BY SCARY CROCODILE TEAM
गाँव में उस जमीन का कोई ठीक नाम नहीं था। कागजों में वह किसके नाम दर्ज थी, यह पटवारी या तहसील वाला बता सकता था, लेकिन गाँव के लोग उसे किसी मालिक के नाम से नहीं पुकारते थे। जब भी बात निकलती, बस इतना कहा जाता—“उधर मत जाना।” यह बात इतनी सामान्य ढंग से कही जाती थी कि पहली बार सुनने वाला समझ ही नहीं पाता था कि चेतावनी दी जा रही है या रास्ता बताया जा रहा है। Ghost Story Hindi

मैं कई साल बाद गाँव लौटा था। शहर की पढ़ाई, नौकरी की तैयारी और रोजमर्रा की भागदौड़ ने गाँव की बहुत सारी चीजें मेरे अंदर से मिटा दी थीं। बचपन में जिन गलियों में खेला था, वे अब छोटी लगती थीं। जिन लोगों से डर लगता था, वे बूढ़े हो चुके थे। लेकिन एक चीज वैसी ही थी—गाँव के पश्चिम में फैली वह जमीन, जिसके पास से लोग शाम के बाद गुजरना पसंद नहीं करते थे।
दिन में वह जगह बिल्कुल साधारण लगती थी। फसल लगी हो तो बाकी खेतों जैसी, खाली हो तो बाकी खाली जमीन जैसी। वहाँ कोई टूटा मंदिर नहीं था, कोई पुरानी हवेली नहीं, कोई पीपल का पेड़ भी नहीं जिसके नीचे लोग कहानियाँ जोड़ दें। शायद इसी वजह से वह बात और अजीब लगती थी। डरने लायक कुछ दिखता नहीं था, लेकिन डर मौजूद था।
उस शाम चाय की दुकान पर बैठे-बैठे मैंने यूँ ही पूछ लिया कि लोग उस तरफ रात में क्यों नहीं जाते। दुकान वाले ने चाय छानते हुए जवाब देने के बजाय दूसरे ग्राहक से पैसे माँगने शुरू कर दिए। पास बैठे एक बुजुर्ग ने बीड़ी बुझाई और मेरी तरफ देखा। उनके चेहरे पर डर नहीं था, मगर थकान थी। जैसे वे यह सवाल बहुत बार सुन चुके हों और हर बार जवाब देने से बचना चाहते हों।
“कितने दिन के लिए आया है?” उन्होंने पूछा।
“दस दिन।”
“तो दस दिन आराम से रह। बेकार की चीजों में मत पड़।”
बात वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी, लेकिन मेरे अंदर शहर वाला वही आत्मविश्वास था जो हर पुरानी बात को अंधविश्वास मानकर शुरू होता है। मैंने हँसकर कहा कि जमीन इंसान को थोड़ी खा जाती है।
बुजुर्ग ने इस बार सीधे मेरी आँखों में देखा।
“खा जाती तो बात आसान थी। जो जाता है, उसका पता तो चल जाता। उस जगह की दिक्कत कुछ और है।”
उसके बाद चाय की दुकान पर बैठे बाकी लोग भी चुप हो गए। बातचीत बदल गई, लेकिन मेरे दिमाग में वही बात अटक गई। दिक्कत कुछ और है। यह वाक्य जितना छोटा था, उतना ही अंदर रह जाने वाला था।
अगले दो दिन मैंने जानबूझकर अलग-अलग लोगों से उसी जमीन के बारे में बात छेड़ी। हर कोई कुछ न कुछ जानता था, लेकिन पूरा सच किसी के पास नहीं था। किसी ने कहा वहाँ से पाँच लोग गायब हुए। किसी ने संख्या सात बताई। एक ने कहा कि गायब होने की बात झूठ है, असली बात यह है कि दो लोग वापस आए थे और उसके बाद उनके घर वालों ने खुद उन्हें कहीं भेज दिया। जब मैंने पूछा क्यों, तो वह आदमी चुप हो गया।
