BY GOVIND BHISE
रात के ठीक 2:13 बजे उसकी नींद खुल जाती थी। हर रोज़। शुरुआत में उसे लगा शायद यह सिर्फ़ उसकी खराब sleeping routine की वजह से हो रहा है। Freelance काम करते-करते उसकी रातें वैसे भी लंबी हो चुकी थीं। कभी सुबह तक laptop पर काम, कभी पूरी रात coffee पीकर deadlines पूरी करना…

लेकिन कुछ दिनों बाद उसे एहसास हुआ कि उसकी आंख अपने आप नहीं खुलती थी।
कोई उसे जगाता था।
“टक… टक… टक…”
धीमी आवाज़।
जैसे कोई उंगली से उसकी खिड़की पर दस्तक दे रहा हो।
सबसे डरावनी बात ये थी कि उसका फ्लैट सातवीं मंज़िल पर था।
और खिड़की के बाहर खड़े होने की कोई जगह नहीं थी। Bhoot Wali Kahani
वह कुछ ही दिनों पहले उस apartment में shift हुई थी। शहर के शोर से दूर, शांत जगह थी इसलिए उसे flat पसंद आ गया था। पुरानी बिल्डिंग थी, लेकिन किराया कम था और उसे अपने writing work के लिए बस सुकून चाहिए था।
बिल्डिंग का नाम था — शांति सदन अपार्टमेंट।
नाम सुनने में जितना अच्छा लगता था, जगह उतनी अजीब थी।
कॉरिडोर में हमेशा सीलन की बदबू रहती। रात में lift कभी-कभी अपने आप किसी floor पर रुक जाती। कई बार खाली hallway में भी ऐसा लगता जैसे कोई धीरे-धीरे चल रहा हो।
उसने शुरू में इन बातों पर ध्यान नहीं दिया।
फ्लैट नंबर था 702।
चाबी देते वक्त broker ने बस एक बात कही थी—
“मैडम… रात में खिड़की बंद रखा कीजिएगा।”
उसने हंसकर पूछा,
“क्यों? चोरी का डर है क्या?”
लेकिन broker ने जवाब नहीं दिया।
बस नजरें झुकाकर चला गया।
उस समय उसे ये बात अजीब लगी थी।
अब डरावनी लगने लगी थी।
तीसरी रात पहली बार उसने उसे देखा।
बाहर हल्की बारिश हो रही थी। कमरे की सारी लाइट बंद थीं। सिर्फ laptop screen की हल्की नीली रोशनी कमरे में फैल रही थी। तभी वही आवाज आई—
“टक… टक… टक…”
उसने घड़ी देखी।
2:13 AM.
इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।
सीधे खिड़की से।
उसका गला सूख गया।
कुछ सेकंड तक वह बिस्तर पर बैठी रही। खुद को समझाती रही कि शायद हवा होगी… शायद किसी pipe की आवाज होगी…
लेकिन अंदर कहीं उसे पता था कि ऐसा नहीं है।
वह धीरे-धीरे खिड़की के पास गई।
हाथ बढ़ाकर पर्दा हटाया।
और उसी पल उसका पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
Bhoot Wali Kahani |
खिड़की के बाहर एक लड़का खड़ा था।
बारह-तेरह साल का।
सफेद school shirt… भीगे हुए बाल… चेहरा इतना पीला जैसे कई दिनों से धूप नहीं देखी… और आंखें…
पूरी तरह खाली।
वह बस उसे देख रहा था।
सातवीं मंज़िल की खिड़की के बाहर।
जैसे हवा में खड़ा हो।
उसकी चीख निकल गई। वह पीछे हट गई। कुछ सेकंड बाद जब उसने दोबारा बाहर देखा…
वह वहां नहीं था।
उस रात के बाद सब बदल गया।
अब हर रात ठीक 2:13 बजे वही tapping शुरू हो जाती।
कभी खिड़की पर छोटे-छोटे हाथों के गीले निशान दिखाई देते।
कभी शीशे पर धुंध जम जाती और उसमें उंगली से लिखा होता—
“मुझे अंदर आने दो।”
धीरे-धीरे उसका डर बढ़ने लगा।
उसे रात में नींद आना बंद हो गया। कभी kitchen में किसी के चलने की आवाज आती। कभी bathroom का tap अपने आप खुल जाता। एक रात तो उसे साफ महसूस हुआ कि उसके कमरे में कोई खड़ा है।
जबकि फ्लैट में वह अकेली थी।
डरकर उसने मकान मालिक को फोन किया।
“सर… इस फ्लैट में पहले कौन रहता था?”
