी आँखों में अजीब उदासी थी। रंग इतना फीका था मानो वह कई दिनों से बीमार हो।
“मुझे रास्ता नहीं मिल रहा,” उसने धीमी आवाज में कहा।
दीपक ने पीछे हवेली की तरफ देखा।
“किसके घर जाना है?”
लड़की कुछ पल चुप रही, फिर बोली—
“मुझे बरवा के अंदर छोड़ दोगे?”
दीपक को उसका व्यवहार अजीब लगा, फिर भी उसने सिर हिला दिया।
“चलो।”
दोनों गाँव की ओर चलने लगे।
रास्ते भर लड़की चुप रही। उसके कदमों से पायल की आवाज आ रही थी, लेकिन दीपक ने गौर किया कि उसके पैरों पर कोई पायल दिखाई नहीं दे रही थी।
उसने सोचा शायद कपड़ों के नीचे छिपी होगी।
“तुम्हारा नाम क्या है?” दीपक ने पूछा।
लड़की ने सीधे सामने देखते हुए कहा—
“नाज़िया।”
यह नाम सुनकर दीपक थोड़ा हैरान हुआ। बरवा में लगभग सभी परिवार हिंदू थे। मुसलमानों के कुछ घर कई दशक पहले गाँव के दूसरे छोर पर हुआ करते थे, लेकिन अब वे लोग कस्बे में जाकर बस चुके थे।
“किसके यहाँ आई हो?”
नाज़िया ने जवाब नहीं दिया।
गाँव की पहली गली पास आने लगी तो मंदिर की घंटी सुनाई दी। उसी समय नाज़िया अचानक रुक गई।
“क्या हुआ?” दीपक ने पूछा।
उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।
“मैं आगे नहीं जा सकती।”
“क्यों?”
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उसने गाँव की तरफ देखा और कुछ कदम पीछे हट गई।
“तुम कल मुझे लेने आओगे?”
दीपक ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“कहाँ?”
नाज़िया ने तालाब की दिशा में इशारा किया।
“वहीं, जहाँ तुमने मुझे देखा था।”
“लेकिन तुम्हें जाना कहाँ है?”
उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
मंदिर की घंटी फिर बजी।
नाज़िया पलटी और तेजी से वापस चलने लगी।
दीपक ने आवाज लगाई—
“सुनो!”
वह नहीं रुकी।
कुछ ही क्षणों में वह अँधेरे रास्ते में गायब हो गई।
दीपक को लगा कि लड़की शायद मानसिक रूप से परेशान है। वह गाँव पहुँचा और सीधे अपने घर चला गया।
घर पर उसकी माँ कमला ने उसे देखते ही गले लगा लिया। पिता अंदर चारपाई पर लेटे थे। उनका चेहरा पीला पड़ चुका था और शरीर तप रहा था।
रात के खाने के दौरान दीपक ने माँ को रास्ते में मिली लड़की के बारे में बताया।
जैसे ही उसने नाज़िया का नाम लिया, कमला के हाथ से रोटी नीचे गिर गई।
“क्या नाम बताया तूने?”
“नाज़िया। क्यों?”
कमला का चेहरा डर से सफेद पड़ गया।
“तू उसे कहाँ मिला?”
“तालाब के पास।”
कमला तुरंत उठी, आँगन का दरवाजा बंद किया और दीपक के पास बैठ गई।
“वह लड़की नहीं थी।”
दीपक हँस पड़ा।
“माँ, मैंने उससे बात की है। वह मेरे साथ गाँव तक आई थी।”
कमला ने घबराकर कहा—
“उसका नाम इस गाँव में कोई रात के समय नहीं लेता।”
आवाज सुनकर पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग रामसेवक भी आ गए। जब उन्हें पूरी बात पता चली, तो उन्होंने दीपक को ध्यान से देखा।
“उसने तुझसे कोई चीज माँगी?”
“नहीं।”
“तेरे साथ घर तक आई?”
