Tuition Horror Story

Tuition Horror Story | गांव के ट्यूशन से गायब हुआ लड़का

बरसात का मौसम था। शाम के लगभग सात बजे होंगे। गांव के बाहर बने पुराने पंचायत भवन में पिछले कुछ महीनों से बच्चों की ट्यूशन लगती थी। दिन में वही कमरा खाली रहता, लेकिन शाम होते ही गांव के तीस-पैंतीस बच्चे वहां पढ़ने आ जाते।

उस ट्यूशन को पढ़ाने वाले मास्टरजी का नाम महेंद्र था। गांव में उनकी अच्छी इज़्ज़त थी। उन्होंने पंचायत भवन इसलिए चुना था क्योंकि वहां जगह बड़ी थी और बच्चों को बैठने में परेशानी नहीं होती थी।

Tuition Horror Story

लेकिन गांव के बुज़ुर्ग उस जगह को पसंद नहीं करते थे।

वे हमेशा कहते,
“सूरज डूबने के बाद उस इमारत के पीछे मत जाना।”

कोई कारण कभी नहीं बताता था।

बच्चे इसे बुज़ुर्गों की बेकार की बातें समझकर हँस देते।

उन्हीं बच्चों में चौदह साल का दीपक भी था। पढ़ाई में तेज़ और हमेशा सबसे पहले पहुंचने वाला।

उस दिन भी वह सबसे पहले आया।

मास्टरजी अभी रास्ते में थे।

बाकी बच्चे भी धीरे-धीरे आने लगे।

दीपक अकेला कमरे में बैठा अपनी कॉपी देख रहा था कि उसे पीछे वाले टूटे दरवाज़े की तरफ से किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

टक…

टक…

टक…

उसे लगा कोई और छात्र आया होगा।

वह बाहर निकला।

लेकिन वहां कोई नहीं था।

सिर्फ भीगी हुई मिट्टी… और पुराने बरगद का पेड़।

वह वापस अंदर आ गया।

कुछ देर बाद क्लास शुरू हो गई।

करीब डेढ़ घंटे पढ़ाई चली।

रात के साढ़े आठ बजे मास्टरजी ने छुट्टी कर दी।

सभी बच्चे अपने-अपने घर चले गए।

अगली सुबह पूरे गांव में हड़कंप मच गया।

दीपक रात को घर पहुँचा ही नहीं था।

उसके माता-पिता ने पूरी रात उसे खोजा।

तालाब…

खेत…

मंदिर…

हर जगह तलाश की गई।

लेकिन उसका कहीं कोई पता नहीं चला।

गांव वालों ने सोचा शायद वह किसी रिश्तेदार के यहां चला गया होगा।

दो दिन निकल गए।

फिर तीन।

फिर पूरा हफ्ता।

दीपक जैसे हवा में गायब हो गया।

पुलिस आई।

पूरे गांव से पूछताछ हुई।

सबसे आखिरी बार उसे ट्यूशन में देखा गया था।

महेंद्र मास्टरजी ने बताया,

“छुट्टी के समय वो बाकी बच्चों के साथ ही निकला था।”

बाकी बच्चों ने भी यही कहा।

मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगा।

करीब एक महीने बाद नया सत्र शुरू हुआ।

ट्यूशन फिर लगने लगी।

एक शाम पढ़ाई के दौरान अचानक बिजली चली गई।

पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

मोमबत्ती जलाई गई।

जैसे ही लौ जली…

पीछे सबसे आखिरी बेंच पर किसी की परछाईं दिखाई दी।

सभी बच्चों ने सोचा कोई छात्र बैठा है।

लेकिन हाज़िरी लेते समय पता चला…

उस बेंच पर किसी का नाम नहीं था।

मास्टरजी ने मोमबत्ती लेकर पीछे देखा।

बेंच खाली थी।

उन्होंने सोचा शायद लौ के कारण भ्रम हुआ होगा।

क्लास फिर शुरू हो गई।

लेकिन उसी रात एक और छात्र गायब हो गया।

इस बार उसका नाम मोहन था।

वह भी घर नहीं लौटा।

अब गांव में डर फैल गया।

दो छात्रों का बिना कोई निशान छोड़े गायब हो जाना सामान्य बात नहीं थी।

कुछ दिनों तक ट्यूशन बंद रही।

पुलिस ने पंचायत भवन की तलाशी ली।

दीवारें तोड़ी गईं।

फर्श खोदा गया।

छत देखी गई।

कुछ भी नहीं मिला।

आखिरकार पुलिस ने मामला बंद कर दिया।

समय बीतता गया।

करीब छह महीने बाद गांव में नए शिक्षक आए।

उन्होंने वही पंचायत भवन फिर से किराये पर लेकर ट्यूशन शुरू कर दी।

गांव वालों ने बहुत मना किया।

लेकिन उन्होंने किसी की बात नहीं मानी।

पहले कुछ दिन सब ठीक रहा।

फिर एक शाम एक छोटी-सी घटना हुई।

एक छात्र अपनी पेंसिल गिरने पर आखिरी बेंच के नीचे झुका।

अचानक वह जोर से चिल्लाया।

जब बाकी बच्चे वहां पहुंचे…

उसने कांपते हुए कहा,

“नीचे कोई लेटा हुआ था…”