सबसे अजीब कहानी एक किराने वाले ने सुनाई। उसने कहा कि उसका चचेरा भाई कई साल पहले रात में उसी तरफ गया था। सुबह मिला तो जिंदा था, होश में था, अपने घर का रास्ता भी पहचानता था, लेकिन उसे अपनी शादी याद नहीं थी। पत्नी सामने खड़ी थी, बच्चे रो रहे थे, और वह आदमी बार-बार यही पूछ रहा था कि ये लोग उसके घर में क्यों खड़े हैं। डॉक्टर ने कहा दिमाग पर सदमा लगा होगा। कुछ महीनों बाद सब सामान्य हो गया, लेकिन उसकी पत्नी ने एक दिन रोते हुए कहा था कि आदमी वापस आया है, उसका पति नहीं।
यह वाक्य सुनकर पहली बार मेरा मजाक कम हुआ।
फिर भी मैं मानने को तैयार नहीं था। शायद इसलिए क्योंकि डर को सच मान लेना आसान नहीं होता। आदमी पहले तर्क ढूँढता है, फिर शक करता है, फिर खुद जाकर देखने की मूर्खता करता है।
मैंने भी वही किया।
उस रात घर में सब सो गए तो चुपचाप बाहर निकल आया। टॉर्च, फोन और जेब में छोटी पानी की बोतल थी। कोई बड़ा साहस नहीं था मेरे अंदर, बस यह भरोसा था कि अगर कुछ न मिला तो अगले दिन चाय की दुकान पर बैठकर मैं सब पर हँस सकूँगा। गाँव की आखिरी गली पार करते हुए एक बार पीछे देखा। घरों की हल्की रोशनी दूर छूटती जा रही थी और सामने खुला अंधेरा फैल रहा था।
जमीन तक पहुँचने में मुश्किल से दस मिनट लगते थे। बचपन में हम लोग दिन के समय उस तरफ गए भी थे, बस रात में नहीं। रास्ते में शुरुआत तक सब सामान्य रहा। फिर धीरे-धीरे एक अजीब बदलाव महसूस होने लगा। आसपास की आवाजें कम नहीं हुईं, बल्कि जैसे पीछे छूटती चली गईं। कुत्ते की आवाज दूर से आती रही, फिर इतनी दूर हो गई कि पहचान में नहीं आई। पैरों के नीचे सूखी मिट्टी की चरमराहट बाकी हर आवाज से ज्यादा साफ सुनाई देने लगी।
यहाँ तक भी मैं लौट सकता था।
लेकिन आदमी अक्सर सबसे साफ चेतावनी को भी गलतफहमी समझकर आगे बढ़ता है।
मैं उस जमीन में दाखिल हो गया।
पहला भ्रम मुझे रास्ते को लेकर हुआ। कुछ देर पहले जिस मेड़ से अंदर आया था, उसे पीछे मुड़कर ढूँढना चाहा तो वह दिखाई नहीं दी। अंधेरा था, यह बात ठीक थी, लेकिन टॉर्च की रोशनी में भी आसपास की बनावट अलग लग रही थी। फसल घनी नहीं थी, फिर भी दूरी का अंदाजा बिगड़ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे जगह अपने आकार से बड़ी हो गई हो।
फोन निकाला तो नेटवर्क नहीं था। यह गाँव में आम बात थी, इसलिए घबराने का कारण नहीं होना चाहिए था। लेकिन स्क्रीन पर समय देखकर बेचैनी हुई। कुछ मिनट पहले भी वही समय था। घड़ी अटकी हुई थी या मुझे समय का हिसाब बिगड़ गया था, समझ नहीं आया। फोन वापस जेब में रखते हुए पहली बार लगा कि यहाँ से निकल जाना चाहिए।
मुड़ते ही लगा कि कोई बहुत दूर खड़ा है।
वह आकृति साफ नहीं दिख रही थी। शायद कोई आदमी, शायद पेड़ की परछाई। मैं कुछ कदम उसकी तरफ बढ़ा, फिर रुका। जो चीज पहले थोड़ी दूरी पर दिख रही थी, वह अब भी उतनी ही दूर थी। दूरी घटनी चाहिए थी, लेकिन घट नहीं रही थी। आँखें धोखा दे रही हैं, यह सोचकर टॉर्च की रोशनी सीधी की। आकृति वहाँ थी, फिर नहीं थी।
