चुड़ैल के गोलगप्पे खाना मना है | Chudail Ke Golgappe Horror Story

हमारे इलाके में एक अजीब कहावत बहुत सालों से चली आ रही थी।

“रात के बाद अगर सड़क किनारे कोई गोलगप्पे वाला दिखे… तो उसके गोलगप्पे मत खाना।”

बचपन में जब भी हम यह बात सुनते, हंस दिया करते थे। हमें लगता था कि यह भी उन पुरानी कहानियों में से एक होगी जिन्हें बड़े लोग बच्चों को डराने के लिए बना लेते हैं।

लेकिन कुछ कहानियाँ मजाक नहीं होतीं।

Chudail Ke Golgappe Horror Story

कुछ कहानियाँ चेतावनी होती हैं।

और यह बात मुझे बहुत देर से समझ आई।

यह घटना लगभग आठ साल पुरानी है। Chudail Ke Golgappe Horror Story

उस समय मैं एक निजी कंपनी में काम करता था और रोज़ शहर से अपने गाँव लौटता था। दफ्तर से निकलते-निकलते अक्सर देर हो जाती थी। कई बार रात के दस या ग्यारह बज जाते थे।

उस दिन भी ऐसा ही हुआ।

ऑफिस में अचानक एक जरूरी काम आ गया था। जब तक मैं निकला, रात के लगभग साढ़े ग्यारह बज चुके थे।

बस स्टैंड तक पहुँचते-पहुँचते आखिरी बस निकल चुकी थी।

मेरे पास केवल एक विकल्प था।

पैदल चलकर मुख्य सड़क तक जाऊँ और वहाँ से कोई वाहन मिलने का इंतजार करूँ।

सड़क लगभग सुनसान थी।

दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

आसमान पर बादल छाए हुए थे और हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

करीब बीस मिनट चलने के बाद मुझे भूख महसूस होने लगी।

सुबह से ठीक से खाना नहीं खाया था।

उसी समय मुझे आगे हल्की रोशनी दिखाई दी।

पहले लगा शायद कोई चाय की दुकान होगी।

लेकिन जब मैं पास पहुँचा तो देखा कि वह एक गोलगप्पे का ठेला था।

मैं थोड़ी देर के लिए रुक गया।

इतनी रात में?

इतनी सुनसान जगह पर?

यह बात अजीब जरूर थी।

लेकिन भूख उससे भी ज्यादा अजीब चीज होती है।

ठेले के पास एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

उसका चेहरा आधा अंधेरे में छिपा हुआ था।

Chudail Ke Golgappe Horror Story

सफेद रंग की पुरानी साड़ी पहनी हुई थी।

उसने मुझे देखते ही मुस्कुराकर कहा,

“बेटा, गोलगप्पे खाओगे?”

उसकी आवाज बहुत धीमी थी।

जैसे किसी गहरी सुरंग से आ रही हो।

मैंने इधर-उधर देखा।

पूरी सड़क खाली थी।

“माँजी, इतनी रात को दुकान?”

मैंने पूछा।

वह फिर मुस्कुराई।

“कुछ लोग दिन में आते हैं… कुछ लोग रात में।”

उसका जवाब सुनकर मुझे अजीब लगा।

लेकिन तब तक मेरी नजर गोलगप्पों पर जा चुकी थी।

सामने मिट्टी के मटके में पानी भरा हुआ था।

गोलगप्पे बिल्कुल ताजे लग रहे थे।

मैंने सोचा खाकर आगे बढ़ जाऊँगा।

जैसे ही मैंने पहला गोलगप्पा खाया, एक अजीब स्वाद महसूस हुआ।

वह स्वाद पहले कभी नहीं चखा था।

न ज्यादा खट्टा।

न ज्यादा तीखा।

फिर भी ऐसा कि एक बार खाने के बाद दूसरा खाने का मन करे।

मैं लगातार खाते चला गया।

दस…

पंद्रह…

बीस…

मुझे खुद नहीं पता चला कि कितने गोलगप्पे खा चुका था।

बूढ़ी औरत बस मुस्कुराकर मुझे देख रही थी।

अचानक उसने पूछा,

“कैसा लगा?”