फोन पर कुछ सेकंड तक चुप्पी रही।
फिर उसने धीरे से पूछा—
“आपको किसने क्या बताया?”
उसकी सांस अटक गई।
“मतलब यहां पहले कुछ हुआ था?”
लेकिन जवाब देने के बजाय उसने कॉल काट दिया।
अगले दिन वह नीचे बैठे पुराने चौकीदार के पास गई। पहले तो वह कुछ बोलने को तैयार नहीं हुआ। लेकिन बहुत पूछने के बाद उसने डरते हुए कहा—
“बेटी… उस खिड़की से दूर रहना।”
“क्यों?”
उसने कुछ सेकंड तक उसकी तरफ देखा। फिर धीमी आवाज में बोला—
“क्योंकि जो लड़का तुम्हें दिखता है… वो ज़िंदा नहीं है।”
उसके हाथ ठंडे पड़ गए।
चौकीदार ने बताया कि कई साल पहले उसी फ्लैट में एक परिवार रहता था। उनका बेटा अचानक बदलने लगा था। वह रात में खिड़की से बातें करता था। कहता था कि बाहर कोई उसे बुलाता है।
फिर एक रात वह गायब हो गया।
तीन दिन बाद उसकी लाश बिल्डिंग के पीछे मिली।
सबने कहा accident था।
लेकिन चौकीदार ने धीरे से कहा—
“वो गिरा नहीं था…”
“तो?”
“उसे बुलाया गया था।”
उस रात वह बिल्कुल नहीं सोई।
करीब दो बजे फिर वही आवाज शुरू हुई।
“टक… टक… टक…”
लेकिन इस बार आवाज पहले से ज्यादा तेज थी।
उसने डरते-डरते खिड़की की तरफ देखा।
बाहर वही लड़का खड़ा था।
लेकिन इस बार उसके पीछे कोई और भी था।
एक लंबा काला साया।
इतना लंबा कि उसका सिर खिड़की के ऊपर तक जा रहा था। उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। बस ऐसा लग रहा था जैसे अंधेरा खुद इंसान बनकर खड़ा हो।
कमरे का तापमान अचानक बहुत ठंडा हो गया।
उसकी सांसों से धुंध निकलने लगी।
फिर खिड़की के दूसरी तरफ से एक भारी आवाज गूंजी—
“खिड़की खोलो…”
उसकी रीढ़ में जैसे बर्फ उतर गई।
उसी पल लड़के ने धीरे से सिर हिलाया।
जैसे वह उसे मना कर रहा हो।
तब उसे पहली बार एहसास हुआ—
वो लड़का उसे डराने नहीं आता था।
वो उसे चेतावनी देने आता था।
अचानक कमरे की सारी लाइट बंद हो गई।
पंखा रुक गया।
कॉरिडोर से किसी के दौड़ने की आवाज आने लगी।
फिर दीवारों के पीछे से फुसफुसाहट सुनाई दी—
“मुझे अंदर आने दो…”
आवाज इंसान जैसी नहीं थी।
जैसे कई आवाजें एक साथ बोल रही हों।
खिड़की अपने आप हिलने लगी।
धीरे-धीरे।
जैसे बाहर से कोई उसे खींच रहा हो।
वह डरकर पीछे हट गई। तभी उसकी नजर कमरे के कोने में रखी पुरानी अलमारी पर गई।
अलमारी का दरवाज़ा अपने आप खुल चुका था।
डरते-डरते वह उसके पास गई।
अंदर नीचे की तरफ लकड़ी का एक हिस्सा ढीला था। उसने कांपते हाथों से उसे हटाया।
अंदर एक पुरानी diary रखी थी।
धूल से भरी हुई।
उसने diary खोली।
पहले कुछ pages बिल्कुल normal थे। स्कूल की बातें… drawings… छोटी-छोटी बातें…
फिर लिखावट बदलने लगी।
“मम्मी कहती हैं कोई नहीं है… लेकिन मैं उसे देखता हूं।”
“वो हर रात खिड़की के बाहर खड़ा रहता है।”
“वो कहता है दरवाज़ा खोलो।”
“वो लड़का नहीं है।”
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
आखिरी page पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“अगर वो अंदर आ गया… तो मैं कभी वापस नहीं आऊंगा।”
उसी पल पीछे से किसी ने धीरे से फुसफुसाया—
“रिया…”
उसका पूरा शरीर जम गया।
धीरे-धीरे उसने पीछे मुड़कर देखा।
वही लड़का कमरे के अंदर खड़ा था।
पहली बार।
उसके कपड़ों से पानी टपक रहा था। चेहरा पहले से ज्यादा डरा हुआ लग रहा था।
उसने कांपती आवाज में कहा—
“वो आ गया है…”
अचानक खिड़की जोर से खुल गई।
ठंडी हवा पूरे फ्लैट में फैल गई।
और उसी पल वह काला साया खिड़की के बाहर दिखाई दिया।
इस बार पहले से कहीं ज्यादा करीब।
इतना करीब कि उसकी लंबी उंगलियां खिड़की के किनारे तक पहुंच रही थीं।
फिर वही भारी आवाज गूंजी—
“तुमने देर कर दी…”
पूरा कमरा कांपने लगा।
दीवारों पर दरारें आने लगीं। kitchen के बर्तन अपने आप गिरने लगे। ऊपर लगी tube light बार-बार blink करने लगी।
वह रोते हुए पीछे हट गई।
“तुम चाहते क्या हो?”
कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर वह चीज़ धीरे से बोली—
“अंदर आना…”
उसी पल लड़के ने जोर से चिल्लाया—
“डायरी जला दो!”
उसके पास सोचने का समय नहीं था।
उसने diary उठाई और भागकर kitchen में गई। हाथ इतने कांप रहे थे कि lighter ठीक से जल ही नहीं रहा था।
पीछे से footsteps की आवाज करीब आती जा रही थी।
धीमी…
घसीटती हुई…
फिर अचानक पूरे flat की lights बंद हो गईं।
अब सिर्फ बाहर बिजली चमकने पर कुछ सेकंड के लिए सब दिखाई देता था।
और हर बार बिजली चमकने पर वह साया पहले से ज्यादा करीब नजर आता।
आखिर lighter जल गया।
उसने तुरंत diary को आग लगा दी।
जैसे ही आग pages तक पहुंची, पूरा flat जोर से हिल उठा।
एक भयानक चीख पूरे कमरे में गूंज गई।
ऐसी आवाज जिसे सुनकर उसका सिर दर्द से फटने लगा।
दीवारों से जैसे सैकड़ों लोग एक साथ चिल्ला रहे हों।
“मत जलाओ…”
“ये बच्चा मेरा है…”
“खिड़की खोलो…”
उसने डर के मारे आंखें बंद कर लीं लेकिन diary हाथ से नहीं छोड़ी।
कुछ सेकंड बाद अचानक सब शांत हो गया।
पूरी तरह।
ना हवा।
ना footsteps।
ना फुसफुसाहट।
धीरे-धीरे उसने आंखें खोलीं।
कमरा बिल्कुल शांत था।
खिड़की बंद थी।
और बाहर सिर्फ हल्की बारिश हो रही थी।
वह लड़का अब वहां नहीं था।
लेकिन खिड़की के धुंधले शीशे पर उंगली से एक आखिरी शब्द लिखा हुआ था—
“धन्यवाद।”
सुबह होते ही उसने वो flat छोड़ दिया।
उसने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।
कई महीनों बाद उस फ्लैट में नए लोग रहने आए।
पहली दो रातें बिल्कुल normal रहीं।
फिर तीसरी रात 2:13 बजे police station में एक call आया।
डरी हुई आवाज थी।
“मेरी खिड़की के बाहर कोई लड़का खड़ा है…”
जब police पहुंची, फ्लैट अंदर से locked था।
कमरे में कोई नहीं था।
लेकिन खिड़की के शीशे पर छोटे-छोटे गीले हाथों के निशान बने हुए थे।
और धुंध में लिखा था—
“मत खोलना।”
आज भी लोग कहते हैं कि शांति सदन अपार्टमेंट के फ्लैट 702 की खिड़की के बाहर हर रात एक लड़का खड़ा दिखाई देता है।
कुछ लोग कहते हैं वो मदद मांगता है।
कुछ कहते हैं वो चेतावनी देता है।
लेकिन एक बात सब जानते हैं—
अगर रात के 2:13 बजे आपकी खिड़की पर कोई दस्तक दे…
तो कभी मत खोलना।
क्योंकि बाहर जो खड़ा है…
वो शायद इंसान नहीं है।
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