Kamla Horror Game | Real Horror Story

BY SCARY CROCODILE TEAM

कमला का नाम मैंने पहली बार उस रात सुना था जब एक आदमी मेरी चौखट पर लगभग गिरता हुआ पहुँचा था। आज भी उस रात की हर छोटी-बड़ी बात मुझे याद है।

आश्रम के बाहर सर्द हवा चल रही थी। दूर कहीं किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज बीच-बीच में सुनाई दे रही थी। रात काफी हो चुकी थी और आश्रम में मौजूद बाकी लोग अपने कमरों में जा चुके थे। मैं दीपक की हल्की रोशनी में कुछ पुराने ग्रंथ पढ़ रहा था। Kamla Horror Game

Kamla Horror Game

तभी बाहर से भागते हुए कदमों की आवाज सुनाई दी।

आवाज इतनी तेज थी जैसे कोई जान बचाकर दौड़ रहा हो।

अगले ही पल आश्रम का लकड़ी का दरवाजा जोर से खुला।

एक अधेड़ उम्र का आदमी अंदर आया और सीधे फर्श पर बैठ गया।

उसकी साँसें बुरी तरह फूल रही थीं।

कपड़े धूल से भरे हुए थे।

माथे पर पसीना चमक रहा था।

कुछ क्षण तक वह बोल भी नहीं पाया।

मैंने उसे पानी दिया।

उसने पूरा लोटा एक ही बार में खाली कर दिया।

फिर काँपती आवाज में बोला—

“महाराज… हमारी बहू को बचा लीजिए।”

उसकी आँखों में ऐसा डर था जो किसी साधारण परेशानी से पैदा नहीं होता।

मैंने उसे शांत होने को कहा और पूरी बात बताने को कहा।

उसने जो कहानी सुनाई, उसे सुनते-सुनते कमरे का माहौल बदल गया।

उसने बताया कि उसकी बहू कमला की शादी छह महीने पहले हुई थी।

शुरुआत में सब कुछ बिल्कुल सामान्य था।

कमला हँसमुख थी।

पूरे घर को संभालती थी।

सुबह सबसे पहले उठती।

सास के साथ रसोई में काम करती।

शाम को आँगन में तुलसी के पास दीपक जलाती।

गाँव की औरतें उसकी तारीफ करती थीं।

लेकिन एक दिन अचानक सब बदलने लगा।

पहले वह रात में नींद में बातें करने लगी।

परिवार को लगा नई जगह है, समय लगेगा।

फिर उसने अकेले कमरे में किसी से बात करना शुरू कर दिया।

कई बार दरवाजा खोलने पर वह ऐसे चुप हो जाती जैसे कोई राज छिपा रही हो।

एक रात उसकी सास ने कमरे के बाहर किसी दूसरी महिला की आवाज सुनी।

उन्हें लगा कोई रिश्तेदार आया होगा।

लेकिन कमरे का दरवाजा खुला तो अंदर सिर्फ कमला थी।

उसके बाद घटनाएँ और अजीब होती चली गईं।

वह खाना कम खाने लगी।

फिर लगभग छोड़ ही दिया।

चेहरा पीला पड़ने लगा।

आँखों के नीचे काले घेरे बन गए।

लेकिन सबसे डरावनी घटना दो हफ्ते पहले हुई।

आधी रात को घर का एक नौकर पानी पीने उठा।

जब उसने ऊपर देखा तो उसकी चीख निकल गई।

कमला हवेली की छत के किनारे खड़ी थी।

तीन मंजिल ऊँची छत।

नीचे पत्थर का आँगन।

एक कदम भी आगे बढ़ती तो सीधी मौत।

लेकिन वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

हवा उसके बाल उड़ा रही थी।

साड़ी फड़फड़ा रही थी।

फिर भी उसके शरीर में कोई हलचल नहीं थी।

जब परिवार ऊपर पहुँचा तो उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।

और ऐसी आवाज में बोली जो उसकी नहीं थी—

“यह घर अब मेरा है।”

