Taboot Mein Kaun Band Tha? | Taboot Horror Story

“Raat ke 2 baje achanak taboot ke andar se kisi ne dheere se mera naam liya… pehle mujhe laga mera bhram hoga. Lekin agle hi pal taboot khud hilne laga.”

गांव के बाहर मौजूद उस कब्रिस्तान का कोई आधिकारिक नाम नहीं था। पुराने सरकारी कागजों में उसे सिर्फ “पुराना दफन स्थल” लिखा गया था, लेकिन आसपास के लोग उसे दूसरे नाम से जानते थे। Taboot Horror Story

वे उसे “ताबूत वाला मैदान” कहते थे।

कारण सिर्फ एक था।

कब्रिस्तान के बीचों-बीच रखा हुआ वह काला ताबूत।

Taboot Horror Story

उसके बारे में जितनी कहानियां थीं, उतने ही डर भी थे। किसी के अनुसार उसके अंदर कोई पागल साधु बंद था। कुछ लोग कहते थे कि उसमें किसी ऐसे आदमी की लाश थी जिसे मरने के बाद भी दफन नहीं किया जा सका। लेकिन सच क्या था, यह कोई नहीं जानता था।

अजीब बात यह थी कि गांव के सबसे बुजुर्ग लोग भी यही कहते थे कि जब उन्होंने बचपन में पहली बार कब्रिस्तान देखा था, तब भी वह ताबूत वहीं मौजूद था।

समय बदलता गया।

पीढ़ियां गुजरती गईं।

लेकिन ताबूत वहीं रहा।

बरसातें आईं, आंधियां आईं, कई पुरानी कब्रें मिट्टी में मिल गईं, मगर ताबूत कभी अपनी जगह से नहीं हिला।

लोगों ने उसे अनदेखा करना सीख लिया था।

कम से कम दिन के समय।

रात की बात अलग थी।

सूरज ढलने के बाद गांव का कोई आदमी उस तरफ नहीं जाता था।

यह कहानी उसी गांव में आए चार दोस्तों से शुरू होती है।

वे किसी YouTube चैनल, paranormal investigation या ghost hunting के लिए नहीं आए थे। वे बस छुट्टियां बिताने आए थे।

शहर की भागदौड़ से दूर।

शांति की तलाश में।

उनमें से एक का पुश्तैनी घर गांव में था, इसलिए बाकी तीन भी उसके साथ चले आए।

शुरुआत के दो दिन शानदार रहे।

दिन में खेतों में घूमना, नदी तक जाना, आम के बागों में बैठना, रात को छत पर लेटकर तारों को देखना।

सब कुछ सामान्य था।

फिर तीसरी शाम चौपाल पर बैठे-बैठे उन्होंने पहली बार उस ताबूत के बारे में सुना।

एक बूढ़ा आदमी तंबाकू मलते हुए बोला—

“जिस चीज़ को लोग भूल जाएं, उसे भूल जाने देना चाहिए।”

“किस चीज़ को?” उनमें से एक ने पूछा।

बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

बस दूर कब्रिस्तान की दिशा में देखने लगा।

फिर धीरे से बोला—

“काले ताबूत को।”

उसके बाद चौपाल पर बैठे बाकी लोग चुप हो गए।

विषय बदल दिया गया।

लेकिन यही चुप्पी चारों दोस्तों के मन में सवाल छोड़ गई।

रात को खाने के बाद वही चर्चा शुरू हो गई।

आखिर उसमें ऐसा क्या था?

लोग उसका नाम सुनकर असहज क्यों हो जाते थे?

और सबसे बड़ी बात…

अगर वह इतना खतरनाक था तो उसे हटाया क्यों नहीं गया?

अगले दिन उन्होंने गांव के कई लोगों से पूछा।

लेकिन हर बार जवाब टाल दिया गया।

कोई कहता—

“पुरानी बातें हैं।”

कोई कहता—

“जितना कम जानो, उतना अच्छा।”

और कुछ लोग तो बात शुरू होते ही वहां से चले जाते।

अब उनकी जिज्ञासा और बढ़ चुकी थी।

शाम होते-होते उन्होंने फैसला कर लिया।

आज रात कब्रिस्तान जाकर ताबूत देखेंगे।

सिर्फ देखेंगे।

कुछ छुएंगे नहीं।

कुछ खोलेंगे नहीं।

बस देखेंगे और लौट आएंगे।

उस समय उन्हें नहीं पता था कि यही फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा पछतावा बनने वाला है।

