जिस गांव की यह कहानी है, वहां पहुंचने से पहले मैंने कभी “सर्कटा” शब्द नहीं सुना था। आज भी जब उस रात को याद करता हूं तो सबसे पहले कोई भूतिया चेहरा नहीं, बल्कि वह अजीब खामोशी याद आती है जो पूरे गांव पर शाम ढलते ही उतर आती थी।
गांव का नाम था देवगढ़। चारों तरफ खेत, दूर तक फैला जंगल और बीच में मिट्टी के पुराने घर।
दिन में सब कुछ सामान्य दिखता था। Sir Kata Bhoot Horror Story

बच्चे खेलते थे।
किसान खेतों में काम करते थे।
चाय की दुकान पर बैठे बुजुर्ग राजनीति से लेकर मौसम तक हर विषय पर चर्चा करते थे।
लेकिन जैसे ही सूरज पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे छिपता, पूरा माहौल बदल जाता।
लोग जल्दी-जल्दी घर लौटने लगते।
दुकानें बंद होने लगतीं।
औरतें दरवाजों पर नींबू-मिर्च टांग देतीं।
बच्चों को घर से बाहर निकलने की मनाही हो जाती।
पहले दिन मुझे लगा यह कोई पुरानी परंपरा होगी।
लेकिन शाम होते-होते महसूस हो गया कि यह परंपरा नहीं, डर था।
एक ऐसा डर जो पूरे गांव की आदत बन चुका था।
मैं अपने दोस्त निखिल के घर ठहरा हुआ था।
रात को खाना खाते समय मैंने उससे पूछ लिया।
“यहां सब लोग इतने डरे हुए क्यों रहते हैं?”
उसने मेरी तरफ देखा।
फिर खिड़की से बाहर अंधेरे में झांकने लगा।
कुछ सेकंड बाद बोला,
“अगर रात में बाहर से कोई आवाज आए तो दरवाजा मत खोलना।”
“कौन-सी आवाज?”
उसने जवाब नहीं दिया।
सिर्फ इतना कहा,
“जितना कम जानोगे, उतना अच्छा रहेगा।”
उसका जवाब मुझे पसंद नहीं आया।
लेकिन मैंने ज्यादा जोर नहीं दिया।
उस रात करीब साढ़े बारह बजे मेरी नींद अचानक खुल गई।
गांव पूरी तरह शांत था।
इतना शांत कि अपनी सांसों की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी।
मैं करवट बदलने ही वाला था कि तभी दूर कहीं से एक अजीब आवाज सुनाई दी।
जैसे कोई बहुत भारी चीज मिट्टी पर घसीटते हुए चल रही हो।
आवाज धीमी थी।
लेकिन लगातार करीब आती जा रही थी।
मैं उठकर खिड़की तक गया।
बाहर धुंध फैली हुई थी।
पहले कुछ दिखाई नहीं दिया।
फिर अचानक गली के आखिरी छोर पर एक परछाईं दिखाई दी।
मैं कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
धीरे-धीरे वह आकृति साफ होने लगी।
और तभी मेरी सांस अटक गई।
वह इंसान जैसा था।
लेकिन उसके कंधों के ऊपर कुछ नहीं था।
सिर नहीं।
चेहरा नहीं।
कुछ भी नहीं।
सिर्फ एक लंबा काला धड़।
मैं कुछ समझ पाता उससे पहले वह आकृति धुंध के अंदर गायब हो गई।
अगली सुबह मैंने निखिल को सब बता दिया।
मेरी बात सुनते ही उसके हाथ से चाय का गिलास लगभग छूट गया।
“तूने सच में देखा उसे?”
“किसे?”