उस आदमी की आँखें यह बताते हुए भर आईं।

उसने कहा—

“महाराज, तब से हमारे घर में कोई चैन से नहीं सोया।”

उसकी बात खत्म होते ही मैंने फैसला कर लिया।

अगली सुबह हम गाँव के लिए निकल पड़े।

यात्रा लंबी थी।

पहले बैलगाड़ी।

फिर पैदल रास्ता।

फिर एक पुरानी बस।

दोपहर गुजर गई।

शाम ढलने लगी।

आसमान नारंगी रंग में बदल रहा था।

खेतों के ऊपर पक्षियों के झुंड अपने घोंसलों की तरफ लौट रहे थे।

लेकिन जैसे-जैसे हम गाँव के करीब पहुँच रहे थे, मेरे भीतर एक अजीब बेचैनी बढ़ रही थी।

गाँव दूर से शांत दिखाई दे रहा था।

लेकिन उसके बीच खड़ी वह हवेली बाकी सब चीजों से अलग लग रही थी।

जैसे किसी दूसरे समय की चीज हो।

जैसे गाँव उसका हिस्सा न हो।

तीन मंजिला विशाल इमारत।

काली पड़ चुकी दीवारें।

टूटी जालियाँ।

जगह-जगह उखड़ा हुआ पलस्तर।

कुछ खिड़कियाँ बंद थीं।

कुछ आधी खुली हुई।

और सबसे अजीब बात—

पूरे गाँव में जीवन था।

बच्चे खेल रहे थे।

औरतें कुएँ से पानी ला रही थीं।

मर्द खेतों से लौट रहे थे।

लेकिन हवेली के आसपास सन्नाटा था।

एक ऐसा सन्नाटा जो कानों में चुभता है।

मुख्य दरवाजे तक पहुँचते-पहुँचते मुझे ऐसा लगा जैसे तापमान अचानक कम हो गया हो।

मैंने ऊपर देखा।

दूसरी मंजिल की एक खिड़की में कोई खड़ा था।

सफेद कपड़ों में।

लेकिन अगले ही पल वह आकृति गायब हो गई।

मैं कुछ समझ पाता उससे पहले दरवाजा खुल गया।

अंदर पूरा परिवार खड़ा था।

उनके चेहरों पर उम्मीद कम और डर ज्यादा था।

कमला का पति सबसे आगे खड़ा था।

उसकी आँखें लाल थीं।

शायद कई रातों से ठीक से सोया नहीं था।

मैंने सबसे पहले कमला से मिलने की इच्छा जताई।

पूरा परिवार चुप हो गया।

ऐसा लगा जैसे किसी ने कोई खतरनाक बात कह दी हो।

आखिरकार वे मुझे दूसरी मंजिल तक ले गए।

लंबा गलियारा।

धूल भरी दीवारें।

पुरानी तस्वीरें।

और बीच-बीच में हवा से हिलते परदे।

गलियारे के अंत में एक कमरा था।

दरवाजे पर बाहर से ताला लगा हुआ था।

ताला खुला।

दरवाजा धीरे-धीरे चरमराया।

और मैं अंदर गया।

कमरा बड़ा था।

लेकिन रोशनी बहुत कम थी।

खिड़की के पास एक महिला बैठी थी।

Kamla Horror Game

पीठ हमारी तरफ।

सफेद साड़ी।

बिखरे हुए लंबे बाल।

कमला।

कुछ क्षण तक वह हिली भी नहीं।

फिर धीरे-धीरे उसने सिर घुमाया।

मैं आज भी उसकी आँखें नहीं भूल पाया हूँ।

वे सामान्य नहीं थीं।

उनमें गुस्सा नहीं था।

पागलपन भी नहीं था।

बल्कि ऐसा खालीपन था जो किसी इंसान में नहीं होना चाहिए।

वह मुझे लगातार देखती रही।

बिना पलक झपकाए।

कमरे में मौजूद कोई व्यक्ति हिल भी नहीं रहा था।

फिर अचानक उसके होंठों पर मुस्कान आई।

धीरे-धीरे।

बहुत धीरे।

और उसने कहा—

“आ गए?”