सबने नीचे देखा।

कुछ नहीं था।

उसे डर के कारण घर भेज दिया गया।

उस रात वह लड़का तेज़ बुखार में बार-बार एक ही बात दोहराता रहा।

“वो मुझे बुला रहा था…”

“कह रहा था… मेरे साथ बैठ जाओ…”

अगले दिन वह भी ट्यूशन नहीं आया।

उसके माता-पिता ने साफ़ मना कर दिया कि उनका बेटा अब वहां कभी नहीं जाएगा।

लेकिन दो दिन बाद…

वह अचानक घर से गायब हो गया।

अब गांव वालों का धैर्य टूट गया।

उन्होंने पंचायत भवन हमेशा के लिए बंद कर दिया।

दरवाज़े पर बड़ा ताला लगा दिया गया।

सालों तक वहां कोई नहीं गया।

धीरे-धीरे उस जगह पर झाड़ियाँ उग आईं।

लोग रास्ता बदलकर निकलने लगे।

करीब पंद्रह साल बाद गांव में सड़क चौड़ी करने का काम शुरू हुआ।

सरकारी टीम पंचायत भवन गिराने पहुँची।

जैसे ही मजदूरों ने आखिरी कमरे की फर्श तोड़नी शुरू की…

उन्हें नीचे एक पुरानी सीढ़ी दिखाई दी।

किसी को पता ही नहीं था कि उस कमरे के नीचे भी कोई हिस्सा बना हुआ है।

नीचे उतरते ही सबके होश उड़ गए।

वह एक छोटा-सा तहखाना था।

उसके अंदर कई पुरानी लकड़ी की बेंच रखी थीं।

दीवारों पर बच्चों के नाम खरोंचे हुए थे।

कुछ नाम इतने पुराने थे कि पढ़े नहीं जा रहे थे।

लेकिन उनमें तीन नाम बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रहे थे।

दीपक।

मोहन।

और तीसरा…

वही लड़का जो पेंसिल उठाने झुका था।

सबसे अजीब बात यह थी कि उन नामों के नीचे एक लाइन बार-बार लिखी हुई थी—

“हाज़िरी पूरी होने तक कोई बाहर नहीं जाएगा।”

सरकारी कर्मचारियों ने पूरा तहखाना खाली कराया।

लेकिन वहां किसी इंसान के रहने का कोई निशान नहीं मिला।

न हड्डियाँ।

न कपड़े।

न कोई सुराग।

सिर्फ धूल, टूटी बेंचें और दीवारों पर उकेरे हुए नाम।

उस घटना के बाद पंचायत भवन पूरी तरह गिरा दिया गया।

आज वहां एक खुला मैदान है।

गांव के लोग बताते हैं कि बरसात की कुछ शामों में, जब आसपास बिल्कुल सन्नाटा होता है, तो उस मैदान से बच्चों की धीमी आवाज़ें सुनाई देती हैं…

“सर… मेरी हाज़िरी भी लगा दीजिए…”

लेकिन वहां अब कोई ट्यूशन नहीं लगती।

Tuition Horror Story – Part 2 | हाज़िरी अभी पूरी नहीं हुई

पंचायत भवन गिराए हुए लगभग तीन साल बीत चुके थे।

गांव के लोग अब उस घटना को भूलने लगे थे।

जहां कभी वह पुरानी इमारत थी, वहां अब एक छोटा-सा खेल का मैदान बन चुका था। बच्चे दिन में क्रिकेट खेलते और शाम होते ही अपने-अपने घर लौट जाते।

लेकिन गांव के बुज़ुर्ग आज भी एक नियम नहीं भूले थे।

“अंधेरा होने से पहले मैदान खाली कर देना।”

कोई कारण नहीं पूछता था।

एक दिन गांव में नए स्कूल के शिक्षक, विनय सर, की नियुक्ति हुई।

वे शहर से आए थे और ऐसी कहानियों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते थे।

उन्होंने देखा कि गांव के कई गरीब बच्चे शाम को पढ़ नहीं पाते।

इसलिए उन्होंने फैसला किया कि रोज़ शाम छह से आठ बजे तक मैदान के किनारे बने नए सामुदायिक भवन में मुफ़्त ट्यूशन पढ़ाएँगे।

गांव वालों ने बहुत समझाया।

“सर… जगह बदल लीजिए।”

विनय सर हँसकर बोले,

“डर से पढ़ाई बंद नहीं हो सकती।”

अगले सोमवार से ट्यूशन शुरू हो गई।

पहले दिन पच्चीस बच्चे आए।

सब कुछ सामान्य था।

दूसरे दिन भी।

तीसरे दिन भी।

फिर चौथे दिन एक अजीब बात हुई।

हाज़िरी लेते समय विनय सर ने नाम पुकारा—

“राहुल?”