“मंदिर की घंटी सुनकर लौट गई।”
रामसेवक ने राहत की साँस ली।
उन्होंने बताया कि नाज़िया उसी पुरानी हवेली से जुड़ी थी।
बहुत साल पहले नवाब की हवेली में सलीम नाम का एक जमींदार रहता था। उसकी एक बेटी थी, नाज़िया। वह सुंदर थी, लेकिन गाँव के लोग कहते थे कि उसके जन्म के समय ही एक फकीर ने चेतावनी दी थी कि लड़की पर किसी पराई शक्ति का साया है।
नाज़िया अधिकतर हवेली के भीतर रहती थी। उसे दिन में कभी-कभी छत पर देखा जाता, लेकिन शाम ढलने के बाद वह गायब हो जाती।
एक रात हवेली से चीखने की आवाज आई। अगले दिन जमींदार ने घोषणा की कि नाज़िया बीमार होकर मर गई है। उसका अंतिम संस्कार कब और कहाँ हुआ, यह किसी ने नहीं देखा।
कुछ सप्ताह बाद गाँव के कई लोगों ने उसे तालाब के पास घूमते देखा।
तब जमींदार परिवार रातोंरात हवेली छोड़कर चला गया।
“वह राह चलते आदमी को रोकती है,” रामसेवक ने कहा, “और अगले दिन वापस बुलाती है।”
दीपक ने पूछा—
“अगर कोई चला जाए तो?”
रामसेवक कुछ देर चुप रहे।
“वह लौटकर पहले जैसा नहीं रहता।”
दीपक को यह कहानी हास्यास्पद लगी।
“इतनी पुरानी कहानी पर आप लोग आज भी विश्वास करते हैं?”
रामसेवक ने गंभीर होकर कहा—
“क्योंकि मैंने उसे देखा है।”
यह कहकर वह चले गए।
उस रात दीपक अपने पिता के पास जमीन पर बिस्तर बिछाकर सो गया। आधी रात के करीब उसकी आँख पायल की आवाज से खुली।
छन…
छन…
छन…
आवाज आँगन से आ रही थी।
दीपक उठकर बैठ गया। माँ और पिता गहरी नींद में थे। उसने सोचा कोई बिल्ली बर्तनों से टकरा रही होगी।
वह दरवाजे के पास गया और छोटे सुराख से बाहर देखा।
आँगन के बीच नाज़िया खड़ी थी।
उसका चेहरा ऊपर दीपक की ओर था। बाल हवा के बिना भी हिल रहे थे।
उसने होंठ हिलाए—
“तुमने आने का वादा किया था।”
दीपक घबराकर पीछे हट गया।
कुछ क्षण बाद उसने दोबारा बाहर देखा।
आँगन खाली था।
सुबह उसने दरवाजा खोला तो जमीन पर गीले पैरों के निशान बने थे। वे मुख्य दरवाजे से शुरू होकर उसके कमरे तक आ रहे थे, लेकिन वापस जाने के कोई निशान नहीं थे।
अब पहली बार दीपक के मन में डर पैदा हुआ।
उसी दिन वह अपने पिता को कस्बे के अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने कहा कि हरिराम को गंभीर संक्रमण है और कुछ दिनों तक इलाज चलेगा। दीपक पिता को अस्पताल में भर्ती करके शाम तक गाँव लौट आया।
रास्ते में उसने लंबा रास्ता चुना।
रात होने के बाद वह आँगन में बैठा था। माँ रसोई में खाना बना रही थी। तभी बाहर से किसी लड़की के रोने की आवाज आई।
कमला ने चूल्हा बुझा दिया।