कमरे में खड़े लोगों की साँसें रुक गईं।

मैंने पूछा—

“तुम मुझे जानती हो?”

वह मुस्कुराई।

“तुम्हें आने में देर हो गई।”

उस पल कमरे का तापमान जैसे और नीचे गिर गया।

क्योंकि मेरे आने की जानकारी किसी ने उसे नहीं दी थी।

लेकिन उसे पता था।

कैसे?

यही सवाल मेरे मन में घूमता रहा।

उस रात मैं हवेली में ही रुक गया।

रात करीब ग्यारह बजे पूरा घर शांत हो चुका था।

मैं नीचे वाले कमरे में बैठा नोट्स लिख रहा था।

दीपक की लौ धीरे-धीरे हिल रही थी।

बाहर हवा चल रही थी।

सब कुछ सामान्य था।

तभी ऊपर से दौड़ने की आवाज आई।

पहले एक कदम।

फिर दूसरा।

फिर लगातार।

जैसे कोई पूरी ताकत से भाग रहा हो।

धड़-धड़-धड़-धड़।

आवाज पूरे घर में गूँज उठी।

मैं तुरंत बाहर निकला।

उसी समय ऊपर से एक महिला की चीख सुनाई दी।

चीख इतनी भयानक थी कि मेरा दिल जोर से धड़क उठा।

मैं सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा।

परिवार के बाकी लोग भी वहाँ थे।

कमला का कमरा खुला था।

लेकिन कमला गायब थी।

खिड़की खुली हुई थी।

परदे हवा में उड़ रहे थे।

उसका पति काँपती आवाज में बोला—

“वह फिर बाहर निकल गई…”

इसके बाद पूरे घर में तलाश शुरू हुई।

हम हर कमरे में गए।

हर कोना देखा।

धूल भरे स्टोर रूम।

बंद बैठक।

पुराना पूजा घर।

लेकिन कमला कहीं नहीं मिली।

लगभग बीस मिनट बाद हम छत पर पहुँचे।

और वहाँ जो दृश्य था, उसने सबको रोक दिया।

छत के बीचों-बीच कमला जमीन पर बैठी थी।

उसके चारों तरफ कबूतरों के पंख बिखरे हुए थे।

वह आसमान की तरफ देख रही थी।

और किसी अनजानी भाषा में बोल रही थी।

आवाज एक नहीं थी।

ऐसा लग रहा था जैसे कई लोग एक साथ फुसफुसा रहे हों।

मैं धीरे-धीरे उसके पास गया।

अचानक वह चुप हो गई।

फिर उसने मेरी तरफ देखा।

और बोली—

“तुम यहाँ से चले जाओ।”

“क्यों?”

मैंने पूछा।

उसके होंठ धीरे से हिले।

“क्योंकि अगली बारी तुम्हारी है…”

उसके बाद पूरी रात मेरी आँखों में नींद नहीं आई।

और मुझे पहली बार लगा—

यह मामला वैसा नहीं था जैसा शुरू में दिखाई दे रहा था।

अगली सुबह सूरज निकल चुका था, लेकिन हवेली के भीतर रात जैसी ही उदासी पसरी हुई थी।

मैं बहुत कम सो पाया था।

बार-बार वही दृश्य आँखों के सामने आ रहा था।

छत पर बैठी कमला।

उसकी अजीब आवाज।

और वह चेतावनी—

“अगली बारी तुम्हारी है।”

सुबह जब मैं नीचे आया तो पूरा परिवार पहले से जाग चुका था।

लेकिन किसी के चेहरे पर सामान्य दिन जैसी कोई बात नहीं थी।

रसोई में चूल्हा जल रहा था।

चाय बन रही थी।

फिर भी पूरे घर में ऐसा माहौल था जैसे किसी की मौत हो गई हो।

कमला की सास ने धीरे से बताया कि रात के बाद से कमला फिर कमरे में बंद है और किसी से बात नहीं कर रही।