मैंने कहा,

“बहुत अच्छा।”

उसकी मुस्कान और चौड़ी हो गई।

“सबको अच्छा लगता है।”

पता नहीं क्यों, उसके यह कहते ही मेरे शरीर में हल्की सिहरन दौड़ गई।

मैंने पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला।

लेकिन उसने सिर हिलाकर मना कर दिया।

“रहने दो।”

“क्यों?”

“जो यहाँ खाते हैं… उनसे पैसे नहीं लिए जाते।”

अब मुझे सचमुच बेचैनी होने लगी।

मैंने जल्दी से धन्यवाद कहा और वहाँ से चल पड़ा।

करीब आधा किलोमीटर आगे जाने के बाद मुझे पीछे मुड़कर देखने का मन हुआ।

लेकिन जब मैंने पीछे देखा…

वहाँ कुछ भी नहीं था।

न ठेला।

न रोशनी।

न वह बूढ़ी औरत।

सड़क बिल्कुल खाली थी।

जैसे वहाँ कभी कुछ था ही नहीं।

मेरे कदम रुक गए।

मैंने आँखें मलीं।

फिर देखा।

कुछ नहीं।

एक पल के लिए लगा कि शायद मैं गलत दिशा में देख रहा हूँ।

लेकिन नहीं।

जहाँ अभी कुछ मिनट पहले ठेला खड़ा था, वहाँ सिर्फ सूखी घास थी।

उस रात मैं किसी तरह घर पहुँचा।

लेकिन असली डर अगले दिन शुरू हुआ।

सुबह उठते ही मुझे फिर वही स्वाद याद आने लगा।

वही गोलगप्पे।

अजीब बात यह थी कि मुझे इतनी तीव्र इच्छा पहले कभी किसी खाने के लिए नहीं हुई थी।

दोपहर तक मेरा ध्यान सिर्फ उसी तरफ था।

शाम होते-होते ऐसा लगने लगा जैसे कोई मुझे लगातार बुला रहा हो।

“फिर आओ…”

“फिर खाओ…”

“फिर आओ…”

आवाज़ कानों में नहीं, दिमाग में गूंज रही थी।

उस रात मुझे नींद नहीं आई।

जब भी आँखें बंद करता, वही गोलगप्पे दिखाई देते।

वही मटका।

वही बूढ़ी औरत।

और उसकी मुस्कान।

तीसरे दिन हालत और खराब हो गई।

मैं बिना वजह चिड़चिड़ा होने लगा।

खाना खाने का मन नहीं करता था।

लेकिन गोलगप्पों के बारे में सोचते ही भूख बढ़ जाती थी।

तब मैंने यह बात अपने दादा को बताई।

मेरी पूरी कहानी सुनने के बाद उनके चेहरे का रंग बदल गया।

उन्होंने तुरंत पूछा,

“उस औरत की आँखें कैसी थीं?”

मैंने सोचा और कहा,

“अजीब थीं… बहुत चमक रही थीं।”

दादा कुछ देर तक चुप रहे।

फिर बोले,

“तूने गलती कर दी।”

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“कौन थी वो?”

दादा ने धीमी आवाज में कहा,

“पुराने समय में इसी इलाके में एक औरत रहती थी। लोग कहते हैं कि वह तांत्रिक विद्या जानती थी। उसकी मौत के बाद कई लोगों ने रात में उसे सड़क किनारे देखा।”

मैंने हँसने की कोशिश की।

लेकिन दादा बिल्कुल गंभीर थे।

“जो उसके हाथ का कुछ खा लेता है, उसका मन वापस उसी के पास जाने लगता है।”

“फिर क्या होता है?”

मैंने पूछा।

दादा ने मेरी तरफ देखा।

“कुछ लोग वापस लौट आते हैं।”

“और कुछ?”

“कुछ लोग फिर कभी नहीं लौटते।”

उस रात पहली बार मुझे सचमुच डर लगा।

लेकिन मुझे नहीं पता था कि सबसे भयानक हिस्सा अभी बाकी था।

क्योंकि उसी रात ठीक दो बजे मेरे कमरे की खिड़की के बाहर किसी ने बहुत धीरे से आवाज लगाई—

“बेटा…

एक और गोलगप्पा खाओगे…?”

