Jatinga Ghat Horror Story | उस रात जंगल मुझे बुला रहा था

BY GOVIND BHISE

जटिंगा घाट का नाम मैंने पहली बार किसी Horror Story में नहीं, बल्कि एक पुराने अख़बार के लेख में पढ़ा था। उस लेख में लिखा था कि असम की पहाड़ियों के बीच बसे जटिंगा नाम के इलाके में कई सालों से एक अजीब घटना होती रही है। कुछ खास रातों में पक्षी खुद उड़कर रोशनी की तरफ आते हैं और कई बार अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। वैज्ञानिकों ने इसके कई कारण बताए, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच आज भी इस जगह को लेकर कई डरावनी कहानियाँ सुनाई जाती हैं।

सच कहूँ तो मैं उन बातों पर ज्यादा विश्वास नहीं करता था।

मुझे लगा कि यह भी उन रहस्यमयी कहानियों में से एक होगी जिन्हें लोग समय के साथ बढ़ा-चढ़ाकर बताते रहते हैं।

Jatinga Ghat Horror Story

लेकिन फिर मुझे खुद जटिंगा घाट जाने का मौका मिला। Jatinga Ghat Horror Story

और जो कुछ मैंने वहाँ देखा… उसके बाद मैं कभी पहले जैसा नहीं रहा।

यह घटना लगभग चार साल पुरानी है।

मैं उस समय एक ट्रैवल ब्लॉग के लिए काम करता था। मेरा काम भारत की अनोखी और रहस्यमयी जगहों पर जाकर उनके बारे में लिखना था। उसी दौरान मेरे एडिटर ने मुझे असम भेजा।

उन्हें जटिंगा के पक्षियों वाली घटना पर एक विस्तृत लेख चाहिए था।

शुरुआत में मुझे यह असाइनमेंट बहुत साधारण लगा। मैंने सोचा था कि वहाँ जाऊँगा, कुछ स्थानीय लोगों से बात करूँगा, तस्वीरें लूँगा और वापस लौट आऊँगा।

लेकिन जिस रात मैं जटिंगा घाट पहुँचा, उसी रात मुझे एहसास हो गया कि यह जगह साधारण नहीं थी।

शाम ढल रही थी जब मेरी जीप पहाड़ी रास्तों से गुजर रही थी।

चारों तरफ घना जंगल था।

सड़क इतनी संकरी थी कि कई जगह दो गाड़ियाँ एक साथ नहीं निकल सकती थीं।

पहाड़ियों के ऊपर बादल इतने नीचे उतर आए थे कि लगता था जैसे पूरा इलाका किसी सफेद धुएँ में डूबा हुआ हो।

ड्राइवर का नाम बिपुल था।

वह पूरे रास्ते चुपचाप गाड़ी चला रहा था।

लेकिन जैसे-जैसे हम जटिंगा के करीब पहुँचने लगे, उसका व्यवहार बदलने लगा।

वह बार-बार रियर व्यू मिरर में देखने लगा।

उसके चेहरे पर अजीब बेचैनी दिखाई दे रही थी।

आखिर मैंने पूछ ही लिया।

“क्या हुआ?”

उसने कुछ क्षण चुप रहने के बाद कहा,

“सर… रात होने से पहले पहुँच जाना अच्छा रहेगा।”

“क्यों?”

वह कुछ सेकंड तक चुप रहा।

फिर बोला,

“यहाँ रात में कुछ आवाज़ें आती हैं।”

मैं हँस पड़ा।

“जंगल है। जानवर होंगे।”

उसने मेरी तरफ देखा।

उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

“जानवरों की आवाज़ अलग होती है।”

उसके बाद उसने कुछ नहीं कहा।

करीब एक घंटे बाद हम गाँव पहुँचे।

वह छोटा-सा पहाड़ी गाँव था।

लकड़ी के घर, संकरी पगडंडियाँ और चारों तरफ फैला घना जंगल।

गाँव में पहुँचते ही मुझे सबसे पहली अजीब बात महसूस हुई।

सूरज पूरी तरह डूबा भी नहीं था, फिर भी लगभग हर घर का दरवाजा बंद था।

सड़कें खाली थीं।

बच्चे दिखाई नहीं दे रहे थे।

लोग जल्दी-जल्दी अपने घरों के अंदर जा रहे थे।

ऐसा लग रहा था जैसे पूरा गाँव किसी चीज़ से बचने की कोशिश कर रहा हो।

मेरा ठहरने का इंतजाम एक पुराने गेस्ट हाउस में था।

गेस्ट हाउस का मालिक एक बुजुर्ग व्यक्ति था।

उसका नाम हेमंत था।

रात के खाने के दौरान मैंने उससे पक्षियों वाली घटना के बारे में पूछा।

वह कुछ देर तक मेरी तरफ देखता रहा।

फिर धीरे से बोला,

“आप यहाँ पक्षियों के लिए आए हैं… लेकिन शायद आपको कुछ और देखने को मिले।”

Jatinga Ghat Horror Story

मैं मुस्कुरा दिया।

“मतलब?”