मैंने नाश्ते के बाद सबसे पहले हवेली का इतिहास जानने का फैसला किया।

कई बार ऐसी घटनाओं की जड़ वर्तमान में नहीं, अतीत में छिपी होती है।

गाँव के सबसे बुजुर्ग आदमी का नाम था हरिराम काका।

उनकी उम्र अस्सी साल के आसपास रही होगी।

चेहरे पर झुर्रियाँ थीं।

सफेद मूँछें थीं।

और आँखों में वह गहराई थी जो सिर्फ बहुत कुछ देख चुके लोगों में होती है।

मैं उनसे मिलने उनके घर पहुँचा।

वह पुराने बरामदे में चारपाई पर बैठे थे।

पास में मिट्टी का हुक्का रखा था।

जब मैंने हवेली का नाम लिया तो उनके चेहरे का रंग बदल गया।

कुछ क्षण तक वह चुप रहे।

फिर बोले—

“उस घर के बारे में जितना कम जानो, उतना अच्छा है।”

मैंने उन्हें समझाया कि अगर सच नहीं जानूँगा तो कमला की मदद भी नहीं कर पाऊँगा।

उन्होंने गहरी साँस ली।

कुछ देर तक जमीन को देखते रहे।

फिर धीरे-धीरे बोलना शुरू किया।

“आज से लगभग पचास साल पहले उस हवेली में रघुवीर सिंह नाम का जमींदार रहता था।”

“बहुत ताकतवर आदमी था।”

“लेकिन उतना ही निर्दयी भी।”

हवा का एक झोंका आया।

बरामदे में लटकता पुराना लालटेन धीरे-धीरे हिलने लगा।

हरिराम काका की आवाज और धीमी हो गई।

“उसकी एक बेटी थी… लता।”

“पूरे इलाके में उसकी सुंदरता की चर्चा थी।”

“लेकिन उसकी जिंदगी खुश नहीं थी।”

मैं ध्यान से सुनता रहा।

लता पढ़ी-लिखी थी।

समझदार थी।

और जमींदार के खेतों की देखरेख करने वाले एक युवक से प्रेम करती थी।

दोनों शादी करना चाहते थे।

लेकिन जब जमींदार को यह बात पता चली तो वह आगबबूला हो गया।

उसने लता की शादी एक अमीर परिवार में तय कर दी।

लता ने विरोध किया।

बहुत किया।

लेकिन उस समय बेटियों की इच्छा कोई नहीं पूछता था।

शादी की तारीख तय हो गई।

पूरा गाँव तैयारियों में लग गया।

लेकिन शादी से एक रात पहले लता अचानक गायब हो गई।

पूरा गाँव उसे खोजता रहा।

तीन दिन बाद उसकी लाश हवेली के पीछे वाले पुराने कुएँ से मिली।

गाँव वालों को बताया गया कि उसने आत्महत्या कर ली।

लेकिन…

यह कहते हुए हरिराम काका रुक गए।

उनके चेहरे पर बेचैनी दिखाई दी।

मैंने पूछा—

“लेकिन क्या?”

उन्होंने मेरी तरफ देखा।

फिर बहुत धीमी आवाज में बोले—

“कई लोगों को आत्महत्या वाली बात पर कभी विश्वास नहीं हुआ।”

“कुछ लोगों ने उस रात हवेली से चीखें सुनी थीं।”

“कुछ ने जमींदार के आदमियों को कुएँ के पास देखा था।”

“लेकिन उस समय कोई उसके खिलाफ बोल नहीं सकता था।”

बरामदे में अचानक खामोशी छा गई।

कुछ क्षण तक सिर्फ हवा की आवाज सुनाई देती रही।

फिर हरिराम काका ने एक और बात कही जिसने मेरे भीतर बेचैनी बढ़ा दी।

“लता की मौत के बाद हवेली बदल गई थी।”

“कैसे?”