रात गहराने लगी।

आसमान साफ था।

दूर-दूर तक चांदनी फैली हुई थी।

चारों टॉर्च लेकर गांव से बाहर निकले।

जैसे-जैसे वे कब्रिस्तान के करीब पहुंचे, माहौल बदलने लगा।

पहले झींगुरों की आवाज कम हुई।

फिर हवा धीमी पड़ गई।

फिर एक अजीब-सी खामोशी चारों तरफ फैल गई।

वह सामान्य खामोशी नहीं थी।

ऐसा लग रहा था जैसे आसपास की सारी आवाजें किसी ने खींचकर निकाल ली हों।

टॉर्च की रोशनी टूटी हुई कब्रों पर पड़ रही थी।

कहीं झुके हुए पत्थर।

कहीं आधी धंसी कब्रें।

और फिर…

उन्हें वह दिखाई दिया।

काला ताबूत।

वास्तविकता में वह कहानियों से कहीं ज्यादा डरावना लग रहा था।

उसकी सतह पर अजीब खरोंचें थीं।

लोहे की पुरानी पट्टियां जंग से भूरी पड़ चुकी थीं।

लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि बाकी कब्रों पर धूल और घास जमी हुई थी, जबकि ताबूत बिल्कुल साफ था।

जैसे किसी ने हाल ही में उसे साफ किया हो।

चारों कुछ देर चुपचाप उसे देखते रहे।

फिर उनमें से एक धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

“सिर्फ छूकर देखते हैं।”

बाकी तीनों ने मना किया।

लेकिन उसने हाथ बढ़ा दिया।

जैसे ही उसकी उंगलियां ताबूत से टकराईं, उसका चेहरा बदल गया।

“यह इतना ठंडा क्यों है?”

बाकी लोगों ने भी छूकर देखा।

वह सही कह रहा था।

गर्मी की रात होने के बावजूद ताबूत बर्फ जैसा ठंडा था।

तभी उन्हें एक और बात महसूस हुई।

कब्रिस्तान में बदबू नहीं थी।

बल्कि एक अजीब-सी गंध थी।

गीली मिट्टी और पुराने लकड़ी के कमरे जैसी।

वह गंध ताबूत के आसपास सबसे ज्यादा थी।

कुछ मिनट बाद वे वापस लौट आए।

किसी ने कुछ नहीं कहा।

लेकिन सभी असामान्य रूप से शांत थे।

उस रात चारों को अलग-अलग सपने आए।

और यही वह बात थी जिसने अगले दिन उन्हें डरा दिया।

सुबह जब उन्होंने अपने सपनों का जिक्र किया, तो पता चला कि चारों ने लगभग एक जैसी चीज देखी थी।

एक अंधेरा कमरा।

कमरे के बीच रखा ताबूत।

और किसी आदमी की आवाज।

जो बार-बार एक ही बात कह रही थी—

“मैं अभी भी अंदर हूं।”

अब मजाक खत्म हो चुका था।

उनमें से दो लोग उसी दिन गांव छोड़ना चाहते थे।

लेकिन बाकी दो इसे संयोग मान रहे थे।

शाम को उन्होंने फिर कब्रिस्तान जाने का फैसला किया।

इस बार सिर्फ दो लोग गए।

बाकी घर पर रुक गए।

और यही उनकी सबसे बड़ी गलती थी।

दूसरी रात सिर्फ दो लोग कब्रिस्तान गए।

बाकी दोनों ने साफ मना कर दिया था।

उन्हें पिछली रात के सपनों के बाद सब कुछ गलत लगने लगा था।

लेकिन जिज्ञासा कई बार समझदारी से ज्यादा ताकतवर साबित होती है।

टॉर्च लेकर दोनों फिर उसी रास्ते पर निकल पड़े।

इस बार रास्ता पहले से ज्यादा सुनसान लग रहा था।

गांव की आखिरी झोपड़ी पार करते ही उन्हें एहसास हुआ कि हवा बिल्कुल बंद है।

पेड़ों की पत्तियां तक नहीं हिल रही थीं।

कब्रिस्तान पहुंचकर उन्होंने सीधे ताबूत की तरफ देखा।

और वहीं रुक गए।

ताबूत पहले जैसी जगह पर नहीं था।

कम से कम उन्हें ऐसा ही लगा।

दोनों कई सेकंड तक उसे देखते रहे।

फिर उनमें से एक बोला—

“क्या यह कल यहां था?”