उसने खिड़की के बाहर अंधेरे जंगल की तरफ देखा।

“रात में अगर कोई आपका नाम लेकर बुलाए… तो जवाब मत देना।”

उसकी बात सुनकर मेरी हँसी निकल गई।

मुझे लगा वह मजाक कर रहा है।

लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

रात करीब साढ़े दस बजे मैं अपने कमरे में था।

बाहर तेज़ हवा चल रही थी।

जंगल की दिशा से अजीब सीटी जैसी आवाजें आ रही थीं।

मैं लैपटॉप पर नोट्स लिख रहा था तभी अचानक बिजली चली गई।

पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

मैंने मोबाइल की Flashlight ऑन कर ली।

उसी समय मुझे बाहर किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

चर्र…

चर्र…

जैसे कोई सूखे पत्तों पर धीरे-धीरे चल रहा हो।

मैंने खिड़की से बाहर देखा।

अंधेरे के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया।

लेकिन आवाज़ लगातार करीब आती जा रही थी।

फिर अचानक सब शांत हो गया।

कुछ सेकंड बाद…

मुझे अपना नाम सुनाई दिया।

“अभिषेक…”

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

आवाज बहुत धीमी थी।

लगभग फुसफुसाहट जैसी।

मैं खिड़की के पास गया।

बाहर कोई नहीं था।

फिर वही आवाज़ दोबारा आई।

इस बार थोड़ा साफ।

“अभिषेक… बाहर आओ…”

मेरा गला सूख गया।

मैंने तुरंत खिड़की बंद कर दी।

तभी मुझे हेमंत की बात याद आई।

“अगर कोई आपका नाम लेकर बुलाए… तो जवाब मत देना।”

मैंने खुद को समझाया कि शायद कोई गाँव वाला मजाक कर रहा होगा।

लेकिन रात भर मुझे नींद नहीं आई।

अगली सुबह मैंने गाँव के कई लोगों से बात की।

दिलचस्प बात यह थी कि जब भी मैं रात वाली घटना का जिक्र करता, लोग विषय बदल देते।

कोई सीधे जवाब नहीं देता।

आखिर एक बुजुर्ग महिला ने मुझे अलग ले जाकर कहा,

“जंगल की तरफ मत जाना।”

“क्यों?”

“जो आवाजें सुनाई देती हैं… वे इंसानों की नहीं होतीं।”

मैंने पूछा,

“क्या आपने खुद सुना है?”

उसने सिर हिलाया।

“बहुत साल पहले मेरा बेटा उन आवाजों के पीछे गया था।”

“फिर?”

महिला की आँखें भर आईं।

“वह वापस आया… लेकिन पहले जैसा नहीं।”

उसने उससे ज्यादा कुछ नहीं बताया।

उस रात मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई।

करीब ग्यारह बजे मैं कैमरा लेकर गेस्ट हाउस से निकल पड़ा।

मेरा इरादा जंगल के किनारे तक जाकर रिकॉर्डिंग करने का था।

हवा ठंडी थी।

घना कोहरा फैल चुका था।

टॉर्च की रोशनी भी कुछ मीटर से आगे नहीं जा रही थी।

मैं धीरे-धीरे पगडंडी पर आगे बढ़ता गया।

करीब पंद्रह मिनट बाद मुझे दूर एक रोशनी दिखाई दी।

जंगल के बीच।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई लालटेन जल रही हो।

मैं उस दिशा में बढ़ने लगा।

जैसे-जैसे मैं करीब पहुँचा, मुझे एहसास हुआ कि वहाँ सिर्फ रोशनी नहीं थी।

कुछ लोग भी खड़े थे।

कम से कम मुझे ऐसा लगा।

लेकिन जब मैं और पास पहुँचा…

तो मेरा दिल जोर से धड़कने लगा।

वहाँ कोई इंसान नहीं था।

सिर्फ लंबे बाँस थे जिनके ऊपर लालटेन टंगी हुई थी।

और उनके नीचे…

सैकड़ों पक्षी पड़े थे।

कुछ मृत।

कुछ घायल।

कुछ अभी भी फड़फड़ा रहे थे।

पूरा दृश्य बेहद विचित्र था।

मैं कैमरा निकालने ही वाला था कि अचानक मुझे पीछे किसी की मौजूदगी महसूस हुई।

मैं पलटा।

वहाँ एक आदमी खड़ा था।

सफेद कपड़े पहने हुए।

उसका चेहरा कोहरे में साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

“आप यहाँ क्या कर रहे हैं?” मैंने पूछा।

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

बस मेरी तरफ देखता रहा।

फिर धीरे-धीरे जंगल की तरफ मुड़ गया।

और चलते-चलते कोहरे में गायब हो गया।

मैं उसके पीछे भागा।

लेकिन कुछ ही सेकंड में वह नजरों से ओझल हो गया।

उसी समय जंगल के अंदर से कई आवाजें सुनाई देने लगीं।

फुसफुसाहटें।

दर्जनों आवाजें।

सभी एक साथ।

और उनमें से हर आवाज मेरा नाम ले रही थी।

“अभिषेक…”