मैंने पूछा।

उन्होंने काँपते हाथों से हुक्का उठाया।

एक लंबा कश लिया।

फिर बोले—

“रात में रोने की आवाजें आती थीं।”

“खाली कमरों में किसी के चलने की आहट सुनाई देती थी।”

“कई लोगों ने दूसरी मंजिल की खिड़की में सफेद कपड़ों वाली लड़की देखी।”

“और सबसे अजीब बात…”

“क्या?”

“जो लोग उस कुएँ के बहुत करीब जाते थे, उन्हें हमेशा लगता था कि कोई उन्हें देख रहा है।”

उनकी बात खत्म होते ही मेरे मन में एक नाम गूँजने लगा।

लता।

क्या कमला और लता का कोई संबंध था?

या यह सिर्फ संयोग था?

मैंने उसी समय कुएँ तक जाने का फैसला किया।

हवेली के पीछे का हिस्सा गाँव से बिल्कुल अलग था।

जैसे किसी ने जानबूझकर उसे छोड़ दिया हो।

झाड़ियाँ उगी हुई थीं।

सूखी घास जमीन पर फैली थी।

कुछ पुराने पेड़ ऐसे खड़े थे जैसे वर्षों से किसी का इंतजार कर रहे हों।

उन पेड़ों के बीच वह कुआँ था।

पुराना।

गहरा।

पत्थरों से बना हुआ।

ऊपर काई जमी हुई थी।

कई जगह दरारें पड़ चुकी थीं।

जैसे समय उसे धीरे-धीरे खा रहा हो।

जैसे ही मैं उसके करीब पहुँचा, मुझे अजीब बेचैनी महसूस हुई।

सुबह की धूप थी।

फिर भी वहाँ ठंड ज्यादा थी।

इतनी कि मेरी बाँहों पर रोंगटे खड़े हो गए।

मैंने कुएँ के भीतर झाँका।

नीचे सिर्फ अंधेरा दिखाई दे रहा था।

बहुत गहरा अंधेरा।

ऐसा लग रहा था जैसे रोशनी भी वहाँ जाकर खो जाती हो।

कुछ सेकंड तक मैं नीचे देखता रहा।

और तभी…

मुझे लगा जैसे नीचे कोई हलचल हुई हो।

बहुत हल्की।

जैसे किसी ने पानी को छुआ हो।

मैं तुरंत पीछे हट गया।

दिल की धड़कन तेज हो गई थी।

शायद वह भ्रम था।

लेकिन उस क्षण मुझे पहली बार डर महसूस हुआ।

फिर मेरी नजर जमीन पर पड़ी।

कुएँ के किनारे मिट्टी में कुछ चमक रहा था।

मैं झुका।

मिट्टी हटाई।

और एक टूटी हुई चाँदी की पायल बाहर निकाली।

पायल पुरानी थी।

बहुत पुरानी।

उस पर मिट्टी और जंग की परत जमी हुई थी।

लेकिन जैसे ही मैंने उसे हाथ में लिया, मेरे शरीर में अजीब सिहरन दौड़ गई।

जैसे अचानक तापमान कई डिग्री गिर गया हो।

जैसे किसी ने बहुत करीब आकर फुसफुसाया हो।

मैंने तेजी से पीछे मुड़कर देखा।

कोई नहीं था।

सिर्फ हवा।

पेड़।

और खामोशी।

लेकिन एक पल के लिए मुझे यकीन हो गया था कि मैं अकेला नहीं हूँ।

मैंने पायल अपने कपड़े में लपेट ली और हवेली वापस लौट आया।

जैसे ही मैं अंदर पहुँचा, मुझे ऊपर से शोर सुनाई दिया।

लोग भाग रहे थे।

महिलाएँ घबराई हुई थीं।

किसी के रोने की आवाज आ रही थी।

मैं तुरंत दूसरी मंजिल की तरफ दौड़ा।

कमला के कमरे के बाहर पूरा परिवार जमा था।

अंदर से चीजें टूटने की आवाज आ रही थी।

धड़ाम!