उसके गायब होने में कोई नाटकीयता नहीं थी। कोई धुआँ, कोई आवाज, कोई झटका नहीं। बस जैसे दिमाग ने एक पल के लिए किसी चीज को पहचानने की कोशिश की और अगले ही पल उसे मिटा दिया।
यही बात सबसे ज्यादा डरावनी थी।
मैंने तुरंत वापस लौटने का फैसला किया। दिशा का अंदाजा लगाकर तेज कदमों से चला, लेकिन थोड़ी देर बाद वही टूटी मेड़ सामने आ गई जिसके पास से कुछ मिनट पहले गुजरा था। यह समझने में समय लगा कि मैं गोल घूम चुका हूँ। जमीन पर अपने ही जूतों के निशान दिखाई दिए। वह पहचान का क्षण इतना साधारण था कि डर और गहरा हो गया। कोई भूत सामने आ जाता तो शायद आसान होता। यहाँ तो बस मेरी अपनी चाल, मेरी अपनी दिशा, मेरी अपनी समझ मेरे खिलाफ काम कर रही थी।
तभी पीछे से किसी ने कहा, “रास्ता पैर से नहीं मिलता यहाँ।”
आवाज बूढ़े आदमी की थी। पलटकर देखा तो थोड़ी दूरी पर एक दुबला-पतला व्यक्ति खड़ा था। कपड़े पुराने थे, मगर फटे हुए नहीं। चेहरे पर धूल जमी थी और आँखों में ऐसा खालीपन था जो किसी बहुत लंबे इंतजार के बाद आता है।
“आप कौन हैं?” मुँह से यही निकला।
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उसने जवाब देने की जल्दी नहीं की। पहले आसपास देखा, जैसे किसी बात की पुष्टि कर रहा हो। फिर बोला, “नाम पूछकर क्या करेगा? यहाँ नाम सबसे पहले छूटता है।”
मेरे पास कहने को कुछ नहीं था।
वह धीरे-धीरे मेरे पास आया। उसके कदमों की आवाज मिट्टी पर नहीं पड़ रही थी, या शायद मैं सुन नहीं पा रहा था। इतने पास आने पर उसका चेहरा थोड़ा साफ दिखा। उम्र पचास से ऊपर रही होगी, लेकिन थकान उम्र से बड़ी लग रही थी।
“बाहर जाना है तो याद रख कि तू क्यों आया था,” उसने कहा।
“मैं रास्ता भूल गया हूँ।”
“नहीं। अभी सिर्फ रास्ता भूला है। देर करेगा तो बाकी चीजें भी जाएँगी।”
उसकी बात समझ नहीं आई, लेकिन शरीर पहले ही मान चुका था कि यह आदमी सामान्य नहीं है। फिर भी अजीब बात यह थी कि उससे डर कम लग रहा था। शायद इसलिए क्योंकि उस पूरी जगह में वही एक आवाज थी जो मुझे भागने के लिए कह रही थी, बुलाने के लिए नहीं।
उसने मुझसे माँ का नाम पूछा। मैंने बता दिया। पिता का नाम पूछा, वह भी याद था। फिर स्कूल का नाम पूछा। जवाब देने में हल्की देर हुई। इतनी हल्की कि सामान्य दिन पर ध्यान भी न जाता, लेकिन उस समय वह देरी भीतर तक चुभ गई। मुझे नाम याद आया, पर पूरा नहीं। जैसे जीभ के नीचे पड़ा हो, लेकिन बाहर न आ रहा हो।
बूढ़े ने सिर झुका लिया।
“शुरू हो गया।”
हवा ठंडी नहीं थी, फिर भी पीठ पर ठंड उतर गई। याददाश्त खोने वाली बात मुझे किराने वाले की कहानी से याद आई। उसका चचेरा भाई, पत्नी, बच्चे, भूल जाना। उस समय लगा था कि यह बीमारी होगी। अब उस कहानी का दूसरा अर्थ खुलने लगा था।
“यह जगह करती क्या है?” मैंने पूछा।
“जितना कोई यहाँ रुकता है, उतना वह अपने अंदर से खाली होता जाता है। शरीर बचा रहता है। चेहरा भी। आवाज भी कई बार। पर जो आदमी उसे आदमी बनाता है, वह यहीं रह जाता है।”
“और जो वापस जाते हैं?”
