अक्टूबर का आखिरी सप्ताह था। नैनीताल में ठंड ने अभी पूरी तरह दस्तक नहीं दी थी, लेकिन शाम ढलते ही हवा में ऐसी नमी घुल जाती थी जो मैदानों से आने वाले लोगों को जैकेट पहनने पर मजबूर कर देती। झील के ऊपर हल्का-सा कोहरा हर रात थोड़ा और घना हो जाता था और पहाड़ियों पर फैले पुराने घरों की खिड़कियों से निकलती पीली रोशनी दूर से ऐसे दिखाई देती जैसे अंधेरे में किसी ने छोटे-छोटे दीपक टांग दिए हों। पर्यटकों के लिए यह मौसम सबसे खूबसूरत माना जाता था। दिन में नाव की सैर, शाम को मॉल रोड की चहल-पहल और रात को पहाड़ों की खामोशी। लेकिन इसी मौसम के बारे में स्थानीय लोग एक बात और कहते थे—कुछ रातें ऐसी होती हैं जब पहाड़ अपने पुराने मेहमानों को याद करते हैं। Nainital Haunted Trip

विवेक मल्होत्रा ने इस बात पर केवल मुस्कुराकर सिर हिला दिया था। उम्र बत्तीस साल। पेशे से ट्रैवल डॉक्यूमेंट्री प्रोड्यूसर। पिछले कई वर्षों से वह अलग-अलग जगहों पर घूमकर छोटे ट्रैवल वीडियो बनाता था। उसका मानना था कि हर शहर की सबसे दिलचस्प कहानी उसकी गलियों में नहीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की यादों में छिपी होती है। इसी वजह से वह हमेशा भीड़ से थोड़ा हटकर जगहें तलाशता था। इस बार उसने अपने तीन दोस्तों—रोहन, निखिल और समीर—के साथ चार दिन की नैनीताल ट्रिप प्लान की थी। चारों कॉलेज के समय से दोस्त थे, लेकिन पिछले छह वर्षों में सभी अपनी-अपनी नौकरियों में इतने व्यस्त हो गए थे कि साथ घूमने का मौका ही नहीं मिला। यह यात्रा केवल छुट्टी नहीं थी, बल्कि पुराने दिनों को फिर से जीने की कोशिश थी।
दिल्ली से निकलते समय कार में केवल हंसी-मजाक था। कोई पुराने कॉलेज के किस्से सुना रहा था, कोई पुराने फोटो दिखा रहा था। रास्ते में ढाबे पर चाय पी गई, पहाड़ शुरू होते ही गाने बदल गए और मोबाइल कैमरे लगातार बाहर की तरफ घूमने लगे। सड़क के दोनों ओर चीड़ के लंबे पेड़ दिखाई देने लगे थे। हवा साफ होती जा रही थी। शाम लगभग छह बजे वे नैनीताल की सीमा में दाखिल हुए। शहर हमेशा की तरह पर्यटकों से भरा हुआ था। झील के किनारे रोशनी चमक रही थी। नावें किनारे लग चुकी थीं। होटल वालों की आवाजें दूर तक सुनाई दे रही थीं।
समीर ने कार पार्क करते हुए कहा, “अगर अभी होटल में चेक-इन कर लिया तो रात को आराम से घूम सकते हैं।”
विवेक ने मोबाइल निकाला और बुकिंग देखने लगा। अचानक उसका चेहरा थोड़ा बदल गया।
“यार… एक छोटी-सी प्रॉब्लम हो गई है।”
“क्या हुआ?”