“सर्कटे को।”
पहली बार मैंने यह नाम सुना।
और उसी दिन मुझे उस शापित कहानी के बारे में पता चला जिसने पूरे गांव की जिंदगी बदल दी थी।
करीब दो सौ साल पहले देवगढ़ पर रुद्रप्रताप नाम का जमींदार राज करता था।
आज उसके बारे में सुनना आसान है।
लेकिन उस समय उसका नाम सुनकर लोगों के चेहरे का रंग उड़ जाता था।
उसकी हवेली गांव के सबसे ऊंचे टीले पर बनी थी।
वहां से पूरे इलाके पर नजर रखी जा सकती थी।
हवेली के चारों तरफ ऊंची पत्थर की दीवारें थीं और दर्जनों हथियारबंद आदमी उसकी रखवाली करते थे।
रुद्रप्रताप सिर्फ अमीर नहीं था।
वह निर्दयी था।
अगर किसी किसान की फसल खराब हो जाती और वह लगान नहीं दे पाता तो उसके घर से अनाज उठवा लिया जाता।
अगर कोई विरोध करता तो उसे गांव के बीच चौपाल में बांधकर पीटा जाता।
लोगों को डराने में उसे अजीब आनंद मिलता था।
एक बार गांव में लगातार सूखा पड़ा।
फसलें बर्बाद हो गईं।
कई परिवारों के घरों में खाने तक की समस्या हो गई।
ऐसे समय में लोग उम्मीद कर रहे थे कि जमींदार कुछ राहत देगा।
लेकिन हुआ उल्टा।
उसने लगान दोगुना कर दिया।
गांव का एक बुजुर्ग किसान था।
हरिराम।
उसने हाथ जोड़कर मोहलत मांगी।
उसकी पत्नी बीमार थी।
घर में खाने को मुश्किल से दो दिन का राशन बचा था।
लेकिन रुद्रप्रताप ने उसकी बात सुनने के बजाय उसे चौपाल पर बुलवाया।
पूरा गांव वहां जमा था।
हरिराम को बरगद के पेड़ से बांध दिया गया।
उसकी पत्नी रोती रही।
बच्चे गिड़गिड़ाते रहे।
लेकिन रुद्रप्रताप हंसता रहा।
उस दिन गांव वालों के अंदर कुछ टूट गया।
डर अब नफरत में बदलने लगा था।
लेकिन असली आग तब लगी जब उसकी नजर गांव की एक युवती पर पड़ी।
उसके परिवार ने विरोध किया।
कुछ दिनों बाद उनका घर रहस्यमय तरीके से जल गया।
परिवार बच गया।
लेकिन सब समझ गए कि यह संयोग नहीं था।
उसी रात गांव के बुजुर्गों ने फैसला किया कि अब बहुत हो चुका।
अमावस्या की रात लगभग पचास लोग हथियार लेकर हवेली पहुंचे।
दरवाजे तोड़े गए।
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पहरेदारों को काबू किया गया।
रुद्रप्रताप भागने की कोशिश करने लगा।
लेकिन जंगल के किनारे उसे पकड़ लिया गया।
मरने से पहले भी उसके चेहरे पर डर नहीं था।
वह हंस रहा था।
उसने कहा,
“अगर मेरा अंत किया तो मेरा साया कभी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा।”
भीड़ का गुस्सा फूट पड़ा।
संघर्ष के दौरान एक तलवार चली।
और उसका सिर धड़ से अलग हो गया।
लेकिन अगले दिन जब लोग सिर ढूंढ़ने पहुंचे…
वह कहीं नहीं मिला।
यहीं से सर्कटे की कहानी शुरू हुई।
अगली सुबह देवगढ़ में वही हुआ जो हर डरावनी जगह पर होता है।
लोग सब जानते थे, लेकिन कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता था।
चाय की दुकान पर बैठे आदमी धीमी आवाज में बात कर रहे थे। जैसे शब्द भी दीवारों से टकराकर किसी गलत जगह पहुंच सकते हों।
मैंने निखिल से पूछा, “अगर यह कहानी इतनी पुरानी है तो लोग आज भी क्यों डरते हैं?”
वह बोला, “क्योंकि यह कहानी सिर्फ पुरानी नहीं है। यह अभी भी चल रही है।”
दोपहर में गांव के बाहर रहने वाला एक चरवाहा लापता हो गया।
उसका नाम गणपत था।
वह रोज शाम से पहले अपनी बकरियां लेकर लौट आता था, लेकिन उस दिन अंधेरा होने तक घर नहीं पहुंचा।
गांव वालों ने पहले इंतजार किया।
फिर जब उसकी पत्नी रोते हुए चौपाल पर आई, तब दस-बारह आदमी मशालें लेकर जंगल की तरफ निकले।
मैं भी निखिल के साथ चला गया।
जंगल गांव से ज्यादा दूर नहीं था, लेकिन उसके पास जाते ही हवा अलग महसूस होने लगी।
पेड़ों के बीच अजीब सन्नाटा था।
झींगुरों की आवाज तक नहीं।
थोड़ी दूर जाने पर हमें गणपत की लाठी मिली।
उसके पास मिट्टी पर घसीटने के निशान थे।
जैसे किसी भारी चीज को खींचकर अंदर ले जाया गया हो।
एक आदमी ने फुसफुसाकर कहा, “वापस चलो। रात होने वाली है।”
लेकिन गणपत की पत्नी का रोना सबके कानों में था।
लोग आगे बढ़े।
करीब आधे घंटे बाद हमें वह एक सूखे नाले के पास मिला।
वह जिंदा था।
लेकिन उसकी हालत देखकर किसी की हिम्मत नहीं हुई कि तुरंत उसके पास जाए।
उसके कपड़े मिट्टी से सने थे।
चेहरा सफेद पड़ चुका था।
आंखें खुली थीं, लेकिन वह किसी को पहचान नहीं रहा था।
उसके होंठ सूखे हुए थे।
वह बहुत धीमी आवाज में एक ही बात बोल रहा था।
“वह अपना सिर मांग रहा था…”
हम सब चुप हो गए।
निखिल ने उसे संभाला।
गणपत ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया।
इतनी जोर से कि निखिल दर्द से चीख पड़ा।
गणपत की आंखें फैल गईं।
वह बोला, “उसका सिर मत ढूंढ़ना… सिर मिल गया तो वह पूरा हो जाएगा…”
उसके बाद वह बेहोश हो गया।
उसी रात गांव में पहली बार मैंने असली डर देखा।
हर घर के दरवाजे भीतर से बंद थे।
कहीं कोई दीपक बाहर नहीं जल रहा था।
यहां तक कि कुत्ते भी चुप थे।
निखिल के पिता ने मुझे अपने पास बैठाया और कहा,
“तुम शहर से आए हो, इसलिए तुम्हें यह सब अंधविश्वास लगेगा। लेकिन इस गांव में हर पीढ़ी ने उसे देखा है।”
मैंने पूछा, “सिरविहीन आदमी क्या चाहता है?”
उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “शायद अपना सिर। शायद बदला। शायद दोनों।”
उस रात मैं सो नहीं पाया।
गणपत की आवाज कानों में घूम रही थी।
“सिर मिल गया तो वह पूरा हो जाएगा।”
करीब एक बजे घर के बाहर किसी के चलने की आहट आई।
धीमी।
भारी।
ऐसी चाल जैसे कोई इंसान नहीं, कोई बड़ा जानवर घरों के बीच से गुजर रहा हो।
निखिल ने तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया।
“आवाज मत करना।”
बाहर आहट दरवाजे के पास रुकी।
कुछ सेकंड तक सब शांत रहा।
फिर दरवाजे पर किसी चीज ने हल्का दबाव डाला।
कुंडी हिली।
निखिल की मां ने भगवान का नाम होंठों में दबा लिया।
मैं सांस रोककर बैठा रहा।
दरवाजे के बाहर से कोई आवाज नहीं आई।
लेकिन मुझे साफ महसूस हो रहा था कि कोई वहीं खड़ा है।
बहुत पास।
इतना पास कि जैसे लकड़ी के दरवाजे के उस पार उसका धड़ झुका हुआ हो।
फिर अचानक खिड़की की झिरी से ठंडी हवा अंदर आई।
दीवार पर टंगी लालटेन की लौ कांपने लगी।
और उसी कांपती रोशनी में मैंने खिड़की के बाहर कुछ देखा।
कंधे।
लंबे कंधे।
उनके ऊपर खाली जगह।
मेरा गला सूख गया।
वह सिरविहीन आकृति हमारी खिड़की के सामने खड़ी थी।
लेकिन इस बार वह आगे नहीं बढ़ी।
वह जैसे सुन रही थी।
जैसे घर के अंदर हमारी सांसें गिन रही हो।
कुछ देर बाद वह धीरे-धीरे मुड़ी और गली के अंधेरे में गायब हो गई।
सुबह होते ही निखिल के पिता मुझे गांव के बुजुर्ग दत्तात्रय काका के पास ले गए।
काका बहुत बूढ़े थे।
उनकी आंखें धुंधली थीं, लेकिन आवाज साफ थी।
उन्होंने मेरी बात सुनी।
फिर बोले,
“सर्कटा हर किसी को नहीं दिखता। जिसे वह दिखता है, उससे उसका कोई काम होता है।”
मेरे पेट में अजीब ठंडक उतर गई।
“मुझसे क्या काम?”
काका ने जवाब देने में देर की।
फिर उन्होंने अपने बिस्तर के नीचे से पुराना कपड़े का थैला निकाला।
उसमें कुछ कागज थे।
पीले, फटे हुए, पुराने।
उन्होंने एक कागज मेरी तरफ बढ़ाया।
उस पर हवेली का नक्शा बना था।
मैंने पूछा, “यह क्या है?”
काका बोले, “रुद्रप्रताप की हवेली का पुराना तहखाना। लोग कहते हैं उसका सिर कभी मिला नहीं, लेकिन सच यह है कि किसी ने उसे छिपाया था।”
“किसने?”
काका ने बाहर आंगन की तरफ देखा।
फिर बोले, “गांव वालों ने नहीं। उसके अपने आदमी ने।”
यह बात नई थी।
काका ने बताया कि रुद्रप्रताप का एक वफादार नौकर था, भीमा।
जब गांव वालों ने रुद्रप्रताप को मारा, भीमा दूर से सब देख रहा था।
सुबह से पहले वह जंगल गया और सिर उठाकर ले आया।
कहा जाता है कि उसने सिर हवेली के तहखाने में छिपा दिया ताकि एक दिन कोई पूजा करके रुद्रप्रताप को वापस बुला सके।
लेकिन भीमा उसी रात मर गया।
तहखाने का रास्ता रहस्य बन गया।
काका ने मेरी तरफ देखते हुए कहा,
“अब अगर सर्कटा गांव में फिर से बेचैन घूम रहा है, तो इसका मतलब है कि कोई उसके सिर तक पहुंचने वाला है।”
मैंने पूछा, “कौन?”