और जब मैंने खिड़की की तरफ देखा…

तो बाहर सड़क पर वही ठेला खड़ा था।

और उसके पीछे खड़ी बूढ़ी औरत इस बार मुस्कुरा नहीं रही थी।

उस रात खिड़की के बाहर वही ठेला खड़ा था।

और ठेले के पीछे खड़ी बूढ़ी औरत इस बार मुस्कुरा नहीं रही थी।

उसकी आँखें सीधे मेरी आँखों में देख रही थीं, जैसे वह कमरे की दीवारों के पार भी मुझे देख सकती हो।

मेरे गले से आवाज नहीं निकली।

मैंने जल्दी से परदा खींच दिया और पीछे हट गया।

दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि लग रहा था पूरा कमरा उसकी आवाज से भर गया है।

बाहर से फिर वही धीमी आवाज आई—

“बेटा… सिर्फ एक गोलगप्पा।”

मैंने दोनों कान बंद कर लिए।

लेकिन आवाज कानों से नहीं आ रही थी।

वह सीधे दिमाग के अंदर गूंज रही थी।

“तुम्हें अच्छा लगा था ना?”

मैं पूरी रात जागता रहा।

सुबह होते ही दादा मेरे कमरे में आए। शायद उन्होंने मेरी हालत देख ली थी।

मैंने बिना कुछ छिपाए सारी बात बता दी।

दादा ने तुरंत कहा, “अब देर नहीं करनी चाहिए।”

उन्होंने मुझे गाँव के बाहर रहने वाले एक पुराने पुजारी के पास ले गए। लोग उन्हें काशीनाथ बाबा कहते थे।

बाबा ने मेरी आँखों में देखा और बोले, “तूने उसका खाना खाया है। अब वह तुझे अपना ग्राहक नहीं, अपना रास्ता समझ रही है।”

मैंने घबराकर पूछा, “रास्ता?”

बाबा ने धीरे से कहा, “कुछ आत्माएँ सीधे इंसान को नहीं ले जा सकतीं। पहले उसकी इच्छा पर कब्जा करती हैं। जब आदमी खुद वापस जाता है, तब वह उसे रोक लेती हैं।”

मेरी रीढ़ में ठंड उतर गई।

बाबा ने मुझे एक काला धागा दिया और कहा, “आज रात वह फिर आएगी। लेकिन इस बार तू भागेगा नहीं। तू देखेगा कि वह कहाँ से आती है।”

मैंने डरते हुए पूछा, “और अगर उसने मुझे पकड़ लिया?”

बाबा बोले, “डर मत। जब तक तू उसके हाथ से फिर कुछ नहीं खाएगा, वह तुझे पूरा अपना नहीं बना पाएगी।”

रात हुई।

दादा, बाबा और मैं कमरे में बैठे रहे।

लगभग दो बजे बाहर से पहियों की बहुत हल्की चरमराहट सुनाई दी।

मेरे शरीर का सारा खून जैसे जम गया।

खिड़की के बाहर वही ठेला था।

इस बार बूढ़ी औरत ने सीधे दरवाजे की तरफ देखा।

“आज अकेले नहीं हो बेटा?”

बाबा ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

अचानक ठेले की रोशनी झिलमिलाने लगी।

औरत का चेहरा बदलने लगा।

उसकी झुकी हुई कमर सीधी हो गई।

सफेद बाल काले होने लगे।

झुर्रियाँ गायब हो गईं।

कुछ ही पलों में वह बूढ़ी औरत नहीं रही।

वह एक लंबी, पीली आँखों वाली औरत थी, जिसका चेहरा इंसानी होते हुए भी इंसानी नहीं लग रहा था।

उसने गुस्से में कहा, “जिसने मेरा स्वाद चखा है, वह वापस आएगा।”

बाबा ने दरवाजा खोला और बाहर कदम रखा।

मैं और दादा उनके पीछे थे।

सड़क पर ठेला धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।

जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे खींच रहा हो।

बाबा ने कहा, “इसके पीछे चलो। लेकिन दूरी रखो।”

हम तीनों उस ठेले के पीछे-पीछे गाँव से बाहर निकल गए।

रास्ता पुरानी बस्ती की तरफ जा रहा था, जहाँ अब कोई नहीं रहता था।

वहाँ एक सूखा कुआँ था।

लोग कहते थे कि बहुत साल पहले उसी कुएँ के पास एक औरत गोलगप्पे बेचा करती थी।

उसका नाम गौरी था।

गौरी का ठेला पूरे इलाके में मशहूर था। लोग दूर-दूर से उसके गोलगप्पे खाने आते थे।

लेकिन एक दिन कुछ लोगों ने अफवाह फैला दी कि वह खाने में टोना करती है।

लोगों ने उससे खरीदना बंद कर दिया।

कर्ज बढ़ गया।

अपमान बढ़ता गया।

और एक रात गौरी उसी कुएँ के पास गायब हो गई।

किसी ने खोजा नहीं।

किसी ने सच जानने की कोशिश नहीं की।

बस कहानी बना दी गई—

“वह चुड़ैल थी।”

