BY GOVIND BHISE
चंद्रमुखी का नाम मैंने पहली बार किसी फिल्म में नहीं, बल्कि अपने दादा से सुना था। बचपन में जब गर्मियों की छुट्टियों में मैं गाँव जाता था, तो रात को खाने के बाद दादा अक्सर पुराने किस्से सुनाते थे। उनमें कुछ कहानियाँ डाकुओं की होती थीं, कुछ राजाओं की और कुछ ऐसी जिनका कोई स्पष्ट अंत नहीं होता था। उन्हीं कहानियों में एक नाम बार-बार आता था—चंद्रमुखी।
जब भी मैं पूछता कि वह कौन थी, दादा बस इतना कहते, “कुछ नामों को जानना अच्छा नहीं होता।” Chandramukhi Horror Story

उस समय मुझे यह सिर्फ डराने वाली बात लगती थी।
लेकिन कई साल बाद जब मैं खुद उस नाम से जुड़ी घटना का हिस्सा बना, तब समझ आया कि दादा की आँखों में डर क्यों दिखाई देता था।
यह घटना मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे के पास स्थित एक पुराने हवेली की है।
मैं तब एक Property Survey Company में काम करता था। हमारी टीम को पुराने भवनों का निरीक्षण करके उनकी रिपोर्ट तैयार करनी होती थी। एक दिन ऑफिस में मुझे एक नई Assignment मिली।
एक सौ साल पुरानी हवेली।
मालिक विदेश में रहता था और वह उसे बेचने की तैयारी कर रहा था।
काम आसान लग रहा था।
बस दो दिन रुककर पूरी Structure Report बनानी थी।
मैं और मेरा सहकर्मी निखिल वहाँ पहुँचे तो शाम हो चुकी थी।
सूरज ढल रहा था।
लाल रोशनी हवेली की दीवारों पर पड़ रही थी और पूरा भवन किसी पुराने चित्र जैसा दिखाई दे रहा था।
हवेली बहुत विशाल थी।
मुख्य दरवाज़ा लकड़ी का था, जिस पर महीन नक्काशी बनी हुई थी।
दीवारों पर समय के निशान साफ दिख रहे थे।
कहीं प्लास्टर उखड़ चुका था, कहीं बेलें चढ़ी हुई थीं।
लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि इतनी बड़ी जगह के आसपास कोई इंसान दिखाई नहीं दे रहा था।
गाँव मुश्किल से आधा किलोमीटर दूर था।
फिर भी हवेली के पास एक अजीब सन्नाटा पसरा हुआ था।
हमने सामान उतारा और अंदर प्रवेश किया।
अंदर कदम रखते ही ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ।
बाहर जून की गर्मी थी।
लेकिन अंदर का तापमान अचानक कम हो गया था।
निखिल ने हँसते हुए कहा, “AC लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी यहाँ।”
मैं भी मुस्करा दिया।
तब तक सब सामान्य लग रहा था।
हवेली के अंदर लंबा गलियारा था।
दोनों तरफ कमरे बने हुए थे।
छत बहुत ऊँची थी।
पुराने झूमर अब भी लटके हुए थे।
फर्श पर काले-सफेद संगमरमर की टाइलें थीं जिन पर समय की धूल जमी हुई थी।
हम कमरों का निरीक्षण करते हुए आगे बढ़े।
एक कमरे में पुराने फर्नीचर पड़े थे।
दूसरे में टूटे हुए शीशे।
तीसरे कमरे में दीवारों पर फीकी पड़ चुकी तस्वीरें लगी थीं।
उन्हीं तस्वीरों में एक तस्वीर ने मेरा ध्यान खींचा।
एक महिला की तस्वीर।
लंबे बाल।
बड़ी आँखें।
चेहरे पर हल्की मुस्कान।
Chandramukhi Horror Story
चित्र इतना जीवंत लग रहा था जैसे वह अभी बोल पड़ेगी।
नीचे सुनहरे अक्षरों में एक नाम लिखा था।
“चंद्रमुखी।”
निखिल ने तस्वीर देखकर कहा, “काफी सुंदर रही होगी।”
मैंने सिर हिलाया।
लेकिन न जाने क्यों उस तस्वीर को देखते समय मन में एक अजीब बेचैनी महसूस हुई।
जैसे कोई मुझे घूर रहा हो।
हमने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ गए।
रात तक रिपोर्ट का काफी काम पूरा हो चुका था।
हमने मुख्य हॉल के पास एक कमरा रहने के लिए चुन लिया।
जनरेटर चलाया।
कुछ खाना खाया।
फिर लैपटॉप पर नोट्स अपडेट करने लगे।
करीब ग्यारह बजे पहली अजीब घटना हुई।
ऊपर की मंजिल से घुंघरुओं की बहुत हल्की आवाज़ सुनाई दी।
जैसे कोई धीरे-धीरे चल रहा हो।
मैंने सोचा शायद हवा के कारण कोई धातु की चीज हिल रही होगी।
लेकिन निखिल भी आवाज़ सुन चुका था।
उसने लैपटॉप से नज़र उठाई।
“सुना?”