बूढ़े ने मेरी तरफ देखा। उस नजर में दया थी या चेतावनी, तय करना मुश्किल था।
“कभी-कभी जगह को बाहर जाने के लिए किसी की जरूरत होती है।”
दूर फसल के बीच हल्की हलचल हुई। कोई जानवर नहीं था, क्योंकि आवाज नहीं आई। बस अंधेरे के भीतर कुछ आकार बदलते दिखे। पहले लगा आँखें थक गई हैं, फिर धीरे-धीरे कई आकृतियाँ अलग-अलग हिस्सों में नजर आने लगीं। वे लोग जैसे ही दिखाई दिए, उस जमीन का फैलाव और बड़ा लगने लगा। कोई पास नहीं आया। वे सिर्फ खड़े रहे, जैसे किसी तमाशे का अंत जानते हों।
उनमें से एक आकृति बाकी से अलग थी।
वह धीरे-धीरे आगे आई, और मेरे अंदर जो थोड़ा साहस बचा था, वह उसी क्षण खत्म हो गया। सामने खड़ा व्यक्ति मेरे जैसा दिखता था। बिल्कुल वैसा नहीं, क्योंकि कोई भी चेहरा हूबहू नहीं होता, लेकिन इतना मिलता-जुलता कि पहली नजर में शरीर ने उसे अपना ही प्रतिबिंब मान लिया। फर्क सिर्फ भाव में था। मेरे चेहरे पर घबराहट थी, उसके चेहरे पर धैर्य। वह ऐसा लग रहा था जैसे उसे पता हो कि आखिर में क्या होगा।
“घर चलो,” उसने कहा।
आवाज भी मेरी ही थी।
यह सुनना किसी भी दृश्य से ज्यादा खराब था। शक्ल का मिलना एक भ्रम हो सकता था, लेकिन अपनी आवाज किसी और के मुँह से सुनना दिमाग को भीतर से हिला देता है। उसने दोबारा कहा कि देर हो रही है। फिर माँ का नाम लिया। फिर मेरे छोटे भाई की एक पुरानी आदत का जिक्र किया, जिसे घर के बाहर बहुत कम लोग जानते थे।
बूढ़े ने मेरी बाँह पकड़ ली। पकड़ ठंडी नहीं थी, मगर कमजोर थी।
“उससे बात मत कर। जितना सुनेगा, उतना देगा।”
“क्या?”
“अपना हिस्सा।”
अब आवाजें बढ़ने लगी थीं। वे चिल्ला नहीं रही थीं। कोई डरावना शोर नहीं था। वे सामान्य बातचीत जैसी थीं, और इसी वजह से असहनीय थीं। कोई पुराने दोस्त की तरह बोल रहा था, कोई घर वाले की तरह। कुछ आवाजें ऐसे रिश्तों से जुड़ी थीं जिन्हें मैंने भूल समझकर दिमाग में कहीं दबा दिया था। वे नाम ले रही थीं, घटनाएँ याद दिला रही थीं, और हर बात के साथ मेरे अंदर से वही घटना थोड़ा और धुँधली होती जा रही थी।
बूढ़े ने मुझे धक्का दिया।
“भाग। जहाँ जमीन नीचे धँसती लगे, उधर जाना।”
यह सलाह अजीब थी, लेकिन उस समय दिशा का कोई और आधार नहीं था। मैं भागा नहीं, पहले लड़खड़ाते हुए चला, फिर कदम तेज हुए। पीछे से मेरा हमशक्ल बोलता रहा। उसने कहा कि लौट आओ, यह सब खत्म हो जाएगा। उसने कहा कि किसी को पता नहीं चलेगा। उसने कहा कि बाहर की दुनिया में वैसे भी मैं कौन सा बहुत जरूरी आदमी हूँ।
यह आखिरी बात मेरे भीतर कहीं लगी।
क्योंकि आदमी को डराने के लिए हमेशा दानव की जरूरत नहीं होती। कई बार उसकी अपनी ही कमजोर आवाज काफी होती है।
कुछ दूरी के बाद जमीन सचमुच नीचे की तरफ ढलान लेने लगी। झाड़ियाँ घनी हो गईं। फसल पीछे छूटती गई और पाँव पत्थरों से टकराने लगे। यह हिस्सा गाँव के किसी नक्शे में नहीं था। बचपन में हमने इस तरफ खेला होता तो याद रहता। यहाँ एक पुराना कुआँ था, पत्थरों से घिरा, आधा झाड़ियों में छिपा हुआ। उसके बारे में मैंने कभी किसी को बोलते नहीं सुना था।