काका बोले, “यही तो पता लगाना है।”
उस दिन के बाद पहली बार मुझे लगा कि मामला सिर्फ किसी पुराने भूत की कहानी नहीं है।
कुछ ऐसा चल रहा था जो अभी भी ज़िंदा था।
दत्तात्रय काका से लौटने के बाद मैं, निखिल और उसके पिता देर तक उसी नक्शे को देखते रहे।
कागज इतना पुराना था कि कई जगह स्याही धुंधली हो चुकी थी।
लेकिन एक चीज साफ दिखाई दे रही थी।
हवेली के नीचे बने तहखानों का जाल।
और उनमें से एक कमरा लाल रंग से घेरा गया था।
उसके पास सिर्फ दो शब्द लिखे थे।
“मत खोलना”
मैंने पूछा, “यह किसने लिखा होगा?”
निखिल के पिता ने सिर हिलाया।
“पता नहीं। लेकिन दो सौ साल पहले कोई आदमी मजाक के लिए ऐसा नहीं लिखता था।”
शाम तक पूरे गांव में एक और खबर फैल गई।
गणपत होश में आ गया था।
लेकिन उसकी हालत पहले से भी अजीब थी।
हम तीनों तुरंत उसके घर पहुंचे।
कमरे के अंदर गांव के कई लोग मौजूद थे।
गणपत चारपाई पर बैठा था।
उसकी आंखें खुली थीं।
लेकिन उनमें पहले जैसा भाव नहीं था।
वह सामने दीवार को घूर रहा था।
जैसे वहां कोई खड़ा हो जिसे बाकी लोग नहीं देख सकते।
मैं उसके पास गया।
“गणपत काका, जंगल में क्या हुआ था?”
कुछ सेकंड तक उसने कोई जवाब नहीं दिया।
फिर धीरे-धीरे मेरी तरफ देखा।
उसकी आंखों के नीचे गहरे काले घेरे थे।
चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे कई दिनों से सोया न हो।
“मैंने उसे देखा।”
कमरे में मौजूद हर आदमी चुप हो गया।
“किसे?”
“सर्कटे को।”
उसके होंठ कांप रहे थे।
“वह जंगल में खड़ा था।”
“कहां?”
“पुराने कुएं के पास।”
निखिल ने पूछा, “फिर?”
गणपत का चेहरा अचानक डर से भर गया।
उसने दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया।
“वह मुझे देख रहा था।”
“लेकिन उसका सिर तो नहीं है।”
गणपत जोर से चीखा।
“है!”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उसकी सांसें तेज हो गईं।
“उसके सीने पर चेहरा है।”
“और वह मुस्कुराता है…”
एक बूढ़ी औरत ने भगवान का नाम लिया।
गणपत कांप रहा था।
“उसने मुझसे कहा कि वह लौट रहा है।”
“उसने कहा कि इस बार वह अधूरा नहीं रहेगा।”
इतना कहकर वह फिर चुप हो गया।
उसके बाद चाहे जितना पूछा गया, उसने एक शब्द नहीं बोला।
उस रात गांव में कोई भी चैन से नहीं सोया।
लगभग हर घर में देर रात तक दीपक जलते रहे।
लोग दरवाजों पर राख और हल्दी की लकीरें बना रहे थे।
कुछ घरों में मंत्र पढ़े जा रहे थे।
कुछ लोग मंदिर में बैठे थे।
लेकिन डर कम नहीं हो रहा था।
आधी रात के करीब अचानक गांव के दूसरे छोर से एक औरत की चीख सुनाई दी।
इतनी तेज कि पूरे गांव की नींद टूट गई।
मैं और निखिल तुरंत बाहर भागे।
दर्जनों लोग उसी दिशा में दौड़ रहे थे।
जब हम वहां पहुंचे तो देखा कि सावित्री नाम की बुजुर्ग महिला अपने घर के बाहर बेहोश पड़ी थी।
उसकी बहू रो रही थी।
“क्या हुआ?”
किसी ने पूछा।
बहू कांपती आवाज में बोली,
“मां पानी भरने बाहर गई थी।”
“फिर?”
“उन्होंने गली में किसी को खड़ा देखा।”
“किसे?”
वह रोने लगी।
“सिर नहीं था उसका…”
सावित्री को होश आने में लगभग आधा घंटा लगा।
होश में आते ही उसने जो बताया, उससे गांव का डर और बढ़ गया।
उसने कहा कि सर्कटा पहले से अलग दिख रहा था।
पहले से बड़ा।
पहले से ज्यादा स्पष्ट।
और इस बार उसके शरीर के चारों तरफ काले धुएं जैसी परछाइयां घूम रही थीं।
दत्तात्रय काका ने यह सुनते ही एक बात कही।
“वह मजबूत हो रहा है।”
“क्यों?”