“जिस होटल में बुकिंग थी, उसने अभी मैसेज भेजा है कि पाइपलाइन फट गई है। उन्होंने दूसरी प्रॉपर्टी ऑफर की है।”
रोहन ने हंसते हुए कहा, “अरे बढ़िया… फ्री अपग्रेड होगा।”
“पता नहीं,” विवेक ने स्क्रीन दिखाते हुए कहा, “यह होटल शहर से लगभग सात किलोमीटर ऊपर है।”
कुछ सेकंड तक सबने एक-दूसरे की तरफ देखा। फिर निखिल बोला, “कोई बात नहीं। वैसे भी शांत जगह चाहिए थी।”
उन्होंने नई लोकेशन का मैप खोला। सड़क शहर से निकलकर धीरे-धीरे ऊपर जंगल की तरफ जा रही थी। होटल का नाम था पाइन क्रेस्ट रिट्रीट। इंटरनेट पर उसकी कुछ तस्वीरें थीं—पत्थर की पुरानी इमारत, सामने खुली घाटी, पीछे घना जंगल। रिव्यू बहुत कम थे। ज्यादातर लोगों ने वहां की शांति की तारीफ की थी।
करीब पच्चीस मिनट बाद कार एक संकरी सड़क पर पहुंची। सड़क इतनी पतली थी कि दो गाड़ियों का साथ निकलना मुश्किल था। दोनों तरफ ऊंचे देवदार के पेड़ थे। स्ट्रीट लाइट लगभग खत्म हो चुकी थीं। केवल कार की हेडलाइट्स रास्ता दिखा रही थीं। तभी सामने एक बुजुर्ग आदमी टॉर्च लेकर धीरे-धीरे चलता दिखाई दिया।
समीर ने कार धीमी कर दी।
बुजुर्ग ने हाथ उठाकर गाड़ी रुकवाई।
“बेटा… शहर जा रहे हो?”
“नहीं, होटल की तरफ,” विवेक ने जवाब दिया।
“कौन-सा होटल?”
“पाइन क्रेस्ट रिट्रीट।”
यह नाम सुनते ही बूढ़े के चेहरे पर आई सामान्य मुस्कान गायब हो गई। उसने कुछ पल तक चारों को देखा। फिर केवल इतना कहा, “अगर वहां पहुंच जाओ… तो रात में बाहर मत निकलना।”
रोहन हंस पड़ा।
“क्यों बाबा? भालू आते हैं क्या?”
बूढ़े ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस सड़क के दूसरी तरफ इशारा किया और बिना पीछे देखे अंधेरे में चलता चला गया।
कार के अंदर कुछ क्षणों के लिए अजीब-सी चुप्पी छा गई।
“लोकल लोग भी ना…” निखिल ने माहौल हल्का करने की कोशिश की, “पर्यटकों को डराना इनका पुराना शौक है।”
विवेक ने भी बात वहीं खत्म कर दी, लेकिन उसने रियर-व्यू मिरर में पीछे देखा। बूढ़ा आदमी अब दिखाई नहीं दे रहा था। सड़क बिल्कुल खाली थी। इतनी जल्दी कोई इंसान आंखों से ओझल नहीं हो सकता था।
Nainital Haunted Trip
सात मिनट बाद होटल सामने था।
वह तस्वीरों से कहीं ज्यादा पुराना लग रहा था।
पत्थरों से बनी तीन मंजिला इमारत, लकड़ी की लंबी बालकनियां, सामने खुला मैदान और उसके बाद सीधी उतरती गहरी घाटी। होटल के आसपास कोई दूसरी बिल्डिंग नहीं थी। केवल जंगल और हवा की आवाज।
रिसेप्शन पर लगभग पचपन साल का एक व्यक्ति बैठा था। उसने मुस्कुराकर उनका स्वागत किया, लेकिन उसकी मुस्कान आंखों तक नहीं पहुंची।
“आप लोग दिल्ली से?”
“जी।”
“चार लोग… दो कमरे।”
उसने बिना ज्यादा बातचीत किए चाबियां दे दीं।
विवेक ने सहज ही पूछ लिया, “यहां और कोई गेस्ट है?”
रिसेप्शनिस्ट ने रजिस्टर बंद करते हुए कहा, “आज नहीं।”
“मतलब पूरा होटल खाली है?”