दूसरे ने जवाब नहीं दिया।

क्योंकि वह भी यही सोच रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे ताबूत कुछ फीट दाईं तरफ खिसक गया हो।

यह संभव नहीं था।

उसका वजन सैकड़ों किलो होगा।

और उसे हिलाने के निशान भी कहीं नहीं थे।

वे धीरे-धीरे पास पहुंचे।

इस बार ताबूत की सतह पर नई खरोंचें दिखाई दे रही थीं।

लंबी।

गहरी।

जैसे किसी ने अंदर से लकड़ी पर नाखून घिसे हों।

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

उनके चेहरे पर पहली बार असली डर दिखाई दिया।

तभी पीछे से किसी के चलने की आवाज आई।

वे तुरंत पलटे।

लेकिन वहां कोई नहीं था।

सिर्फ कब्रें थीं।

और चांदनी।

कुछ सेकंड बाद फिर वही आवाज आई।

इस बार बाईं तरफ से।

फिर दाईं तरफ से।

जैसे कोई उन्हें दिखाई दिए बिना उनके चारों ओर घूम रहा हो।

अब दोनों वापस जाने के लिए मुड़े।

लेकिन तभी उनमें से एक की टॉर्च बंद हो गई।

उसने कई बार स्विच दबाया।

कुछ नहीं हुआ।

उसी समय उसे अपने बिल्कुल पीछे किसी की सांस महसूस हुई।

गर्म।

धीमी।

और बहुत करीब।

उसने पलटकर देखा।

वहां कोई नहीं था।

लेकिन उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।

दोनों बिना रुके गांव की तरफ भागे।

उस रात उनमें से किसी ने भी इस घटना का जिक्र नहीं किया।

लेकिन सुबह होने तक एक और समस्या खड़ी हो चुकी थी।

जो लड़का सबसे पहले ताबूत को छूकर आया था, वह बुखार में जल रहा था।

उसकी आंखें लाल थीं।

और वह नींद में लगातार कुछ बड़बड़ा रहा था।

घर वालों को लगा कि मौसम की वजह होगी।

लेकिन दोपहर में उसने अचानक आंखें खोलीं और बोला—

“वह बाहर आना चाहता है।”

कमरे में बैठे सभी लोग चुप हो गए।

“कौन?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस छत की तरफ देखने लगा।

फिर मुस्कुराया।

वह मुस्कान उसकी अपनी नहीं लग रही थी।

उस रात उसकी हालत और खराब हो गई।

आधी रात के बाद उसने अचानक घर से बाहर निकलने की कोशिश की।

परिवार वालों ने रोक लिया।

लेकिन वह बार-बार एक ही बात दोहरा रहा था—

“मुझे उसके पास जाना है।”

सुबह होते ही गांव के सबसे बुजुर्ग आदमी को बुलाया गया।

वह चुपचाप बीमार लड़के के पास बैठा रहा।

फिर उसने सिर्फ एक सवाल पूछा—

“तुम लोग कब्रिस्तान गए थे?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

सच्चाई सामने आ गई।

बुजुर्ग आदमी का चेहरा उतर गया।

उसने तुरंत बाकी तीनों को बुलाया।

फिर पहली बार उसने वह कहानी सुनाई जिसे गांव में लगभग भुला दिया गया था।

करीब सौ साल पहले गांव के बाहर एक आदमी रहता था।

कोई नहीं जानता था कि वह कहां से आया था।

उसने कब्रिस्तान के पास एक पत्थर का कमरा बना लिया था।

दिन में शायद ही कभी दिखाई देता।

रात में अकेला घूमता रहता।

शुरुआत में लोगों ने ध्यान नहीं दिया।

लेकिन फिर गांव में अजीब घटनाएं शुरू हुईं।

कई कब्रें खुदी हुई मिलने लगीं।

जानवर गायब होने लगे।

और कुछ लोगों ने दावा किया कि उन्होंने रात में किसी को कब्रिस्तान में खड़े देखा है।