किसी ने पूछा।
काका बोले,
“क्योंकि उसका सिर उसके करीब आ रहा है।”
अगली सुबह हमने फैसला किया कि हवेली तक जाना ही होगा।
गांव के कुछ लोग इसके खिलाफ थे।
लेकिन अब डर इतना बढ़ चुका था कि कुछ न करना उससे भी ज्यादा खतरनाक लग रहा था।
दोपहर के समय हम छह लोग हवेली की तरफ निकले।
गांव से लगभग दो किलोमीटर दूर वह खंडहर आज भी मौजूद था।
पहली नजर में ही समझ आ जाता था कि कभी यह जगह कितनी भव्य रही होगी।
टूटी हुई मेहराबें।
विशाल पत्थर की दीवारें।
सूखे हुए फव्वारे।
और जगह-जगह उगी हुई जंगली बेलें।
हवेली के सामने पहुंचते ही अजीब बेचैनी होने लगी।
हवा अचानक ठंडी महसूस होने लगी।
जबकि दोपहर का समय था।
अंदर कदम रखते ही लगा जैसे किसी ने आसपास की सारी आवाजें बंद कर दी हों।
न पक्षियों की आवाज।
न हवा का शोर।
कुछ भी नहीं।
सिर्फ खामोशी।
हम नक्शे के सहारे आगे बढ़ते रहे।
करीब बीस मिनट बाद हमें वह जगह मिल गई जहां तहखाने का रास्ता होना चाहिए था।
लेकिन वहां सिर्फ पत्थरों का ढेर था।
लगता था जैसे किसी ने जानबूझकर रास्ता बंद किया हो।
हमने पत्थर हटाने शुरू किए।
लगभग एक घंटे की मेहनत के बाद नीचे जाने वाली सीढ़ियां दिखाई देने लगीं।
सीढ़ियों से सड़ी हुई मिट्टी जैसी गंध आ रही थी।
मैंने टॉर्च जलाई।
और नीचे उतरना शुरू किया।
हर कदम के साथ अंधेरा गहरा होता जा रहा था।
सीढ़ियां खत्म होने के बाद हम एक लंबे गलियारे में पहुंचे।
दीवारों पर पुरानी नमी जमी हुई थी।
कहीं-कहीं पुराने दीपकों के अवशेष दिखाई दे रहे थे।
फिर अचानक निखिल रुक गया।
“यह देखो।”
मैंने टॉर्च उसकी तरफ घुमाई।
दीवार पर खरोंचें बनी हुई थीं।
दर्जनों खरोंचें।
जैसे किसी ने नाखूनों से पत्थर को कुरेदने की कोशिश की हो।
और उनके बीच एक वाक्य लिखा था।
इतना पुराना कि मुश्किल से पढ़ा जा सकता था।
लेकिन शब्द साफ थे।
“उसे बाहर मत आने देना।”
मेरी रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।
क्योंकि यह चेतावनी दो सौ साल पुरानी लग रही थी।
और शायद उसी आदमी ने लिखी थी जिसने सर्कटे का असली रहस्य देखा था।
गलियारे के आखिर में हमें लोहे का एक विशाल दरवाजा दिखाई दिया।
जंग से भरा हुआ।
भारी।
और उसके ऊपर वही निशान बना था जो नक्शे में लाल घेरे वाले कमरे पर बना हुआ था।
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर निखिल ने फुसफुसाकर कहा,
“क्या यही वह कमरा है?”
मैंने धीरे से दरवाजे पर हाथ रखा।
अंदर से बर्फ जैसी ठंड महसूस हुई।
और उसी क्षण…
दरवाजे के दूसरी तरफ से किसी चीज के खरोंचने की आवाज आई।
हम सब एक साथ पीछे हट गए।
क्योंकि वह आवाज किसी इंसान की नहीं लग रही थी।
और वह आवाज अभी भी जारी थी…
कुछ सेकंड तक कोई भी हिल नहीं पाया।
तहखाने की उस गहरी खामोशी में वह खरोंचने की आवाज और भी डरावनी लग रही थी।
जैसे लोहे के दूसरी तरफ कोई चीज अपने नाखून घसीट रही हो।
धीरे-धीरे।
धैर्य के साथ।
मानो उसे पता हो कि हम बाहर खड़े हैं।
खर्रर…
खर्रर…
खर्रर…
निखिल ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
उसकी उंगलियां ठंडी पड़ चुकी थीं।
“हमें वापस चलना चाहिए।”
उसकी आवाज कांप रही थी।
लेकिन तभी गांव के एक आदमी, रामू ने कहा,
“इतनी दूर आ गए हैं। अब लौटकर क्या करेंगे?”