“आज… हाँ।”
रोहन ने धीरे से कहा, “वाह… पूरा होटल हमारे लिए।”
लेकिन न जाने क्यों यह बात सुनकर किसी को उत्साह नहीं हुआ।
कमरे बड़े थे, साफ-सुथरे भी। लकड़ी की छत, पुराना फर्नीचर और सामने पूरी घाटी का दृश्य। बाहर खड़े होकर देखने पर दूर नैनीताल शहर की रोशनियां छोटे सितारों जैसी चमक रही थीं।
रात लगभग साढ़े नौ बजे चारों ने होटल के डाइनिंग हॉल में खाना खाया। वहां केवल वही चार लोग थे। कोई स्टाफ भी बार-बार दिखाई नहीं दे रहा था। खाना उम्मीद से अच्छा था। लौटते समय विवेक ने देखा कि रिसेप्शन खाली पड़ा था। घंटी रखी थी, लेकिन कोई मौजूद नहीं था।
कमरे में पहुंचकर उन्होंने अगले दिन की प्लानिंग शुरू कर दी। स्नो व्यू पॉइंट, केव गार्डन, नैना पीक और झील की बोटिंग। लगभग ग्यारह बजे सब अपने-अपने कमरों में चले गए।
रात करीब बारह बजे विवेक की अचानक आंख खुली।
कमरे में पूरी तरह सन्नाटा था।
उसे लगा शायद बाहर तेज हवा चल रही है। उसने करवट बदली, लेकिन तभी उसे बहुत हल्की-सी आवाज सुनाई दी।
जैसे किसी ने लकड़ी के फर्श पर धीरे-धीरे कदम रखे हों।
टक…
फिर कुछ सेकंड की चुप्पी।
टक…
फिर चुप्पी।
आवाज कमरे के बाहर गलियारे से आ रही थी।
उसने सोचा शायद कोई स्टाफ होगा। लेकिन तभी उसे याद आया—पूरा होटल तो खाली था।
वह उठकर दरवाजे के पास गया और पीपहोल से बाहर देखा।
लंबा लकड़ी का गलियारा हल्की पीली रोशनी में दिखाई दे रहा था।
कोई नहीं था।
आवाज भी बंद हो चुकी थी।
विवेक वापस बिस्तर पर लौटने ही वाला था कि उसकी नजर गलियारे के सबसे आखिरी छोर पर गई।
वहां… किसी ने अभी-अभी मोड़ काटा था।
उसे केवल एक धुंधली-सी परछाईं दिखाई दी।
इतनी तेज कि वह यह भी तय नहीं कर पाया कि वह आदमी था… या कोई और।
उसने तुरंत दरवाजा खोल दिया।
गलियारा बिल्कुल खाली था।
हवा भी नहीं चल रही थी।
लेकिन लकड़ी के फर्श पर, ठीक वहां… जहां कुछ सेकंड पहले उसे परछाईं दिखी थी…
धूल में जूतों के नहीं…
बल्कि नंगे पैरों के गीले निशान बने हुए थे।
विवेक कुछ सेकंड तक उन गीले पैरों के निशानों को देखता रहा। उसकी पहली प्रतिक्रिया डर नहीं, बल्कि उलझन थी। बाहर न बारिश हुई थी, न गलियारे में कहीं पानी था। फिर भी लकड़ी के फर्श पर बने वे निशान बिल्कुल ताज़ा लग रहे थे, जैसे कोई अभी-अभी नंगे पैर वहां से गुज़रा हो। उसने मोबाइल की टॉर्च ऑन की और धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ा, जहां कुछ पल पहले उसे परछाईं दिखाई दी थी। हर कदम के साथ लकड़ी का फर्श हल्की-सी चरमराहट करता, और वही आवाज़ पूरे होटल में गूंज जाती। गलियारे के आखिर में पहुंचकर उसने टॉर्च दाईं ओर घुमाई। वहां केवल बंद कमरों की कतार थी। सभी कमरों के दरवाजों पर धूल जमी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि महीनों से किसी ने उन्हें खोला ही नहीं। लेकिन पैरों के निशान वहीं जाकर अचानक गायब हो गए। जैसे कोई हवा में विलीन हो गया हो।
उसी समय पीछे से किसी ने धीरे से उसका नाम पुकारा।
“विवेक…”
उसने पलटकर देखा तो रोहन खड़ा था। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था।
“तू यहां क्या कर रहा है?”