काँच टूटने की आवाज।

फिर किसी भारी चीज के गिरने की।

मैंने दरवाजा खुलवाया।

और जो देखा उसने सभी को स्तब्ध कर दिया।

कमला कमरे के बीचों-बीच खड़ी थी।

उसके बाल पूरी तरह बिखरे हुए थे।

साँसें तेज चल रही थीं।

फर्श पर टूटा हुआ आईना पड़ा था।

कुर्सी उलटी हुई थी।

और दीवार पर नाखूनों से खरोंचे गए कई निशान दिखाई दे रहे थे।

उसका पति आगे बढ़ा।

“कमला…”

लेकिन उसने तुरंत उसकी तरफ देखा।

उस नजर में ऐसी नफरत थी कि उसका पति वहीं रुक गया।

फिर कमला ने धीरे-धीरे कहा—

“मेरा कोई पति नहीं है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

उसका पति जैसे पत्थर बन गया।

कमला ने फिर कहा—

“मैं यहाँ बहुत पहले से हूँ।”

उसकी आवाज अब उसकी नहीं थी।

और उसी क्षण मुझे यकीन हो गया…

हवेली का अतीत अभी खत्म नहीं हुआ था।

और असली डर अब शुरू होने वाला था…

कमला के मुँह से निकले उन शब्दों के बाद कमरे में मौजूद कोई भी व्यक्ति कुछ सेकंड तक बोल नहीं पाया।

“मैं यहाँ बहुत पहले से हूँ।”

वह वाक्य बार-बार मेरे दिमाग में गूँज रहा था।

कमला का पति जैसे भीतर से टूट गया था।

उसकी आँखें कमला पर टिकी थीं।

शायद वह उम्मीद कर रहा था कि अगले ही पल कमला हँस देगी और कहेगी कि यह सब मजाक था।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

कमला धीरे-धीरे कमरे के बीचों-बीच खड़ी रही।

उसका चेहरा बिल्कुल भावहीन था।

जैसे उसके सामने मौजूद लोग उसके लिए अजनबी हों।

कमरे की हवा भारी लगने लगी थी।

दीवार पर लगी पुरानी घड़ी की टिक-टिक असामान्य रूप से तेज सुनाई दे रही थी।

मैंने धीरे से अपनी जेब में रखी चाँदी की पायल को छुआ।

उसी क्षण कमला की गर्दन झटके से मेरी तरफ घूमी।

इतनी तेजी से कि कमरे में खड़ी एक महिला डरकर चीख उठी।

कमला की नजर सीधे मेरी जेब पर थी।

उसने पायल देखी नहीं थी।

वह छिपी हुई थी।

फिर भी उसे पता था।

उसकी आँखों में अचानक गुस्सा भर गया।

“उसे वापस रख दो…”

उसने दाँत भींचकर कहा।

कमरे में मौजूद लोगों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

मैंने कुछ नहीं कहा।

कमला दो कदम आगे बढ़ी।

“वह मेरी है।”

उसकी आवाज पहले से कहीं ज्यादा भारी थी।

ऐसा लग रहा था जैसे दो अलग-अलग आवाजें एक साथ बोल रही हों।

एक महिला की।

और दूसरी किसी बूढ़ी, थकी हुई आत्मा की।

मैंने शांत स्वर में पूछा—

“किसकी?”

कमला के होंठ काँपे।

कुछ क्षण तक उसने मेरी तरफ घूरकर देखा।

फिर उसके चेहरे पर ऐसा दर्द उभरा जिसे शब्दों में बताना मुश्किल है।

उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

लेकिन अगले ही पल वह दर्द गुस्से में बदल गया।

कमरे की खिड़की अचानक जोर से बंद हुई।

धड़ाम!