“दरवाजा मत खोलना,” उसने फुसफुसाकर कहा।
रोने की आवाज धीरे-धीरे दरवाजे के पास आ गई।
“दीपक…”
नाज़िया की आवाज थी।
“मुझे डर लग रहा है।”
दीपक चुप रहा।
“तुमने कहा था मुझे घर छोड़ोगे।”
दरवाजे पर तीन बार दस्तक हुई।
ठक…
ठक…
ठक…
कमला ने भगवान की तस्वीर के सामने दिया जला दिया। बाहर खड़ी लड़की अचानक हँसने लगी।
उसकी हँसी सामान्य नहीं थी। कभी वह किसी जवान लड़की की आवाज जैसी लगती और अगले ही क्षण किसी बूढ़ी औरत की कर्कश आवाज में बदल जाती।
फिर सब शांत हो गया।
अगली सुबह दरवाजे पर मिट्टी का वही छोटा घड़ा रखा था, जो नाज़िया के हाथ में दीपक ने देखा था। घड़े के अंदर काले बाल और लाल रंग का धागा था।
कमला उसे छूने जा रही थी, लेकिन रामसेवक ने रोक दिया।
उन्होंने लोहे की चिमटी से घड़ा उठाया और गाँव के बाहर ले जाकर जला दिया।
घड़ा आग में रखते ही उसके अंदर से ऐसी चीख निकली कि आसपास बैठे कौए उड़ गए।
रामसेवक ने कहा—
“उसने इसे चुन लिया है।”
दीपक ने गुस्से में कहा—
“कौन चुन लिया है? आप लोग मुझे और माँ को डरा रहे हैं।”
रामसेवक ने उसकी बात अनसुनी कर दी।
“आज अमावस्या है। रात में घर से बाहर मत निकलना। कोई भी आवाज दे, दरवाजा मत खोलना।”
शाम तक पूरे गाँव में खबर फैल गई कि नाज़िया वापस दिखाई दी है। लोग सूर्यास्त से पहले अपने घरों में बंद हो गए।
रात करीब दस बजे तक कुछ नहीं हुआ।
फिर अस्पताल से फोन आया।
फोन करने वाले व्यक्ति ने बताया कि दीपक के पिता की हालत अचानक खराब हो गई है। डॉक्टर ने परिवार के किसी सदस्य को तुरंत बुलाया था।
दीपक परेशान हो गया।
कमला ने कहा—
“अभी मत जा। सुबह होते ही निकल जाना।”
“डॉक्टर ने तुरंत बुलाया है।”
रामसेवक की चेतावनी याद होने के बावजूद दीपक पिता के बारे में सोचकर रुक नहीं सका। उसने मोटरसाइकिल निकाली और कस्बे की ओर चल पड़ा।
गाँव के बाहर पहुँचते ही मोटरसाइकिल बंद हो गई।
उसने कई बार स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन इंजन नहीं चला।
उसी समय खेतों के बीच से एक लालटेन की रोशनी आती दिखाई दी।
दीपक ने सोचा कोई किसान होगा।
रोशनी पास आई तो नाज़िया दिखाई दी।
आज उसने लाल रंग का लंबा कपड़ा पहन रखा था। उसके हाथ में लालटेन थी और चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
“तुम आखिर आ ही गए।”
दीपक मोटरसाइकिल छोड़कर पीछे हटने लगा।
“मुझसे दूर रहो।”
“तुमने मुझे रास्ता दिखाया था। अब मेरी बारी है।”
“मुझे कहीं नहीं जाना।”
नाज़िया ने अस्पताल वाली दिशा में देखा।
“तुम्हारे पिता वहाँ नहीं हैं।”
दीपक रुक गया।
“क्या मतलब?”