एक रात गांव वालों ने उस आदमी को पकड़ लिया।

लेकिन उसके कमरे में जो मिला, उसे देखकर लोग डर गए।

पुरानी हड्डियां।

अजीब निशान।

और दर्जनों नाम।

ऐसे लोगों के नाम जो वर्षों पहले मर चुके थे।

गुस्से में गांव वालों ने उसे मारने की कोशिश की।

लेकिन गांव के एक बूढ़े पुजारी ने मना कर दिया।

उसका कहना था कि अगर वह आदमी मर गया तो समस्या खत्म नहीं होगी।

इसलिए उसे एक खास ताबूत में बंद कर दिया गया।

लोहे की पट्टियों से जकड़कर।

और कब्रिस्तान के बीच छोड़ दिया गया।

मरने के लिए।

लेकिन अगले कई वर्षों तक लोगों ने दावा किया कि रात में ताबूत के आसपास किसी की परछाईं दिखाई देती थी।

धीरे-धीरे समय बीत गया।

लोग बदल गए।

लेकिन चेतावनी बची रही।

और अब…

किसी ने फिर उस चीज को परेशान कर दिया था।

कहानी सुनने के बाद चारों दोस्तों के चेहरे उतर चुके थे।

उन्होंने उसी दिन गांव छोड़ने का फैसला किया।

लेकिन जब वे सामान बांध रहे थे, तभी गांव में हड़कंप मच गया।

क्योंकि बीमार लड़का गायब हो चुका था।

खिड़की अंदर से बंद थी।

दरवाजा भी।

फिर भी वह कमरे में नहीं था।

पूरा गांव उसे खोजने निकल पड़ा।

घंटों तलाश चली।

शाम होने लगी।

और आखिरकार वह मिला।

कब्रिस्तान में।

काले ताबूत के सामने।

घुटनों के बल बैठा हुआ।

जैसे किसी से बात कर रहा हो।

लोग धीरे-धीरे उसके करीब पहुंचे।

लेकिन वहां पहुंचकर उनके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

क्योंकि वह अकेला नहीं था।

ताबूत के दूसरी तरफ भी कोई बैठा हुआ था।

पहले लोगों को लगा कोई आदमी है।

लेकिन जब वह आकृति उठी…

तो सब पीछे हट गए।

वह असामान्य रूप से लंबी थी।

उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

फिर भी ऐसा लग रहा था कि वह मुस्कुरा रही है।

अगले ही पल पूरे कब्रिस्तान में तेज हवा चलने लगी।

टॉर्च बुझ गईं।

लोग चीखने लगे।

और जब कुछ सेकंड बाद सब सामान्य हुआ…

तो दोनों गायब थे।

बीमार लड़का भी।

और वह आकृति भी।

सिर्फ ताबूत बचा था।

पहले की तरह।

शांत।

बंद।

जैसे वहां कभी कुछ हुआ ही न हो।

लेकिन असली डर अभी शुरू हुआ था।

क्योंकि उसी रात गांव के अलग-अलग घरों में लोगों ने एक जैसी बात महसूस की।

उन्हें लगा जैसे कोई खिड़की के बाहर खड़ा है।

दिखाई नहीं दे रहा।

लेकिन मौजूद है।

और अगले दिन सुबह…

कब्रिस्तान में सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई ताजा पैरों के निशान मिले।

ऐसे पैरों के निशान जो गांव से निकलकर ताबूत तक जाते थे।

लेकिन वापस नहीं आते थे…

कब्रिस्तान में मिले उन पैरों के निशानों ने पूरे गांव को डरा दिया था।

पहले लोग इसे अफवाह समझ रहे थे।

अब उनके पास डरने की वजह थी।

निशान सिर्फ एक आदमी के नहीं थे।

कम से कम सात या आठ अलग-अलग लोगों के पैरों के निशान वहां दिखाई दे रहे थे।

सबके निशान गांव की तरफ से आ रहे थे।

लेकिन कोई भी वापस नहीं गया था।

जैसे सभी लोग ताबूत तक पहुंचे और फिर हवा में गायब हो गए हों।

उस दिन गांव में कोई खेत पर नहीं गया।

दुकानें जल्दी बंद हो गईं।

सूरज ढलने से पहले ही लोग घरों में बंद हो चुके थे।

उधर बाकी तीन दोस्त भी गांव छोड़ने की तैयारी कर रहे थे।

लेकिन समस्या यह थी कि उनका चौथा साथी अभी तक नहीं मिला था।

जीवित है या नहीं…

किसी को नहीं पता था।

उनमें से एक ने कहा—

“हम पुलिस को बुलाते हैं।”

लेकिन गांव वालों ने सिर हिला दिया।

“पहले भी बुला चुके हैं।”

“क्या मतलब?”