मैंने कहा, “हाँ।”
दोनों कुछ सेकंड चुप रहे।
फिर आवाज़ बंद हो गई।
हमने बात को वहीं खत्म कर दिया।
लेकिन लगभग पंद्रह मिनट बाद वही आवाज़ फिर सुनाई दी।
इस बार थोड़ी स्पष्ट।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई गलियारे में चल रहा हो।
निखिल ने टॉर्च उठाई।
“चलकर देखते हैं।”
हम सीढ़ियों की तरफ बढ़े।
पुरानी लकड़ी की सीढ़ियाँ हर कदम पर चरमराने लगीं।
ऊपर पहुँचकर हमने पूरा फ्लोर देखा।
हर कमरा बंद था।
कोई नहीं था।
लेकिन एक बात अजीब थी।
धूल से ढके फर्श पर ताज़ा पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।
नंगे पैर।
एक महिला के पैरों जैसे।
वे निशान गलियारे से शुरू होकर आखिरी कमरे तक जा रहे थे।
हम दोनों कुछ क्षण उन्हें देखते रहे।
निखिल ने धीरे से कहा, “यह पहले नहीं थे।”
मैंने जवाब नहीं दिया।
हम निशानों का पीछा करते हुए आखिरी कमरे तक पहुँचे।
दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर घुप अंधेरा था।
टॉर्च की रोशनी कमरे में फैली।
कमरा खाली था।
लेकिन कमरे के बीचोंबीच एक पुराना शीशा खड़ा था।
बहुत बड़ा।
लगभग छह फीट ऊँचा।
उसकी सतह पर धूल जमी हुई थी।
और उसी धूल पर किसी ने एक शब्द लिखा हुआ था।
“वापस जाओ।”
मेरे हाथ में पकड़ी टॉर्च हल्की काँप गई।
निखिल ने तुरंत कहा, “कोई मज़ाक कर रहा है।”
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
बिल्कुल कोई नहीं।
हम नीचे लौट आए।
उस रात किसी तरह नींद आ गई।
लेकिन सुबह जब मेरी आँख खुली तो निखिल कमरे में नहीं था।
मैंने सोचा शायद बाहर गया होगा।
फिर मैंने उसे हवेली के आँगन में खड़ा देखा।
वह एकटक ऊपर की बालकनी की तरफ देख रहा था।
मैंने पूछा, “क्या हुआ?”
उसने धीमी आवाज़ में कहा, “रात तीन बजे मेरी आँख खुली थी।”
“फिर?”
“मैंने ऊपर किसी औरत को खड़ा देखा।”
मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“कैसी औरत?”
उसने जवाब दिया, “सफेद साड़ी… लंबे बाल… और चेहरा बिल्कुल उसी तस्वीर जैसा।”
चंद्रमुखी।
नाम अचानक मेरे दिमाग में गूंज उठा।
दिनभर हमने खुद को काम में व्यस्त रखा।
लेकिन माहौल लगातार भारी होता जा रहा था।
दोपहर में गाँव के एक बुजुर्ग हमसे मिलने आए।
उन्होंने पूछा, “आप लोग हवेली में रुके हुए हैं?”