आवाज इतनी तेज थी कि सभी लोग चौंक गए।

और उसी क्षण कमला बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी।

पूरा परिवार उसकी तरफ दौड़ पड़ा।

लेकिन मैं वहीं खड़ा रहा।

मेरे मन में एक बात साफ होती जा रही थी।

यह सिर्फ किसी आत्मा का मामला नहीं था।

यह किसी ऐसे दर्द की कहानी थी जिसे वर्षों तक दबाकर रखा गया था।

और शायद वह दर्द अब बाहर आने की कोशिश कर रहा था।

शाम तक कमला शांत रही।

वह सोती रही।

कभी-कभी कुछ बड़बड़ाती।

लेकिन पहले जैसी हिंसक हरकतें नहीं कीं।

मैंने उस दौरान हवेली के कई हिस्सों की जाँच की।

सबसे ज्यादा समय दूसरी मंजिल के पुराने हिस्से में बिताया।

वह हिस्सा अब इस्तेमाल नहीं होता था।

लंबे गलियारे।

धूल से ढके कमरे।

दीवारों पर मकड़ी के जाले।

कई जगह लकड़ी सड़ चुकी थी।

ऐसा लग रहा था जैसे समय ने उस हिस्से को भूल ही गया हो।

गलियारे के आखिर में एक बंद कमरा था।

परिवार के लोगों ने बताया कि वह कमरा वर्षों से नहीं खुला।

कुंजी भी गायब हो चुकी है।

दरवाजा पुराना था।

उस पर जंग लगे लोहे के पट्टे लगे थे।

लेकिन मेरी नजर किसी और चीज पर गई।

दरवाजे के नीचे धूल जमी हुई थी।

फिर भी वहाँ किसी के पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

ताजा नहीं।

लेकिन पुराने भी नहीं।

जैसे कुछ दिनों पहले कोई वहाँ गया हो।

मैं नीचे झुका।

धूल को ध्यान से देखा।

और तभी मेरे शरीर में ठंडक दौड़ गई।

वे पैरों के निशान नंगे पैरों के थे।

एक महिला के।

मैं कुछ क्षण वहीं बैठा रहा।

फिर खड़ा होकर दरवाजे को ध्यान से देखने लगा।

अचानक भीतर से बहुत हल्की आवाज सुनाई दी।

टिक…

टिक…

टिक…

जैसे कोई लकड़ी पर उँगली मार रहा हो।

मैं स्थिर हो गया।

आवाज फिर आई।

टिक…

टिक…

टिक…

मेरे और दरवाजे के बीच सिर्फ कुछ इंच की दूरी थी।

लेकिन आवाज बिल्कुल दूसरी तरफ से आ रही थी।

मैंने तुरंत दरवाजे पर हाथ रखा।

आवाज बंद हो गई।

पूरा गलियारा फिर शांत हो गया।

कुछ सेकंड तक मैं वहीं खड़ा रहा।

फिर धीरे-धीरे नीचे लौट आया।

उस रात मैंने फैसला कर लिया।

अब अनुष्ठान करना जरूरी था।

अगर सच सामने लाना था तो देर नहीं की जा सकती थी।

रात होते-होते हवेली का माहौल फिर बदलने लगा।

आसमान में बादल छा गए।

हवा तेज हो गई।

पुरानी खिड़कियाँ बार-बार हिलने लगीं।

घर के लोग नीचे वाले बड़े कमरे में इकट्ठा हो गए।

कमरे के बीचों-बीच अनुष्ठान की तैयारी की गई।

पीतल के दीपक रखे गए।

गंगाजल रखा गया।

मंत्रों के लिए आवश्यक सामग्री रखी गई।

कमला को कमरे के बीच में बैठाया गया।

शुरुआत में वह बिल्कुल शांत थी।

इतनी शांत कि कोई उसे बीमार भी न समझे।

लेकिन जैसे ही मंत्रोच्चार शुरू हुआ, उसकी साँसें बदलने लगीं।

पहले धीरे।

फिर तेज।

फिर बहुत तेज।

कमरे में बैठे लोग घबराने लगे।

दीपकों की लौ काँपने लगी।

हवा का कोई झोंका नहीं था।

फिर भी लौ ऐसे हिल रही थी जैसे कोई उनके पास खड़ा हो।