तब एक बुजुर्ग ने बताया कि करीब बारह साल पहले भी ऐसी ही घटना हुई थी।

एक आदमी रात में कब्रिस्तान गया था।

अगले दिन गायब हो गया।

पुलिस आई।

जांच हुई।

लेकिन कुछ नहीं मिला।

मामला धीरे-धीरे बंद हो गया।

और फिर कुछ साल बाद वही घटना दोबारा हुई।

उसके बाद गांव वालों ने बाहरी लोगों को उस जगह के बारे में बताना ही बंद कर दिया।

अब वही चक्र फिर शुरू हो चुका था।

उस रात तीनों दोस्तों ने तय किया कि सुबह होते ही गांव छोड़ देंगे।

लेकिन रात ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था।

आधी रात के बाद अचानक पूरे घर की बिजली चली गई।

पहले तो उन्हें लगा कि सामान्य कटौती होगी।

लेकिन कुछ सेकंड बाद उन्हें एहसास हुआ कि गांव के बाकी घरों में भी अंधेरा है।

पूरा गांव काले साये में डूब चुका था।

एक दोस्त खिड़की तक गया।

और वहीं जम गया।

उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

बाकी दोनों तुरंत उसके पास पहुंचे।

“क्या हुआ?”

उसने कांपते हुए बाहर इशारा किया।

दूर…

कब्रिस्तान की दिशा में…

एक हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

जैसे किसी ने वहां दर्जनों लालटेन जला दी हों।

लेकिन असली डर रोशनी नहीं थी।

रोशनी के चारों तरफ खड़ी आकृतियां थीं।

दर्जनों आकृतियां।

बिल्कुल स्थिर।

बिना हिले।

बिना आवाज किए।

तीनों कई मिनट तक खिड़की से देखते रहे।

फिर अचानक उनमें से एक आकृति ने सिर घुमाया।

सीधे उनकी तरफ।

घर का दरवाजा उसी समय जोर से हिला।

धड़ाम!

तीनों उछल पड़े।

फिर दूसरी आवाज आई।

इस बार पीछे वाले दरवाजे से।

फिर खिड़की से।

फिर छत से।

जैसे कोई या कुछ पूरे घर को चारों तरफ से घेर चुका हो।

कोई बाहर जाने की हिम्मत नहीं कर पाया।

यह सिलसिला लगभग एक घंटे तक चलता रहा।

और फिर अचानक सब शांत हो गया।

इतना शांत कि अपनी सांसों की आवाज भी सुनाई देने लगी।

सुबह होने पर गांव वालों ने देखा कि पूरे गांव के बाहर मिट्टी में सैकड़ों पैरों के निशान बने हुए थे।

लेकिन किसी ने रात में किसी आदमी को चलते नहीं देखा था।

अब डर दहशत में बदल चुका था।

उसी दोपहर गांव के सबसे पुराने मंदिर के पुजारी को बुलाया गया।

वह लगभग अस्सी साल का था।

कमजोर था।

लेकिन जैसे ही उसने ताबूत का नाम सुना, उसका चेहरा बदल गया।

उसने गांव वालों से कहा—

“अगर देर हुई तो इस बार सिर्फ कुछ लोग नहीं, पूरा गांव भुगतेगा।”

फिर उसने एक पुरानी तांबे की पेटी मंगवाई।

उस पेटी में पुराने दस्तावेज और कुछ पीले पड़े कागज थे।

घंटों तक वह उन्हें पढ़ता रहा।

आखिर उसे वह चीज मिल गई जिसे वह खोज रहा था।

एक पुराना हस्तलिखित रिकॉर्ड।

उसमें उस आदमी का असली नाम लिखा था जिसे वर्षों पहले ताबूत में बंद किया गया था।

नाम था—

निरंजन।

लेकिन वह साधारण इंसान नहीं था।

वह कब्रों से जुड़ी एक प्रतिबंधित साधना करता था।

लोगों का मानना था कि वह मृत लोगों की यादों और डर को अपने अंदर खींच सकता था।

धीरे-धीरे वह इतना खतरनाक हो गया कि गांव वालों ने उसे पकड़ लिया।

लेकिन उसे मारा नहीं जा सका।

क्योंकि मरने के बाद भी उसकी मौजूदगी खत्म नहीं हो रही थी।

आखिर एक विशेष अनुष्ठान के बाद उसे ताबूत में बंद कर दिया गया।

और तब से वह वहीं था।

पुजारी ने रिकॉर्ड बंद किया।

फिर धीमी आवाज में कहा—

“समस्या यह नहीं कि वह बाहर आना चाहता है।”

“समस्या क्या है?”