बाबा ने कुएँ के पास रुककर कहा, “वह चुड़ैल पैदा नहीं हुई थी। उसे लोगों ने बनाया।”

यह सुनते ही ठेले की रोशनी एकदम तेज हो गई।

गौरी कुएँ के पास खड़ी थी।

उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, दर्द था।

उसने मेरी तरफ देखा।

“मैंने किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया था। लोग मेरे हाथ का खाना खाते थे, तारीफ करते थे। फिर उन्हीं लोगों ने मुझे अपवित्र कहा।”

उसकी आवाज भारी होती गई।

“मैं भूखी मरी… और दुनिया ने मुझे राक्षस कह दिया।”

कुछ पल के लिए मुझे उस पर दया आई।

शायद यही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी।

क्योंकि जैसे ही मेरे मन में दया आई, मेरे कदम खुद उसकी तरफ बढ़ने लगे।

दादा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

गौरी ने ठेले से एक गोलगप्पा उठाया।

“बस आखिरी बार खा लो। फिर भूख कभी नहीं लगेगी।”

मेरे हाथ काँपने लगे।

सच कहूँ तो उस पल मुझे सच में उसे खाने का मन हुआ।

वह स्वाद फिर से याद आने लगा।

मेरे मुँह में पानी आने लगा।

बाबा जोर से बोले, “उसकी भूख तेरी नहीं है। याद रख!”

मैंने आँखें बंद कर लीं।

अपने घर को याद किया।

दादा को याद किया।

अपनी माँ की रसोई की खुशबू याद की।

धीरे-धीरे वह खिंचाव कमजोर पड़ने लगा।

गौरी की आँखों में पहली बार डर दिखाई दिया।

बाबा ने कुएँ के पास एक पुराना लोहे का डिब्बा खोदा।

उसमें कुछ सिक्के, टूटी चूड़ियाँ और एक पुराना कपड़ा रखा था।

बाबा बोले, “यही उसका अधूरा संसार है। इसकी देह नहीं मिली, इसका सम्मान नहीं मिला, इसका अंतिम अन्न नहीं मिला।”

दादा ने गाँव के पाँच बुजुर्गों को बुलवाया।

सुबह होने से पहले उसी कुएँ के पास एक छोटा सा विधि-विधान किया गया।

बाबा ने कहा कि उसे डर से नहीं, सम्मान से विदा करना होगा।

गाँव वालों ने पहली बार उसके लिए दीप जलाए।

किसी ने उसे चुड़ैल नहीं कहा।

सबने कहा—

“गौरी, हमें माफ करना।”

सूरज की पहली किरण जैसे ही कुएँ पर पड़ी, ठेला अपने आप धुएँ की तरह हल्का होने लगा।

गौरी कुछ दूर खड़ी थी।

अब उसका चेहरा डरावना नहीं था।

वह थकी हुई लग रही थी।

बहुत थकी हुई।

उसने मेरी तरफ देखा और धीरे से कहा,

“भूख सबसे बड़ा श्राप है बेटा। किसी भूखे इंसान को कभी अपमान मत देना।”

इतना कहकर वह रोशनी में घुल गई।

ठेला गायब हो गया।

मटका खाली रह गया।

और वह अजीब स्वाद मेरे दिमाग से हमेशा के लिए मिट गया।

उस घटना के बाद गाँव की सड़क पर फिर कभी रात में कोई गोलगप्पे वाला नहीं दिखा।

लेकिन आज भी हमारे घर में एक नियम है।

रात के बाद सुनसान सड़क पर कुछ भी मुफ्त में मिले…

तो उसे लेना मना है।

और अगर कभी बहुत देर रात कोई धीमी आवाज पूछे—

“गोलगप्पे खाओगे?”

तो जवाब मत देना।

क्योंकि हर भूख पेट की नहीं होती।

कुछ भूखें आत्मा तक पहुँच जाती हैं।

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