“तुम्हें बुलाने वाला फोन अस्पताल से नहीं आया था।”
दीपक ने जेब से मोबाइल निकाला। स्क्रीन पर कोई नेटवर्क नहीं था। कॉल सूची में भी अस्पताल का कोई नंबर नहीं था।
उसकी रीढ़ में ठंड उतर गई।
नाज़िया धीरे-धीरे तालाब की ओर बढ़ने लगी।
“मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें सब दिखाऊँगी।”
दीपक दूसरी दिशा में भागा, लेकिन कुछ ही कदम बाद उसे वही सूखा तालाब सामने दिखाई दिया।
वह जिस दिशा में भी भागता, हर बार तालाब के किनारे पहुँच जाता।
हवेली के मुख्य दरवाजे पर लालटेनें जलने लगीं।
कुछ पल पहले तक खंडहर दिखाई देने वाली हवेली अब बिल्कुल नई लग रही थी। दीवारों पर रोशनी थी। छत पर लोग खड़े थे। अंदर से संगीत और हँसी की आवाज आ रही थी।
नाज़िया दरवाजे पर खड़ी थी।
“मेरा निकाह है,” उसने कहा, “लेकिन दूल्हा हर बार भाग जाता है।”
उसके पीछे खड़े लोगों ने एक साथ दीपक की तरफ देखा।
उन सभी के चेहरे धुँधले थे।
दीपक चिल्लाकर पीछे हटना चाहता था, लेकिन उसके पैर जमीन में धँसने लगे। काली मिट्टी टखनों तक पहुँच गई।
नाज़िया उसके पास आई और अपना हाथ आगे बढ़ाया।
“मुझे अकेला मत छोड़ो।”
दीपक ने उसका हाथ नहीं पकड़ा।
अचानक उसका सुंदर चेहरा बदलने लगा। त्वचा सूखकर हड्डियों से चिपक गई। आँखें पूरी तरह काली हो गईं। मुँह असामान्य रूप से फैल गया।
“तुमने मुझे गाँव तक पहुँचाया था,” वह गुर्राई, “इसलिए अब तुम्हारा घर मेरा है।”
दीपक ने पूरी ताकत से मिट्टी से पैर निकाले और मोटरसाइकिल की ओर भागा। इस बार बाइक एक ही प्रयास में स्टार्ट हो गई।
वह पीछे देखे बिना गाँव पहुँचा।
घर के दरवाजे खुले थे।
आँगन में माँ बेहोश पड़ी थी।
दीवारों पर गीली मिट्टी से हथेलियों के निशान बने थे। उसके कमरे के अंदर से पायल की आवाज आ रही थी।
दीपक ने दरवाजा खोला।
नाज़िया उसकी चारपाई पर बैठी थी।
“तुम बहुत देर से आए।”
दीपक पीछे हटने लगा, लेकिन कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
नाज़िया उठकर उसके करीब आई।
“तुम जानते हो मैं गाँव के भीतर क्यों नहीं आ सकती थी?”
दीपक चुप रहा।
“क्योंकि मुझे किसी जीवित व्यक्ति की अनुमति चाहिए थी।”
उसने मुस्कराकर कहा—
“तुम मुझे गाँव तक लाए। अब मैं किसी भी घर में जा सकती हूँ।”
अचानक बाहर से रामसेवक की आवाज आई। वह दो अन्य बुजुर्गों के साथ दरवाजे पर मंत्र पढ़ रहे थे। कमरे की दीवारें काँपने लगीं।
नाज़िया चीखी।
उसके बाल पूरे कमरे में फैल गए। मिट्टी की दुर्गंध भर गई। वह हवा में ऊपर उठी और दरवाजे की तरफ झपटी, लेकिन दरवाजे पर बँधे लाल धागे से टकराकर पीछे गिर गई।
रामसेवक ने दीपक से कहा—
“उसकी आँखों में मत देखना। कमरे के कोने में रखा घड़ा तोड़ दे।”
दीपक ने देखा कि वही मिट्टी का घड़ा कमरे के कोने में रखा था, जिसे सुबह जलाया गया था।
वह लकड़ी की कुर्सी उठाकर उसकी ओर बढ़ा।
नाज़िया ने तुरंत उसकी माँ की आवाज में कहा—
“बेटा, मत तोड़ना। मुझे चोट लगेगी।”
दीपक रुक गया।
फिर उसके पिता की आवाज आई—
“दीपक, मेरी बात सुन।”
लेकिन उसे समझ आ गया कि यह छलावा है।
उसने कुर्सी घड़े पर दे मारी।
घड़ा टूटते ही कमरे के भीतर तेज हवा चली। नाज़िया की चीख से खिड़कियों के शीशे टूट गए। उसकी परछाईं दीवार पर फैलती चली गई और फिर धुएँ की तरह गायब हो गई।