“वह बाहर आ चुका है।”

कमरे में बैठे लोगों का खून जम गया।

अगर वह बाहर था…

तो ताबूत में क्या था?

उस सवाल का जवाब उसी रात मिला।

पुजारी, गांव के कुछ लोग और बचे हुए तीन दोस्त साथ में कब्रिस्तान पहुंचे।

इस बार किसी ने छिपकर जाने की कोशिश नहीं की।

वे सीधे ताबूत तक पहुंचे।

चांद बादलों में छिपा हुआ था।

टॉर्च की रोशनी ताबूत पर पड़ी।

और पहली बार सबने एक चीज नोटिस की।

ताबूत का ढक्कन पूरी तरह बंद नहीं था।

उसके बीच में एक पतली दरार दिखाई दे रही थी।

पुजारी आगे बढ़ा।

उसने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

हवा अचानक ठंडी हो गई।

पेड़ जोर-जोर से हिलने लगे।

और तभी…

ताबूत के अंदर से आवाज आई।

लेकिन इस बार आवाज खरोंचने की नहीं थी।

आवाज किसी आदमी की थी।

बहुत कमजोर।

बहुत थकी हुई।

“मुझे बाहर निकालो…”

कुछ लोग पीछे हट गए।

लेकिन पुजारी वहीं खड़ा रहा।

आवाज फिर आई।

“मैं अभी भी अंदर हूं…”

तीनों दोस्तों के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

क्योंकि यही वाक्य उन्होंने सपने में सुना था।

पुजारी ने कांपते हाथों से ढक्कन पर हाथ रखा।

फिर धीरे-धीरे उसे ऊपर उठाया।

सभी लोग सांस रोके खड़े थे।

ढक्कन खुला।

और अंदर जो था…

उसे देखकर किसी की भी आवाज नहीं निकली।

क्योंकि अंदर कोई राक्षस नहीं था।

कोई सड़ी हुई लाश नहीं थी।

अंदर एक आदमी था।

जीवित।

कमजोर।

सूखा हुआ।

और वह बिल्कुल वैसा दिख रहा था जैसा वर्षों पहले गायब हुआ पहला व्यक्ति दिखता था।

वह आदमी जिसने बारह साल पहले कब्रिस्तान में कदम रखा था…

और फिर कभी वापस नहीं मिला था।

उसने धीरे से आंखें खोलीं।

और फुसफुसाया—

“उसे मत ढूंढो…”

“किसे?”

उसकी आंखों में आतंक भर गया।

“वह हम सबके बीच चल रहा है…”

इतना कहकर वह बेहोश हो गया।

उसी पल कब्रिस्तान के दूसरे छोर से किसी के हंसने की आवाज आई।

धीमी।

लेकिन साफ।

सभी लोगों ने मुड़कर देखा।

दूर अंधेरे में एक आदमी खड़ा था।

स्थिर।

चुप।

और उसकी आंखें सीधे उनकी तरफ थीं।

पुजारी उसे देखते ही फुसफुसाया—

“निरंजन…”

और तभी वह आकृति मुस्कुराई।

फिर धीरे-धीरे अंधेरे में पीछे हट गई।

और गायब हो गई।

सब समझ चुके थे।

असल कैद ताबूत के अंदर नहीं थी।

असल कैद उन लोगों की थी जिन्हें उसने वर्षों में पकड़ लिया था।

और अब…

वह आज़ाद घूम रहा था।

लेकिन उसे रोकने का एक आखिरी तरीका अभी भी बाकी था…

कब्रिस्तान में मौजूद किसी भी व्यक्ति ने उस रात दोबारा बोलने की हिम्मत नहीं की।

दूर अंधेरे में दिखाई देने वाली वह आकृति गायब हो चुकी थी, लेकिन उसका असर अभी भी सबके चेहरों पर साफ दिखाई दे रहा था।