कुएँ से रोशनी नहीं, बल्कि एक तरह की हल्की चमक निकल रही थी। वह किसी लालटेन या मोबाइल की रोशनी जैसी नहीं थी। ज्यादा देर देखने पर लगता था कि चमक बाहर नहीं आ रही, बल्कि आँखों के भीतर बन रही है। बूढ़ा मेरे पीछे आकर रुक गया। पहली बार उसके चेहरे पर डर साफ दिखा।
“यहीं से यह शुरू हुआ था,” उसने कहा।
कुएँ में झाँकने का मन नहीं था। शरीर पीछे हटना चाहता था, लेकिन नजरें उसी ओर खिंच रही थीं। नीचे अंधेरा होना चाहिए था, मगर वहाँ खालीपन नहीं था। पहले धुंधले आकार दिखे, फिर चेहरे। बहुत सारे चेहरे। कुछ इतने बूढ़े कि पहचानना मुश्किल, कुछ अधूरे, कुछ ऐसे जैसे किसी ने याद करते-करते बीच में छोड़ दिया हो। वे मृत चेहरों जैसे नहीं थे। उनमें एक अजीब प्रतीक्षा थी, जैसे वे अब भी किसी जवाब की उम्मीद कर रहे हों।
फिर उनमें अपना चेहरा दिखा।
न नीचे पानी था, न लाशें, न कोई दैत्य। बस वह संभावना थी कि मेरा एक हिस्सा पहले ही वहाँ पहुँच चुका है। नीचे दिख रहा चेहरा मुस्कुरा नहीं रहा था। वह दुखी भी नहीं था। वह मेरी तरफ ऐसे देख रहा था जैसे कह रहा हो कि देर मत कर, जगह कम है।
सिर में तेज दर्द शुरू हुआ। बचपन की बहुत सारी बातें एक साथ सामने आईं और उतनी ही तेजी से पीछे हटने लगीं। आम के पेड़ पर चढ़ना याद था, मगर किसके साथ चढ़ा था याद नहीं। स्कूल का मैदान याद था, मगर दोस्त का चेहरा मिट रहा था। घर का दरवाजा याद था, मगर पहली बार शहर जाने वाली सुबह की आवाजें गायब हो रही थीं। यह भूलना सामान्य भूलने जैसा नहीं था। यह ऐसा था जैसे किसी ने अंदर रखी चीजों को उठाकर बिना आवाज के बाहर रखना शुरू कर दिया हो।
बूढ़ा चिल्लाया नहीं। उसने बस मेरा कंधा दबाया और बहुत साफ आवाज में कहा, “अपना नाम बोल।”
मैंने बोलने की कोशिश की।
नाम नहीं आया।
वह क्षण किसी भी भूत से ज्यादा डरावना था।
आदमी दुनिया में बहुत कुछ खो सकता है, लेकिन अपना नाम खोने से पहले उसे समझ नहीं आता कि वह कितनी पतली डोर पर टिका था। मैंने फिर कोशिश की। जीभ भारी लग रही थी। नीचे कुएँ में चेहरे हलचल करने लगे। पीछे से मेरा हमशक्ल पास आ चुका था। उसकी आवाज अब बहुत शांत थी।
“छोड़ दो। बाहर वैसे भी सब तुम्हें पहचान लेंगे।”
यही बात असली जाल थी।
अगर लोग पहचान लेंगे तो फिर बचने की जरूरत क्या है? अगर माँ गले लगा लेगी, पिता नाम से पुकारेंगे, गाँव वाले कहेंगे कि लड़का लौट आया, तो असली और नकली में फर्क कौन करेगा? शायद कोई नहीं। शायद यही उस जगह की ताकत थी।
मैंने आँखें बंद कर लीं। नाम याद करने के बजाय घर की गंध याद करने की कोशिश की—रसोई में बनती चाय, बरामदे की सीलन, पुराने संदूक में रखे कपड़ों की बंद गंध, माँ के हाथों में लगी हल्दी, पिता की खाँसी, बारिश के बाद आँगन में उठती मिट्टी। यादें साफ नहीं थीं, लेकिन वे मेरी थीं। उनके साथ मेरा नाम भी धीरे-धीरे वापस आया।