वह आगे बढ़ा और दरवाजे को धक्का दिया।
दरवाजा हिला तक नहीं।
फिर उसने पूरा जोर लगाया।
एक भारी आवाज गूंजी।
लोहे पर जमी जंग टूटने लगी।
और तभी…
खरोंचने की आवाज अचानक बंद हो गई।
पूरा तहखाना फिर से शांत हो गया।
इतना शांत कि सबको अपनी धड़कन सुनाई देने लगी।
यह खामोशी पहले वाली खामोशी से ज्यादा डरावनी थी।
क्योंकि अब ऐसा लग रहा था कि दूसरी तरफ जो भी था…
वह सुन रहा था।
रामू ने फिर धक्का लगाया।
इस बार दरवाजा कुछ इंच खुल गया।
अंदर से बर्फ जैसी ठंडी हवा बाहर निकली।
इतनी ठंडी कि जून की गर्मी में भी शरीर कांप गया।
मैंने टॉर्च की रोशनी अंदर डाली।
कमरा बहुत बड़ा था।
लगभग किसी पुराने दरबार जितना।
दीवारों पर काले निशान बने हुए थे।
जैसे कभी वहां आग लगी हो।
कमरे के बीचों-बीच पत्थर का एक चबूतरा था।
और उस चबूतरे पर कुछ रखा हुआ था।
पहले हमें समझ नहीं आया।
फिर रोशनी स्थिर हुई।
और सबकी सांस अटक गई।
वह एक मानव खोपड़ी थी।
पुरानी।
धूल से ढकी हुई।
लेकिन पूरी तरह सुरक्षित।
कमरे में मौजूद किसी आदमी ने धीरे से भगवान का नाम लिया।
निखिल फुसफुसाया,
“यही है…”
“रुद्रप्रताप का सिर।”
मैं कुछ बोल ही नहीं पाया।
दो सौ साल पुरानी कहानी अचानक हमारे सामने रखी थी।
लेकिन सबसे अजीब बात अभी बाकी थी।
खोपड़ी अकेली नहीं थी।
उसके चारों तरफ जमीन पर अजीब प्रतीक बने हुए थे।
गोलाकार आकृतियां।
पुराने मंत्रों जैसे चिन्ह।
और कई जगह सूखे हुए काले धब्बे।
जैसे कभी वहां कोई अनुष्ठान हुआ हो।
दत्तात्रय काका सही थे।
किसी ने सिर सिर्फ छिपाया नहीं था।
उसकी रक्षा भी की थी।
तभी रामू ने गलती कर दी।
वह आगे बढ़ा और खोपड़ी को हाथ लगाने लगा।
“मत छूना!”
मैं लगभग चिल्लाया।
लेकिन देर हो चुकी थी।
उसकी उंगलियां खोपड़ी से टकरा गईं।
उसी क्षण पूरा कमरा कांप उठा।
दीवारों से धूल झड़ने लगी।
छत से छोटे पत्थर गिरने लगे।
और फिर…
एक आवाज सुनाई दी।
बहुत धीमी।
बहुत दूर से।
लेकिन साफ।
हंसी।
कोई हंस रहा था।
कमरे में मौजूद सभी लोग जम गए।
वह हंसी किसी इंसान जैसी नहीं थी।
ऐसा लग रहा था जैसे कई लोग एक साथ हंस रहे हों।
और वह आवाज हर दिशा से आ रही थी।
रामू पीछे हट गया।
उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।
“चलो यहां से!”
किसी ने चिल्लाया।
और फिर सब भागने लगे।
हम सीढ़ियों की तरफ दौड़े।
लेकिन तभी पीछे से रामू की चीख सुनाई दी।
इतनी भयानक कि आज भी भूल नहीं पाया।
मैंने पलटकर देखा।
रामू जमीन पर गिरा हुआ था।
और उसके पीछे…
कोई खड़ा था।
वह इतना लंबा था कि लगभग छत को छू रहा था।
काले धुएं जैसी परछाइयां उसके शरीर के चारों तरफ घूम रही थीं।
उसके कंधों के ऊपर अब भी सिर नहीं था।
लेकिन सीने पर बना चेहरा पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रहा था।
उसकी आंखें खुली हुई थीं।
और होंठों पर मुस्कान थी।
वह मुस्कान इंसानी नहीं थी।
वह किसी शिकारी की मुस्कान थी।
सर्कटा।
इस बार वह धुंध में नहीं था।
वह हमारे सामने खड़ा था।
पूरी तरह।
जिंदा दुःस्वप्न की तरह।
रामू उठने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन डर ने उसका शरीर जवाब दे चुका था।
सर्कटे ने धीरे-धीरे अपना हाथ बढ़ाया।
उसकी उंगलियां असामान्य रूप से लंबी थीं।
जैसे किसी पेड़ की सूखी शाखाएं।
अगले ही पल रामू की चीख फिर गूंजी।
और पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
मैं और बाकी लोग भागते रहे।
पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
हम किसी तरह तहखाने से बाहर निकले।
सूरज डूब चुका था।
आसमान लाल हो रहा था।
लेकिन बाहर आने के बाद भी कोई सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा था।
क्योंकि रामू हमारे साथ नहीं था।
उस रात पूरा गांव जागता रहा।
रामू वापस नहीं लौटा।
सुबह जब लोग हवेली पहुंचे…
वह तहखाने के बाहर पड़ा मिला।
जिंदा।
लेकिन उसकी हालत गणपत से भी खराब थी।
उसके बाल एक रात में सफेद हो चुके थे।
चेहरा बूढ़ा लगने लगा था।
और वह सिर्फ एक बात बोल रहा था।
“वह पूरा होने वाला है…”
“वह पूरा होने वाला है…”
“वह अपना सिर लेने आ रहा है…”
उसी शाम दत्तात्रय काका ने गांव के सभी लोगों को मंदिर में बुलाया।
पहली बार उनके चेहरे पर भी डर दिखाई दे रहा था।
उन्होंने कहा,
“अब समय खत्म हो रहा है।”
“अगर सिर और धड़ एक हो गए…”
“तो सर्कटा सिर्फ जंगल या हवेली तक सीमित नहीं रहेगा।”
मंदिर में बैठे हर आदमी की सांस रुक गई।
निखिल ने पूछा,
“फिर क्या होगा?”
