कभी-कभी किसी इंसान की ज़िंदगी बर्बाद करने के लिए उसे मारना ज़रूरी नहीं होता। उसकी सोच, उसके फैसले और उसके रिश्तों को धीरे-धीरे इस तरह बदल दिया जाए कि वह खुद अपनी बर्बादी का कारण बन जाए—शायद यही असली काला जादू होता है। Kaala Jaadu Horror Story
अनिरुद्ध चौधरी पिछले दस साल से एक बड़ी फार्मास्यूटिकल कंपनी में “क्वालिटी कंप्लायंस ऑडिटर” था। उसका काम पूरे देश की फैक्ट्रियों में जाकर उत्पादन प्रक्रिया की जांच करना, रिपोर्ट तैयार करना और यह तय करना था कि कोई दवा बाजार में जाने लायक है या नहीं। उसका पेशा ऐसा था जिसमें दुश्मन बनना आसान था। एक गलत रिपोर्ट करोड़ों का नुकसान कर सकती थी। फिर भी उसने हमेशा यही सीखा था कि कागज पर वही लिखना है जो सच हो।

उस सुबह उसे कंपनी की तरफ से एक नया असाइनमेंट मिला। शहर के बाहरी इलाके में बनी एक निजी बायोटेक यूनिट की जांच करनी थी। यह यूनिट हाल ही में कंपनी ने खरीदी थी। पिछले तीन महीने से वहां लगातार शिकायतें आ रही थीं कि मशीनें ठीक होने के बावजूद उत्पादन में अजीब गड़बड़ियां हो रही हैं। बैच रिपोर्ट और असली उत्पादन के आंकड़े मेल नहीं खाते थे। कई अनुभवी कर्मचारी बिना वजह नौकरी छोड़कर जा चुके थे। कंपनी को शक था कि कोई अंदरूनी व्यक्ति जानबूझकर डेटा बदल रहा है।
अनिरुद्ध को ऐसी जांचें पसंद थीं। यहां भावनाओं की नहीं, तथ्यों की कीमत होती थी।
दोपहर तक वह फैक्ट्री पहुंच गया। बाहर से इमारत बिल्कुल सामान्य दिखती थी। नई पेंटिंग, चमकते शीशे, इलेक्ट्रॉनिक गेट और अंदर व्यवस्थित लैब। कहीं कोई डरावनी बात नहीं।
रिसेप्शन पर बैठी महिला ने मुस्कुराकर कहा, “सर, आपका इंतजार हो रहा था।”
प्लांट हेड समरजीत ने हाथ मिलाते हुए कहा, “उम्मीद है आप इस रहस्य को सुलझा देंगे।”
“रहस्य?” अनिरुद्ध मुस्कुराया।
“कभी-कभी हम भी यही शब्द इस्तेमाल करते हैं।”
उन्होंने पूरी यूनिट दिखाई। मशीनें बिल्कुल सही थीं। तापमान रिकॉर्ड सामान्य थे। सर्वर सुरक्षित था। कोई तकनीकी खराबी नहीं मिली।
लेकिन एक बात अजीब थी।
जहां भी वह जाता, लोग उससे आंखें मिलाने से बचते।
कर्मचारी सवालों का जवाब देते थे, लेकिन हर उत्तर ऐसा लगता था जैसे पहले से याद कराया गया हो।
“आप लोग इतने चुप क्यों हैं?” उसने एक ऑपरेटर से पूछा।
उसने तुरंत इधर-उधर देखा, फिर धीरे से बोला, “सर… यहां ज्यादा सवाल पूछना अच्छा नहीं माना जाता।”
“किसके द्वारा?”
वह जवाब दिए बिना चला गया।
अनिरुद्ध ने इसे ऑफिस की राजनीति समझकर नजरअंदाज कर दिया।
शाम को वह रिकॉर्ड रूम में पुराने दस्तावेज देखने लगा। वहां पिछले ऑडिट की फाइलें रखी थीं। लगभग हर रिपोर्ट के आखिरी पन्ने पर लाल पेन से एक छोटा-सा गोल निशान बना था।
इतने व्यवस्थित दस्तावेजों में बार-बार एक ही निशान?