विवेक ने निशानों की तरफ इशारा किया, लेकिन जब दोनों ने नीचे देखा तो फर्श बिल्कुल सूखा था। एक भी निशान नहीं बचा था।
“यार, तू ठीक तो है?” रोहन ने पूछा।
विवेक कुछ बोल ही रहा था कि रोहन ने फुसफुसाकर कहा, “मुझे लगा कोई मेरे कमरे के बाहर खड़ा था। दरवाज़े के नीचे से किसी की परछाईं दिख रही थी। मैंने दरवाज़ा खोला… तो कोई नहीं था।”
दोनों ने तय किया कि बाकी दोस्तों को अभी नहीं जगाएंगे। शायद थकान की वजह से भ्रम हुआ हो। लेकिन कमरे में लौटते समय विवेक की नज़र सीढ़ियों के पास लगे पुराने फ्रेम पर पड़ी। उसमें होटल की बहुत पुरानी तस्वीर लगी थी। तस्वीर में यही इमारत थी, लेकिन सामने करीब दस लोग खड़े मुस्कुरा रहे थे। उनमें से एक आदमी बिल्कुल उसी रिसेप्शनिस्ट जैसा दिख रहा था जिसने उनका स्वागत किया था—बस तस्वीर कम से कम तीस-चालीस साल पुरानी लग रही थी।
सुबह जब चारों नाश्ते के लिए नीचे पहुंचे तो रिसेप्शनिस्ट सामान्य व्यवहार कर रहा था। विवेक ने तस्वीर के बारे में पूछा।
“यह फोटो कितनी पुरानी है?”
रिसेप्शनिस्ट ने एक नज़र फोटो पर डाली और शांत स्वर में बोला, “बहुत पुरानी।”
“इसमें जो आदमी खड़ा है… वह आप हैं?”
वह कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, “लोग कहते हैं कि शक्ल मिलती है।”
“मतलब?”
“मेरे पिता।”
उसने उससे ज़्यादा कुछ नहीं कहा और दूसरी तरफ चला गया।
दिनभर चारों नैनीताल घूमते रहे। नैनी झील, मॉल रोड, केबल कार, चाय की दुकानें—दिन इतना अच्छा बीता कि पिछली रात की बातें धीरे-धीरे मज़ाक लगने लगीं। शाम को उन्होंने झील के किनारे बैठे एक बुज़ुर्ग फोटोग्राफर से बातचीत शुरू की। जब उसने सुना कि वे पाइन क्रेस्ट रिट्रीट में ठहरे हैं, तो उसके चेहरे का रंग बदल गया।
“वह होटल अभी भी खुला है?”
“हाँ।”
“अजीब बात है…”
“क्यों?”
बूढ़े ने कैमरा नीचे रखते हुए कहा, “करीब पच्चीस साल पहले वहां पहाड़ी का एक हिस्सा टूटकर गिरा था। उस रात होटल में कुछ पर्यटक और स्टाफ फँस गए थे। बचाव दल सुबह पहुंचा, लेकिन कई लोग नहीं बचे। उसके बाद होटल सालों तक बंद रहा। बाद में किसी ने उसे फिर से शुरू किया।”
“और मालिक?”
“पुराना मालिक भी उसी हादसे में मारा गया था।”
विवेक के दिमाग में तुरंत सुबह देखी हुई तस्वीर घूम गई।
रात को लौटते समय चारों के बीच पहले जैसी हँसी नहीं थी।
करीब साढ़े ग्यारह बजे अचानक पूरे होटल की बिजली चली गई।
कुछ सेकंड बाद जनरेटर चालू हुआ, लेकिन केवल गलियारे की हल्की पीली लाइटें जलीं।
उसी समय ऊपर की मंज़िल से किसी भारी चीज़ के घसीटे जाने जैसी आवाज़ आने लगी।
घ्र्र्र…
घ्र्र्र…
समीर ने कहा, “चलकर देखते हैं।”
चारों मोबाइल की टॉर्च लेकर तीसरी मंज़िल पर पहुँचे। वहां हवा असामान्य रूप से ठंडी थी। गलियारे के आखिर में एक लकड़ी का दरवाज़ा आधा खुला था। उसे धक्का देते ही धूल का गुबार उठा। कमरा किसी स्टोर जैसा था। पुराने फर्नीचर, टूटे सूटकेस और दीवार पर लटकी एक बड़ी रजिस्टर अलमारी।
निखिल ने रजिस्टर उठाया।
उसके आखिरी पन्ने पर तारीख थी—
18 अक्टूबर
ठीक पच्चीस साल पहले की।