पुजारी घुटनों के बल बैठ गया।

उसकी सांसें तेज चल रही थीं।

वह उस आदमी को देख रहा था जो ताबूत के अंदर मिला था।

बारह साल पहले गायब हुआ इंसान।

बारह साल।

किसी बंद ताबूत में कोई आदमी बारह साल तक जिंदा नहीं रह सकता।

यह बात वहां मौजूद हर व्यक्ति जानता था।

फिर भी वह आदमी उनके सामने था।

कमजोर।

डरा हुआ।

लेकिन जिंदा।

कुछ देर बाद उसे गांव लाया गया।

डॉक्टर बुलाया गया।

जांच हुई।

लेकिन जितनी जांच हुई, रहस्य उतना ही गहरा होता गया।

उसके शरीर पर उम्र बढ़ने के सामान्य निशान नहीं थे।

ऐसा लग रहा था जैसे उसके लिए समय लगभग रुक गया हो।

वह बार-बार एक ही बात कह रहा था—

“उसे गांव से बाहर मत जाने देना।”

लेकिन वह यह नहीं बता पा रहा था कि उसे कैसे रोका जाए।

उस रात गांव में किसी ने नींद नहीं ली।

हर घर में लोग जाग रहे थे।

दरवाजे बंद थे।

खिड़कियां बंद थीं।

लेकिन डर फिर भी अंदर मौजूद था।

सुबह होते ही पुजारी ने गांव के कुछ बुजुर्गों को बुलाया।

उनमें वह लोग भी शामिल थे जिनके परिवारों ने पीढ़ियों से उस ताबूत की कहानी सुनी थी।

कई घंटों तक चर्चा चली।

पुराने दस्तावेज देखे गए।

पुरानी बातें याद की गईं।

आखिरकार एक बात सामने आई।

जिस रात निरंजन को ताबूत में बंद किया गया था, उस रात सिर्फ एक अनुष्ठान नहीं हुआ था।

दो अनुष्ठान हुए थे।

पहला उसे कैद करने के लिए।

दूसरा उसकी पहचान मिटाने के लिए।

क्योंकि गांव वालों का मानना था कि जब तक लोग उसका नाम याद रखेंगे, उसका प्रभाव बना रहेगा।

समस्या यह थी कि वर्षों बाद उसका नाम फिर सामने आ चुका था।

और शायद इसी वजह से वह दोबारा ताकतवर हो गया था।

पुजारी ने फैसला किया।

अगली रात अंतिम प्रयास किया जाएगा।

अगर वह असफल रहा…

तो गांव हमेशा के लिए छोड़ना पड़ेगा।

दिन किसी तरह गुजर गया।

शाम हुई।

फिर रात।

इस बार पूरा गांव कब्रिस्तान नहीं गया।

सिर्फ पुजारी, तीन दोस्त और कुछ चुनिंदा लोग गए।

आसमान बादलों से ढका हुआ था।

दूर बिजली चमक रही थी।

कब्रिस्तान पहुंचते ही सबको एहसास हो गया कि कुछ बदल चुका है।

कई पुरानी कब्रें टूटी हुई थीं।

जमीन पर ताजा दरारें थीं।

और सबसे अजीब बात…

काला ताबूत फिर खुला हुआ था।

हालांकि पिछली रात उसे बंद किया गया था।

पुजारी आगे बढ़ा।

उसने जमीन पर एक घेरा बनाया।

कुछ पुराने मंत्र पढ़े।

फिर ताबूत की तरफ देखने लगा।

मिनट गुजरने लगे।

कुछ नहीं हुआ।

फिर अचानक तापमान गिरने लगा।

सांसों से धुंध निकलने लगी।

पेड़ों की शाखाएं जोर-जोर से हिलने लगीं।

और तभी…

कब्रिस्तान के अलग-अलग हिस्सों से लोग दिखाई देने लगे।

पहले एक।

फिर दो।

फिर पांच।

फिर दर्जनों।

वे सभी धीरे-धीरे चलते हुए ताबूत की तरफ आ रहे थे।

उनमें से कुछ चेहरों को गांव वाले पहचानते थे।

वे लोग जो वर्षों पहले गायब हो चुके थे।

कुछ ऐसे थे जिन्हें मरे हुए दशकों हो चुके थे।

लेकिन वे वहां थे।

चलते हुए।

खाली आंखों के साथ।

जैसे किसी और के आदेश का पालन कर रहे हों।

तीनों दोस्तों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उनका गायब साथी भी उनमें शामिल था।