उसने पूछा, “ये किसका मार्क है?”
समरजीत ने फाइल हाथ से लेकर तुरंत बंद कर दी।
“पुराने ऑडिटर की आदत थी। कोई मतलब नहीं।”
अनिरुद्ध ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने गौर किया कि समरजीत के हाथ हल्के-हल्के कांप रहे थे।
रात होटल लौटकर उसने लैपटॉप खोला और दिनभर के नोट्स टाइप करने लगा। लगभग आधे घंटे बाद स्क्रीन एक सेकंड के लिए काली हुई।
फिर सब सामान्य हो गया।
उसने इसे बिजली की हल्की समस्या समझा।
लेकिन जब उसने अपनी रिपोर्ट दोबारा पढ़ी, तो आखिरी पैराग्राफ बदल चुका था।
वहां लिखा था—
“तुम्हें सच लिखने की आदत है। देखते हैं कब तक रहती है।”
अनिरुद्ध कुछ पल तक स्क्रीन देखता रहा।
उसने पूरा सिस्टम स्कैन किया। कोई वायरस नहीं।
उसने फाइल हिस्ट्री देखी।
आखिरी बदलाव उसी के यूजर अकाउंट से हुआ था।
समय वही था जब स्क्रीन काली हुई थी।
“शायद कोई सॉफ्टवेयर गड़बड़ी है,” उसने खुद से कहा।
उसने लाइन डिलीट की और फाइल सेव कर दी।
Kaala Jaadu Horror Story
अगली सुबह जब उसने फाइल खोली, वही लाइन फिर मौजूद थी।
इस बार नीचे एक और वाक्य जुड़ चुका था—
“काला रंग सिर्फ स्याही का नहीं होता।”
अब पहली बार उसके माथे पर पसीना आया।
उसने लैपटॉप ऑफ कर दिया।
फैक्ट्री पहुंचने पर उसने आईटी विभाग से पूरा सिस्टम चेक करवाया।
सब कुछ सामान्य निकला।
“सर, किसी ने कुछ नहीं किया,” इंजीनियर बोला।
“लेकिन फाइल बदल रही है।”
“अगर ऐसा हुआ होता तो लॉग में दिखता।”
लॉग खाली था।
दिनभर उसने कर्मचारियों से अलग-अलग बात की। सभी एक ही तरह की बातें करते। जैसे किसी ने उनके जवाब पहले से तय कर दिए हों।
दोपहर में कैंटीन में एक बुजुर्ग सफाई कर्मचारी उसकी टेबल के पास आया।
“सर…”
“हां?”
“अगर यहां ज्यादा दिन रहना है… तो किसी का दिया हुआ कुछ मत खाइएगा।”
“क्यों?”
वह जवाब देने ही वाला था कि पीछे से सुपरवाइजर की आवाज आई।
“रामू! यहां क्या कर रहे हो?”