सब कुछ शांत हो गया।
रामसेवक ने बताया कि खतरा अभी खत्म नहीं हुआ था।
वह घड़ा केवल नाज़िया को कुछ समय के लिए घर से बाहर रख सकता था। उसे हमेशा के लिए रोकने के लिए हवेली के उस कमरे को ढूँढ़ना जरूरी था, जहाँ उसे वर्षों पहले बंद किया गया था।
अगली सुबह दीपक, रामसेवक और गाँव के चार लोग हवेली पहुँचे।
दिन के उजाले में भी वहाँ अजीब ठंड थी।
हवेली के अंदर टूटे फर्नीचर, चमगादड़ों और मोटी धूल के अलावा कुछ नहीं दिखाई दिया। लेकिन सबसे पीछे की दीवार पर एक दरवाजा था, जिसे ईंटों से बंद किया गया था।
उन्होंने ईंटें हटानी शुरू कीं।
दरवाजा खुलते ही सड़ी हुई मिट्टी की गंध बाहर आई।
कमरे के बीच लोहे की जंजीरें पड़ी थीं। दीवारों पर नाखूनों से दर्जनों नाम लिखे थे। उनमें सबसे नीचे ताजी मिट्टी से दीपक का नाम भी लिखा था।
कोने में एक पुराना संदूक रखा था।
संदूक के अंदर नाज़िया की तस्वीर, कुछ कपड़े, पायल और चमड़े में लिपटी एक डायरी मिली।
डायरी जमींदार सलीम की थी।
उसमें लिखा था कि नाज़िया पर किसी जिन्न का साया नहीं था। सलीम ने धन और लंबी उम्र के लालच में एक तांत्रिक से समझौता किया था। तांत्रिक ने कहा था कि उसे अपने ही परिवार की किसी जवान लड़की को हवेली के तहखाने में बंद करना होगा।
सलीम ने अपनी बेटी नाज़िया को बंद कर दिया।
कई दिनों तक भूखी-प्यासी रहने के बाद नाज़िया की मौत हो गई। मरते समय उसने अपने पिता और पूरे गाँव को श्राप दिया था, क्योंकि गाँव वालों ने उसकी चीखें सुनकर भी उसे बचाने की कोशिश नहीं की।
उसकी मौत के बाद बुलाया गया जिन्न उसी की आत्मा से जुड़ गया।
नाज़िया अब केवल भटकती आत्मा नहीं थी। वह आधी इंसानी आत्मा और आधी जिन्नी शक्ति बन चुकी थी।
इसलिए गाँव वाले उसे जिन्नज़ादी कहने लगे थे।
डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था कि उसकी शक्ति पायल में कैद है। पायल को तालाब की मिट्टी में दफन किया गया तो वह हवेली से बाहर नहीं जा सकेगी। लेकिन अगर किसी जीवित व्यक्ति ने उसे स्वेच्छा से गाँव का रास्ता दिखा दिया, तो बंधन टूट जाएगा।
दीपक को अपनी गलती समझ आ गई।
रामसेवक ने कहा—
“अब उसे दोबारा बाँधने का एक ही तरीका है। पायल को उसी कमरे में जलाना होगा जहाँ उसकी मौत हुई थी।”
जैसे ही उन्होंने पायल बाहर निकाली, हवेली का मुख्य दरवाजा बंद हो गया।
ऊपर से पायल बजने की आवाज आई।
छन…
छन…
छन…
नाज़िया सीढ़ियों पर खड़ी थी।
दिन के उजाले में उसका रूप और भी डरावना था। चेहरा सुंदर था, लेकिन उसके पीछे दीवार पर पड़ने वाली परछाईं किसी विशाल प्राणी जैसी थी।
वह धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी।
गाँव के दो आदमी डरकर भागे। मुख्य दरवाजा खुला और वे बाहर निकल गए, लेकिन अगले ही पल उनकी चीख सुनाई दी।
दीपक ने खिड़की से देखा।
दोनों सूखे तालाब के बीच खड़े थे और धीरे-धीरे मिट्टी में धँस रहे थे।
नाज़िया हँसने लगी।
“इस गाँव ने मुझे मरते देखा था। अब यह गाँव मुझे जीते हुए देखेगा।”
दीपक पायल लेकर पीछे वाले कमरे की ओर भागा। रामसेवक उसके साथ थे। उन्होंने कमरे के बीच सूखी लकड़ियाँ रखकर आग जलाई।
नाज़िया दरवाजे तक पहुँच गई।
वह अंदर प्रवेश नहीं कर पा रही थी, क्योंकि रामसेवक लगातार मंत्र पढ़ रहे थे।
