Raat Ko Is Gaon Mein Kuch Ghoomta Hai | Scary Gaon Ki Kahani

WRITER – GOVIND BHISE

रात में उस गांव का माहौल बदल जाता था। दिन में वही सामान्य जगह लगती थी। बच्चे गलियों में खेलते, औरतें घरों के बाहर बैठकर बातें करतीं, खेतों से लौटते लोगों की आवाजें आती रहतीं। अगर कोई पहली बार वहां जाता तो उसे कभी यकीन नहीं होता कि इसी गांव के बारे में आसपास के इलाकों में इतने डरावने किस्से फैले हुए हैं।Scary Gaon Ki Kahani

लेकिन जैसे ही सूरज ढलता…

Scary Gaon Ki Kahani

सब बदल जाता।

दुकानों के शटर जल्दी गिरने लगते। लोग बिना वजह बाहर रुकना बंद कर देते। बच्चे अचानक घरों के अंदर भेज दिए जाते। और सबसे अजीब चीज़…

हर घर का दरवाज़ा ठीक अंधेरा होने से पहले बंद हो जाता था।

पहली बार जब मैंने ये देखा तो मुझे लगा शायद गांव वालों की कोई पुरानी tradition होगी। कुछ गांवों में लोग जल्दी सो जाते हैं। लेकिन यहां मामला अलग था। यहां लोगों के चेहरों पर डर साफ दिखता था।

ऐसा डर… जो आदत बन चुका हो।

मैं वहां अपने दोस्त के कहने पर गया था। शहर की भागदौड़ से थोड़ा break चाहिए था। Freelance editing का काम लगातार laptop पर करते-करते दिमाग पक चुका था। उसने कहा था, “दो-तीन दिन गांव में रह ले। नेटवर्क कमजोर है लेकिन दिमाग शांत हो जाएगा।”

शांत…

काश उसने पहले बता दिया होता कि वहां रातें कितनी खतरनाक थीं।

गांव तक पहुंचते-पहुंचते शाम हो चुकी थी। रास्ते में खेत थे, टूटी सड़कें थीं और बीच-बीच में छोटे जंगल के हिस्से आते थे। बाइक चलाते हुए कई बार ऐसा लगा जैसे कोई दूर से देख रहा हो। लेकिन मैंने उसे travel exhaustion समझकर ignore कर दिया।

गांव के बाहर पहुंचते ही सबसे पहले एक चीज़ notice हुई।

सन्नाटा।

अजीब तरह का सन्नाटा।

ना कुत्तों के भौंकने की आवाज। ना लोगों की बातें। ना कहीं TV की आवाज।

बस हवा चल रही थी।

और दूर कहीं लोहे की कोई चीज़ हिलने की धीमी आवाज आ रही थी।

मेरा दोस्त बाहर ही मिल गया। उसने जल्दी से मेरा बैग उठाया और बोला, “चल अंदर।”

“इतनी जल्दी क्या है?” मैंने हंसते हुए पूछा।

लेकिन उसने जवाब नहीं दिया।

बस एक बार पीछे मुड़कर सड़क की तरफ देखा… और तेज़ कदमों से घर के अंदर चला गया।

घर के अंदर उसकी मां बैठी थीं। उन्होंने मुझे देखते ही पानी दिया, खाना परोसा… लेकिन बार-बार दरवाज़े की तरफ देख रही थीं।

फिर अचानक उन्होंने पूछा, “रास्ते में कहीं रुके तो नहीं थे?”

“नहीं।”

“किसी ने आवाज़ तो नहीं दी?”

मैं थोड़ा हंसा। “क्या मतलब?”

लेकिन कमरे में कोई नहीं हंसा।

उस रात पहली बार मुझे महसूस हुआ कि गांव वाले किसी चीज़ से सच में डरते हैं।

खाना खत्म होते-होते बाहर पूरा अंधेरा हो चुका था। तभी अचानक…

ठक।

जैसे बाहर किसी ने लकड़ी पर पैर मारा हो।

मेरे दोस्त की मां तुरंत उठीं और खिड़की का पर्दा और कसकर बंद कर दिया।

“बाहर मत देखना,” उन्होंने धीरे से कहा।

अब मुझे curiosity होने लगी थी।

“आखिर बात क्या है यहां?”

कुछ सेकंड तक कमरे में कोई नहीं बोला। फिर मेरा दोस्त धीरे से बोला—

“रात को यहां कुछ घूमता है।”

मैं फिर हंस पड़ा। “मतलब? Animal?”