पहले अधूरा।
फिर पूरा।
मैंने उसे बोल दिया।
आवाज कमजोर थी, पर मेरी थी।
जमीन हल्की सी काँपी। यह फिल्मी तरह का कंपन नहीं था कि सब कुछ टूटने लगे। बस इतना कि पैरों के नीचे खड़े होने का भरोसा चला जाए। कुएँ के भीतर मौजूद चेहरे पीछे हटते हुए लगे। मेरा हमशक्ल पहली बार शांत नहीं रहा। उसके चेहरे पर जो भाव आया, वह गुस्सा नहीं था। वह खालीपन था। जैसे उसके पास अचानक कुछ कम पड़ गया हो।
बूढ़े ने कहा, “अब मत रुकना।”
इस बार मैं सचमुच भागा। दिशा समझ नहीं आ रही थी, लेकिन अब उस जगह का दबाव थोड़ा कम हो गया था। आवाजें पीछे छूट रही थीं। कई बार लगा कि कोई कंधे से पकड़ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ। फसलें खत्म हुईं, मिट्टी की पगडंडी मिली, और सामने दूर गाँव की पहली रोशनी दिखाई दी।
सुबह लोग मुझे खेत की सीमा के पास मिला बताते हैं। यह बात मुझे बाद में पता चली। मेरे कपड़े मिट्टी से भरे थे, घुटने छिले हुए थे और बुखार इतना तेज था कि दो दिन तक मैं ठीक से बोल नहीं पाया। गाँव वालों ने मान लिया कि मैं बच गया। कई लोगों ने कहा कि ऊपर वाले ने बचा लिया। कुछ ने मेरी मूर्खता पर डाँटा। चाय की दुकान वाला कई दिनों तक मुझे देखकर सिर हिलाता रहा।
मैं भी यही मानना चाहता था कि मैं बच गया।
लेकिन ठीक होने के बाद कुछ छोटी बातें परेशान करने लगीं।
घर का रास्ता याद था, लेकिन बचपन में उस रास्ते पर किसके साथ पतंग उड़ाई थी, यह याद नहीं आता था। माँ की आवाज पहचानता था, पर उनकी एक पुरानी लोरी याद करने की कोशिश करता तो दिमाग खाली हो जाता। पिता की डाँट याद थी, पर पहली बार उन्होंने मुझे साइकिल चलाना कब सिखाया, वह दृश्य टूटे हुए काँच जैसा बिखरा पड़ा था।
शुरू में सबने कहा कि डर की वजह से ऐसा है। डॉक्टर ने भी यही कहा—trauma, shock, temporary memory issue. मैंने मान लिया। मानना जरूरी भी था, क्योंकि दूसरी संभावना पर सोचने की हिम्मत नहीं थी।
तीन दिन बाद गाँव के बुजुर्ग मेरे पास आए। वही चाय की दुकान वाले बुजुर्ग। उन्होंने पूछा कि भीतर क्या देखा। मैंने जितना बता सकता था, बताया। कुआँ सुनते ही उनका चेहरा बदल गया। उन्होंने बाकी लोगों से कुछ नहीं कहा, लेकिन उसी शाम चार आदमी लेकर उस दिशा में गए। वे सूरज ढलने से पहले लौट आए। उनके हाथ खाली थे, चेहरों पर पसीना था।
“वहाँ कोई कुआँ नहीं है,” उन्होंने कहा।
मैंने समझाना चाहा कि झाड़ियों के पीछे था, ढलान पर था, पत्थर का घेरा था। उन्होंने मेरी बात काट दी।
“वहाँ जमीन समतल है।”
उस रात नींद नहीं आई।
आधी रात के बाद आईने के सामने खड़ा हुआ। चेहरा वही था। आँखें मेरी थीं। माथे का पुराना निशान भी था, जो बचपन में गिरने से लगा था। सबूत मेरे पक्ष में थे। फिर भी भीतर एक असुविधा थी। जैसे सामने खड़ा चेहरा मेरे हर भाव को आधा सेकंड देर से दोहरा रहा हो।