काका ने धीरे-धीरे जवाब दिया।
“फिर वह वही करेगा जो दो सौ साल पहले करना चाहता था।”
“पूरा गांव खत्म कर देगा।”
और उसी क्षण मंदिर के बाहर से एक ऐसी आवाज आई जिसने सबको चुप करा दिया।
भारी कदमों की आवाज।
धीमी।
निश्चित।
और पहले से कहीं ज्यादा करीब।
इस बार…
वह गांव के अंदर आ चुका था।
मंदिर के बाहर भारी कदमों की आवाज गूंज रही थी।
इस बार किसी को यह भ्रम नहीं था कि बाहर कोई इंसान होगा।
गांव वाले सांस रोके बैठे थे।
कुछ लोगों ने मंदिर के दरवाजे बंद करने की कोशिश की, लेकिन दत्तात्रय काका ने उन्हें रोक दिया।
“दरवाजा बंद करने से वह नहीं रुकेगा।”
उनकी आवाज में डर था, लेकिन घबराहट नहीं।
जैसे उन्हें पहले से पता हो कि यह रात आने वाली है।
बाहर कदमों की आवाज धीरे-धीरे मंदिर के सामने आकर रुक गई।
फिर सब कुछ शांत हो गया।
इतना शांत कि किसी बच्चे की दबाई हुई सिसकी भी साफ सुनाई दे रही थी।
करीब एक मिनट तक कोई आवाज नहीं आई।
फिर मंदिर की घंटी अपने आप बज उठी।
टन…
पूरे मंदिर में सन्नाटा फैल गया।
कोई घंटी के पास नहीं था।
फिर दूसरी बार।
टन…
इस बार कुछ महिलाएं रोने लगीं।
मैंने मंदिर के मुख्य दरवाजे की तरफ देखा।
बाहर कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन मुझे महसूस हो रहा था कि कोई वहां खड़ा है।
और वह अंदर मौजूद हर आदमी को देख रहा है।
दत्तात्रय काका धीरे-धीरे उठे।
उन्होंने अपनी कमर से बंधी पुरानी चाबी निकाली।
निखिल ने पूछा,
“यह क्या है?”
काका बोले,
“जिस आदमी ने रुद्रप्रताप का सिर छिपाया था, वह सिर्फ उसका नौकर नहीं था।”
मंदिर में बैठे सभी लोग उनकी तरफ देखने लगे।
“वह मेरा पूर्वज था।”
कमरे में फुसफुसाहट फैल गई।
काका ने आगे कहा,
“भीमा जानता था कि अगर सिर और धड़ दोबारा मिल गए तो रुद्रप्रताप पहले से ज्यादा शक्तिशाली होकर लौटेगा। इसलिए उसने सिर को छिपाया और उस कमरे को बंद कर दिया।”
“फिर?”
मैंने पूछा।
काका की आंखें भर आईं।
“लेकिन उसने मरने से पहले एक और बात लिखी थी।”
“क्या?”