वह भी उसी भीड़ के साथ चल रहा था।

लेकिन उसकी आंखों में कोई पहचान नहीं बची थी।

भीड़ धीरे-धीरे ताबूत के चारों तरफ जमा हो गई।

और फिर उनके बीच से एक आदमी बाहर आया।

साधारण कपड़े।

साधारण चेहरा।

अगर कोई उसे सड़क पर देखता तो शायद ध्यान भी नहीं देता।

लेकिन उसकी आंखें…

वे आंखें सामान्य नहीं थीं।

उनमें उम्र नहीं थी।

भावना नहीं थी।

सिर्फ एक ठंडी स्थिरता थी।

पुजारी ने उसे देखते ही सिर झुका लिया।

“निरंजन।”

आदमी मुस्कुराया।

“इतने साल बाद भी मुझे याद रखा गया।”

उसकी आवाज बिल्कुल सामान्य थी।

यही बात सबसे ज्यादा डरावनी थी।

वह किसी राक्षस की तरह नहीं बोल रहा था।

वह एक साधारण इंसान की तरह बोल रहा था।

निरंजन ने चारों तरफ देखा।

फिर बोला—

“तुम लोगों ने मुझे कैद नहीं किया था।”

“तो फिर क्या किया था?” पुजारी ने पूछा।

“मुझे इंतजार करना सिखाया था।”

उसके शब्दों के बाद पूरे कब्रिस्तान में अजीब खामोशी फैल गई।

फिर उसने ताबूत की तरफ इशारा किया।

“असल जेल यह कभी थी ही नहीं।”

पुजारी सब समझ चुका था।

ताबूत सिर्फ प्रतीक था।

असल कैद लोगों के डर में थी।

पीढ़ियों तक लोग उस कहानी को याद रखते रहे।

और उसी डर ने उस चीज को जिंदा रखा।

पुजारी ने आंखें बंद कर लीं।

अब उसे अंतिम उपाय समझ आ चुका था।

उसने गांव वालों की तरफ देखा।

फिर जोर से बोला—

“नीचे देखो।”

सब चौंक गए।

“क्या?”

“उसकी तरफ मत देखो। उसकी बात मत सुनो।”

लोग समझ नहीं पाए।

लेकिन उन्होंने वैसा ही किया।

धीरे-धीरे सभी ने नजरें झुका लीं।

निरंजन हंसने लगा।

पहले धीमे।

फिर जोर से।

फिर उसकी आवाज गुस्से में बदलने लगी।

वह लोगों को पुकारता रहा।

उन्हें देखने के लिए मजबूर करता रहा।

लेकिन कोई नहीं देख रहा था।

कोई जवाब नहीं दे रहा था।

कुछ मिनट बाद उसकी आवाज कमजोर होने लगी।

फिर और कमजोर।

फिर…

अचानक सब शांत हो गया।

जब लोगों ने सिर उठाया…

तो कब्रिस्तान खाली था।

निरंजन गायब था।

वे सभी लोग भी गायब थे जो उसके साथ खड़े थे।

सिर्फ काला ताबूत बचा था।

पहले की तरह।

स्थिर।

खामोश।

उस रात के बाद गांव में फिर कभी कोई गायब नहीं हुआ।

धीरे-धीरे लोग सामान्य जिंदगी में लौट आए।

साल गुजर गए।

फिर दशक गुजर गए।

कहानी भी लगभग भुला दी गई।

लेकिन पूरी तरह नहीं।

क्योंकि आज भी उस गांव में एक नियम है।

कब्रिस्तान में जाओ तो जा सकते हो।

पुरानी कब्रें भी देख सकते हो।

लेकिन बीच में रखे काले ताबूत के पास मत रुकना।

क्योंकि गांव के कुछ लोग दावा करते हैं कि देर रात कभी-कभी वहां कोई आदमी बैठा दिखाई देता है।

साधारण कपड़ों में।

साधारण चेहरे के साथ।

वह किसी को डराता नहीं।

पीछा नहीं करता।

बस ताबूत पर बैठकर आने-जाने वालों को देखता रहता है।

और अगर कोई उससे पूछ बैठे—

“तुम कौन हो?”

तो वह मुस्कुराकर सिर्फ एक जवाब देता है—

“मैं अभी भी इंतजार कर रहा हूं।”

इसके बाद वह आदमी फिर कभी दिखाई नहीं देता।

लेकिन जिसने भी उससे यह जवाब सुना…

उसने दोबारा कभी उस कब्रिस्तान का रास्ता नहीं लिया।


The End – Kahani Yahin Khatam Nahi Hoti

अगर आपको ये Horror Story पसंद आई हो, तो रात में अकेले मत पढ़ना… क्योंकि कुछ कहानियाँ सिर्फ कहानी नहीं होतीं।

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