नीचे मेहमानों के नाम लिखे थे।
विवेक…
रोहन…
समीर…
निखिल…
चारों एक साथ जम गए।
“ये… कैसे हो सकता है?” समीर की आवाज़ काँप रही थी।
नामों के आगे कमरे के नंबर भी वही थे जिनमें वे ठहरे थे।
रजिस्टर का आखिरी वाक्य था—
“अगर यह सूची फिर से भर जाए… तो पहाड़ अपना हिसाब पूरा कर देगा।”
अचानक पीछे से दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया।
कमरा अँधेरे में डूब गया।
बाहर से कई लोगों के एक साथ चलने की आवाज़ आने लगी।
टक…
टक…
टक…
जैसे पूरा गलियारा लोगों से भर गया हो।
रोहन ने दरवाज़ा धक्का दिया, लेकिन वह नहीं खुला।
उसी समय कमरे के कोने में रखा पुराना रेडियो अपने आप चालू हो गया।
उसमें केवल एक टूटी हुई आवाज़ सुनाई दी—
“इस बार… निकल जाओ…”
और फिर किसी आदमी की चीख।
विवेक ने पूरी ताकत से दरवाज़े पर कंधा मारा।
तीसरी कोशिश में कुंडी टूट गई।
चारों दौड़ते हुए सीढ़ियों की तरफ भागे।
लेकिन नीचे पहुँचकर वे वहीं रुक गए।
रिसेप्शन… खाली था।
काउंटर पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।
लकड़ी की कुर्सी आधी टूटी हुई थी।
ऐसा लग रहा था जैसे वर्षों से वहां कोई बैठा ही न हो।
जहाँ रात को रिसेप्शनिस्ट बैठा था, वहाँ अब उसकी एक पुरानी तस्वीर रखी थी। तस्वीर के नीचे पीतल की छोटी-सी पट्टिका लगी थी—
“महेश रावत (1962–2001)”
विवेक का गला सूख गया।
“ये… तो वही आदमी है…”
तभी होटल के मुख्य दरवाज़े अपने आप खुल गए।
बाहर हल्की सुबह होने लगी थी।
चारों बिना पीछे देखे भागते हुए सड़क तक पहुँचे। कुछ दूर जाकर उन्हें वही बुज़ुर्ग आदमी मिला जिसने पहली रात उन्हें रोका था।
वह बोला, “तुम लोग बच गए… क्योंकि किसी ने तुम्हें बाहर निकलने को कहा।”
“कौन?”
बूढ़े ने होटल की तरफ देखा।
“पुराना मालिक। लोग कहते हैं, वह आज भी उन लोगों को बाहर भेज देता है जिनकी मौत अभी लिखी नहीं होती।”
चारों ने पीछे मुड़कर देखा।
जहाँ होटल होना चाहिए था, वहाँ केवल टूटी हुई पत्थर की दीवारें, जंग लगा लोहे का गेट और झाड़ियों से घिरा खंडहर दिखाई दे रहा था।
न कोई रोशनी।
न कोई बालकनी।
न कोई रिसेप्शन।
जैसे वह होटल वर्षों पहले ही समय के भीतर दफन हो चुका हो।
बाद में नैनीताल लौटकर उन्होंने नगरपालिका के पुराने रिकॉर्ड देखे। वहाँ दर्ज था कि पच्चीस वर्ष पहले भूस्खलन में पाइन क्रेस्ट रिट्रीट पूरी तरह नष्ट हो गया था और उसके बाद उसे दोबारा कभी चालू करने की अनुमति नहीं मिली।
विवेक ने उस घटना पर कभी कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं बनाई।
लेकिन आज भी, जब वह अपनी उस यात्रा की तस्वीरें देखता है, तो एक फोटो पर उसकी नज़र हमेशा ठहर जाती है।
चारों दोस्त होटल के सामने खड़े मुस्कुरा रहे हैं।
उनके पीछे पहली मंज़िल की बालकनी में, सफेद स्वेटर पहने वही रिसेप्शनिस्ट खड़ा है।
अजीब बात यह है कि फोटो लेने के समय वहाँ कोई पाँचवाँ व्यक्ति मौजूद नहीं था।
और कैमरे के टाइमस्टैम्प के अनुसार…
वह तस्वीर उस सुबह ली गई थी, जब सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक उस जगह पर कोई होटल था ही नहीं।