यह भ्रम हो सकता था।
थकान भी।
लेकिन अगले दिन जो हुआ, उसके बाद मैं खुद को पूरी तरह समझा नहीं पाया।
माँ ने पुराने एल्बम निकाले। शायद उन्हें लगा कि तस्वीरें देखने से याददाश्त लौटेगी। एक तस्वीर में मैं था, छोटा, पिता की साइकिल पकड़े हुए। दूसरी में स्कूल का वार्षिक कार्यक्रम। तीसरी में मैं और मेरा बचपन का दोस्त, जिसकी याद कुएँ के पास धुँधली हुई थी।
मैंने उस दोस्त का नाम पहचान लिया।
लेकिन तस्वीर में उसके बगल में खड़े खुद को देखकर अजीब सा लगा।
जैसे वह बच्चा मैं नहीं, कोई और था जिसकी कहानी मुझे सुनाई गई है।
मैंने यह बात किसी को नहीं बताई।
कुछ दिन बाद शहर लौट आया। जीवन धीरे-धीरे सामान्य हुआ। नौकरी, किराया, भीड़, मोबाइल, रोज की भागदौड़। गाँव की घटना को दिमाग ने एक अजीब हादसे की तरह रखना शुरू कर दिया। कभी-कभी रात में नींद खुलती तो लगता कोई मेरा नाम पूछ रहा है, लेकिन सुबह होते-होते सब हल्का हो जाता।
लगभग छह महीने बाद माँ का फोन आया। आवाज सामान्य रखने की कोशिश कर रही थीं, पर मैं पहचान गया कि वह परेशान हैं। उन्होंने बताया कि गाँव का एक आदमी शाम के बाद उसी तरफ गया था। सुबह घर लौट आया। लोग खुश थे कि कुछ नहीं हुआ।
मैंने पूछा, “फिर?”
माँ कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं, “वह अपने बेटे को पहचान रहा है, बहू को पहचान रहा है, घर भी पहचान रहा है। बस कह रहा है कि उसकी माँ कई साल पहले मर चुकी है।”
समस्या यह थी कि उसकी माँ उसी कमरे में बैठी थी।
मैंने फोन काटने के बाद बहुत देर तक कुछ नहीं किया। कमरे में आईना था, पर मैंने उसकी तरफ नहीं देखा। उस दिन पहली बार समझ आया कि वह जगह खत्म नहीं हुई। शायद कभी खत्म होती ही नहीं। वह बस इंतजार करती है कि कोई आदमी अपने यकीन, अपनी जिज्ञासा या अपनी मूर्खता के साथ वहाँ पहुँच जाए।
आज भी जब कोई मुझसे पूछता है कि उस रात सच में क्या हुआ था, तो मैं पूरी बात नहीं बताता। लोग भूत की कहानी सुनना चाहते हैं, उन्हें कोई चेहरा, कोई परछाई, कोई श्राप चाहिए होता है। उन्हें यह डर समझाना मुश्किल है कि आदमी लौट भी आए तो जरूरी नहीं कि पूरा लौटे।
कई बार सुबह उठकर सबसे पहले अपना नाम मन ही मन दोहराता हूँ। फिर माँ का नाम, पिता का नाम, अपने गाँव का नाम। यह आदत अब मजबूरी जैसी हो गई है। जब तक सब याद आ जाए, दिन शुरू नहीं करता।
और कभी-कभी, बहुत कम, लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि नाम याद आने में एक पल ज्यादा लग जाता है।
बस एक पल।
लेकिन वही एक पल काफी है यह समझने के लिए कि उस जमीन ने मुझे छोड़ा नहीं है।
शायद उसने सिर्फ मुझे पूरी तरह लेने का समय आगे बढ़ा दिया है।
https://en.wikipedia.org/wiki/Black_magic
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