मेरे हाथ काँपने लगे।

मैं दौड़कर वापस गाँव की तरफ भागा।

उस रात पहली बार मुझे डर महसूस हुआ।

असली डर।

अगली सुबह मैंने हेमंत को पूरी बात बताई।

उसने लंबी साँस ली।

फिर बोला,

“तुमने उसे देख लिया।”

“किसे?”

“घाट वाले आदमी को।”

मैंने पूछा,

“वह कौन है?”

हेमंत कुछ देर चुप रहा।

फिर उसने जो कहानी सुनाई, उसे सुनकर मेरी रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

करीब तीस साल पहले एक व्यक्ति पक्षियों वाली घटना की सच्चाई खोजने निकला था।

वह कई रातों तक जंगल में घूमता रहा।

एक रात वह गायब हो गया।

कई दिनों बाद उसकी लाश घाटी में मिली।

लेकिन उसके बाद लोगों ने दावा करना शुरू किया कि वह अब भी जंगल में दिखाई देता है।

कई यात्रियों ने सफेद कपड़ों वाले आदमी को देखने की बात कही थी।

और लगभग हर बार उसके बाद कुछ न कुछ बुरा हुआ था।

मैंने कहानी को अंधविश्वास मानकर नजरअंदाज कर दिया।

लेकिन उसी शाम एक और घटना हुई।

मैं अपने कैमरे की फुटेज देख रहा था।

तभी मुझे एक अजीब चीज दिखाई दी।

जिस समय मैंने जंगल में रिकॉर्डिंग की थी…

फ्रेम के पीछे कुछ सेकंड के लिए एक चेहरा दिखाई दिया।

वही सफेद कपड़ों वाला आदमी।

लेकिन उसका चेहरा इंसानी नहीं लग रहा था।

उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

और उसका मुँह असामान्य रूप से लंबा दिखाई दे रहा था।

मैंने वीडियो कई बार देखा।

हर बार वही दृश्य था।

उस रात मैं गाँव छोड़ने का फैसला कर चुका था।

लेकिन किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था।

करीब आधी रात को बाहर अचानक चीख सुनाई दी।

इतनी भयानक कि मेरी नींद खुल गई।

पूरा गाँव जाग गया।

लोग टॉर्च लेकर बाहर निकल आए।

मैं भी उनके साथ गया।

चीख जंगल की तरफ से आई थी।

कुछ देर बाद हमें एक युवक मिला।

वह काँप रहा था।

उसकी हालत बेहद खराब थी।

वह बार-बार एक ही बात कह रहा था।

“उन्होंने बुलाया था… उन्होंने बुलाया था…”

लेकिन जब लोगों ने पूछा कि कौन…

तो वह बेहोश हो गया।

सुबह तक उसकी मौत हो चुकी थी।

डॉक्टर ने हार्ट फेलियर बताया।

लेकिन गाँव वाले कुछ और मानते थे।

और सच कहूँ…

उस रात के बाद मैं भी उनकी बातों को पूरी तरह झूठ नहीं कह पाया।

अगली सुबह मैं जटिंगा छोड़कर वापस लौट आया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

घर लौटने के बाद कई हफ्तों तक मुझे रात में वही फुसफुसाहटें सुनाई देती रहीं।

कई बार ऐसा लगता जैसे कोई मेरे कमरे के बाहर खड़ा है।

कई बार मुझे वही सफेद कपड़ों वाला आदमी सपनों में दिखाई देता।

फिर एक दिन मैंने कैमरे की सारी फुटेज डिलीट कर दी।

उसके बाद धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया।

लेकिन आज भी जब जटिंगा घाट का नाम सुनता हूँ, तो उस रात का कोहरा, जंगल की फुसफुसाहटें और वह सफेद आकृति मेरी आँखों के सामने आ जाती है।

हो सकता है कि उन घटनाओं का कोई वैज्ञानिक कारण हो।

हो सकता है कि मेरा दिमाग डर की वजह से भ्रम पैदा कर रहा हो।

लेकिन एक सवाल आज भी मेरे मन में है।

अगर वह सब सिर्फ भ्रम था…

तो उस रात जंगल में मेरा नाम लेकर मुझे कौन बुला रहा था?

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