मैंने हाँ कहा।
उनका चेहरा तुरंत बदल गया।
उन्होंने हमें बाहर बुलाया।
फिर धीरे-धीरे एक कहानी सुनाई।
करीब सौ साल पहले हवेली में चंद्रमुखी नाम की एक नर्तकी रहती थी।
जमींदार उससे प्रेम करता था।
लेकिन वह किसी और से प्यार करती थी।
जब जमींदार को यह बात पता चली तो उसने उस युवक को मरवा दिया।
कहते हैं उसी रात चंद्रमुखी ने हवेली की ऊपरी मंजिल से कूदकर जान दे दी।
मरने से पहले उसने शपथ ली थी कि जो भी इस हवेली को अपना बनाने की कोशिश करेगा, वह कभी चैन से नहीं जी पाएगा।
मैं ऐसी बातों पर विश्वास नहीं करता था।
लेकिन पिछले चौबीस घंटों में जो कुछ देखा था, उसके बाद मैं पूरी तरह निश्चिंत भी नहीं था।
दूसरी रात और भी भयानक साबित हुई।
करीब दो बजे अचानक मेरी आँख खुल गई।
कमरे में अजीब ठंड थी।
इतनी ठंड कि साँस लेते समय धुंध दिखाई दे रही थी।
जनरेटर बंद हो चुका था।
चारों तरफ सन्नाटा था।
फिर मुझे घुंघरुओं की आवाज़ सुनाई दी।
इस बार बहुत पास।
इतनी पास जैसे कोई हमारे कमरे के बाहर चल रहा हो।
मैंने धीरे से सिर घुमाया।
निखिल भी जाग चुका था।
हम दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे।
तभी दरवाज़े के दूसरी तरफ किसी के रुकने की आवाज़ आई।
फिर…
धीरे-धीरे…
किसी ने दरवाज़े पर उँगलियाँ फेरनी शुरू कर दीं।
आवाज़ लकड़ी पर चलती नाखूनों जैसी थी।
मेरा गला सूख गया।
निखिल ने टॉर्च जलाई।
आवाज़ तुरंत बंद हो गई।
हमने हिम्मत करके दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन गलियारे के अंत में एक आकृति खड़ी थी।
सफेद साड़ी।
झुका हुआ सिर।
लंबे बाल।
वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।
कुछ सेकंड तक हम उसे देखते रहे।
फिर उसने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
और पहली बार मैंने उसका चेहरा देखा।
वह तस्वीर वाली महिला थी।
चंद्रमुखी।
लेकिन उसका चेहरा इंसानी नहीं लग रहा था।
आँखें पूरी तरह काली थीं।
होंठों पर अस्वाभाविक मुस्कान थी।
और गर्दन एक अजीब कोण पर झुकी हुई थी।
निखिल चीख पड़ा।
मैंने टॉर्च उसकी तरफ फेंकी।
रोशनी एक क्षण के लिए उस पर पड़ी।
और अगले ही पल वह गायब हो गई।
जैसे वहाँ कभी थी ही नहीं।
हम पूरी रात जागते रहे।
सुबह होते ही वहाँ से निकलने का फैसला कर लिया।
लेकिन असली डर अभी बाकी था।
जब हम सामान लेकर मुख्य दरवाज़े तक पहुँचे तो देखा कि बाहर जाने वाला रास्ता बंद था।
भारी लकड़ी का दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका था।
हमने पूरी ताकत लगाई।
लेकिन वह नहीं खुला।
उसी समय ऊपर से घुंघरुओं की आवाज़ गूँजी।
फिर हँसी।
धीमी।
ठंडी।
और इंसानी नहीं।
पूरा हवेली उस हँसी से भर गई।
मैंने ऊपर देखा।
बालकनी पर चंद्रमुखी खड़ी थी।
इस बार बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।
उसकी आँखें सीधे हमारी तरफ थीं।
फिर उसने अपना हाथ उठाया।
और इशारा किया।
जैसे हमें ऊपर बुला रही हो।
अचानक हवेली के सारे दरवाज़े अपने आप खुलने और बंद होने लगे।
खिड़कियाँ जोर-जोर से टकराने लगीं।
झूमर हिलने लगे।
हवा तूफान की तरह चलने लगी।
हम घबराकर पीछे हट गए।
तभी मुख्य दरवाज़ा अचानक खुल गया।
हमने एक पल भी बर्बाद नहीं किया।
सामान छोड़कर सीधे बाहर भागे।
गाँव तक पहुँचने के बाद भी पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं हुई।
उस दिन के बाद हमने वह Assignment छोड़ दी।
कंपनी ने दूसरी टीम भेजी।
लेकिन अजीब बात यह थी कि दूसरी टीम वहाँ सिर्फ चार घंटे रुकी।
और फिर बिना कोई कारण बताए वापस लौट आई।
आज भी वह हवेली खाली खड़ी है।
कई लोग कहते हैं कि रात में वहाँ घुंघरुओं की आवाज़ सुनाई देती है।
कुछ लोग दावा करते हैं कि ऊपरी बालकनी में सफेद साड़ी पहने एक महिला दिखाई देती है।
और कुछ लोग यह भी कहते हैं कि हवेली के पुराने शीशे में आज भी चंद्रमुखी का प्रतिबिंब दिखाई देता है।
भले ही उसके सामने कोई खड़ा न हो।
मैं नहीं जानता उन बातों में कितना सच है।
लेकिन एक बात मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ।
उस रात मैंने जिस चेहरे को देखा था…
वह किसी जीवित इंसान का चेहरा नहीं था।
और अगर कभी किसी पुरानी हवेली में आपको दूर से घुंघरुओं की आवाज़ सुनाई दे…
तो उसका पीछा करने की गलती मत करना।
हो सकता है कोई आपका इंतज़ार कर रहा हो।
ठीक वैसे ही जैसे चंद्रमुखी आज भी अपने अगले मेहमान का इंतज़ार कर रही है

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