दीपक ने पायल आग में डाल दी।
पायल लाल होने लगी।
नाज़िया ने अचानक दीपक के पिता का रूप ले लिया।
“बेटा, मुझे बचा ले।”
दीपक की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने आग से पायल नहीं निकाली।
फिर नाज़िया अपने पुराने रूप में लौट आई। अब उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, दर्द था।
“मैंने क्या गलत किया था?” उसने पूछा।
दीपक चुप रहा।
“मेरे पिता ने मुझे बंद किया। गाँव ने मेरी आवाज सुनी, लेकिन कोई नहीं आया। मैंने कई रातें दरवाजा पीटते हुए बिताईं।”
उसकी आँखों से काले आँसू बहने लगे।
“मैं केवल बाहर निकलना चाहती थी।”
दीपक को एक पल के लिए उस पर दया आई।
रामसेवक चिल्लाए—
“उसकी बात मत सुन!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
दीपक आग की ओर बढ़ा और पायल निकालने के लिए हाथ आगे किया।
उसी क्षण उसे कमरे की दीवार पर लिखे नाम दिखाई दिए। वे उन सभी लोगों के नाम थे, जो वर्षों में गायब हुए थे।
सबसे ऊपर उसके दादा का नाम भी लिखा था।
दीपक का हाथ रुक गया।
नाज़िया का चेहरा फिर बदल गया।
“निकालो इसे!” वह चीखी।
दीपक ने पास रखा मिट्टी के तेल का डिब्बा आग में उड़ेल दिया।
लपटें ऊपर तक उठीं।
पायल पिघलने लगी।
हवेली जोर-जोर से काँपने लगी। दीवारों में दरारें पड़ गईं। नाज़िया की परछाईं कई हिस्सों में बँटकर पूरे कमरे में घूमने लगी।
फिर एक भयानक चीख के साथ सब शांत हो गया।
जमीन हिली और कमरे की छत गिरने लगी।
दीपक और रामसेवक दौड़कर बाहर निकले। उनके पीछे पूरी हवेली धूल और मलबे में बदल गई।
तालाब के बीच फँसे दोनों आदमी भी मिट्टी से बाहर आ गए।
उस दिन के बाद बरवा में नाज़िया कभी दिखाई नहीं दी।
दीपक के पिता भी इलाज के बाद ठीक होकर घर लौट आए। कुछ महीनों में गाँव का जीवन सामान्य हो गया। लोगों ने तालाब के पास जाना शुरू कर दिया। बच्चे वहाँ खेलते और किसान रास्ते से होकर खेतों तक जाते।
हवेली के मलबे के पास गाँव वालों ने एक छोटा मंदिर बनवा दिया।
दीपक वापस शहर चला गया।
लगभग एक वर्ष बाद बरसात के मौसम में वह फिर गाँव आया। रात को परिवार के साथ खाना खाने के बाद वह अपने कमरे में सोने चला गया।
आधी रात को उसकी आँख खुली।
खिड़की से बारिश की बूँदें अंदर आ रही थीं।
वह खिड़की बंद करने उठा तो उसकी नजर आँगन पर पड़ी।
बारिश के बीच एक छोटी लड़की खड़ी थी। उसकी उम्र सात-आठ वर्ष से ज्यादा नहीं लग रही थी। उसने हरे रंग का कपड़ा पहन रखा था और हाथ में मिट्टी का घड़ा था।
दीपक ने डरते हुए पूछा—
“कौन हो तुम?”
लड़की ने ऊपर देखकर मुस्कराया।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
“मेरी अम्मी ने कहा है कि तुम रास्ता जानते हो।”
अचानक कमरे के बाहर पायल बजने लगी।
छन…
छन…
छन…
दीपक ने पीछे मुड़कर देखा।
दरवाजे के नीचे से काली मिट्टी अंदर आ रही थी।
फिर कमरे के दूसरे कोने से नाज़िया की धीमी आवाज सुनाई दी—
“एक पायल जलाने से जिन्नज़ादी नहीं मरती, दीपक।”
“वह केवल अपना पुराना शरीर छोड़ती है।”
दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।
और उसी क्षण पूरे गाँव की बत्तियाँ बुझ गईं।
Wikipedia – Djinn: https://en.wikipedia.org/wiki/Jinn
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