बुजुर्ग तुरंत चुप होकर चला गया।
शाम तक अनिरुद्ध ने महसूस किया कि फैक्ट्री में हर कोई उस आदमी से बचता है।
जैसे उसकी बात सुनना भी गलत हो।
उस रात उसने तय किया कि वह रिकॉर्ड रूम फिर देखेगा।
करीब नौ बजे वह वापस फैक्ट्री पहुंचा। सिक्योरिटी ने उसे अंदर जाने दिया।
पूरा प्लांट लगभग खाली था।
रिकॉर्ड रूम की चाबी उसके पास थी।
उसने धीरे से दरवाजा खोला।
फाइलें वहीं थीं।
लेकिन जिस शेल्फ पर पुराने ऑडिट रखे थे, वहां धूल में किसी ने उंगलियों से कुछ लिखा था।
“मत पढ़ो।”
उसने चारों तरफ देखा।
कमरा खाली था।
सीसीटीवी कैमरा ऊपर लगा था।
उसने रिकॉर्डिंग देखने का फैसला किया।
सिक्योरिटी कंट्रोल रूम में फुटेज निकाली गई।
वीडियो में साफ दिखाई दे रहा था कि शाम छह बजे के बाद कोई कमरे में नहीं गया।
फिर रात आठ बजकर बयालीस मिनट पर धूल अपने आप हिलने लगी।
जैसे किसी अदृश्य उंगली ने धीरे-धीरे वे दो शब्द लिख दिए हों।
कंट्रोल रूम में मौजूद ऑपरेटर ने वीडियो तुरंत बंद कर दिया।
“सर… ये फाइल खराब है।”
“फाइल खराब नहीं है।”
“हम इसे डिलीट कर देंगे।”
“क्यों?”
“क्योंकि… ऐसी रिकॉर्डिंग रखने की इजाजत नहीं है।”
“किसकी इजाजत नहीं है?”
वह चुप रहा।
अनिरुद्ध ने पहली बार महसूस किया कि यहां लोग किसी इंसान से नहीं, किसी विचार से डरते हैं।
अगले दिन उसे पुराने ऑडिटर विक्रम सक्सेना का संपर्क मिला। रिकॉर्ड में लिखा था कि उसने अचानक इस्तीफा दिया था।
काफी कोशिश के बाद उसका पता मिला।
वह शहर में ही रहता था।
अनिरुद्ध शाम को उसके फ्लैट पहुंचा।
दरवाजा उसकी पत्नी ने खोला।
“आप विक्रम जी से मिलना चाहते हैं?”
“जी।”
महिला का चेहरा उतर गया।
“वो अब किसी से नहीं मिलते।”
“मैं कंपनी से हूं।”
कुछ देर बाद अंदर से धीमी आवाज आई।
“आने दो।”
कमरे में बैठे विक्रम को देखकर अनिरुद्ध ठिठक गया।
सिर्फ चालीस साल की उम्र में वह सत्तर का लगता था।
चेहरे पर गहरी झुर्रियां, आंखों के नीचे काले घेरे और हाथ लगातार कांप रहे थे।
“आप भी वहीं गए हैं?” उसने बिना परिचय के पूछा।
“जी।”
विक्रम ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “रिपोर्ट मत लिखना।”
“क्यों?”
“क्योंकि रिपोर्ट कभी फैक्ट्री के बारे में नहीं होती।”
“मतलब?”
विक्रम धीरे-धीरे मुस्कुराया।
“तुम्हें अभी तक लगा होगा कि कोई तुम्हारा लैपटॉप हैक कर रहा है… रिकॉर्ड बदल रहा है… लोग झूठ बोल रहे हैं।”
अनिरुद्ध ने कुछ नहीं कहा।
विक्रम ने पहली बार उसकी आंखों में देखा।
“असल खेल दस्तावेजों में नहीं है।”
“तो कहां है?”
विक्रम ने कांपते हुए मेज की दराज खोली।
उसमें से एक पुरानी डायरी निकाली।
डायरी का हर पन्ना काली स्याही से भरा था।
लेकिन स्याही से ज्यादा डरावनी बात यह थी कि हर पन्ने पर एक ही नाम बार-बार लिखा गया था।
‘अनिरुद्ध चौधरी।’
सैकड़ों बार।
विभिन्न लिखावटों में।
विभिन्न तारीखों के साथ।
कुछ तारीखें तो अगले महीने की थीं… जो अभी आई भी नहीं थीं।
अनिरुद्ध का गला सूख गया।
“ये… किसने लिखा?”
विक्रम ने धीमी आवाज में कहा—
“मैंने नहीं…”
“…लेकिन लिखावट मेरी ही है।”
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