“अगर कभी सर्कटा लौटे… तो सिर को उसके पास मत ले जाना। उसे वहीं नष्ट कर देना।”
यह सुनकर मेरा दिल बैठ गया।
क्योंकि हमने सबसे बड़ी गलती पहले ही कर दी थी।
सिर को छूकर हमने उस सुरक्षा को तोड़ दिया था जो दो सौ साल से कायम थी।
तभी बाहर से एक भयानक गर्जना सुनाई दी।
मंदिर की खिड़कियां कांप उठीं।
कुछ शीशे टूट गए।
और अगले ही पल मंदिर का मुख्य दरवाजा जोर से खुल गया।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया।
इतना ठंडा कि कई लोगों की सांस अटक गई।
फिर दूर अंधेरे में वह दिखाई दिया।
सर्कटा।
पहले से बड़ा।
पहले से ज्यादा स्पष्ट।
उसके आसपास घूमती काली परछाइयां अब इंसानी आकृतियों जैसी लग रही थीं।
जैसे वर्षों से मरे हुए लोग उसके साथ चल रहे हों।
गांव वाले पीछे हटने लगे।
लेकिन सर्कटा आगे नहीं बढ़ा।
वह सिर्फ खड़ा रहा।
और फिर पहली बार…
उसके सीने पर बने चेहरे ने आंखें खोलीं।
मंदिर में मौजूद हर आदमी जम गया।
उस चेहरे के होंठ हिले।
और आवाज निकली।
“मेरा…”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर वही आवाज।
“सिर…”
अब किसी को संदेह नहीं था।
वह अपना सिर मांग रहा था।
उसी समय रामू अचानक मंदिर के बीच खड़ा हो गया।
जिस आदमी को सुबह तक बोलने की ताकत नहीं थी, वह अब सीधा खड़ा था।
उसकी आंखें पूरी तरह काली हो चुकी थीं।
दत्तात्रय काका चिल्लाए,
“उसे पकड़ो!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
रामू किसी पागल आदमी की तरह मंदिर से बाहर भागा।
सीधे हवेली की दिशा में।
मैं, निखिल और कुछ लोग उसके पीछे दौड़े।
रात का अंधेरा घना हो चुका था।
रामू ऐसे भाग रहा था जैसे उसे रास्ता याद हो।
जैसे कोई उसे बुला रहा हो।
हम हवेली पहुंचे।
तहखाने का दरवाजा खुला हुआ था।
रामू बिना रुके अंदर उतर गया।
हम भी उसके पीछे गए।
जब हम लाल घेरे वाले कमरे में पहुंचे…
तो हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई।
खोपड़ी गायब थी।
रामू उसे दोनों हाथों में पकड़े खड़ा था।
उसके पीछे सर्कटा मौजूद था।
पहले से कहीं ज्यादा करीब।
अब उनके बीच सिर्फ कुछ कदमों का फासला था।
दत्तात्रय काका चिल्लाए,
“रामू! उसे नीचे रख दो!”
लेकिन रामू मुस्कुरा रहा था।
वह अपनी आवाज में नहीं बोला।
उसके मुंह से दूसरी आवाज निकली।
भारी।
ठंडी।
और नफरत से भरी।
“दो सौ साल…”
“मैंने दो सौ साल इंतजार किया है।”
सर्कटा आगे बढ़ा।
एक कदम।
फिर दूसरा।
पूरा कमरा कांपने लगा।
छत से पत्थर गिरने लगे।
दीवारों पर दरारें पड़ने लगीं।
रामू ने खोपड़ी ऊपर उठाई।
और तभी मुझे कुछ याद आया।
भीमा की चेतावनी।
सिर को नष्ट करना होगा।
मैं पूरी ताकत से रामू की तरफ दौड़ा।
उसने मुझे धक्का दिया।
मैं पत्थरों से टकराकर गिर पड़ा।
लेकिन उसी दौरान खोपड़ी उसके हाथ से छूट गई।
वह जमीन पर लुढ़कती हुई कमरे के बीच पहुंच गई।
सर्कटा उसकी तरफ झपटा।
मैं भी।
मुझे नहीं पता उस समय मुझमें इतनी ताकत कहां से आई।
मैंने पास पड़ी मशाल उठाई।
और पूरी ताकत से खोपड़ी पर दे मारी।
पहला वार।
दरार पड़ी।
दूसरा वार।
और बड़ी दरार।
तीसरे वार के साथ पूरी खोपड़ी टूट गई।
उसी क्षण ऐसा लगा जैसे पूरे तहखाने में विस्फोट हो गया हो।
एक भयानक चीख गूंजी।
इतनी तेज कि कान सुन्न हो गए।
सर्कटा वहीं रुक गया।
उसके शरीर से काला धुआं निकलने लगा।
सीने पर बना चेहरा दर्द से विकृत हो गया।
वह पीछे हटने लगा।
फिर उसकी पूरी आकृति टूटने लगी।
जैसे राख हवा में बिखर रही हो।
कुछ सेकंड बाद…
वह गायब था।
पूरी तरह।
काला धुआं भी खत्म हो गया।
ठंडी हवा भी।
कमरे की कंपकंपी भी।
सब कुछ अचानक शांत हो गया।
इतना शांत कि विश्वास करना मुश्किल था कि कुछ पल पहले वहां क्या हो रहा था।
दत्तात्रय काका जमीन पर बैठ गए।
उनकी आंखों में आंसू थे।
उन्होंने धीरे से कहा,
“खत्म हो गया।”
उस रात के बाद देवगढ़ में फिर कभी सर्कटे को नहीं देखा गया।
गणपत धीरे-धीरे ठीक हो गया।
रामू भी सामान्य हो गया।
गांव में पहली बार लोग रात के बाद भी बाहर बैठने लगे।
डर जो पीढ़ियों से उनके साथ था, आखिरकार खत्म हो चुका था।
लेकिन कई महीनों बाद जब मैं शहर लौट चुका था, एक रात मेरे फोन पर एक अज्ञात नंबर से फोटो आई।
फोटो धुंधली थी।
लगता था किसी ने रात में ली थी।
पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया।
फिर मैंने तस्वीर को ज़ूम किया।
दूर एक खेत के किनारे कोई खड़ा था।
लंबा।
असामान्य रूप से लंबा।
और उसके कंधों के ऊपर…
कुछ नहीं था।
समाप्त

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