मैं लगातार मंत्र पढ़ता रहा।

कुछ मिनट बाद कमला ने आँखें खोलीं।

और पूरा कमरा सन्न रह गया।

उसकी पुतलियाँ ऊपर की तरफ घूमी हुई थीं।

सिर्फ सफेदी दिखाई दे रही थी।

उसके हाथ काँप रहे थे।

उँगलियाँ अजीब तरीके से मुड़ रही थीं।

फिर उसके होंठ खुले।

लेकिन जो आवाज निकली, वह कमला की नहीं थी।

“बस करो…”

आवाज भारी थी।

गुस्से से भरी हुई।

मैंने मंत्र जारी रखा।

“बस करो!”

इस बार आवाज इतनी तेज थी कि कमरे की खिड़कियाँ काँप उठीं।

कमला का शरीर अचानक पीछे की तरफ झटका खाकर उठा।

ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे खींच लिया हो।

उसकी सास रोने लगी।

कुछ लोग डरकर पीछे हट गए।

लेकिन मैं रुका नहीं।

मंत्रों की गति और तेज हो गई।

कमला अचानक चीखी।

ऐसी चीख जिसे सुनकर किसी भी इंसान का खून जम जाए।

फिर उसने अपनी आँखें मेरी तरफ घुमाईं।

अब पुतलियाँ वापस आ चुकी थीं।

लेकिन उनमें ऐसी नफरत थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी।

कुछ सेकंड तक वह मुझे घूरती रही।

फिर उसके चेहरे का भाव बदल गया।

नफरत गायब हो गई।

उसकी जगह दुख आ गया।

गहरा।

असहनीय दुख।

और फिर…

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

वह रोने लगी।

धीरे-धीरे।

जैसे कोई वर्षों बाद अपना दर्द बाहर निकाल रहा हो।

कमरे में बैठे सभी लोग स्तब्ध थे।

कमला की आवाज अब बदल चुकी थी।

वह फुसफुसाई—

“मैं मरना नहीं चाहती थी…”

मेरे हाथ रुक गए।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

कमला रोती रही।

“मैं भागना चाहती थी…”

“मैं जीना चाहती थी…”

“उन्होंने मुझे जाने नहीं दिया…”

कमला का पूरा शरीर काँप रहा था।

आँसू उसके चेहरे से गिरकर जमीन पर टपक रहे थे।

उस पल पहली बार मुझे यकीन हुआ कि यह सिर्फ क्रोध नहीं था।

यह न्याय की पुकार थी।

एक ऐसी आत्मा की पुकार जिसे मौत के बाद भी शांति नहीं मिली थी।

फिर अचानक कमला ने सिर उठाया।

उसकी आँखें सीधे मेरी आँखों में आकर टिक गईं।

और उसने एक वाक्य कहा जिसने पूरे रहस्य की दिशा बदल दी।

“कुएँ के नीचे देखो…”

कमरे में मौजूद हर व्यक्ति ने उसकी तरफ देखा।

कमला ने दोबारा कहा—

“सच अभी भी वहीं है…”

फिर उसका शरीर ढीला पड़ गया।

उसकी आँखें बंद हो गईं।

और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी।

उस रात अनुष्ठान यहीं रोकना पड़ा।

लेकिन अब मेरे पास पहली बार एक स्पष्ट संकेत था।

कुआँ।

वही पुराना कुआँ।

जहाँ से लता की लाश मिली थी।

जहाँ मुझे पायल मिली थी।

और जहाँ शायद इतने वर्षों से छिपा हुआ सच अभी भी दफन था।

अगली सुबह सूरज उगते ही मैं गाँव वालों को लेकर उस कुएँ के पास जाने वाला था।

लेकिन मुझे नहीं पता था कि जो चीज हम वहाँ खोजने वाले थे…

वह सिर्फ एक रहस्य नहीं,

बल्कि उस हवेली के पूरे इतिहास को बदल देने वाली थी।

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