उसने सिर हिलाया।

“अगर animal होता तो डर नहीं लगता।”

उसकी आंखों में मजाक नहीं था।

उस रात करीब ग्यारह बजे तक बिजली चली गई। गांव पूरा अंधेरे में डूब गया। सिर्फ मिट्टी के तेल वाले lamp की हल्की रोशनी कमरे में जल रही थी।

मैं phone चलाने लगा लेकिन network लगभग गायब था। बाहर हवा की आवाज बढ़ती जा रही थी।

फिर…

किसी के चलने की आवाज आई।

धीमी।

घसीटते हुए कदम।

ऐसा लगा जैसे कोई घर के बाहर मिट्टी पर धीरे-धीरे घूम रहा हो।

मैं उठने लगा तो मेरे दोस्त ने तुरंत हाथ पकड़ लिया।

“मत जा।”

“कौन है बाहर?”

उसने जवाब नहीं दिया।

आवाज़ अब खिड़की के ठीक पास आ गई थी।

चर्र…

जैसे किसी ने उंगलियां खिड़की पर रगड़ी हों।

मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

फिर पहली बार वो आवाज सुनाई दी।

एक आदमी की आवाज।

बहुत धीमी।

“दरवाज़ा खोलो…”

मेरी सांस वहीं अटक गई।

आवाज़ बिल्कुल सामान्य थी। ना भारी, ना डरावनी। बल्कि इतनी normal कि एक पल को लगा सच में कोई मदद मांग रहा है।

फिर उसने दोबारा कहा—

“मुझे अंदर आने दो…”

मेरे दोस्त की मां ने तुरंत भगवान की फोटो के सामने दिया जला दिया। उनके हाथ कांप रहे थे।

मैंने फुसफुसाकर पूछा, “कौन है ये?”

मेरे दोस्त ने मेरी तरफ देखा।

“अगर बाहर इंसान होता… तो हम डरते नहीं।”

अब बाहर कदमों की आवाज धीरे-धीरे पूरे घर के चक्कर लगाने लगी।

कभी खिड़की के पास।

कभी पीछे।

कभी छत के ऊपर।

हाँ…

छत के ऊपर।

धीमे-धीमे कोई चल रहा था। टप… टप…टप…

उस आवाज़ में कुछ ऐसा था जो इंसानी नहीं लग रहा था।

मैं खुद को रोक नहीं पाया। धीरे से खिड़की के पास गया और पर्दे के कोने से बाहर देखने की कोशिश की।

और वहीं मेरी रीढ़ जम गई।

बाहर कोई खड़ा था।

लेकिन उसका शरीर अजीब था।

बहुत लंबा।

इतना लंबा कि उसका सिर लगभग पेड़ की टहनियों तक पहुंच रहा था। उसके हाथ असामान्य तरीके से नीचे लटक रहे थे। चेहरा अंधेरे में साफ नहीं दिख रहा था… लेकिन उसकी आंखें दिख रही थीं।

सफेद।

पूरी सफेद।

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और वो सीधे खिड़की की तरफ देख रहा था।

मेरे मुंह से आवाज तक नहीं निकली।

फिर अचानक वो मुस्कुराया।

ऐसी मुस्कान जो इंसान की नहीं लगती।

मैं पीछे हट गया। दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि सांस लेना मुश्किल हो गया।

“देख लिया ना…” मेरे दोस्त ने धीरे से कहा।

उस रात हममें से कोई नहीं सोया।

करीब तीन बजे के बाद बाहर की आवाजें बंद हुईं। धीरे-धीरे सुबह होने लगी। गांव में फिर normal आवाजें लौट आईं। मुर्गे की आवाज, लोगों की बातें, बर्तनों की खनक…

जैसे रात में कुछ हुआ ही ना हो।

लेकिन मेरे लिए सब बदल चुका था।

सुबह मैंने गांव वालों से बात करने की कोशिश की। पहले तो कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। फिर एक बूढ़े आदमी ने मुझे खेतों के पास रोक लिया।

उसने पूछा, “रात को देखा क्या?”

मैंने धीरे से सिर हिलाया।

वो कुछ सेकंड चुप रहा। फिर बोला—

“जिसे तूने देखा… वो पहले इंसान था।”

उसकी बात सुनकर मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

उसने बताया कि कई साल पहले गांव के बाहर जंगल में एक आदमी गायब हो गया था। लोग उसे ढूंढते रहे लेकिन कुछ नहीं मिला। तीन दिन बाद वो खुद वापस आया।

लेकिन वापस आने वाला इंसान… पहले जैसा नहीं था।

वो रात में गांव में घूमता रहता। लोगों के घरों के बाहर खड़ा रहता। अजीब आवाज़ में लोगों को बुलाता।

फिर गांव में मौतें शुरू हुईं।

जो भी रात में उसकी आवाज सुनकर बाहर गया…

वो कभी वापस नहीं आया।

“फिर क्या हुआ?” मैंने पूछा।

बूढ़े आदमी ने मेरी तरफ देखा।

“एक रात गांव वालों ने उसे जिंदा जला दिया।”

मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।

“तो फिर…”

“कुछ चीज़ें जलने के बाद भी खत्म नहीं होतीं।”

उस दिन के बाद मैं गांव से निकल जाना चाहता था। लेकिन मौसम अचानक खराब हो गया। इतनी तेज़ बारिश शुरू हुई कि सड़कें बंद हो गईं।

मुझे एक और रात वहीं रुकना पड़ा।

और वही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।

उस रात गांव पहले से भी ज्यादा शांत था।

ऐसा लग रहा था जैसे पूरा गांव सांस रोककर बैठा हो।

करीब बारह बजे फिर वही कदमों की आवाज शुरू हुई।

लेकिन इस बार कुछ अलग था।

इस बार वो हमारे घर के बाहर नहीं रुका।

वो धीरे-धीरे आगे बढ़ गया।

फिर अचानक दूर से चीख सुनाई दी।

औरत की चीख।

पूरा गांव जैसे एक सेकंड के लिए जम गया।

मेरे दोस्त की मां रोने लगीं। उन्होंने तुरंत मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया।

मैंने पूछा, “क्या हुआ?”

मेरा दोस्त खिड़की से बाहर देख रहा था। उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।

“किसी ने दरवाज़ा खोल दिया…”

उस रात गांव में कोई बाहर नहीं निकला।

सुबह पता चला कि गांव के किनारे रहने वाला एक आदमी गायब था। उसका दरवाज़ा खुला मिला। घर के बाहर मिट्टी में लंबे घसीटने के निशान थे… जो सीधे जंगल की तरफ जा रहे थे।

लेकिन सबसे डरावनी चीज़ अभी बाकी थी।

उस आदमी के घर की दीवार पर उंगलियों से कुछ लिखा था।

“उसने मुझे अंदर बुलाया।”

उस दिन मैं हर हाल में गांव छोड़ना चाहता था। बारिश थोड़ी कम हुई तो मैंने बाइक निकाली।

गांव से निकलते वक्त मैंने पीछे मुड़कर देखा।

सारे लोग मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं किसी मौत की जगह से भाग रहा हूं।

सड़क पूरी कीचड़ से भरी थी। आसमान काला था। हवा इतनी तेज़ चल रही थी कि कई बार बाइक संभालना मुश्किल हो रहा था।

लेकिन मैं बस वहां से दूर जाना चाहता था।

करीब आधा घंटा चलने के बाद मुझे एहसास हुआ…

पीछे से कोई आ रहा है।

पहले लगा शायद कोई दूसरी बाइक होगी।

लेकिन फिर rear view mirror में जो दिखा… उसने मेरी सांस रोक दी।

सड़क पर दूर वही लंबा आदमी चल रहा था।

धीरे-धीरे।

लेकिन अजीब बात ये थी कि उसकी चाल सामान्य नहीं थी। उसके पैर जैसे जमीन को छू ही नहीं रहे थे।

और फिर…

वो अचानक गायब हो गया।

मैंने तुरंत बाइक तेज़ कर दी।

दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि कानों में आवाज गूंज रही थी।

तभी phone vibrate हुआ।

Network वहां almost नहीं था… फिर भी notification आया।

Unknown Number.

मैंने गलती से call उठा ली।

कुछ सेकंड तक सिर्फ हवा की आवाज आती रही।

फिर…

वही धीमी आवाज।

“तू बाहर क्यों चला गया…”

मेरे हाथ कांपने लगे। बाइक लगभग फिसल गई।

“मैं अभी भी तेरे पीछे हूं।”

उसके बाद call कट गया।

मैंने पीछे देखने की हिम्मत नहीं की।

बस लगातार बाइक चलाता रहा।

करीब एक घंटे बाद जब मैं highway तक पहुंचा… तब जाकर पहली बार लगा कि शायद अब सुरक्षित हूं।

लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।

शहर लौटने के बाद कई दिनों तक सब normal रहा। मैंने खुद को समझाया कि शायद गांव वालों की बातें दिमाग पर असर कर गई थीं।

लेकिन फिर एक रात…

करीब दो बजे…

मेरे apartment के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

धीमी।

घसीटते हुए कदम।

मेरी आंख खुल गई।

पूरा कमरा अंधेरे में डूबा था।

मैंने खुद को समझाया कि शायद ऊपर वाले flat से आवाज आ रही होगी।

फिर…

चर्र…

जैसे किसी ने दरवाज़े पर उंगलियां रगड़ी हों।

मेरा गला सूख गया।

मैं धीरे-धीरे उठकर दरवाज़े के पास गया।

और तभी बाहर से वही आवाज आई—

“दरवाज़ा खोलो…”

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