पीछे से आवाज़ आई,

“जी सर।”

उन्होंने टिक लगा दिया।

क्लास खत्म होने के बाद राहुल की माँ उसे लेने आई।

लेकिन राहुल तो पूरी क्लास में आया ही नहीं था।

वह दो दिन से तेज़ बुखार में घर पर था।

विनय सर ने रजिस्टर दिखाया।

उस दिन राहुल की हाज़िरी लगी हुई थी।

उन्होंने सोचा शायद गलती से किसी और की आवाज़ सुन ली होगी।

अगले दिन फिर वही हुआ।

इस बार नाम था—

“पूजा।”

“जी मैडम…” जैसी धीमी आवाज़ आई।

लेकिन पूजा भी उस दिन स्कूल के कार्यक्रम में गई हुई थी।

अब विनय सर पहली बार परेशान हुए।

उन्होंने तय किया कि आज हाज़िरी लेते समय हर बच्चे को खड़ा करेंगे।

शाम हुई।

क्लास शुरू हुई।

उन्होंने पहला नाम पुकारा।

हर बच्चा खड़ा होकर जवाब देता गया।

फिर उन्होंने पुकारा—

“दीपक…”

पूरा कमरा शांत हो गया।

किसी बच्चे का यह नाम नहीं था।

रजिस्टर में भी नहीं।

फिर भी…

सबसे पीछे वाली खाली कुर्सी धीरे-धीरे चरमराई।

जैसे कोई अभी-अभी उस पर बैठा हो।

विनय सर ने सिर उठाकर देखा।

कुर्सी अपने आप आगे-पीछे हिल रही थी।

उन्होंने तुरंत जाकर उसे रोक दिया।

क्लास खत्म होते ही उन्होंने रजिस्टर खोला।

उनकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

रजिस्टर में जहाँ तक उन्होंने नाम लिखे थे, उसके नीचे लाल पेंसिल से एक नया नाम लिखा था।

दीपक।

उसके सामने हाज़िरी लगी हुई थी।

लेकिन वह नाम उन्होंने नहीं लिखा था।

उन्होंने पूरी रात सोचा कि शायद किसी बच्चे की शरारत होगी।

अगली शाम उन्होंने नया रजिस्टर खरीदा।

पुराना रजिस्टर घर में बंद कर दिया।

क्लास शुरू हुई।

इस बार उन्होंने किसी को रजिस्टर छूने नहीं दिया।

हाज़िरी पूरी हुई।

सब ठीक रहा।

लेकिन छुट्टी के समय एक बच्चा रोते हुए बोला,

“सर… पीछे वाला लड़का मुझे घर तक आने को कह रहा है।”

विनय सर ने पूछा,

“कौन लड़का?”

बच्चे ने उंगली सबसे आखिरी कुर्सी की तरफ कर दी।

कुर्सी खाली थी।

उसी रात वह बच्चा अचानक लापता हो गया।

पूरा गांव फिर उसी डर में डूब गया, जो वर्षों पहले खत्म हुआ था।

पुलिस आई।

सीसीटीवी लगाए गए।

सामुदायिक भवन के बाहर और अंदर दोनों जगह कैमरे लगे।

तीन रात तक कुछ नहीं हुआ।

चौथी रात कैमरों में एक अजीब दृश्य रिकॉर्ड हुआ।

रात ठीक 7:47 पर…

खाली क्लासरूम का दरवाज़ा अपने आप खुला।

अंदर रखी सारी कुर्सियाँ धीरे-धीरे अपनी जगह बदलने लगीं।

जैसे बच्चे बैठने की तैयारी कर रहे हों।

सबसे आखिरी कुर्सी अपने आप पीछे खिसकी…

और फिर किसी अदृश्य वजन से दब गई।

कुछ सेकंड बाद…

रजिस्टर के पन्ने अपने आप पलटने लगे।

अंतिम पेज पर जाकर रुक गए।

उसके बाद…

लाल स्याही अपने आप फैलने लगी।

कैमरे में साफ़ दिखाई दे रहा था कि बिना किसी इंसान के हाथ लगाए, एक वाक्य लिखा जा रहा है—

“तीन अभी भी कम हैं…”

अगले ही पल कैमरे की रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

जब पुलिस सुबह पहुँची…

रजिस्टर खुला हुआ था।

वहीं वही वाक्य लिखा मिला।

लेकिन इस बार उसके नीचे तीन खाली लाइनें थीं।

जैसे किसी के नाम लिखे जाने का इंतज़ार हो…

विनय सर ने उसी दिन ट्यूशन हमेशा के लिए बंद कर दी।

उन्होंने गांव छोड़ दिया।

आज भी उस सामुदायिक भवन में कोई शाम के बाद नहीं जाता।

गांव के कुछ लोगों का दावा है कि बरसात की रातों में वहां से बच्चों की हाज़िरी की आवाज़ आती है—

“दीपक…”

“जी सर…”

“मोहन…”

“जी सर…”

और फिर…

एक ऐसी आवाज़ सुनाई देती है जिसे आज तक किसी ने पहचान नहीं पाया।

अगला नाम किसका है…?

(जारी रहेगा…)

India Meteorological Department (IMD): https://mausam.imd.gov.in/

Old House Totka Horror Story, हिंदी डरावनी कहानी

1 thought on “Tuition Horror Story”

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